विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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९८ : विज्ञानभैरव अथाक्ष्णोर्निमीलनेन भावनामाह—एवमेव कृष्णपक्षदुर्निशाद्यभावेऽपि आदौ स्वनेत्रे निमील्य अग्रतः कृष्णाभं तमोरूपं भैरवं भावयन् पश्चात् नेत्रे प्रसार्यापि कृष्णाभं भैरवरूपं किमेतदित्याश्चर्यकारि, एतदेव भैरवं रूपमिति भावयन् तन्मयः प्रकाशमयो भवेत् ॥८६॥ इस श्लोक में निमीलन भावना को बताया गया है, अर्थात् आँख बन्द करके इस भावना का अभ्यास किया जाता है। कृष्ण पक्ष की घनी अँधियारी रात के न होने पर साधक को चाहिये कि वह अपनी आँखें बन्द कर ले और अपने सामने भयानक घने काले अन्धकार की भावना करे। इस भावना का अभ्यास बढ़ाने पर उसको आँखें खोल देने के बाद भी भगवान् भैरव का यह भयंकर स्वरूप ही भासित होता रहता है। अन्ततः उसकी भयंकरता समाप्त हो जाती है और अत्यन्त आश्चर्यजनक प्रकाशमय भैरव स्वरूप की प्रतीति होने लगती है। “नोर्ध्वं ध्यानं प्रयुञ्जीत” (८।४१-४४) इत्यादि श्लोकों की व्याख्या करते हुए क्षेमराज ने नेत्रतन्त्रोद्योत में अक्षि-निमीलन धारणा का निषेध करते हुए इसी श्लोक का उदाहरण दिया है ॥८६॥ [ धारणा-६४ ] यस्य कै१स्येन्द्रियस्यापि२ व्याघाताच्च निरोधतः । प्रविष्टस्याद्वये शून्ये तत्रै३वात्मा प्रकाशते ॥८७॥ यस्य कस्यापि इन्द्रियस्य व्याघाताद् विरुद्धसमुच्चयाद् बाह्याभिभावककृतात्, निरोधतः निरोधात् स्वरसोत्थात् प्रायत्निकाद् वा, अद्वये द्वयरहिते शून्ये तत्त्वे प्रविष्टस्य अन्तर्मुखपदे निरुद्धस्य, तत्रैव आत्मा परं चैतन्यं प्रकाशते ॥८७॥ जिस किसी भी इन्द्रिय का बाह्य विषयों से संपर्क दो तरह से टूट जाता है। या तो बाहरी विरोधी पदार्थों के जुट जाने से उसकी शक्ति क्षीण या नष्ट हो जाती है, जैसे कि सूर्य के प्रकाश से चौंधिया जाने पर कुछ क्षणों तक आँखों से कुछ दिखाई नहीं पड़ता; या कभी- कभी चेचक आदि के प्रकोप से आँखों की ज्योति नष्ट हो जाती है। इसी तरह से स्वाभाविक रूप से अथवा प्रयत्नपूर्वक इन्द्रियों को बाह्य विषयों की ओर प्रवृत्त होने से रोका जा सकता है। इन दोनों ही स्थितियों में इन्द्रियों का बाह्य विषयों से संपर्क छूट जाने पर साधक अन्तर्वृत्ति हो जाता है, उसकी द्वैत दृष्टि दब जाती है और सर्वत्र अद्वय तत्त्व का उन्मेष हो उठता है, वह सर्वत्र स्वात्मस्वरूप परम तत्त्व का ही दर्शन करने लगता है। अर्थात् बाह्य विषयों के न रहने से इन्द्रियाँ खाली-खाली सी हो जाती हैं, शून्यावस्था में प्रविष्ट हो जाती हैं। इस खालीपन में भावना को दृढ़ करने पर, चित्त की अन्तर्मुखता को स्थिर कर लेने पर, १. य°-ख० । २. °दो-ख० । ३. °दै°-ख० ।
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विज्ञानभैरव : ९९ साधक के चित्त में चैतन्य ¹ आत्मा प्रकाशित हो उठती है ॥८७॥ [ धारणा-६५ ] अबिन्दुमविसर्गं च अकारं जपतो महान् । उदेति देवि सहसा ज्ञानौघः परमेश्वरः ॥८८॥ बिन्दुः अविभागसंवेदनमद्वैतज्ञानम्, विसर्गः भेदप्रथासर्जनक्रियारम्भो ब्राह्म्या- दिशक्तिरूपककाराद्यक्षररूपः, तद्रहितम् अकारं प्रथमाक्षरम् अविद्यमानः कारः कारणं यस्य तत् एवम्विधम् अकिञ्चिच्चिन्तनात्मकमनुत्तरं विमृशतस्तत्क्षणमेवानेकज्ञानप्रसर- स्रष्टा परमेश्वरः प्रादुर्भवति । अथवा 'अं' इत्यत्र 'अः' इत्यत्र च बिन्दुविसर्गौ परित्यज्य कुम्भकस्थस्य 'अ' इत्येवमेव केवलं जपतः सहसा तत्क्षणमेव परमेश्वरो ज्ञानौघ उदेति सर्वविकल्पराहित्येन विकल्पादीन् संत्यज्य यत् शिष्यते तदेव भवतीत्यर्थः ॥८८॥ विभाग अर्थात् भेद रूप से प्रतीत न होना ही अद्वैत ज्ञान है । इस अद्वैत ज्ञान को यहाँ 'बिन्दु' नाम दिया गया है । विसर्ग भेद ज्ञान की सृष्टि करता है, क्योंकि ककार प्रभृति अक्षरों की सृष्टि विसर्ग से ही होती है, जिनकी कि ब्राह्मी प्रभृति शक्तियाँ अधिष्ठातृ देवता हैं । इस द्वैत और अद्वैत ज्ञान से रहित, अर्थात् दोनों प्रकार के ज्ञानों से अतीत अकार को, जो कि वर्णमाला का पहला अक्षर है, जिसका 'अविद्यमानः कारः कारणं यस्य तत्' इस व्युत्पत्ति के आधार पर कोई कारण नहीं है और जो सभी प्रकार की चिन्तन प्रक्रिया से मुक्त है, उस अनुत्तर अकार का विमर्श करने वाले योगी के चित्त में तत्क्षण अनेक ज्ञानों के विविध आकारों के स्रष्टा परमेश्वर प्रकट हो जाते हैं । "एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म" (छा० उ० ६।२।१), "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (छा० उ० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतियाँ परमेश्वर के एकत्व, अद्वितीयत्व को ही बताती हैं । वाणी और मन जहाँ नहीं पहुँच सकते, उस अनुत्तर तत्त्व में द्वित्व की कल्पना कैसे हो सकती है ? अकार को अनुत्तर या निरूत्तर इसलिये कहा जाता है कि इसके बाद कोई तत्त्व नहीं बचता, जिसमे कि इसका लय हो । अर्थात् मातृका की सृष्टि अकार से ही होती है और पूरी मातृका का संहार भी अकार में ही होता है । ऐसा कोई वर्ण अकार के बाद नहीं है, जिसमे कि इसका लय हो या जिससे इसकी सृष्टि हो । अतः अकार को ²अनुत्तर या निरुत्तर कहना उचित ही है। इसी तरह से ब्रह्म भी अनुत्तर या निरुत्तर माना
- विकल्पावस्था में चिति ही चित्त के रूप में परिणत हो जाती है और निर्विकल्पावस्था में चित्त पुनः अपने चिति स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । इस विषय का विवेचन प्रत्यभिज्ञाहृदय के "चितिरेव चेतनपदावरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम्" (५) और "तत्परिज्ञाने चित्तमेवान्तर्मुखीभावेन चेतनपदाध्यारोहाच्चितिः" (१३) इन दो सूत्रों में किया गया है ।
- पालि साहित्य में अनुत्तर पद भगवान् बुद्ध का वाचक है । बौद्ध तान्त्रिक वाङ्मय में अनुत्तर योग की चर्चा आती है । ऐसे स्थलों में अनुत्तर पद का प्रयोग सर्वोत्तम के अर्थ में हुआ है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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१०० : विज्ञानभैरव जाता है। “नेति नेति” (बृह० उ० ३।९।२६) इत्यादि श्रुतियां इस तत्त्व का प्रतिपादन निषेध मुख से ही कर पाती हैं, क्योंकि सभी द्वैत वस्तुओं का निषेध कर देने पर जो बच रहता है, वही अद्वय तत्त्व अनुत्तर या निरुत्तर ब्रह्म के नाम से जाना जाता है। अतः यह उचित ही है कि अनुत्तर अकार में धारणा की स्थिरता से अनुत्तर ब्रह्म की प्रतीति हो । श्लोक का दूसरा अर्थ यह किया जाता है—अं और अः इन दोनों स्वरों के बिन्दु और विसर्ग को छोड़कर, जो कि पूरक और रेचक प्राणायाम के प्रतीक हैं (अं का उच्चारण करते समय प्राण का पूरण और विसर्ग का उच्चारण करते समय प्राण का रेचन होता है, यह बात अनुभव से सिद्ध है) कुम्भक प्राणायाम में स्थित होकर केवल अकार का जप करने वाले योगी के चित्त में सहसा परमेश्वर प्रकट हो जाते हैं, जिससे कि चित्त में ¹ज्ञान-समुद्र के लहराने से सभी विकल्पों का नाश हो जाता है। संचित विकल्पों का नाश हो जाने से और नये विकल्पों की उत्पत्ति न होने से परमेश्वर के ज्ञानमय स्वरूप के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बच रहता। अतः इस धारणा के अभ्यास से साधक ज्ञानस्वरूप हो जाता है, क्योंकि अन्त में सभी विकल्पों से अतीत यही स्वरूप बचा रहता है। विज्ञानभैरव के इस श्लोक की अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ ने एक भिन्न प्रकार की व्याख्या की है। उनका यह कहना है— “बुद्धिरूपी भूमि के ऊपर ²अहंकारमयी भूमि है। इस अहंकार से यह सारा जगत् भरा हुआ है। इस अहंकार भूमि का सही ज्ञान हो जाने पर प्राणी मुक्त हो जाता है। इसी को संवित् स्वरूप वाली पराशक्ति कहा जाता है, जो कि परमेश्वर से कभी अलग नहीं रहती। इसी को ज्ञानशक्ति कहा जाता है और यही मन्त्रशक्ति के रूप में प्रतीत होने लगती है। शिव और शक्ति से अभिन्न स्वरूप वाला अहंकार ही मन्त्र कहलाता है। यही अहंकार अपरिमित अहन्ता, अर्थात् ³पूर्णाहन्ता के रूप में परिणत
- पहले ७६ वीं कारिका की व्याख्या में इस विषय पर प्रकाश डाला जा चुका है।
- सांख्य दर्शन के अनुसार आरोह क्रम में मन, अहंकार और बुद्धि—यह तत्त्वों का क्रम है। इसके विपरीत प्रस्तुत स्थल में अहंकार को बुद्धि से ऊपर माना गया है। अहंकार शब्द का प्रयोग यहाँ सांख्यसंमत अर्थ में न होकर विमर्श दशा के अर्थ में किया गया है। प्रकाशात्मक शिव की इस विमर्श दशा में ही यह सारा जगत् अन्तर्लीन है, छिपा हुआ है। विमर्श शक्ति ही इस सारे जगत् को उन्मीलित (प्रकट) करती है। प्रत्यभिज्ञा- हृदय के “स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति” (२) इस सूत्र में यही बात कही गई है। इसी अभिप्राय के अन्य अनेक वचन शास्त्रों में मिलते हैं। महार्थमञ्जरीपरिमल (पृ० ६१, ८८) में भी अहंकार की प्रधानता बताई गई है।
- अपरिमित अहन्ता, अर्थात् पूर्णाहन्ता ही विरूपाक्षपंचाशिका प्रभृति शास्त्रों में विश्वाहन्ता के नाम से प्रसिद्ध है। इस विषय की विवेचना हमने “तान्त्रिक योग की चरमोपलब्धिः विश्वाहन्ता” शीर्षक निबन्ध में की है। यहाँ भी १०२ संख्या के श्लोक की व्याख्या में इसकी संक्षिप्त चर्चा की जायगी।
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विज्ञानभैरव : १०१ हो जाता है। मातृका अर्थात् वर्णमाला का पहला अक्षर अकार है। वह परमेश्वर शिव से अभिन्न है। यह जब नाद और बिन्दु से संयुक्त हो जाता है, तो वह ईश्वर की शक्ति कहलाता है। यह शिव और शक्तिमय अकार इस सारे अचर और चर, स्थावर और जंगम जगत् का बीज माना जाता है, अर्थात् बीज से वृक्ष की तरह शिवशक्तिमय अकार से सारे विश्व की सृष्टि होती है। स्वर और व्यंजन सभी वर्ण इसी से व्याप्त हैं, अर्थात् इन सबमें अकार किसी न किसी रूप में विद्यमान है। इसीलिये यथार्थ तत्त्व की खोज में लगे योगी इसको शब्दब्रह्म के नाम से पुकारते हैं। प्राण और स्वर के रूप में जो अभी परिणत नहीं हुआ है, उस अकार का निर्विभाग (विभाग रहित) अवस्था में विद्यमान पश्यन्ती की सहायता से चिन्मात्र स्वरूप में चिन्तन करने वाला योगी परम पद में प्रविष्ट हो जाता है, स्वात्मस्वरूप में विलीन हो जाता है। शास्त्रों में आचार्यों ने¹ इस बात को इस तरह से स्पष्ट किया है—नाभि से एक वितस्ति (बित्ता) ऊपर और कंठ से छः अंगुल नीचे हृदय विद्यमान है। इस हृदय के बीच के भाग में एक कमल है। इस कमल के बीच में तीन कोनों वाली कर्णिका है। इस कर्णिका के मध्य भाग में अकार का स्वरूप धारण कर आत्मा रहती है। इस अकार के भीतर अत्यन्त सूक्ष्म तत्त्व निवास करता है, जिसमें कि चित् तत्त्व का निरन्तर स्फुरण होता रहता है। विज्ञानभैरव के "अबिन्दुर्माविसर्गं च" इत्यादि श्लोक में इसी चित् तत्त्व की उपासना का विधान है। आत्मा के उसी निवास स्थान में ईश्वर की शक्ति भी निवास करती है, जिसको कि कुण्डलिनी कहते हैं। इसी का संयोग होने पर शिव सृष्टि करने में समर्थ होते हैं। अतः यह विश्व की जननी है। यह कुण्डलिनी शक्ति सांप की तरह साढ़े तीन लपेटे खाकर बिना किसी आधार के यहाँ बैठी रहती है। इसी को प्राणशक्ति कहा जाता है। यह शक्ति शरीर में हकार रूपी नाद के स्वरूप में सदा नदन करती रहती है। योगी अपने दोनों कानों को बन्द कर इसके नदन व्यापार को सुन सकता है। यह शक्ति भ्रूमध्य में बिन्दु के रूप में निवास करती है। सारे संसार की यही मंगलमयी जननी है। अपने तेज से प्रकाशित इस बिन्दु रूप शक्ति का योगी नित्य दर्शन करते हैं। उस बिन्दु के चन्द्र और सूर्य वाम और दक्षिण नेत्र हैं। इनको आश्रय हीन कर, अर्थात् विषयों से हटा कर, योगी परम पद अर्थात् ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है।"
- प्रस्तुत उद्धरण में वामननाथ ने विज्ञानभैरव और सिद्धादिष्ट सिद्धान्तसंग्रह की चर्चा की है। तान्त्रिक साहित्य (पृ० ७०१) के अनुसार किसी सिद्धान्तसंग्रह का उल्लेख पुरश्चर्यार्णव में हुआ है। वामननाथ और उनके ग्रन्थ आदि के सम्बन्ध में लुप्तागमसंग्रह के द्वितीय भाग के उपोद्घात में विचार किया गया है। देखिये पृ० १५, ६५-६६ तथा अन्यत्र भी।
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१०२ : विज्ञानभैरव संक्षेप में इसका अभिप्राय यह हुआ कि अकार अर्थात् परम शिव के नाद और बिन्दु अवस्था से अतीत शुद्ध स्वरूप का चिन्तन करने पर साधक सनातन ब्रह्मस्वरूप में विलीन हो जाता है ॥८८॥ [ धारणा-६६ ] वर्णस्य¹ सविसर्गस्य विसर्गान्तं² चितिं कुरु । निराधारेण चित्तेन स्पृशेद् ब्रह्म सनातनम् ॥८९॥ निराधारेण प्रक्षीणवेद्येन चित्तेन सविसर्गस्य विसर्गसहितस्य वर्णस्य अकारस्य विसर्गान्तं चितिं कुरु विविधसर्गस्वभावयुक्तस्य वर्णजातेः ककाराद्यक्षररूपस्य ब्राह्म्या- दिशक्तिसमूहस्य पशुभावोपकरणस्य विसर्गस्य अन्तो यथा भवति तथा अन्तर्मुख- स्वभावविमर्शाधिक्यात् तत्समावेशेन तन्मयीभावापादनस्वरूपतया बुद्धिं विधेहि। ततः संवेदनस्य निराश्रयत्वे सति सनातनं ब्रह्म विशेत्, नित्यः परब्रह्मस्पर्शाविर्भावः स्यात् । 'विसर्गान्ते' इति सप्तम्यन्तपाठे त्वयमर्थः—सर्वोऽयं मातृकाप्रपञ्चोऽकुलस्य शिवबिन्दु- नामधेयस्य शक्तिरूपो विसर्ग इति तस्मिन् विसर्गे बुद्धिं विधेहीति ॥८९॥ किसी जानने लायक वेद्य वस्तु के अभाव में चित्त निराधार हो जाता है। चित्त की इस अवस्था में विसर्ग के साथ आद्य वर्ण अकार में अपनी धारणा को स्थिर करे । अकार के द्वारा नाना प्रकार की सृष्टि करने में ककार प्रभृति अक्षरों का और उनकी अधिष्ठात्री ब्राह्मी प्रभृति मातृकाओं का सहयोग रहता है । इन्हीं की सहायता से अज्ञानी जीव का सारा व्यव- हार चलता है। अतः यह सारी सृष्टि भी विसर्ग के नाम से ही जानी जाती है । इसका अन्त किये बिना स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती । अनुत्तर अकार विसर्ग की सहायता से ही सभी ककार प्रभृति वर्णों की और सारे जगत् की सृष्टि करता है, अतः इस विसर्ग का अकार में उपसंहार करने पर ही इस सारी सृष्टि का उपसंहार हो सकता है । प्रस्तुत धारणा में अकार की इस उपसंहार दशा में ही निराधार चित्त को स्थिर करने का अभ्यास किया जाता है, जिससे कि अपने अन्तर्मुख स्वभाव का गहराई से चिन्तन करने से साधक अपने स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। जब वह अपने स्वरूप में समाविष्ट होता है, तो उसके अपने स्वाभाविक स्वरूप के अभिव्यक्त हो जाने से उसका अब तक का काल्पनिक स्वरूप उसी में लीन हो जाता है, उसी आकार को धारण कर लेता है । उसकी अलग से कोई सत्ता नहीं रह जाती । साधक जब अपनी चित्त-वृत्ति को भी तदाकार बना लेता है, तब संवेदन अर्थात् ज्ञान का कोई बाह्य आलम्बन न रहने से उसका परब्रह्म स्वरूप में नित्य समावेश हो जाता है । 'विसर्गान्ते' ऐसा पाठ मानने पर उसका अर्थ यह होगा—यह सारा स्वर-व्यंजनात्मक मातृका का विस्तार, सभी वर्णों की उत्पत्ति शिवबिन्दु नामक शक्ति से ही होती है। यह कौलिकी शक्ति विसर्ग नाम से जानी जाती है। इसी से सारी वर्णमाला का विकास होता है । इस १. सविसर्गस्य वर्णस्य-ख० । २. ॰न्ते-ख० ।
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विज्ञानभैरव : १०३ विषय को समझने के लिए विस्तार की अपेक्षा है। कुल प्रक्रिया का विवेचन करते समय इस विषय पर उपोद्घात में विचार किया जायगा। भट्ट आनन्द ने इस श्लोक की व्याख्या इस तरह से की है— अं और अः (बिन्दु और विसर्ग) से अकार को निकाल देने पर केवल बिन्दु (ं) और विसर्ग (:) ही बच रहेंगे। बिना आधार (अकार) के इनको समझ पाना कठिन है। योगी जब इनमें धारणा करते हुए अपने चित्त को भी इसी तरह से निराधार, निर्विषय बना लेता है, तो उसको परम निर्वृति (मोक्ष) प्राप्त हो जाती है। पहले श्लोक में बिन्दु और विसर्ग से रहित 'अकार' में धारणा का और इस श्लोक में अकार से रहित निराधार बिन्दु अथवा विसर्ग में धारणा का विधान है। यह इन दोनों धारणाओं में स्पष्ट भेद है ॥८९॥ [ धारणा-६७ ] व्योमाकारं स्वमात्मानं ध्यायेद् दिग्भिरनावृतम् । निराश्रया चितिः शक्तिः स्वरूपं दर्शयेत् तदा ॥९०॥ यदा व्योमाकारमित्यनाकृतिं न तु तुच्छम्, स्वमात्मानं दिग्भिर्नीलपीतादिभि- रुपाधिभिरनावृतं विवर्जितम्, विश्वव्यापिनमिति यावत्, कृत्वा ध्यायेत्, तदा चिति- शक्तिर्निराश्रया सती स्वं रूपं दर्शयेत् ॥९०॥ आकाश की कोई आकृति न रहने पर भी जैसे उसकी सत्ता मानी जाती है, उसी तरह से जिस व्योमाकार अर्थात् निराकार, शून्यस्वभाव स्वात्मस्वरूप में यहाँ धारणा को स्थिर करने का विधान है, वह भी अलीक, तुच्छ, मिथ्या न होकर केवल किसी भी प्रकार की आकृति से रहित ही माना जाता है। इस नील, पीत आदि उपाधियों से रहित, अर्थात् विश्व- व्यापी स्वात्मस्वरूप में धारणा को स्थिर कर देने पर चिति शक्ति बाह्य आलम्बनों से मुक्त होकर अपने सहज स्वरूप को दिखा देती है, अर्थात् साधक अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। स्वच्छन्दतन्त्र में १"अहमेव परो हंसः परमात्मा परात्परः" (४।३९९) इत्यादि ग्रन्थ में इस स्थिति का वर्णन किया गया है ॥९०॥ [ धारणा-६८ ] किञ्चिदङ्गं विभिद्यादौ तीक्ष्णसूच्यादिना ततः । तत्रैव चेतनां१ युक्त्वा२ भैरवे३ निर्मला गतिः ॥९१॥ आदौ प्रथमं किञ्चिदङ्गम् अङ्गुल्यङ्गुष्ठादिकं तीक्ष्णसूच्यादिना निशितसूचीकण्ट- कादिना विभिद्य छित्त्वा ततस्तदनन्तरं तत्रैव चेतनां संविदं युक्त्वा संयोज्य भैरवे १. ०ना-ख० । २. ०क्ता-ख० । ३. ०वी-ख० ।
- यह पाठ भट्टानन्द की टीका में मिलता है (पृष्ठ ३७)। शिवोपाध्याय ने “अहमेव परो हंसः शिवः परमकारणम्" (पृ० १३०) ऐसा पाठ स्वीकार किया है। मुद्रित स्वच्छन्द- तन्त्र (भा० २, प० ४, पृ० २५३) में भी यही पाठ मिलता है।
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१०४ : विज्ञानभैरव निर्मला गतिः, स्यादिति शेषः । तीक्ष्णसूच्यादिना अग्निना वा शरीरं प्रमथ्य तत्सहना- दिना या सहनशक्तिः सैवात्र चेतनेत्यभिधीयते । सूच्यादिव्यथानुभवितृचेतनाशक्ति- समाहितस्य भैरवविषयं निर्मलं ज्ञानं भवत्येवेति भावः ॥९१॥ अपने अंगुली, अंगूठे आदि किसी अंग को तीखी सुई अथवा कांटे१ आदि से पहले बींध दे । उसके बाद उसी स्थान में अपनी चेतना, अर्थात् संवित् को जोड़ देने पर, उस सूची आदि के बींधने से उत्पन्न पीड़ा का अनुभव करने वाली चेतना शक्ति में समाहित योगी के चित्त में भैरवविषयक निर्मल ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । तीखी सुई आदि से बींधने पर अथवा आग से जला देने पर शरीर के उस अंग में तीव्र पीड़ा होने लगती है । इस पीड़ा को सहन करने की शक्ति यहां 'चेतना' कही गई है । इस चेतना शक्ति में, अर्थात् किसी भी पीड़ा को सहन करने की शक्ति में अपने चित्त को समाहित करने वाला योगी अपने निर्मल बोधभैरव स्वरूप को पहचान लेता है ॥९१॥ [ धारणा-६९ ] चित्ताद्यन्तःकृतिर्नास्ति ममान्तर्भावयेदिति१ । विकल्पानामभावेन२ विकल्पैरुज्झितो भवेत् ॥९२॥ ममान्तः मद्देहान्तः, चत्तादिकमन्तःकरणं नास्तीति भावयेत्, अस्त्यपि नास्त्ये- वेत्येवं बाह्यविषयोपरमाद् दृढभावनः स्यात्, ततो विकल्पानामभावेन विकल्पैरुज्झित- स्त्यक्तो निर्विकल्पतया शुद्धचैतन्यो भवेत् ॥९२॥ मेरे शरीर के भीतर चित्त आदि अन्तःकरणों की कोई सत्ता नहीं है, ऐसी भावना करे । शरीर के भीत त आदि के रहते हुए भी जब यह भावना की जायगी कि उनकी कोई सत्ता नहीं है, तो अन्तःकरण की वृत्तियों के अभाव में बाह्य विकल्पों की भी कोई सत्ता नहीं रह जायगी । इस भावना का दृढ़ता से अभ्यास करने पर विकल्पों की सत्ता के न रह जाने से साधक इन बाह्य विकल्पों से मुक्त होकर निर्विकल्प दशा में प्रविष्ट हो जायगा, उसका शुद्ध स्वात्मचैतन्य अभिव्यक्त हो जायगा ॥९२॥ [ धारणा-७० ] २माया विमोहिनी नाम कलायाः कलनं स्थितम् । इत्यादिधर्मं तत्त्वानां कलयन्न३ पृथग् भवेत् ॥९३॥ १. ०द्यदि-ख० । २. ०वेऽपि-ख० । ३. ०यन् ना-ख० ।
- क्रान्तिकारी भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद प्रभृति के विषय में यह प्रसिद्ध है कि वे अपनी सहन शक्ति की परीक्षा के लिये जलती मोमबत्ती की लौ पर अपने हाथ के मांसल भाग को उस समय तक टिकाये रखते थे, जब कि वह जल कर टप-टप नीचे गिरने लगता था । प्रस्तुत श्लोक में भी लगभग इसी प्रकार की स्थिति में धारणा को स्थिर करने का विधान है । २. ई० प्र० वि० वि० ( भा० १, पृ० ८० ) में इसका पहला चरण और वहीं ( भा० ३, पृ० २८५ ) इस श्लोक का पूर्वार्ध रुद्रयामलसार के नाम से उद्धृत है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १०५ विशेषेण भेदप्रथात्मकेन स्वरूपेण पुरुषं मोहयतीति मायाया एव मोहनत्वं धर्मो न मम, कलायाः कलातत्त्वस्य, कलनं किञ्चित्करणं धर्मः, विद्यातत्त्वस्य किञ्चिद् वेदनं धर्म इत्यादि सर्वेषां तत्त्वानां धर्मं कलयन् विमृशन् पुरुषः पृथग् न भवेत्, किन्तु विवेकज्ञानात्मकाभेदख्यातिमान् भवेत् । 'ना पृथग् भवेत्' इति पाठे इत्येवं कलयन् ना पुरुषः पृथग् भवेत् सर्वोत्तीर्णः कूटस्थः स्यादित्यर्थः ॥९३॥ माया तत्त्व से मोहित होकर जीव परस्पर एक दूसरे को भिन्न समझने लगते हैं । अतः भेद-दृष्टि का विस्तार करना माया का धर्म है, शुद्ध चैतन्य का नहीं । इसी प्रकार कला तत्त्व का धर्म कुछ करना है, विद्या तत्त्व का धर्म कुछ जानना है । इसी तरह से सभी तत्त्वों के धर्मों के विषय में विचार करने वाले योगी की स्थिति अलग से नहीं रह जाती, किन्तु इस विवेक ज्ञान के सहारे वह अभेद ¹ख्याति से युक्त हो जाता है । प्रकृति और पुरुष के विवेक ज्ञान से कैवल्य का आविर्भाव सांख्य दर्शन को अभिप्रेत है । इस भावना के अभ्यास से माया प्रभृति के विभेदक स्वरूपों से अलग होकर योगी अपने कैवल्यात्मक स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । 'ना पृथग् भवेत्' ऐसा पाठ मानने पर इसका अर्थ यह होगा कि इस प्रकार की धारणा में चित्त को स्थिर करने वाला मनुष्य पृथक् हो जाता है, अर्थात् इन विभेदक दृष्टियों से ऊपर उठकर शुद्ध, कूटस्थ, सर्वोत्तीर्ण स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । प्रथम कारिका की व्याख्या करते समय अभिनवगुप्त ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० १, पृ० ८०) में माया शक्ति का अर्थ स्पष्ट करते हुए इस श्लोक का प्रमाण दिया है ॥९३॥ [ धारणा-७१ ] झगितीच्छां समुत्पन्नामवलोक्य शमं नयेत् । यत एव समुद्भूता ततस्तत्रैव लीयते ॥९४॥ इच्छां पुत्राद्येषणाम् इदं मे स्यादित्येवंप्रकारामेषणां समुत्पन्नाम् अमूर्तादपि चिन्मात्राद् मायाकृतक्षोभवशादुद्भूताम् अवलोक्य दृष्ट्वा तामन्तर्मुखत्वेन विमृश्य झगिति शीघ्रं शमं नयेत् शान्तिं प्रापयेत् । अमूर्तो हि चिन्मात्रात्मा मध्येज्ञानेनैव प्रकटितेच्छः । चिन्मात्रस्य निराकारत्वान्नास्ति इच्छा, परन्तु इष्यमाणमेषणादिकं वाऽविद्यैवैतत् दृष्ट्वा शान्तेच्छो भवेदिति तात्पर्यम् । यतो यस्माद् अविद्यात एव समुद्- भूता इच्छा, अविद्या हि आकाशात्मिका, ततस्तत्रैव लीयते लीना भवति, तेन हि
- दर्शन शास्त्र में ख्याति शब्द प्रतीति या ज्ञान के अर्थ में प्रयुक्त होता है । अभेद ख्याति का अर्थ है अद्वय बोध । सब कुछ शिवमय ही है, उसके भिन्न कुछ भी नहीं है, इस तरह की एकाकार प्रतीति ही यहां अभेद ख्याति कही गयी है । भ्रान्त ज्ञान के अर्थ में भी ख्याति शब्द प्रयुक्त होता है । अपूर्णता ख्याति का अर्थ है भ्रमवश अपने पूर्ण स्वरूप का ज्ञान न होना । भारतीय दर्शन में छः प्रकार की ख्याति मानी गई है । इनका स्वरूप बहुत ही संक्षेप में हमने महार्थमंजरी के उपोद्घात (पृ० ठ-ड) में बताया है ।
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१०६ : विज्ञानभैरव निर्विकल्पदशाप्राप्तिः । एवमन्तर्मुखतया विमृश्य यत एव क्षोभमयान्मनस उत्थिता तत्रैव शमं नयेत् प्रापयेत्, ततस्तत्रैव लीयते तदा स्वयमेव ब्रह्म सम्पद्यत इत्यर्थः ॥९४॥ अमूर्त चिन्मात्र स्वात्मस्वरूप में भी माया के क्षोभ के कारण ¹पुत्र, धन, यश आदि की मुझे प्राप्ति हो, इस तरह की भाँति-भाँति की इच्छाओं की उत्पत्ति होते देखकर अपनी अन्तर्मुखी वृत्ति से उसको वहीं शीघ्र शान्त कर दे । वास्तव में प्रारंभ और अन्त में भी यह अमूर्त आत्मा चिन्मात्रस्वरूप ही है । बीच में अज्ञानवश इसमें एषणाएँ पैदा हो जाती हैं । चिन्मात्र स्वरूप तो निराकार है, उसमें इच्छाएँ नहीं हो सकतीं । इष्यमाण (इच्छित वस्तु) और एषणा (इच्छा) यह सब अविद्या ही है, इस तरह की दृष्टि का उन्मेष होने पर साधक की सारी इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं । जिस अविद्या से ये इच्छाएँ पैदा होती हैं, वह अविद्या आकाशस्वरूप है, शून्यस्वभाव है, अतः इस शून्य भावना का अभ्यास करने से वे इच्छाएँ अन्ततः आकाश में ही लीन हो जाती हैं और योगी का निर्विकल्प स्वात्मस्वरूप मात्र बच रहता है । अर्थात् साधक की जब सब वृत्तियाँ अन्तर्मुख हो जाती हैं, तो उसकी सब इच्छाएँ भी, जो कि मन के क्षोभ के कारण उत्पन्न हुई थीं, उसी तरह से मन में ही विलीन हो जाती हैं, जैसे कि प्रक्षुब्ध सागर से उठी लहरें सागर के शान्त हो जाने पर उसी में लीन हो जाती हैं । इन वृत्तियों के लीन हो जाने पर योगी शान्त समुद्र के समान अपने प्रशान्त स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, ब्रह्म बन जाता है । यदि इच्छा शान्त न होती दिखाई दे तो उसके लिये स्पन्दकारिका में प्रदर्शित उपाय का सहारा लेना चाहिये । "एकचिन्ताप्रसक्तस्य" (श्लो० ४१) इत्यादि स्पन्दकारिका के श्लोक में 'उन्मेष' दशा का वर्णन है । उसका अभिप्राय यह है कि मनुष्य जब किसी एक चिन्ता में पड़ा रहता है, तभी उसमें दूसरी चिन्ता का आविर्भाव हो जाता है । जिस क्षण में एक चिन्ता से दूसरी चिन्ता में चित्त प्रविष्ट होता है, वही क्षण 'उन्मेष' कहलाता है । इस उन्मेष क्षण में दोनों चिन्ताओं को विलीन कर देना चाहिये, अर्थात् पहली चिन्ता के विलय क्षण में ही चित्त को स्थिर कर लेना चाहिये । ऐसा करने से आगे की चिन्ता का उत्थान ही नहीं होगा और पहली चिन्ता के विलीन हो जाने से चित्त उस क्षण में वृत्ति-शून्य हो जायगा, "न चित्तं निक्षिपेत्" (श्लो० १०१), "यत्र यत्र मनो याति" (श्लो० १२६) इत्यादि धारणाओं में इसी स्थिति को आलम्बन बनाया गया है । इस उन्मेष क्षण में धारणा को स्थिर कर देने से सारी इच्छाएँ जहाँ से उत्पन्न होती हैं, वहीं विलीन हो जाती हैं, अर्थात् जिस उन्मेष स्वरूप स्पन्द तत्त्व से ये इच्छाएँ पैदा होती हैं, उसी में ये विलीन भी हो जाती हैं । इस उन्मेष दशा का वर्णन करने वाला स्पन्दकारिका का यह महत्त्वपूर्ण श्लोक पहले ही उद्धृत कर दिया गया है ॥९४॥
- पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा के भेद से एषणा (इच्छा) के तीन भेद माने गये हैं । इन तीनों एषणाओं से मुक्त व्यक्ति ही वास्तविक ब्राह्मण है, ऐसा उपनिषदों में प्रति- पादित है (बृह० उ० ३।५।१) । मनुस्मृति (२।१६२) में भी ब्राह्मण के लिये संमान से दूर रहने का विधान है ।
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विज्ञानभैरव : १०७ [ धारणा-७२ ] यदा ममेच्छा नोत्पन्ना ज्ञानं वा कस्तदाऽस्मि वै । तत्त्वतोऽहं तथाभूतस्तन्लीनस्तन्मना भवेत् ॥९५॥ यदा मम इच्छा न उत्पन्ना, ज्ञानं वा न उत्पन्नम्। ज्ञानमिति क्रियाया उप- लक्षणम् । क्रिया च नोत्पन्ना। तदा कोऽस्मि ? इच्छाज्ञानक्रियाणामनाविर्भावेऽहमेव नास्मि, किन्तु चिदानन्दरूप एवास्तीत्यर्थः। तदेवाह—तत्त्वतो वस्तुतः, तथाभूतश्चिदा- नन्दात्मक एवाहम् इति भावनयाऽनया तस्मिन् चिदानन्दस्वरूपे लीनस्तन्मना भवेत् तन्मयश्चिदानन्दमयो भवेत् ॥९५॥ इस श्लोक में ज्ञान पद क्रिया का भी बोध कराता है, अतः इसका अर्थ यह होगा कि जब मेरे अन्दर इच्छा, ज्ञान और क्रिया में से किसी की भी उत्पत्ति नहीं होगी, तो उस स्थिति में मेरा स्वरूप क्या होगा ? अर्थात् इनके अभाव में अहन्ता, ममता, इदन्ता की कोई भी स्थिति नहीं बन सकती, किन्तु उस अवस्था में तो चित् और आनन्द स्वरूप की ही स्थिति रहती है। इसलिये साधक को सदा इसी स्थिति की भावना करनी चाहिये कि वास्तव में मैं चित् और आनन्द स्वरूप ही हूँ। इस धारणा के अभ्यास से योगी उस चिदानन्द स्वरूप में ही लीन हो जाता है और अनन्तः स्वयं उसका चिदानन्दमय स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है। स्पन्दकारिका में इस स्थिति को इस प्रकार स्पष्ट किया है— गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥ अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्थगनोद्यताः । पातयन्ति दुरुत्तारे घोरे संसारवर्त्मनि ॥ अतः ^1सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये । जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ॥ (१९-२१ श्लो०) अर्थात् सत्त्व, रज, तम आदि गुण तथा महत्, अहङ्कार, तन्मात्रा, इन्द्रिय, पंच महा- भूत आदि सभी पदार्थ और इनके कारण प्रादुर्भूत होने वाली सुख, दुःख, मोह आदि की लहरें —ये सब अनन्त विशेषताओं को अपने में समेटे हुए स्पन्द तत्त्व से ही उठती हैं, इस बात को जानने वाले योगी के मार्ग में ये सब वस्तुएँ रुकावट नहीं डाल पातीं, उसके स्वरूप को नहीं ढक पातीं। इसके विपरीत ^2अप्रबुद्ध मनुष्य के स्वात्मस्वरूप को ढक कर ये वृत्तियाँ उसको घोर दुस्तर संसार-समुद्र में गिरा देती हैं। इसलिये जो व्यक्ति इस स्थिति को समझ
- स्पन्द तत्त्व के स्वरूप को समझने के लिये निरन्तर प्रयत्नरत रहने की बात यहाँ बताई गई है। इसीलिये "उद्यमो भैरवः" (१।५) इस शिवसूत्र में उद्यम को भैरव का ही स्वरूप माना गया है। योगवासिष्ठ में अनेक स्थलों पर पुरुषार्थ की बड़ी महिमा गाई गई है।
- अप्रबुद्ध आदि शब्दों के अर्थ के लिये १२८वें श्लोक की व्याख्या के अवसर पर की गई टिप्पणी देखनी चाहिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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१०८ : विज्ञानभैरव कर स्पन्द तत्त्व के स्वरूप को जानने के लिये निरन्तर क्रियाशील रहता है, उद्योग करता रहता है, वह जाग्रदवस्था में ही अपने निज स्वभाव को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् जीवन्मुक्त हो जाता है । प्रस्तुत धारणा के अभ्यास से भी योगी इसी स्थिति को प्राप्त करता है ॥९५॥ [ धारणा -७३ ] ^१इच्छायामथवा ज्ञाने जाते चित्तं निवेशयेत् । ^२आत्मबुद्ध्याऽनन्यचेतास्ततस्तत्त्वार्थदर्शनम् ॥९६॥ अत्रापि ज्ञानं क्रियाया उपलक्षणम् । इच्छायां जातमात्रायाम्, ज्ञाने वा जाते सति, क्रियायां वा समुत्पन्नायाम् अनन्यचेताः विषयसंकल्पं विहाय आत्मबुद्ध्या आत्मैवैतदिति बुद्ध्या चित्तं निवेशयेत् निक्षिपेत् । ततस्तत्त्वार्थदर्शनं तयैव भावनया परमार्थज्ञानं भवेत् । सर्वस्मिन् स्वात्मरूपदृढभावनयाऽनन्यचेतसस्तत्त्वार्थदर्शनं स्यादेवेति भावः ॥९६॥ इस श्लोक में भी ज्ञान पद क्रिया का भी बोध कराता है । इच्छा, ज्ञान अथवा किसी क्रिया के उत्पन्न होने के साथ ही अपने चित्त को उसी में स्थिर करके अन्य सभी प्रकार के विषयों के संकल्प का परित्याग कर दे, 'यह सब कुछ आत्मा ही है' इस प्रकार की दृढ़ भावना से इच्छा, ज्ञान अथवा क्रिया में ही अपने चित्त को स्थिर कर अन्य सभी बाह्य विषयों से अपने चित्त को हटा ले । “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” (छा० ३।१४।१), “अयमात्मा ब्रह्म” (बृ० २।५।१९) इन श्रुतिवचनों के अनुसार सभी सांसारिक वस्तुओं में जब योगी का चित्त स्वात्मस्वरूप को ही देखने लगता है, तो इस भावना के दृढ़ होने पर परमार्थ तत्त्व का ज्ञान हो जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि जब योगी सभी पदार्थों को अपना ही रूप मानकर एकाग्र चित्त से उनमें अपनी धारणा को स्थिर कर देता है, तो उसको परमार्थ तत्त्व का परिज्ञान हो जाता है । इस श्लोक में सालम्बन अर्थात् साकार भावना का विधान है । नेत्रतन्त्र (८।४१-४४) में ^२अनुत्तर योग का विवेचन करते समय अनेक प्रकार की धारणाओं का निषेध किया गया है । क्षेमराज ने इसकी व्याख्या करते हुए सालम्बन भावना के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत किया है ॥९६॥ [ धारणा-७४ ] ^३निर्निमित्तं^४ भवेज्ज्ञानं ^३निराधारं प्रमात्मकम् । तत्त्वतः कस्यचिन्नैतदेवंभावी शिवः प्रिये ॥९७॥ १. तत्र-ने० । २. °तः स्यादात्म°-ने० । ३. निराधारं-त० । ४. निर्निमित्तं-त० ।
- नेत्रतन्त्र की उद्योत टीका (भा० १, पृ० २०१) में यह श्लोक मिलता है ।
- जैसा कि पृ० ९९ की २ टिप्पणी में बताया गया है, अनुत्तर योग का बौद्ध तान्त्रिक ग्रन्थों में विशेष वर्णन मिलता है । नेत्रतन्त्र में वर्णित पर योग अनुत्तर योग ही है, क्योंकि यह स्थूल और सूक्ष्म योग की अपेक्षा उत्कृष्ट है ।
- तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७९) में यह उपलब्ध है ।
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विज्ञानभैरव : १०९ हे प्रिये, यदिदं घटादिज्ञानं तद् निराधारं निराश्रयम्, तत्त्वतः स्थिरस्य कस्य- चिदात्मनो घटादेराधारस्य वाऽवास्तवत्वात्। अत एव निर्निमित्तं निर्हेतुकम्, तत्त्वतश्चक्षुरालोकादिनिमित्तस्याप्यवास्तवत्वात्। भ्रमात्मकं मायावशोत्थितम्, विकल्पात्मकत्वात्, तत्त्वतो ज्ञानव्यतिरिक्तस्यान्यस्याभावात्। स एवायं घट इति संवेदनं तु सोऽयं गङ्गाया प्रवाह इतिवद् भ्रान्तिरेवेति भावः। अस्ति हि सर्वं चिन्मात्रम्, चिद्व्यतिरिक्तस्यान्यस्याभादित्येवं भावनादार्ढ्यात् शिव एव स्यादिति ॥९७॥ हे प्रिये, यह जो घट आदि का ज्ञान है, उसका कोई आधार नहीं है, क्योंकि वस्तुतः किसी स्थिर आत्मा अथवा घट आदि वस्तुओं की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। इसी लिये यह निर्हेतुक भी है, क्योंकि चक्षु, आलोक (प्रकाश) आदि पदार्थों की भी वास्तविक सत्ता नहीं है। इसी लिये यह सब कुछ भ्रमात्मक है, माया के कारण उत्पन्न है। अत एव विकल्प- स्वरूप है, क्योंकि ज्ञान के अतिरिक्त अन्य सभी वस्तुओं का अभाव है। 'यह वही घट है' इस तरह का ज्ञान 'यह वही गंगा का प्रवाह है' इस ज्ञान की तरह भ्रमात्मक ही माना जायगा। अर्थात् गंगा के प्रवाह में जैसे 'यह वही प्रवाह है' यह प्रत्यभिज्ञा भ्रान्ति-जन्य है, उसी तरह से घट, पट, देवदत्त आदि की प्रत्यभिज्ञा को भी भ्रमात्मक ही मानना चाहिये। इस तरह से अन्ततः सब कुछ चिन्मात्र, विज्ञानात्मक ही सिद्ध होता है। इस चिदात्मक विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी की भी सत्ता नहीं है, इस तरह की भावना का दृढ़ता से अभ्यास करने से साधक शिव हो जाता है। तन्त्रालोक (५।७१) में यह स्थिति 'सर्वात्म-संकोच' के नाम से वर्णित है और टीकाकार ने इस स्थिति के उदाहरण के रूप में इसी श्लोक को प्रस्तुत किया है ॥९७॥ [ धारणा-७५ ] ^1चिद्धर्मा सर्वदेहेषु विशेषो नास्ति कुत्रचित्। अतश्चयं तन्म सर्वं भावयन् भवजिज्जनः ॥९८॥ चिद् ज्ञानं क्रिया वा धर्मो गुणो यस्य स चिद्धर्मा चेतनः, सर्वदेहेषु हस्तिपिपी- लिकादिशरीरेषु सामान्यतया वर्तते, कीटादिसदाशिवान्तं नास्ति कुत्रचित् कश्चिद् विशेषः। अतश्च चैतन्यस्य साधारणत्वात् तन्मयं चिन्मयं सर्वं भावयन् निर्विशेषं ब्रह्म सर्वत्रास्तीति बोधमेवं धारयन् जनो भवजित् दुस्तरसंसारोत्तीर्णो भवति। 'चिद्धर्माः' इति पाठे देवासुरनरतिर्यगादिमूर्तिषु चिद्धर्माः सामान्येन सन्तीति न तत्र विशेषोऽस्ति कुत्रचित्। देहादेरेव विशेषोऽस्ति न तु चितेरिति भावयतः सर्वत्र चिदेव जृम्भतेऽनुभव- दाढ्यादित्यर्थः ॥९८॥ चित् अर्थात् ज्ञान अथवा क्रिया जिसका धर्म है, वह चेतन प्राणी चिद्धर्मा कहलाता है। यहाँ “धर्मादनिच् केवलात्” (५।४।१२४) इस पाणिनि सूत्र से अनिच् प्रत्यय होता है। १. °र्माः-ख०।
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३) पर यह श्लोक मिलता है।
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११० : विज्ञानभैरव हाथी और चींटी आदि छोटे-बड़े सभी प्राणियों के शरीरों में, अर्थात् कीट से लेकर सदाशिव पर्यन्त सभी प्राणियों में चैतन्य की दृष्टि से कोई विशेष भेद नहीं है। अतः यह सब चिन्मय ही है, क्योंकि चैतन्य इन सब का साधारण धर्म है। इस तरह से सभी प्राणियों में चिन्मय निर्विशेष ब्रह्म विद्यमान है, इस भावना का दृढ़तापूर्वक अभ्यास करने वाला साधक इस संसार को जीत लेता है, इस दुस्तर संसार-सागर को पार कर लेता है। 'चिद्धर्माः' ऐसा पाठ मानने पर इसका अर्थ यह होगा कि देव, असुर, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावर, जंगम आदि सभी मूर्तियों में चिति (चैतन्य) समान रूप से विद्यमान है, चैतन्य की दृष्टि से इनमें परस्पर कोई विशेषता नहीं है। विशेषता केवल शरीरों की है, चिति की नहीं। इस तरह से चैतन्य- सामान्य सर्वत्र स्फुरित हो रहा है, इस अनुभव को दृढ़ता से अपनी भावना का आधार बनाने वाला योगी दुस्तर संसार-सागर को पार कर लेता है, उसको सर्वत्र चिन्मात्रस्वरूप ब्रह्म की प्रतीति होने लगती है। "चैतन्यमात्मा" (१।१) इस शिव-सूत्र की व्याख्या करते हुए क्षेम- राज ने इस श्लोक को प्रस्तुत किया है ॥९८॥ [ धारणा-७६ ] ¹कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यगोचरे । बुद्धिं निस्तिमितां कृत्वा तत्तत्त्वमवशिष्यते ॥९९॥ कामक्रोधादिषु मात्सर्यपर्यन्तेषु अरिषड्वर्गेषु बुद्धिं स्वसंविदं निस्तिमितामेकाग्रां विकारानधिगमान्निष्पन्दां कृत्वा विधाय तत् तत्त्वं चिन्मात्रस्वरूपमवशिष्यते । कामादिविषये चित्ते एकाग्र्यप्रकर्षादपहारितबाह्यविषयाश्लेषं चिदानन्दमयमेवावि- र्भवतीत्यभिप्रायः ॥९९॥ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य ये छः चित्तगत दोष शास्त्रों में अरिषड्वर्ग के नाम से प्रसिद्ध हैं । इन चित्त-वृत्तियों में से किसी एक उत्कट चित्त-वृत्ति में धारणा को स्थिर कर देने पर अन्य समस्त वृत्तियां शान्त हो जातो हैं। इसी स्थिति में योगी को निरन्तर स्पन्दनशील स्वात्मस्वरूप के विवेक में लग जाना चाहिये, जिससे कि उसकी वृत्ति पुनः बहिर्मुख न हो। ऐसा करने से उसकी बुद्धि एकाग्र हो जाती है, बाह्य विषयों का संपर्क छूट जाने से निश्चल (स्थिर) और विकारशून्य हो जाती है। इस प्रकार की वृत्ति-क्षय दशा को जगा कर योगी अपनी उत्कट काम, क्रोध आदि वृत्तियों को उसी तरह से शान्त कर लेता है, जैसे कि कछुआ अपने अंगों को भीतर समेट लेता है। भगवद्गीता (२।५८) में स्थितप्रज्ञ का लक्षण बताते समय इसी स्थिति की ओर इंगित किया गया है। इस स्थिति में योगी का केवल चित् स्वरूप बच रहता है । अर्थात् काम, क्रोध आदि विषयों में चित्त की एकाग्रता के बढ़ जाने पर जब अन्य बाह्य विषयों से उसकी बुद्धि का संपर्क छूट जाता है, तब साधक का चिदानन्दमय बोधस्वरूप अभिव्यक्त हो उठता है। स्पन्दकारिका के—
- स्पन्दनिर्णय (पृ० ४०) पर यह श्लोक उद्धृत है ।
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विज्ञानभैरव : १११ अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वामृशन् । धावन् वा यत्पदं गच्छेत् तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ (श्लो० २२) इस श्लोक में भी इस स्थिति का वर्णन मिलता है, जिसकी कि व्याख्या पहले ही की जा चुकी है। स्पन्दनिर्णय (पृ० ४०-४१) में क्षेमराज का कहना है कि प्रस्तुत धारणा की ही तरह “आनन्दे महति प्राप्ते” (श्लो० ७०) और “क्षुताद्यन्ते” (श्लो० ११६) इन दोनों स्थलों में भी इस स्पन्द तत्त्व में प्रतिष्ठित होने की ही विधि बताई गई है ॥९९॥ [ धारणा-७७ ] 1इन्द्रजालमयं विश्वं न्यस्तं वा चित्रकर्मवत् । भ्रमद्वा१ ध्यायतः सर्वं पश्यतश्च सुखोद्गमः ॥१००॥ विश्वं ग्राह्यग्राहकात्मकमिदं सर्वं जगद् ज्ञानानुभवयुक्त्या निश्चितया बुद्ध्या इन्द्रजालनिभं मायानिर्मितम्, पटादिषु चित्रकर्मवत् न्यस्तं कल्पितम्, नावारूढस्य भ्रमद् गच्छत्तरुपर्वतादिवद् भ्रान्तिकल्पितं वा ध्यायतः पश्यतश्च सुखोद्गमः अक्षयसुखाविर्भावो भवति । ‘भ्रमतः’ इति पाठे भ्रमन्नपि ध्यायन्नपि पश्यन्नपीति योज्यम् ॥१००॥ यह सारा विश्व यद्यपि ग्राह्य और ग्राहक के रूप में दिखाई पड़ता है, किन्तु अनुभव और तर्क के द्वारा परिष्कृत बुद्धि से जब इसके स्वरूप पर विचार किया जाता है तो ये सब इन्द्रजाल (जादू के खेल) की तरह माया से निर्मित; कपड़े, कागज आदि पर बनाये चित्र के समान कल्पित; अथवा नाव आदि सवारी पर चढ़ कर चलने पर जैसे वृक्ष-पर्वत आदि चलते हुए से नजर आते हैं, उसी तरह से भ्रमपूर्ण, कल्पना से प्रसूत (उत्पन्न) मालूम पड़ते हैं। इस सही स्थिति का ज्ञान हो जाने पर और उसी में अपने ध्यान को केन्द्रित कर देने पर योगी के चित्त में अक्षय सुख का आविर्भाव हो जाता है। ‘भ्रमतः’ यह पाठ मानने पर इसका अर्थ होगा कि साधक जब अपने स्पन्द स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, तो वह भ्रमण करे, ध्यान करे अथवा देखे, उनमें अक्षय सुख की स्थिति सदा बनी रहती है। “शाक्ते क्षोभे” (५।७१) इत्यादि तन्त्रालोक के श्लोक की व्याख्या करते हुए जयरथ ने इस श्लोक को भी उद्धृत किया है ॥१००॥ [ धारणा-७८ ] न चित्तं निक्षिपेद् दुःखे न सुखे वा परिक्षिपेत् । भैरवि २ज्ञायतां मध्ये किं तत्त्वमवशिष्यते ॥१०१॥ हे भैरवि, सुखदुःखयोर्विषये चित्तस्थापनं न विधेयम्—अहं सुखी, अहं दुःखीति । शुद्धे स्वात्मनि अन्तःकरणधर्मान् सुखदुःखादीनध्यस्य न स्थेयमिति भावः । १. भ्रमतः-ख०, भ्रमाद्वा-त० । २. ध्या°-ख० ।
- तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३८०) में इसको देखा जा सकता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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११२ : विज्ञानभैरव किन्तु ज्ञायतां त्वया स्वयमेव विचारय त्वम्, मध्ये किं तत्त्वमवशिष्यत इति । सुखदुःख- योर्मध्ये यत् तत्त्वं तत्साक्षिभूतं तदनुसन्धातृ एकं चित्तत्त्वम्, एकाग्र्येण तदेव विमृश इति तात्पर्यम् । 'ध्यायताम्' इति पाठे हे भैरवि, चित्तैकाग्र्यं विधाय किं तत्त्वमवशिष्यत इति ध्यायतां तन्मध्ये ध्यानमध्ये भैरवोदयः स्यादित्यर्थः ॥१०१॥ हे भैरवि, अपने चित्त को न तो सुख के विषय में ही स्थापित करे और न दुःख के विषय में ही कि मैं सुखी हूँ या दुःखी हूँ। शुद्ध स्वात्मा में अन्तःकरण के धर्म सुख-दुःख आदि की कल्पना करनी चाहिये, किन्तु योगी को यह स्वयं विचार करना चाहिये कि इन दोनों के बीच में कौन सा तत्त्व बच रहता है ? सुख और दुःख के बीच में जो तत्त्व है, वही साक्षीभूत, सुख-दुःख का अनुसन्धाता, एक चित् तत्त्व है। एकाग्र भाव से योगी को उसी चित् तत्त्व पर अपने चिन्तन को केन्द्रित कर देना चाहिये। 'ध्यायताम्' ऐसा पाठ मानने पर इसका अर्थ यह होगा कि हे भैरवि, चित्त को एकाग्र करने पर सुख और दुःख के बीच में जो तत्त्व बच रहता है, उसमें अपने ध्यान को केन्द्रित कर देने वाले योगियों को उसी ध्यान में भैरव स्वरूप की अभिव्यक्ति हो जाती है ॥१०१॥ [ धारणा-७९ ] विहाय निजदेहास्थां सर्वत्राऽस्मीति भावयन् २ । दृढेन मनसा दृष्ट्या नान्येक्षिण्या सुखी भवेत् ॥१०२॥ निजदेहे आस्थां स्वदेहे प्रमातृतां न देहोऽहमित्यादिना विहाय, सर्वत्रास्मीति सर्वमिदमहमेवेति सदाशिवेश्वरादिवन्न तु 'चिद्धर्मा' (श्लो० ९८) इत्युक्तचिन्मात्रात्म- शिववत्, दृढेन निःसंशयेन, मनसा चित्तेन, तथा दृष्ट्या स्वसंविदा नान्येक्षिण्या प्रोक्त- वस्तुविमर्शैकाग्रया भावयन् सुखी भवेत् ॥१०२॥ अपने शरीर में आस्था, प्रमातृभाव को छोड़कर, अर्थात् मैं केवल इस देह में ही नहीं हूँ, किन्तु सदाशिव अथवा ईश्वर की तरह सर्वत्र मैं ही हूँ, सब कुछ मैं ही हूँ, इस भावना का अभ्यास करे। संशय रहित चित्त से तथा अपनी संवित्ति के बल पर, जो कि उक्त स्वरूप के विमर्श (विचार) में स्थिर है, अन्य किसी वस्तु का चिन्तन नहीं करती, इस भावना के विकास में लगा योगी सुखी हो जाता है। 'चिद्धर्मा' इत्यादि कारिका में सभी शरीरों में चिति की भावना का उपदेश दिया गया है। उसके विपरीत यहाँ अपने देह के अभिमान को छोड़कर सभी शरीरों में अपनी प्रमातृता, अपनी सत्ता के विकास की भावना का विधान है। इन दोनों धारणाओं का यह स्पष्ट अन्तर है। प्रस्तुत श्लोक में यह स्पष्ट किया गया है कि शिव और शक्ति का अपनी आत्मा के साथ सामरस्य संपादन करने वाले योगी के चित्त में समस्त विश्व के साथ अहंभाव की अभिव्यक्ति होती है, अर्थात् वह अपने को विश्वस्वरूप समझने लगता है। विश्वाहन्ता के १. ॰मस्मी-ख० । २. ॰येत्-ख० ।
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विज्ञानभैरव : ११३ विकास की यह प्रक्रिया विरूपाक्षपञ्चाशिका जैसे शास्त्रों में भी वर्णित है। तत्त्वमंजरीकार इस तरह के अहम्भाव को भी स्वीकार नहीं करते । वे बौद्ध मत का अनुमोदन करने में रस लेते हुए से कहते हैं— यतस्ततो वाऽस्तु भयं यद्यहं नाम किञ्चन । अहमेव न किञ्चिच्चेद् भयं कस्योपजायते ॥ अर्थात् यदि मैं कुछ होऊँ, तब मुझे इधर-उधर, जहाँ-तहाँ से भय हो सकता है । यदि मैं ही कुछ नहीं हूं, तो फिर भय किसको पैदा होगा । इसविचार से बौद्ध विद्वान् सहमत हैं, जब कि वे कहते हैं— सत्यात्मनि परसंज्ञा स्वपरविभागे च रागविद्वेषौ । अनयोः संप्रतिबद्धा सर्वे दोषाः प्रजायन्ते ।। (प्र० वा० १।२२१-२२२) अर्थात् अपनी आत्मा के रहने पर दूसरी आत्मा की बात उठती है । यह अपना है, यह पराया है, ऐसी कल्पना हो जाने पर अपने से राग और दूसरे से द्वेष उत्पन्न होने लगता है । समस्त प्राणियों में इस राग और द्वेष से जुड़े हुए ही अन्य समस्त छोटे-छोटे दोष उत्पन्न होते हैं । इसके विपरीत विमर्शदीपिका में इस अहम्भाव की एक अलग व्याख्या की गई है । जैसे कि— विश्वात्म विश्वोत्तीर्णं च स्वतन्त्रं दिव्यमक्षरम् । अहमित्युत्तमं तत्त्वं समाविश्य बिभेतिः कः ॥ अर्थात् विश्वात्मक होते हुए भी विश्वोत्तीर्ण, स्वतन्त्र, दिव्य, अक्षर तत्त्व ही 'अहम्' नाम से कहा जाता है। इस प्रकार के 'अहम्' तत्त्व में धारणा स्थिर हो जाने पर भय किसको छू सकता है ? किसी आचार्य ने ठीक ही कहा है— एककोऽहमिति संसृतौ जनस्त्राससाहसरसेन खिद्यते । एककोऽहमिति कोऽपरोऽस्ति मे इत्थमस्मि गतभीर्व्यवस्थितः ॥ अर्थात् इस संसार में जब मनुष्य यह सोचता है कि मैं अकेला हूँ, मेरा कोई सहायक नहीं है, तब वह भयभीत रहता है । किन्तु जब वह यह सोचता है कि मैं अकेला ही तो इस संसार में हूँ, यह सब कुछ मुझ से अलग छोड़े ही है, तब वह निर्भय होकर रहता है । इस प्रकार आगमशास्त्र में अहम्भाव को भगवत्स्वरूप ही माना गया है । अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ के द्वारा प्रतिपादित अहम्भाव की व्याख्या पहले (श्लो० ८८) की जा चुकी है । इस प्रकार यह अहम्भाव उपादेय है, त्याज्य नहीं । परिमित अहन्ता का, अहंकार का तो त्याग होना ही चाहिये । जैसा कि तपस्वीराज ने कहा है— सुविषमममतादंष्ट्राविदलितजनधैर्यशोणितपिपासुः । अहमिति पिशाच एष त्वत्स्मृतिमात्रेण किङ्करीभवति ।।
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११४ : विज्ञानभैरव अर्थात् अहंकार की ममता रूपी बड़ी तीखी दाढ़ें होती हैं। इनकी पकड़ में आने पर मनुष्य का धैर्य छूट जाता है । तब यह अहंकार रूपी पिशाच उस मनुष्य का रक्त चूसने लगता है, अर्थात् उसकी सद्बुद्धि पर आवरण डाल देता है। किन्तु मनुष्य जब भगवान् की शरण में पहुँच जाता है, तो यही पिशाच उसका सेवक बन जाता है। भगवान् ने भगवद्गीता¹ के सोलहवें अध्याय में आसुरी सम्पत्ति के रूप में इस अहंकार रूपी पिशाच का बड़ा हृदयहारी वर्णन किया है ॥१०२॥ [ धारणा-८० ] घटादौ यच्च विज्ञानमिच्छाद्यं वा ममान्तरे । नैव सर्वगतं जातं भावयन्निति सर्वगः ॥१०३॥ सर्वगतं सदा सर्वत्र सर्वास्ववस्थासु परिदृश्यमानं यद् घटादौ विज्ञानं घटोऽय- मित्यादिनाऽनुभूयमानम्, यच्च ममान्तरे इच्छादिकम् एवं करोमीत्यादिना प्रतीयमानम्, तत्सर्वं जातमपि किमपि न भवति, निःसारत्वादिति भावयन् सर्वगः सर्वत्र प्रकाशस्वरूपः, स्यादिति शेषः । अथवा घटादौ विषये यदस्मदादेर्विषयिणो ज्ञानमिच्छाद्यं वा यदस्ति तन्ममै- वान्तरे हृदयमध्ये नैव, किन्तु सर्वगतं जातं तद्भवतीत्यन्वयः । एवकारो भिन्नक्रमः, स तु 'मम' इत्यनन्तरं बोद्धव्यः । सर्वेषां घटादीनामप्यस्मदादिविषयं ज्ञानमिच्छाद्यं वाऽस्ति । तेन किं जातम् ? घटादयोऽपि जानन्त्यस्मदादिज्ञानेन, तथा सदाशिवादिरपि क्रिमिपर्यन्तं मदात्मना जानाति इच्छति वा, क्रिमिरप्यस्मदादिप्रभृति सदाशिवान्तं जानाति इच्छति चेति ज्ञानक्रियात्मकं सर्वं सर्वात्मकमिति भावयन् धारणां कुर्वन् सर्वगतो भवेत् ॥१०३॥ सदा, सर्वत्र, सभी अवस्थाओं में दिखाई पड़ने वाला 'यह घट है' इस प्रकार का बाह्य घट प्रभृति पदार्थों का अनुभव और मेरे भीतर प्रतीत हो रहे, 'मैं ऐसा करता हूँ' इस प्रकार के इच्छा प्रभृति भाव, वे सब निःसार होने से पैदा होते हुए भी कुछ नहीं है। अतः उनकी शून्य रूप में भावना करने पर योगी सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, सभी स्थितियों में प्रकाश- स्वरूप हो जाता है। अथवा इस श्लोक की दूसरी व्याख्या इस तरह से की जा सकती है—घट आदि विषय में भी अस्मदादि विषयी का भान अथवा इच्छा प्रभृति भावों का उदय होता है, अर्थात् वह केवल मेरे हृदय में ही नहीं होते, किन्तु उनकी प्रतीति तो सर्वत्र घट-पट आदि में भी होती है । यहाँ 'नैव' के साथ जुड़े हुए एवकार को 'मम' के साथ जोड़ना चाहिये । तब श्लोक का अन्वय इस तरह से होगा—ममैव अन्तरे न, (किन्तु) सर्वगतं जातम् । तदनुसार ही यह
- भगवद्गीता में इस आसुरी सम्पत्ति का वर्णन 'आसुरं पार्थ मे शृणु' इस छठे श्लोक से लेकर 'आसुरीं योनिमापन्नाः' इस बीसवें श्लोक तक विस्तार से किया गया है ।
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विज्ञानभैरव : ११५ दूसरा अर्थ किया गया है । घट-पट आदि सभी पदार्थों में अस्मदादि विषयक ज्ञान अथवा इच्छा प्रभृति भाव विद्यमान हैं, यह कह कर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? इससे हम यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हमारे ज्ञान के घट आदि में संक्रान्त हो जाने से वे भी ज्ञानवान् हो जाते हैं । सदाशिव प्रभृति जैसे क्रिमि-कीट पर्यन्त सभी पदार्थों को अपने से अभिन्न मानते हैं और उनको चाहते हैं, उसी तरह क्रिमि-कीट भी अस्मदादि से लेकर सदाशिव पर्यन्त सभी को जानते हैं और उनको चाहते हैं । ज्ञान और क्रिया की इस समानता के आधार पर जगत् के सभी पदार्थ सर्वात्मक हैं । इस तरह की धारणा का अभ्यास करने वाला योगी सर्वत्र व्याप्त हो जाता है । यही विषय सोमानन्द की शिवदृष्टि में भी प्रतिपादित है— घटो मदात्मना वेत्ति वेद्म्यहं च घटात्मना ॥ सदाशिवात्मना वेत्सि स वा वेत्ति मदात्मना । नानाभावैः स्वमात्मानं जानन्नास्ते स्वयं शिवः ॥ (५।१०५-१०६, १०९) सभी भावों की सर्वात्मकता का प्रतिपादन शिवदृष्टि के प्रथम और पंचम आह्निक के अन्त में विस्तार से किया गया है । यह वहीं अवलोकनीय है ।।१०३।। [ धारणा-८१ ] १ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽयं१ संबन्धे सावधानता ।।१०४।। सर्वदेहिनां सदाशिवादिकीटान्तानाम् इदं ग्राह्यम् अयं ग्राहक इत्यादिना यो व्यवहारः स सामान्य एव । यदेको जानाति तदपरोऽपि जानातीति नात्र कश्चन विशेष इति भावः । परन्तु योगिनामयमेव विशेषः—सम्बन्धे ग्राह्यग्राहकस्वरूपावधारणे सावधानता ग्रहीतृरूपाविस्मरणम् ।।१०४।। सदाशिव से लेकर कीट पर्यन्त सभी प्राणियों में यह वस्तु ग्राह्य है और यह प्रमाता उसका ग्राहक है, इस तरह का व्यवहार समान रूप से विद्यमान है । इनके संवेदन (ज्ञान) में परस्पर कोई विशेषता या विलक्षणता नहीं है, क्योंकि किसी वस्तु को एक प्रमाता जिस तरह से देखता है, दूसरा प्रमाता भी उसी तरह से देखता है । यह तो योगियों की ही विशेषता है कि वे सम्बन्ध के प्रति अधिक सावधान रहते हैं, अर्थात् ग्राह्य और ग्राहक के स्वरूप का अवधारण करते समय उनको अपने चित् स्वरूप की कभी विस्मृति नहीं होती और वे इस १. ॰षोऽस्ति-क० ।
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १८, ६८), महा० परि० (पृ० १५४), तन्त्रा० वि० (भा० ७, आ० १०, पृ० १४०), ई० प्र० वि० वि० (भा० १, पृ० ७७; भा० २, पृ० ४०५), प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ३८) में यह श्लोक उद्धृत है । नेत्रतन्त्र० (भा० २, पृ० ३७), ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० ५०; भा० ३, पृ० ३०, ५२) में केवल चतुर्थ चरण उद्धृत है ।
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११६ : विज्ञानभैरव बात में सदा सावधान रहते हैं कि मैं स्मर्ता हूँ, सदा प्रकाशस्वरूप हूँ तथा मुझसे भिन्न सब कुछ वेद्य (ज्ञेय) है, अनित्य है, अत एव असत् कहलाता है। यह सत् और असत् वस्तु का विवेक कभी योगी से अलग नहीं होता। यह श्लोक, विशेष कर इसका चतुर्थ चरण अनेक ग्रन्थों में उद्धृत है। इससे इस श्लोक की महत्ता सिद्ध होती है। यह सावधानी लौकिक कार्यों को पूरा करने के लिए भी जब अत्यन्त आवश्यक है, तब योगी के लिए तो इसकी उपयोगिता के विषय में कहना ही क्या ! कहा जा सकता है कि किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए सावधानी पहली शर्त है ॥१०४॥ [ धारणा-८२ ] स्ववदन्यशरीरेऽपि संवित्तिमनुभावयेत् । अपेक्षां स्वशरीरस्य त्यक्त्वा व्यापी दिनैर्भवेत् ॥१०५॥ स्ववत् स्वीयदेहवत्, अन्यशरीरेऽपि स्वावयवभूते सर्वदेहसमूहे संवित्तिं चेतनां स्वकीयामहन्ताम्^२ अनुभावयेत् । कथम् ? स्वशरीरस्य अपेक्षां त्यक्त्वा चिन्मात्ररूपस्य मम सर्वत्र तुल्यस्थितित्वेन निखिलं जगन्ममैव वपुः, न तु एकदेशावयवतुल्योऽयं देहवराकः, एतस्मिन् देहावयवे नष्टेऽप्यन्ये सर्वे देहा मम सन्त्येवेति किमनेन ? इत्थं ममताविषयोकृतां स्वशरीरापेक्षां त्यक्त्वा कतिपयैर्द्दिनैरेव सर्वव्यापको भवेत् ॥१०५॥ किसी ज्ञान के लिये अपने शरीर की भी आवश्यकता रहती है, इस बात का विचार किये बिना अपने बाह्य देह की तरह दूसरे व्यक्ति के बाह्य देह में भी एक ही तरह की संवित्ति अनुगत रूप से प्रवाहित हो रही है, ऐसी भावना करे। अपने शरीर में अविनाभाव सम्बन्ध से विद्यमान संवित् का रूप दूसरे के बाह्य शरीर में भी अनुगत है, इस तरह के विचार को निरन्तर अभ्यास के द्वारा दृढ़ करे। इस भावना का अभ्यास करने से "तद्बुद्धय- स्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः" (५।१७) इत्यादि भगवद्गीता के वचन के अनुसार विदेह कैवल्य की सिद्धि हो जाती है। साथ ही "विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि" (५।१८) इस गीता वाक्य में उपदिष्ट पद्धति से सर्वत्र ब्रह्म का दर्शन करने से महाविदेह कैवल्य की भी प्राप्ति होती है। ^३विदेह कैवल्य और महाविदेह कैवल्य की सिद्धि हो जाने पर योगी में
- ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० ३११) में इस श्लोक का प्रथम और तृतीय चरण तथा वहीं (पृ० ४२७) उत्तरार्ध मात्र मिलता है।
- पृ० १०० की तीसरी टिप्पणी में विश्वाहन्ता की संक्षिप्त व्याख्या की गई है। इस विश्वाहन्ता का विकास होने पर योगी की अपने शरीर की ही भांति अन्य शरीरों में भी अहन्ता-बुद्धि स्थिर हो जाती है।
- विवेक ख्याति से मनुष्य जड़ से अर्थात् त्रिगुणात्मक प्रकृति से अपने को पृथक् अर्थात् द्रष्टा के रूप में समझ या पहचान सकता है। इस अवस्था में देह का बोध नहीं रहता, केवल निष्क्रिय आत्मस्वरूप ही रहता है। इसी स्थिति को साधारणतया विदेह कैवल्य के नाम Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ११७ परकायप्रवेश आदि के द्वारा नाना प्रकार के शरीरों में उन-उन कर्मों का भोग पूरा करने के अभिप्राय से विहार करने का और नाना सुखों को भोगने का सामर्थ्य आ जाता है । अपने देह का सहारा लिये बिना दूसरे के शरीर में संवित् स्वरूप की भावना कैसे करें ? इसका उत्तर श्लोक में ही 'स्ववत्' पद से दिया गया है । जैसे अपनी आत्मा में अपने शरीर का सहारा छोड़ कर योगी अपने संवित्स्वरूप का चिन्तन करता है, वैसे ही दूसरे के जीवित अथवा मृत शरीर में भी अपने संवित्स्वरूप के विमर्श को अनुगत करे । इसमें योगी की इच्छा ही नियामिका है कि वह अपने विमर्श को जीवित शरीर से अनुगत करेगा या मृत शरीर से । जीवित शरीर में विमर्श को अनुगत करने पर १वशिता, यत्रकामावसायिता आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । अपने संवित्स्वरूप के परामर्श के बल से किसी मरे हुए राजा आदि के शरीर में प्रविष्ट होकर योगी नाना प्रकार के भोगों को भोगता है, अथवा अपना अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध करता है । इससे यह सिद्ध होता है कि संवित्स्वरूप को कभी भी शरीर की अपेक्षा नहीं रहती, क्योंकि यह संवित्स्वरूप सर्वत्र अनुगत है । एक शरीर तो दूसरी जगह नहीं रह सकता । जैसे कि स्वप्नावस्था में चिदात्मा की तो अनुवृत्ति रहती है, क्योंकि स्वप्न के साक्षी के रूप में उस समय भी उसका स्फुरण विद्यमान है; किन्तु स्थूल शरीर उस समय नहीं रहता, क्योंकि उसकी वहाँ प्रतीति नहीं होती । सुषुप्ति अवस्था में तो केवल चिति की ही अनुवृत्ति रहती है, क्योंकि साक्षी के रूप में उस समय भी उसका स्फुरण विद्यमान हैं। अन्यथा यह कौन सोया है ? इस प्रश्न का उत्तर आप क्या देंगे ? इसके लिये स्वात्मस्वरूप संवित्ति की अनुवृत्ति माननी पड़ेगी । स्वप्नावस्था में जैसे स्थूल शरीर की निवृत्ति हो जाती है, उसी तरह सुषुप्ति दशा में सूक्ष्म शरीर की भी निवृत्ति माननी पड़ती है, क्योंकि उस अवस्था में गाढ निद्रा के कारण पदार्थों के दर्शन-स्पर्शन का आभास भी नहीं बच रहता । इसी तरह से चित्त के समाधिस्थ हो जाने पर तुरीय दशा में शुद्ध चिदानन्द का स्फुरण होने से आत्मा की वृत्ति रहती है, क्योंकि उस समय वह समाहित अवस्था में रहता है । सुषुप्ति दशा में प्रतीत होने वाले कारण देह रूप अज्ञान की भी तुरीय दशा में निवृत्ति हो जाती है । इस तरह से उक्त चार अवस्थाओं में उक्त तीनों शरीरों की नियमतः अनुवृत्ति नहीं होती, किन्तु आत्मा की संवित्स्वरूपता तो सर्वत्र अनुवृत्त रहती है । अतः इसके लिए उस-उस शरीर की अपेक्षा के न रहने से यह कहना से जाना जाता है । “बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः” (३।४३) इस योगसूत्र के व्यासभाष्य में विदेह और महाविदेह कैवल्य की व्याख्या की गई है और परकायप्रवेश की चर्चा आई है । . वशिता का अर्थ है सर्ववशीकार, सबको अपने वश में कर लेने का सामर्थ्य । यत्रकामाव- सायिता का तात्पर्य है जिस वस्तु को प्राप्त करने की चाह (इच्छा) योगी के मन में उत्पन्न होती है, वह अवसित हो जाती है, पूरी हो जाती है, उसकी इच्छा का कभी विघात नहीं होता ।