भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 156

विज्ञानभैरव : ९९ साधक के चित्त में चैतन्य ¹ आत्मा प्रकाशित हो उठती है ॥८७॥ [ धारणा-६५ ] अबिन्दुमविसर्गं च अकारं जपतो महान् । उदेति देवि सहसा ज्ञानौघः परमेश्वरः ॥८८॥ बिन्दुः अविभागसंवेदनमद्वैतज्ञानम्, विसर्गः भेदप्रथासर्जनक्रियारम्भो ब्राह्म्या- दिशक्तिरूपककाराद्यक्षररूपः, तद्रहितम् अकारं प्रथमाक्षरम् अविद्यमानः कारः कारणं यस्य तत् एवम्विधम् अकिञ्चिच्चिन्तनात्मकमनुत्तरं विमृशतस्तत्क्षणमेवानेकज्ञानप्रसर- स्रष्टा परमेश्वरः प्रादुर्भवति । अथवा 'अं' इत्यत्र 'अः' इत्यत्र च बिन्दुविसर्गौ परित्यज्य कुम्भकस्थस्य 'अ' इत्येवमेव केवलं जपतः सहसा तत्क्षणमेव परमेश्वरो ज्ञानौघ उदेति सर्वविकल्पराहित्येन विकल्पादीन् संत्यज्य यत् शिष्यते तदेव भवतीत्यर्थः ॥८८॥ विभाग अर्थात् भेद रूप से प्रतीत न होना ही अद्वैत ज्ञान है । इस अद्वैत ज्ञान को यहाँ 'बिन्दु' नाम दिया गया है । विसर्ग भेद ज्ञान की सृष्टि करता है, क्योंकि ककार प्रभृति अक्षरों की सृष्टि विसर्ग से ही होती है, जिनकी कि ब्राह्मी प्रभृति शक्तियाँ अधिष्ठातृ देवता हैं । इस द्वैत और अद्वैत ज्ञान से रहित, अर्थात् दोनों प्रकार के ज्ञानों से अतीत अकार को, जो कि वर्णमाला का पहला अक्षर है, जिसका 'अविद्यमानः कारः कारणं यस्य तत्' इस व्युत्पत्ति के आधार पर कोई कारण नहीं है और जो सभी प्रकार की चिन्तन प्रक्रिया से मुक्त है, उस अनुत्तर अकार का विमर्श करने वाले योगी के चित्त में तत्क्षण अनेक ज्ञानों के विविध आकारों के स्रष्टा परमेश्वर प्रकट हो जाते हैं । "एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म" (छा० उ० ६।२।१), "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (छा० उ० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतियाँ परमेश्वर के एकत्व, अद्वितीयत्व को ही बताती हैं । वाणी और मन जहाँ नहीं पहुँच सकते, उस अनुत्तर तत्त्व में द्वित्व की कल्पना कैसे हो सकती है ? अकार को अनुत्तर या निरूत्तर इसलिये कहा जाता है कि इसके बाद कोई तत्त्व नहीं बचता, जिसमे कि इसका लय हो । अर्थात् मातृका की सृष्टि अकार से ही होती है और पूरी मातृका का संहार भी अकार में ही होता है । ऐसा कोई वर्ण अकार के बाद नहीं है, जिसमे कि इसका लय हो या जिससे इसकी सृष्टि हो । अतः अकार को ²अनुत्तर या निरुत्तर कहना उचित ही है। इसी तरह से ब्रह्म भी अनुत्तर या निरुत्तर माना

  1. विकल्पावस्था में चिति ही चित्त के रूप में परिणत हो जाती है और निर्विकल्पावस्था में चित्त पुनः अपने चिति स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । इस विषय का विवेचन प्रत्यभिज्ञाहृदय के "चितिरेव चेतनपदावरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम्" (५) और "तत्परिज्ञाने चित्तमेवान्तर्मुखीभावेन चेतनपदाध्यारोहाच्चितिः" (१३) इन दो सूत्रों में किया गया है ।
  2. पालि साहित्य में अनुत्तर पद भगवान् बुद्ध का वाचक है । बौद्ध तान्त्रिक वाङ्मय में अनुत्तर योग की चर्चा आती है । ऐसे स्थलों में अनुत्तर पद का प्रयोग सर्वोत्तम के अर्थ में हुआ है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)