विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९४ : विज्ञानभैरव भावना के अभ्यास से चित्त-वृत्ति को पूरी तरह से विलीन कर देने पर साधक को ^1दिव्यौघ की प्राप्ति हो जाती है, अर्थात् दिव्य लोकों में ! स करने वाले परम योगियों के तेजोमय स्वरूप की प्राप्ति उसे हो जाती है, वह परम आकाश के समान सर्वत्र विद्यमान चिदानन्द के प्रवाह में प्रविष्ट हो जाता है, उसका ज्ञानमय और आनन्दमय स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है ॥८२॥ [ धारणा-६० ] ^2लीनं मूर्ध्नि वियत्सर्वं खत्वेन भावयेत् । तत्सर्वं भैरवाकारं तेजस्तत्त्वं समाविशेत् ॥८३॥ सर्वं जगत्, वियद् आकाशरूपं तिमिररूपं वाऽन्तःकृतसर्वभावपरिपूर्णं भैरवत्वेन सर्वसंहारकालस्वरूपत्वेन मूर्ध्नि मुख्यभूते हृदयब्रह्मरन्ध्राख्ये, लीनं श्लिष्टम्, भावयेत् आकाशमयमेव चिन्तयेत् । तदनु तत्सर्वं भैरवाकारं भैरवाकृतिपरप्रकाशस्वरूपम्, तेज- स्तत्त्वं चित्रप्रकाशरूपं समाविशेत् । सर्वस्य उक्तलक्षणवियद्रूपत्वचिन्तनेन परप्रकाशता संपद्यत इत्यद्भुतं फलमस्या धारणायाः । यन्नीलपीतादि तत्सर्वं शिवमियमिति भावयतो ब्रह्म प्रकाशत इति भावः ॥८३॥ योगी को चाहिये कि वह ऐसी भावना करे कि यह सारा जगत् आकाश के रूप में अथवा अन्धकार के रूप में हृदय, ब्रह्मरन्ध्र आदि प्रमुख स्थानों में उसी तरह से विद्यमान है, जैसे कि इन स्थानों में जगत् के सभी पदार्थों को अपने मे समेटे हुए सर्वसंहारक कालरूपी भैरव विद्यमान है। इस भावना के अभ्यास को बढ़ाने पर अन्ततः आकाश, तिमिर, काल, जगत्, नील-पीत, आदि सभी पदार्थ भैरवस्वरूप प्रकाशमय परम तत्त्व में समाविष्ट हो जाते हैं। इस धारणा का यह अद्भुत व्यापार है कि इसमें आलम्बन तो अन्धकारमय आकाश को बनाया जाता है, किन्तु फल मिलता है—परम स्वरूप का प्रकाश । क्योंकि इस धारणा के अभ्यास से योगी चित्प्रकाश रूप तेजस्तत्त्व (ब्रह्म) में समाहित हो जाता है । अर्थात् इस संसार में जो कुछ भी नील, पीत आदि पदार्थ हैं, वे सब शिवमयं हैं, शिव से अभिन्न हैं, ऐसी भावना के दृढ़ हो जाने पर योगी के चित्त में ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है । शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत मालिनीवार्त्तिक में इसी धारणा को निम्न श्लोकों से स्पष्ट किया गया है— १. इतः पूर्वम्—"आकाशं विमलं पश्यन्" इत्यादिकः श्लोकोऽधिको व्याख्यातः शिवोपाध्यायेन।
- तन्त्रशास्त्र में ज्ञान की परम्परा को ओवल्ली या ओघ (प्रवाह) के नाम से जाना जाता है । दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ के भेद से यह तीन तरह की होती है । देवताओं से प्राप्त ज्ञान की परम्परा दिव्यौघ, सिद्धों से प्राप्त सिद्धौघ और मानव गुरुओं से प्राप्त ज्ञान-परम्परा मानवौघ के नाम से प्रसिद्ध है ।
- मालिनीविजयवार्त्तिक (पृ० ३७) में इसका प्रथम पाद मिलता है ।