विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ९५ ¹लीनं गमयतीत्युक्तेर्लिङ्गनिर्वचनं यतः। हृदये ब्रह्मरन्ध्रे च वियल्लीनं परे पदे ॥ तदप्यन्तःकृताशेषसृष्टभावसुनिर्भरम् । भेदभावकमायीयतेजोंऽशग्रसनाच्च तत् ॥ सर्वसंहारकत्वेन कृष्णं तिमिररूपधृक्। (पृ० ३७) अर्थात् छिपी हुई वस्तु का ज्ञान करा देने वाला लिंग कहलाता है। हृदय और ब्रह्मरन्ध्र रूपी पद में सारे जागतिक पदार्थों को अपने में समेटे हुए यह आकाश लीन हो जाता है। यह आकाश भेद की भावना को जन्म देने वाले मायानिर्मित तेजस्तत्त्व के अंश को खा जाता है। इस तरह से सबको अपने में समेटे हुए यह आकाश काले घने अन्धकार का रूप धारण कर लेता है। इस तिमिर रूप में धारणा का अभ्यास करने की बात विज्ञानभैरव के इस श्लोक में प्रतिपादित है ॥८३॥ [ धारणा-६१ ] किञ्चिज्ज्ञातं¹ द्वैतदायि बाह्यालोकस्तमः पुनः। विश्वादि भैरवं रूपं ²ज्ञात्वाऽनन्तप्रकाशभृत् ॥८४॥ किञ्चिज्ज्ञातं किञ्चिन्मात्रं घटकुड्यादिकं ज्ञानविषयीकृतम्, द्वैतदायि भेदप्रथाप्रदं जाग्रदवस्थागोचरम्, तथा बाह्यालोको बाह्यानां पदार्थानां जाग्रत्संस्कारजातानाम् आलोकः प्रकाशः स्वप्नावस्थाविषयः, पुनः भूयः, तमः अज्ञानयोगः सुप्तिस्थः, तथा एतदवस्थात्रयाभिमानि चैतन्यं विश्वादि । आदिशब्देन तैजसप्राज्ञादीनां ग्रहणम्। एतत्सर्वं विश्वतैजसादिप्रपञ्चजातं भैरवं रूपं तुरीयस्वरूपं ज्ञात्वा अनन्तप्रकाशभृत् अनन्तप्रकाशरूपो भवेत् । अथवा आदौ भेदमयं ध्यात्वा, ततश्च बाह्यश्चासावालोक- श्चन्द्रसूर्यादि, ततश्च तमः—एतत्सर्वं भैरवरूपं ध्यात्वाऽनन्तप्रकाशमयो भैरवो भवतीति श्लोकार्थः ॥८४॥ भेद-बुद्धि को बढ़ावा देने वाले घट, कुड्य (भित्ति=दीवाल) प्रभृति जाग्रत् अवस्था में प्रतीत हो रहे जिस किसी पदार्थ को, जाग्रत् अवस्था के संस्कारों से उत्पन्न बाह्य पदार्थों का ज्ञान कराने वाले स्वप्नावस्था के विषयों को, तथा सुषुप्ति अवस्था के विषय तम (अज्ञान) को एवं इन तीनों अवस्थाओं के अभिमानी विश्व, तैजस और प्राज्ञ नाम से प्रसिद्ध चैतन्य को भैरव रूप में, अर्थात् तुरीय (चतुर्थ) रूप में जानकर, यह सब उस तुरीय अवस्था के अभि- मानी भैरव का ही सर्वविध विकास है, इस बात को पूरी तरह से समझ लेने पर साधक योगी अनन्त प्रकाश से परिपूर्ण हो जाता है। १. ॰त्वा-ख० । २. ध्या०-ख० ।
- अभिनवगुप्त कृत मालिनीवार्त्तिक (पृ० ३७) में कुछ परिवर्तनों के साथ ये पंक्तियाँ मिलती हैं।