भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 150

विज्ञानभैरव : ९३ वेद्यराशौ गलिते सति स्वदेहमपि निराधारं विभावयन् स्वदेहावमर्शस्यापि गलनाद् आस्तरणाद्याश्रयरहितमेव स्ववपुर्विमृशन् क्षणात् सद्य एव क्षीणाशयो निर्वासनो भवेत् ॥८१॥ मृगचर्म, रेशमी वस्त्र, गलीचा, ऊनी वस्त्र, सूती कपड़ा, मखमल, शीतलपाटी आदि से बने कोमल आसन, तकिया, बिछावन, शय्या, चादर आदि का उपयोग करने पर शरीर को बड़ा आराम मिलता है ओर चित्त की सारी वृत्तियाँ कुछ क्षणों तक क्षीण हो जाती हैं । इस अवस्था में वृत्तियों के क्षीण हो जाने से चित्त जैसे निराधार हो जाता है । उन कोमल, सुखद वस्तुओं के उपयोग से चित्त की आनन्द भरी अवस्था के उत्पन्न होने पर योगी अपने शरीर में इसी निराधार भावना का अभ्यास करे । अर्थात् मैं देह नहीं हूँ, मेरा देह नहीं है, यह कोमल सुखद आसन आदि के उपयोग से आविर्भूत आनन्द दशा ही मेरा वास्तविक स्वरूप है, इस तरह की भावना का निरन्तर अभ्यास करते रहने से अपने शरीर के प्रति भी योगी की निरा- धार भावना दृढ़ हो जाती है, अर्थात् वह इस बात को भूल जाता है कि मेरा शरीर किन्हीं कोमल-सुखद वस्तुओं पर टिका हुआ है । अन्ततः उसको अपने शरीर की भी विस्मृति हो जाती है और इस तरह से उसकी सारी वासनाएं क्षण भर में शान्त हो जाती हैं ॥८१॥ [ धारणा-५९ ] चलासने स्थितस्याथ शनैर्वा देहचालनात् । प्रशान्ते मानसे भावे देवि दिव्यौघमाप्नुयात् ॥८२॥ हे देवि, अथ ¹चलासने अतिचञ्चले गन्त्रीगजतुरगादियानासने स्थितस्य उप- विष्टस्य तद्यानादिकृतदेहचलत्तया, वा अथवा, स्वयमेव शनैः देहचालनात्, मानसे भावे प्रशान्ते मनसः सत्तायां विलीनायां साधको दिव्यौघं दिव्यानां लोकानां परमयोगिनाम् ओघं समूहं तत्तेजस्तत्त्वम् आप्नुयात् प्राप्नुयात् । तस्य परमाकाशचिदानन्दप्रवाहावाप्तिः स्यादिति भावः ॥८२॥ हे देवि, अत्यन्त चंचल, गतिशील बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी, रथ, हाथी, घोड़ा आदि सवारियों पर बैठने पर सवारी के चलने से व्यक्ति का शरीर अपने आप हिलने-डुलने लगता है । साधक को चाहिये कि सवारी पर चढ़ कर चलने से उसका शरीर जो स्वाभाविक रूप से हिलने-डुलने लगा है, उसको जान-बूझ कर अपनी तरफ से और धीरे धीरे हिलावे-डुलावे । अथवा किसी चलासन पर बैठे बिना भी अपने शरीर को उसी तरह से हिलावे-डुलावे जैसे कि वह चलासन पर बैठ कर चल रहा हो । इस प्रक्रिया के अभ्यास से मन की सत्ता क्षीण होने लगती है, शरीर के हिलने-डुलने से एक अनोखे सुख का अनुभव होने लगता है, जिसमें कि कुछ क्षणों के लिये साधारण व्यक्ति की भी चित्त-वृत्ति लीन हो जाती है । इस स्थिति में

  1. शक्तिसंगम तन्त्र के द्वितीय तारा खण्ड के ४७-४९ पटलों में चलासनों का विस्तार से वर्णन मिलता है ।