विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ९७ परभैरव तुरीय स्वरूप का ही विस्तार है, ऐसा जानकर साधक अनन्त प्रकाश से आलोकित हो उठता है । वस्तुतः इस श्लोक में भी प्रस्तुत तिमिर भावना का ही प्रकारान्तर से विधान किया गया है । प्रारम्भ में द्वैत दृष्टि के आधार पर किसी बाह्य स्थूल आलम्बन को धारणा का विषय बनाया जाता है । बाद में उसको छोड़कर बाह्य चन्द्र, सूर्य प्रभृति के प्रकाश पर धारणा स्थिर की जाती है । अन्त में उसको भी छोड़कर तिमिर में दृढ़ भावना का अभ्यास किया जाता है । इन सब स्वरूपों में परभैरव का स्वरूप ही विद्यमान है, इस भावना के अभ्यास से योगी स्वयं अनन्त प्रकाशस्वरूप भैरव हो जाता है ॥८४॥ [ धारणा-६२ ] ¹एवमेव दुर्निशायां कृष्णपक्षागमे चिरम् । तैमिरं भावयन्² रूपं भैरवं रूपमेष्यति ॥८५॥ एवमेव पूर्वोक्ततिमिरभावनावत्, कृष्णपक्षागमे दुर्निशायाम्, मेघच्छन्ना रात्रि- र्दुर्निशा, तस्यामन्धतामिस्रमहातामिस्रतामिस्ररूपायाम्, चिरं तैमिरं रूपं कालश्याम- लादि भयङ्कररूपं भैरवमुद्रितं भैरवमुद्राङ्कितं भयङ्करत्वाददृश्यं भावयन् योगी भैरवं रूपम् एष्यति प्राप्स्यति । तद्रूपस्य अत्याश्चर्यकारित्वादक्षयानन्दमाप्नुयादित्यर्थः । इयमक्षणोन्मीलनेन तिमिरभावना उक्ता ॥८५॥ पूर्व श्लोकों में बताई गई तिमिर भावना के समान ही कृष्ण पक्ष की घनघोर काले बादलों से भरी रात्रि में चिर काल तक तिमिर स्वरूप की भावना करे । मेघ से आच्छन्न रात्रि को दुर्निशा कहा जाता है । अन्धकार के गाढ़े और हलकेपन के कारण यह अन्धतामिस्र, महातामिस्र और तामिस्र के नाम से अभिहित होती है । इस घने अन्धकार में काले-सांवले रंग का कोई भयंकर स्वरूप आंखों के सामने एकाएक आ जाय, तो डर के मारे आदमी की घिग्घी बंध जाती है, वह उस स्वरूप को पूरी तरह से देख भी नहीं पाता । इस भयंकर अन्धकारमय स्वरूप में अपनी धारणा को केन्द्रित करना ही यहाँ तिमिर भावना कही गई है । यह परभैरव का ही अत्यन्त भयंकर स्वरूप माना जाता है । इसमें भावना को स्थिर करने से योगी को भैरव स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है, अर्थात् उसमें अक्षय आनन्द की अभिव्यक्ति हो जाती है और इसके कारण उसके सभी तरह के सांसारिक भय शान्त हो जाते हैं । इस भावना का अभ्यास करते समय योगी अपनी आंखों को खुली रखता है ॥८५॥ [ धारणा-६३ ] ²एवमेव निमील्यादौ नेत्रे कृष्णाभमग्रतः । प्रसार्य भैरवं रूपं भावयंस्तन्मयो भवेत् ॥८६॥ १. भावयेद् भैरवं रूपं भावयन्द्भिर्दुराभिदम्-मा० । २. ॰येद्-ख० म० । ३. ॰येत्त°-ख० ।
- महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १४०) और मालिनीवार्तिक (पृ० ३७) में देखिये ।
- नेत्रतन्त्र की क्षेमराज कृत व्याख्या (भा० १, पृ० २००) में देखिये ।