विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०० : विज्ञानभैरव जाता है। “नेति नेति” (बृह० उ० ३।९।२६) इत्यादि श्रुतियां इस तत्त्व का प्रतिपादन निषेध मुख से ही कर पाती हैं, क्योंकि सभी द्वैत वस्तुओं का निषेध कर देने पर जो बच रहता है, वही अद्वय तत्त्व अनुत्तर या निरुत्तर ब्रह्म के नाम से जाना जाता है। अतः यह उचित ही है कि अनुत्तर अकार में धारणा की स्थिरता से अनुत्तर ब्रह्म की प्रतीति हो । श्लोक का दूसरा अर्थ यह किया जाता है—अं और अः इन दोनों स्वरों के बिन्दु और विसर्ग को छोड़कर, जो कि पूरक और रेचक प्राणायाम के प्रतीक हैं (अं का उच्चारण करते समय प्राण का पूरण और विसर्ग का उच्चारण करते समय प्राण का रेचन होता है, यह बात अनुभव से सिद्ध है) कुम्भक प्राणायाम में स्थित होकर केवल अकार का जप करने वाले योगी के चित्त में सहसा परमेश्वर प्रकट हो जाते हैं, जिससे कि चित्त में ¹ज्ञान-समुद्र के लहराने से सभी विकल्पों का नाश हो जाता है। संचित विकल्पों का नाश हो जाने से और नये विकल्पों की उत्पत्ति न होने से परमेश्वर के ज्ञानमय स्वरूप के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बच रहता। अतः इस धारणा के अभ्यास से साधक ज्ञानस्वरूप हो जाता है, क्योंकि अन्त में सभी विकल्पों से अतीत यही स्वरूप बचा रहता है। विज्ञानभैरव के इस श्लोक की अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ ने एक भिन्न प्रकार की व्याख्या की है। उनका यह कहना है— “बुद्धिरूपी भूमि के ऊपर ²अहंकारमयी भूमि है। इस अहंकार से यह सारा जगत् भरा हुआ है। इस अहंकार भूमि का सही ज्ञान हो जाने पर प्राणी मुक्त हो जाता है। इसी को संवित् स्वरूप वाली पराशक्ति कहा जाता है, जो कि परमेश्वर से कभी अलग नहीं रहती। इसी को ज्ञानशक्ति कहा जाता है और यही मन्त्रशक्ति के रूप में प्रतीत होने लगती है। शिव और शक्ति से अभिन्न स्वरूप वाला अहंकार ही मन्त्र कहलाता है। यही अहंकार अपरिमित अहन्ता, अर्थात् ³पूर्णाहन्ता के रूप में परिणत
- पहले ७६ वीं कारिका की व्याख्या में इस विषय पर प्रकाश डाला जा चुका है।
- सांख्य दर्शन के अनुसार आरोह क्रम में मन, अहंकार और बुद्धि—यह तत्त्वों का क्रम है। इसके विपरीत प्रस्तुत स्थल में अहंकार को बुद्धि से ऊपर माना गया है। अहंकार शब्द का प्रयोग यहाँ सांख्यसंमत अर्थ में न होकर विमर्श दशा के अर्थ में किया गया है। प्रकाशात्मक शिव की इस विमर्श दशा में ही यह सारा जगत् अन्तर्लीन है, छिपा हुआ है। विमर्श शक्ति ही इस सारे जगत् को उन्मीलित (प्रकट) करती है। प्रत्यभिज्ञा- हृदय के “स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति” (२) इस सूत्र में यही बात कही गई है। इसी अभिप्राय के अन्य अनेक वचन शास्त्रों में मिलते हैं। महार्थमञ्जरीपरिमल (पृ० ६१, ८८) में भी अहंकार की प्रधानता बताई गई है।
- अपरिमित अहन्ता, अर्थात् पूर्णाहन्ता ही विरूपाक्षपंचाशिका प्रभृति शास्त्रों में विश्वाहन्ता के नाम से प्रसिद्ध है। इस विषय की विवेचना हमने “तान्त्रिक योग की चरमोपलब्धिः विश्वाहन्ता” शीर्षक निबन्ध में की है। यहाँ भी १०२ संख्या के श्लोक की व्याख्या में इसकी संक्षिप्त चर्चा की जायगी।