विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ : विज्ञानभैरव श्लोक की यह व्याख्या वेदान्त की प्रक्रिया के अनुसार की गई है। वेदान्त शास्त्र की दृष्टि से प्रस्तुत विषय को इस प्रकार समझा जा सकता है—सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति कहते हैं। माया और अविद्या के भेद से यह दो तरह की होती है। माया में विशुद्ध सत्त्व की प्रधानता रहती है और अविद्या में मलिन सत्त्व की। अर्थात् माया में केवल सत्त्व गुण की प्रधानता रहती है और अविद्या में यह सत्त्व गुण रज और तम से मलिन हो जाता है। चिदात्मा का जब माया में प्रतिबिम्ब पड़ता है, तो उस समय 'मैं इस सारे जगत् को जानता हूँ और बनाता हूँ' इस तरह से सर्वज्ञत्व आदि गुणों से विशिष्ट ईश्वर की अभिव्यक्ति होती है। यह ईश्वर एक ही है। वही चिदात्मा जब अविद्या में प्रतिबिम्बित होता है, तो उसे 'मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ' इस तरह की प्रतीति होने लगती है। तब यह जीव कहलाता है। यह स्वतन्त्र न होकर परतन्त्र है, अर्थात् ईश्वर के नियन्त्रण में रहता है। देव, तिर्यक् आदि के भेद से यह अनेक प्रकार का होता है। १ आतिवाहिक नामक लिंग शरीर में 'यह मैं हूँ' इस तरह का अभिमान रखने वाले जीव 'मैं सुखी हूँ, मैं मैं दुःखी हूँ, मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ' इस तरह से अन्तःकरण के स्वभावों को अपना स्वभाव मान लेते हैं, अर्थात् सुख, दुःख, भूख, प्यास ये सब वस्तुतः अन्तःकरण, शरीर आदि के धर्म हैं, आत्मा के नहीं; अविद्या के कारण जीव इनको अपनी आत्मा के धर्म मान लेते हैं। ये जीव तैजस कहलाते हैं। कारण शरीर के नाम से कही जाने वाली अविद्या में 'यह मैं ही हूँ' इस तरह का अलग-अलग अभिमान रखने वाले जीव 'प्राज्ञ' कहलाते हैं। एक एक स्थूल शरीर को लेकर 'मैं मोटा हूँ, मैं दुबला हूँ' इस तरह का अभिमान रखने वाले जीव 'विश्व' कहे जाते हैं। ऊपर बताये गये लक्षण वाला मायोपाधिक परमेश्वर सारे स्थूल शरीरों को अपना ही मानता है और 'हिरण्यगर्भ' कहलाता है। वही ईश्वर जब सारे स्थूल शरीरों को अपना मानता है, तो उसको 'वैश्वानर' कहा जाता है। प्राज्ञ जीव अविद्या को अपना स्वरूप मानते हैं। इस स्वरूप का ज्ञान उन्हें सुषुप्ति अवस्था में स्पष्ट होता है। जब वह सुषुप्ति अवस्था से उठता है, तब 'मैं उस समय मूढ़ हो गया था', 'मैं अपने को भी नहीं जानता' इस तरह की प्रतीति होती है। परमेश्वर की अविद्याविषयक प्रतीति इससे भिन्न प्रकार की होती है। वह मानता है कि 'सभी प्राज्ञों का मैं ही कर्ता हूँ'। इस तरह से प्राज्ञों के कर्ता के रूप में उसमें अविद्याविषयक अभिमान होता है, साक्षात् नहीं, क्योंकि वह तो सर्वज्ञ है। प्रलय अवस्था में जब ईश्वर योगनिद्रा में निमग्न हो जाता है, तब भी अविद्या उसमें वासना के रूप में विद्यमान रहती है। यदि ऐसा न हो तो कर्तृत्व आदि का अभिमान पैदा करने वाली अविद्या के न रहने से ब्रह्म अपनी कूटस्थ दशा से कैसे जीव दशा को प्राप्त कर सकता है ? इस प्रकार "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (छा० उ० ३।१४।१) इस श्रुति के अनुसार विश्व, तैजस, प्राज्ञ प्रभृति चेतन और इनके अतिरिक्त सारा अचेतन जगत् भी उस ब्रह्म का ही,
- लिंग शरीर को आतिवाहिक इसलिए कहा जाता है कि इसी के सहारे आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। "अतिवाहे इहलोकात् परलोकप्रापणे नियुक्त आतिवाहिकः" आतिवाहिक शब्द की इस व्युत्पत्ति से यही अर्थ निकलता है।