भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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९८ : विज्ञानभैरव अथाक्ष्णोर्निमीलनेन भावनामाह—एवमेव कृष्णपक्षदुर्निशाद्यभावेऽपि आदौ स्वनेत्रे निमील्य अग्रतः कृष्णाभं तमोरूपं भैरवं भावयन् पश्चात् नेत्रे प्रसार्यापि कृष्णाभं भैरवरूपं किमेतदित्याश्चर्यकारि, एतदेव भैरवं रूपमिति भावयन् तन्मयः प्रकाशमयो भवेत् ॥८६॥ इस श्लोक में निमीलन भावना को बताया गया है, अर्थात् आँख बन्द करके इस भावना का अभ्यास किया जाता है। कृष्ण पक्ष की घनी अँधियारी रात के न होने पर साधक को चाहिये कि वह अपनी आँखें बन्द कर ले और अपने सामने भयानक घने काले अन्धकार की भावना करे। इस भावना का अभ्यास बढ़ाने पर उसको आँखें खोल देने के बाद भी भगवान् भैरव का यह भयंकर स्वरूप ही भासित होता रहता है। अन्ततः उसकी भयंकरता समाप्त हो जाती है और अत्यन्त आश्चर्यजनक प्रकाशमय भैरव स्वरूप की प्रतीति होने लगती है। “नोर्ध्वं ध्यानं प्रयुञ्जीत” (८।४१-४४) इत्यादि श्लोकों की व्याख्या करते हुए क्षेमराज ने नेत्रतन्त्रोद्योत में अक्षि-निमीलन धारणा का निषेध करते हुए इसी श्लोक का उदाहरण दिया है ॥८६॥ [ धारणा-६४ ] यस्य कै१स्येन्द्रियस्यापि२ व्याघाताच्च निरोधतः । प्रविष्टस्याद्वये शून्ये तत्रै३वात्मा प्रकाशते ॥८७॥ यस्य कस्यापि इन्द्रियस्य व्याघाताद् विरुद्धसमुच्चयाद् बाह्याभिभावककृतात्, निरोधतः निरोधात् स्वरसोत्थात् प्रायत्निकाद् वा, अद्वये द्वयरहिते शून्ये तत्त्वे प्रविष्टस्य अन्तर्मुखपदे निरुद्धस्य, तत्रैव आत्मा परं चैतन्यं प्रकाशते ॥८७॥ जिस किसी भी इन्द्रिय का बाह्य विषयों से संपर्क दो तरह से टूट जाता है। या तो बाहरी विरोधी पदार्थों के जुट जाने से उसकी शक्ति क्षीण या नष्ट हो जाती है, जैसे कि सूर्य के प्रकाश से चौंधिया जाने पर कुछ क्षणों तक आँखों से कुछ दिखाई नहीं पड़ता; या कभी- कभी चेचक आदि के प्रकोप से आँखों की ज्योति नष्ट हो जाती है। इसी तरह से स्वाभाविक रूप से अथवा प्रयत्नपूर्वक इन्द्रियों को बाह्य विषयों की ओर प्रवृत्त होने से रोका जा सकता है। इन दोनों ही स्थितियों में इन्द्रियों का बाह्य विषयों से संपर्क छूट जाने पर साधक अन्तर्वृत्ति हो जाता है, उसकी द्वैत दृष्टि दब जाती है और सर्वत्र अद्वय तत्त्व का उन्मेष हो उठता है, वह सर्वत्र स्वात्मस्वरूप परम तत्त्व का ही दर्शन करने लगता है। अर्थात् बाह्य विषयों के न रहने से इन्द्रियाँ खाली-खाली सी हो जाती हैं, शून्यावस्था में प्रविष्ट हो जाती हैं। इस खालीपन में भावना को दृढ़ करने पर, चित्त की अन्तर्मुखता को स्थिर कर लेने पर, १. य°-ख० । २. °दो-ख० । ३. °दै°-ख० ।