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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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१२६ : विज्ञानभैरव का ही स्वरूप मान कर मन को वहीं स्थिर कर दे । इस प्रकार के अभ्यास के स्थिर हो जाने पर अन्ततः मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है ॥११३॥ [ धारणा-९१ ] ¹यत्र¹ यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते विभोः२ । तस्य तन्मात्र³धर्मित्वाच्चिल्लयाद् भरितात्मता४ ॥११४॥ यत्र यत्र नीलसुखादौ, अक्षमार्गेण चक्षुरादिसुषिरमार्गेण, विभोः प्रभोः पर- भैरवात्मनः, चैतन्यं चित्प्रकाशः, अभिव्यज्यते स्फुरति, तस्य नीलसुखादेः, तन्मात्र- धर्मित्वात् दर्पणप्रतिबिम्बिताभासवैचित्र्येण चैतन्यमात्रस्वभावत्वात्, चिल्लयात् चितौ लयाद् विश्रान्तेः, भरितात्मता परभैरवस्वरूपता । भावनाया अस्या दाढर्येन भावकः ‘अहमेव विश्वमयो महच्चैतन्यभरितः’ इत्यनुभूततात्त्विकावस्थः संपद्यत इति भावः । यथा घनीभूतः प्रकाश एव सूर्यमण्डलं जातम्, तथा चिदेव हि आश्यानीभूता जगदा- त्मना भातीत्याम्नायः ॥११४॥ जहाँ जहाँ नील, सुख प्रभृति बाह्य अथवा आन्तर भावों में चक्षु प्रभृति बाह्य अथवा आन्तर इन्द्रियों के माध्यम से प्रभु परभैरव स्वरूप आत्मा का चित्प्रकाश अभिव्यक्त होता है, वहाँ वहाँ उन नील, सुख आदि भावों को केवल चित्प्रकाशात्मक ही मानना चाहिये। यदि इनको चैतन्य से अतिरिक्त माना जाय तो इनकी चेत्यता अर्थात् ज्ञानविषयता भी नहीं बन सकेगी, ये ज्ञान के विषय भी न हो सकेंगे । दर्पण में प्रतिबिम्बित हो रहे नाना प्रकार के आभास जैसे दर्पणमात्र स्वभाव हैं, दर्पण के अतिरिक्त इनकी कोई सत्ता नहीं है, दर्पण के कारण ही इनकी प्रतीति होती है; उसी तरह से प्रकाशात्मक शिव में स्थित चैतन्यमात्र स्वभाव ही यह सारा जगत् है, प्रकाशात्मक चैतन्य के अतिरिक्त इसकी कोई सत्ता नहीं है, चैतन्य के कारण ही यह भासित हो रहा है। इस धारणा का अभ्यास करने से यह भावना दृढ़ हो जाती है कि उस विभु के अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीं है। ऐसा विचार करते-करते साधक इस सारे विश्व की भित्तिभूत ( आधारस्वरूप ) चिति में लीन हो जाता है और उसका परभैरव स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है, उसको अपनी तात्त्विक पूर्णता का बोध हो जाता है कि अखण्ड चैतन्य से ओतप्रोत यह सारा विश्व मैं ही हूँ। जैसे घनीभूत प्रकाश ही सूर्यमण्डल कहलाता है, उसी तरह से यह घनीभूत चिच्छक्ति ही जगत् के रूप में भासित होने लगती है। आगमशास्त्र की यह प्रमुख मान्यता है। इसका अभिप्राय यह है कि जैसे १. तत्र तत्रा°-यो० । २. प्रभोः-यो० । ३. °रूपत्वा°-यो० । ४. स्थितिः-यो०, मतिः-यो० ।

  1. तन्त्रालोकवि० ( भा० ११, आ० २९, पृ० ८२ ), शिव० विम० (पृ० ४२), योगिनी० दीपिका (पृ० १९२, २६४, २९९, ३३३. ३४३) में यह उपलब्ध है। तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० २१) में ऐसा पाठ मिलता है—"येन येनाक्षमार्गेण यो योऽर्थः प्रतिभासते । स्वावष्टम्भबलाद् योगी तद्गतस्तन्मयो भवेत् ॥"

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विज्ञानभैरव : १२७ ¹घनीभूत (जमा हुआ) घृत अथवा हिम (बर्फ़) ही पिघल कर तरल बन जाता है, उसी तरह से घनीभूत चिच्छक्ति ही जगत् का रूप धारण कर लेती है । तरल द्रव्य जैसे घन द्रव्य से भिन्न नहीं है, उसी तरह से यह जगत् भी उस चिच्छक्ति से अतिरिक्त नहीं है । अतः सर्वत्र चिति की उपस्थिति के कारण जहाँ कहीं भी धारणा स्थिर की जायगी, वहीं चैतन्य की अभिव्यक्ति हो जायगी ॥११४॥ [ धारणा-९२ ] ²क्षुता¹द्यन्ते भये शोके गह्वरे वा रणाद्² द्रुते । कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्ता³ समीपगा ॥११५॥ क्षुतादीनां छिक्काप्रभृतीनामन्ते, भये, शोके, गह्वरे, रणाद् द्रुते, कुतूहले, क्षुधा- दीनां बुभुक्षापिपासादीनामन्ते वा ब्रह्मसत्ता अनवच्छिन्नचिदानन्दस्फुरत्ता समीपगा निकटस्थिता । तां तत्र तत्रावसरे विमृश्य सुप्रबुद्धः समाविशेत् । अप्रबुद्धः पुनरत्र मूढ एव तिष्ठतीति भावः ॥११५॥ छींक आने के बाद अथवा भय, शोक, आदि भावों के उत्पन्न होने पर, गढ्ढे में गिर पड़ने पर, युद्धस्थल से भाग जाने पर, किसी आश्चर्यजनक घटना के घट जाने पर या भूख- प्यास आदि तीव्र संवेगों की निवृत्ति हो जाने पर एक क्षण के लिये ब्रह्मानन्द सरीखे आनन्द का अनुभव होता है । व्यक्ति का अनवच्छिन्न चिदानन्द, जो कि जीव दशा के कारण अवच्छिन्न हो गया था, कुछ क्षण के लिए अपने परमार्थ स्वरूप में प्रकट हो जाता है । इन अव- सरों का लाभ उठाकर अर्थात् कुछ क्षण के लिये अभिव्यक्त अपने सहज स्वरूप में धारणा का अभ्यास कर उसको स्थायी बना लेने वाला सुप्रबुद्ध साधक समावेश दशा में लीन हो जाता है । इसके विपरीत अप्रबुद्ध साधक उस ब्रह्मसत्ता के पास पहुँच कर भी उसको जान नहीं पाता । “अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा” (श्लोक २२) इत्यादि स्पन्दकारिका से भी इस धारणा की पुष्टि होती है ॥११५॥ [ धारणा-९३ ] वस्तुषु स्मर्यमाणेषु दृष्टे देशे मनस्त्यजेत् । स्वशरीरं निराधारं कृत्वा प्रसरति प्रभुः ॥११६॥ स्मर्यमाणेषु स इति तदिति स्मृतिज्ञानेन वेद्यमानेषु, वस्तुषु पदार्थेषु, दृष्टे देशे- ऽनुभवशक्तौ स्वाधारभूतायाम्, मनस्त्यजेत् प्रक्षिपेद् एकाग्र्येणादध्यात्, अनुभवपूर्वकत्वात् स्मृतेः । स्वशरीरं स्वदेहं निराधारं निरालम्बनमहिकञ्चुकवदसङ्गं विभावयेत् । ततोऽनुभवरूपः प्रभुः स्मरणानुभवयोः स्मर्यमाणानुभूयमानयोश्च एकत्वानुसन्धात्रात्मा, १. क्रोधा°-स्पप्र० । २. वारणद्रुते-ख० स्पनि०, वारणे रणे-स्पप्र० । ३. °मयी दशा-क० ।

  1. इसके स्पष्टीकरण के लिए पृ० ४ की ३ संख्या की टिप्पणी देखनी चाहिये ।
  2. स्पन्दनिर्णय (पृ० ४१) और स्पन्दप्रदीपिका (पृ० १०७) में उद्धृत है ।

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१२८ : विज्ञानभैरव प्रसरति प्रादुर्भवति । अत्रायं भावः—अनुभवात् स्मरणादौ सूत्र इव मणिगणः प्रोतश्चैतन्यप्रसर इति सिद्धम् । अतस्तमेव ध्यायेत् ततः स्वयमेव प्रभुः प्रादुर्भवतीति निश्चय इति ।।११६।। किसी सहकारी उद्बोधक के रहने पर हमारे मन में अनेक प्रकार की स्मृतियाँ जागती रहती हैं। स्मृति से प्रतीत हो रहे ऐसे पदार्थों के उपस्थित होने पर उन स्मृतियों के आधारभूत अनुभव में अपने मन को नियोजित कर दे । प्रत्येक स्मृति का जन्म अनुभव के आधार पर ही होता है, अतः जिस अनुभव से स्मृति का जन्म हुआ, उस स्मृति के उपस्थित होने पर उसका परित्याग कर उसके 'आधारभूत ज्ञान को पूरी सावधानी से पकड़े । इसके साथ ही अपने शरीर को भी इस अनुभव से अलग कर दे । साँप जब केंचुली उतार देता है, तो उस केंचुली से जैसे उसको कोई माया-मोह नहीं रहता, उसी तरह से साधक को चाहिये कि जब उसने स्मृति का परित्याग कर उसके आधारभूत अनुभव को पकड़ा है, तो उस समय उस शरीर के साथ भी ममता को छोड़ दे, जिसमें कि रहकर वह अनुभवों और स्मृतियों को तथा उनके संस्कारों को संचित करता रहता है । इस स्थिति में उसका चित्त अहन्ता, ममता और संचित वासनाओं के अभाव में शुद्ध अनुभव रूप हो जाता है । वह स्मृति और अनुभव में तथा स्मर्यमाण तथा अनुभूयमान पदार्थों में किसी प्रकार का भेद नहीं देखता । यही तो प्रभु का, परभैरव का वास्तविक स्वरूप है । अतः इस धारणा के अभ्यास से साधक के चित्त में निरन्तर अनुभव दशा का ही स्फुरण होते रहने से परभैरव स्वरूप का प्रकाश आलोकित हो उठता है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे माला की सारी मणियां तागे में गुँथी रहती हैं, वैसे ही सारी स्मृतियाँ अनुभवों में गुँथी रहती हैं । यह अनुभव स्वात्मचैतन्य स्वरूप है । अतः जिस किसी भी अनुभव को अपनी धारणा का विषय बनाया जाय, उसमें इस स्वात्मचैतन्य की भावना करने से यह परभैरव स्वरूप स्वात्मचैतन्य प्रकट हो जाता है । अतः साधक को इसी में अपनी धारणा स्थिर करनी चाहिये ।।११६।। [ धारणा-९४ ] क्वचिद्वस्तुनि विन्यस्य शनैर्दृष्टिं निवर्तयेत् । तज्ज्ञानं चित्तसहितं देवि शून्यालयो भवेत् ।।११७।। हे देवि, क्वचिद्वस्तुनि कस्मिंश्चिद् वस्तुनि दृष्टिमक्षिरूपां विन्यस्य निक्षिप्य, कञ्चित् पदार्थं घटोऽयमित्येवं दृष्ट्वेत्यर्थः । तज्ज्ञानं शनैः शनैस्तस्य पदार्थस्य ज्ञानम्, चित्तसहितं तद्विषयसंकल्पसहितम्, तद्वासनायुक्तमिति यावत् । निवर्तयेत् शून्यभावनया, अन्तर्लक्ष्यबहिर्दृष्टिन्यायेन वा । तेनैव शून्यालयः शून्ये आलयो विश्रान्तिर्यस्य एवंविधः संयमी भवेत् ।।११७।। हे देवि, जिस किसी भी घट-पट आदि पदार्थ में अपनी दृष्टि डालकर, अर्थात् घट-पट आदि किसी भी पदार्थ को सावधानी से देखकर, धीरे-धीरे उस पदार्थ के ज्ञान को उसके संकल्प के साथ और उस अनुभव से संचित वासनाओं के साथ चित्त से निकाल दे । अनुभव, संकल्प और वासनाओं को अपने चित्त से निकाल देने के लिए साधक शून्यभावना का सहारा ले कि

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विज्ञानभैरव : १२९ यह सारा विश्व शून्य स्वभाव है, आकाश के समान रूपहीन है, इसका कोई स्वरूप नहीं है, अस्तित्व नहीं है । अथवा शांभवी¹ मुद्रा की सहायता से, जिसमें कि दृष्टि के बाहर रहने पर भी लक्ष्य भीतर ही रहता है, इस कार्य को संपन्न करे । अर्थात् वह अपने शुद्ध स्वरूप को ही देखे और उससे भिन्न सभी विकल्प वासनाओं का परित्याग कर दे । ऐसा करने से, इस धारणा के अभ्यास से, संयमी साधक शून्य में लीन हो जाता है, परम पद में विश्राम प्राप्त कर लेता है ॥११७॥ [ धारणा-९५ ] ²भक्त्युद्रेकाद् विरक्तस्य यादृशी जायते मतिः । सा शक्तिः शाङ्करी नित्यं भावयेत् तां ततः शिवः ॥११८॥ भक्त्युद्रेकाद् भक्त्यतिशयेन विरक्तस्य शान्तचित्तस्य भक्तस्य चित्ते साधकचित्त- समाधानेन यादृशी मतिर्जायते सा शाङ्करी शक्तिरिति गीयत इति तामेव नित्यं भावयेत् । ततः साधकः शिवः शिवमयः स्यात् ॥११८॥ भक्ति के उद्रेक से अर्थात् आधिक्य से विरक्त अर्थात् शान्तचित्त भक्त के चित्त में साधक के चित्त के समाहित हो जाने से जिस तरह की बुद्धि उत्पन्न होती है, वह शांकरी शक्ति कही जाती है । अर्थात् ईश्वर के अनुग्रह (शक्तिपात) से भक्त के हृदय में ऐसी भावना पैदा होती है कि वह सब कुछ भूलकर शान्त भाव से निरन्तर ईश्वर के चिन्तन में लगा रहता है । उसका चित्त ईश्वर की आराधना में लीन हो जाता है । भक्त की इस मानसिक दशा में अपने चित्त को लीन करने वाला साधक भी शिवमय हो जाता है, अर्थात् वह साधक भी उस भक्त के समान ही भगवन्मय हो जाता है । क्षेमेन्द्र ने अपने गीतानिष्यन्द में भक्ति का लक्षण यह किया है— ³न पादपतनं भक्तिर्व्यापिनः परमेशितुः । भक्तिर्भावस्वभावानां तदेकीभावभावनम् ॥ अर्थात् सर्वत्र व्यापक भगवान् के चरणों में साष्टांग प्रणाम करना ही भक्ति नहीं है । वास्तविक भक्ति तो यह है कि भाव स्वभाव के सभी पदार्थों में एक भगवान् का ही अनुचिन्तन किया जाय, अर्थात् सारे जगत् को भगवन्मय समझा जाय । भगवद्भक्ति की महिमा स्तवचिन्तामणि में इस प्रकार वर्णित है— अणिमादिगुणावाप्तिः सदैश्वर्यं भवक्षयः । अमी भव ! भवद्भक्तिकल्पपादपपल्लवाः ॥ (श्लो० ५५)

  1. भैरवी मुद्रा ही यहाँ शाम्भवी मुद्रा के नाम से कही गई है । भैरवी मुद्रा का लक्षण श्लो० २६ की व्याख्या में बताया जा चुका है ।
  2. स्तवचिन्तामणि की व्याख्या (पृ० ६५) में क्षेमराज ने इसे उद्धृत किया है ।
  3. महार्थमञ्जरीपरिमल (पृ० १०८) में यह श्लोक उद्धृत है ।

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१३० : विज्ञानभैरव अर्थात् हे भव (शिव), आपकी भक्ति कल्पवृक्ष के समान है और अणिमा प्रभृति सिद्धियों की प्राप्ति, सदाशिव प्रभृति का ऐश्वर्य और मुक्ति—ये सब कल्पवृक्ष के पल्लवों (पत्तों) के समान हैं। अभिप्राय यह है कि कल्पवृक्ष से जैसे प्राणी की सारी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं, उसी तरह भगवद्भक्ति रूप कल्पवृक्ष से भी साधक शिवस्वरूप में समाविष्ट हो जाता है ॥११८॥ [ धारणा-९६ ] १वस्त्वन्तरे वेद्यमाने 'शनैर्वस्तुषु शून्यता । तामेव मनसा ध्यात्वा२ विदि३तोऽपि प्रशाम्यति ॥११९॥ वस्त्वन्तरे कस्मिंश्चिदेकस्मिन् वस्तुनि वेद्यमाने चित्स्वरूपत्वेन ज्ञायमाने सर्व- वेद्येषु तदन्येषु बाह्याभ्यन्तरेषु वस्तुषु वेद्यमानेष्वपि शनैः शनैरभ्यासपाटवेन शून्यता भावनीया । शून्यता नाम तत्कालमनाभासनम् । तामेव वेद्याभावात्मकचित्प्रकाशरूपां शून्यतां मनसा निर्विकल्पसंविदा ध्यात्वा विमृश्य विदितोऽपि वेदनादपि प्रशाम्यति शान्त- ब्रह्मस्वरूपो भवति । विदिशब्द इकारान्तो भेदप्रथारूपज्ञानवाचकः । 'विचित्तोऽपि' इति पाठे विविधसंकल्पविकल्पव्यापारसंयुक्तोऽपि मुक्तः स्यादित्यर्थः ॥११९॥ किसी एक वस्तु का चित्स्वरूप में ज्ञान हो जाने पर उससे भिन्न सभी बाह्य और आन्तर वस्तुओं एवं भावों का बोध होने पर धीरे-धीरे उनमें अभ्यास के सहारे शून्यता की भावना करनी चाहिये । यहाँ शून्यता का अभिप्राय एक वस्तु के ज्ञान के रहते उसके विपरीत स्वभाव की किसी दूसरी वस्तु के ज्ञान का उदय न होने में है । इस चित्प्रकाश रूप शून्यता में, जहाँ कि अन्य किसी विरोधी वेद्य की स्थिति नहीं है, निर्विकल्पक मन से ध्यान को केन्द्रित करने पर साधक योगी का भेदप्रथात्मक ज्ञान (भेद-भ्रम) शान्त हो जाता है तब उसका शान्त ब्रह्मस्वरूप प्रकट हो उठता है, अर्थात् वह ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । यहाँ इकारान्त 'विदि' शब्द भेदप्रथात्मक ज्ञान का वाचक है । 'विचित्तोऽपि' ऐसा पाठ मानने पर इसका अर्थ यह होगा कि नाना प्रकार के संकल्प-विकल्प व्यापारों से संयुक्त रहने पर भी साधक मुक्त हो जाता है । इस धारणा में और 'क्वचिद्वस्तुनि' (श्लोक ११७) इत्यादि श्लोक में प्रदर्शित धारणा में शून्यता की भावना की समानता रहते हुए भी इनमें परस्पर विशेषता यह है कि पहली धारणा में एक वस्तु को जान लेने पर उससे संबद्ध वासना आदि में शून्यता की भावना करने की बात कही गई है, जब कि प्रस्तुत धारणा में एक वस्तु के ज्ञान के बाद अन्य समस्त वेद्य वस्तुओं में शून्यता की भावना का विधान है ॥११९॥ १. सर्ववेद्येषु-ने० । २. ध्यायन्-ने० । ३. ॰चित्तो०-ख० ।

  1. नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २००) में यह श्लोक मिलता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivedi (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : १३१ [ धारणा-९७ ] १किञ्चिज्जैर्या स्मृता२ शुद्धिः साऽशुद्धिः शम्भुदर्शने । न शुचिर्ह्यशुचिस्तस्मान्निर्विकल्पः३ सुखी४ भवेत् ॥१२०॥ किञ्चिज्जैः किञ्चिन्मात्रबोधयुक्तैर्धर्मशास्त्रज्ञैः, या शुद्धिः मृज्जलादिना स्मृता सा शम्भुदर्शने पारमेश्वरतत्त्वसाक्षात्कारे सति अशुद्धिरेव । अथवा शम्भुदर्शने परमेश्वर- भाषिते शास्त्रे सा अशुद्धिरेव । न शुचिः न नैर्मल्यम्, निर्देशस्य भावप्रधानत्वात् । या अन्यशास्त्रोक्ता शुद्धिः सा न शुचिः न शुद्धत्वम्, किन्तु हि अशुचिः । 'हि' अवधारणे हेतौ वा । अशुद्धतैव । मृदादिशुद्धेस्तत्त्वज्ञानं प्रत्यकिञ्चित्करत्वेनानङ्गत्वादिति भावः । 'अशुद्धिः' इति पूर्वमभिधाय तदनु 'न शुचिः' इत्युक्त्वापि पुनः 'हि अशुचिः' इत्यशुचि- पौनरुक्त्यं तत्त्वज्ञानानुपयोगित्वदार्ढ्यप्रतिपादनार्थम् । तस्मान्मृद्दिशौचविनाकृतोऽपि निर्विकल्पः निर्विकल्पज्ञानेन सति मनःशौचे त्यक्तमनोमलः सुखी भवेत् ॥१२०॥ धर्मशास्त्रकारों ने भलीभाँति हाथ-पैर धोकर तीन बार स्वच्छ जल से आचमन करना, स्नान करना आदि अनेक तरह से शुद्धि का विधान किया है । इन धर्मशास्त्रों में मिट्टी, जल आदि से होने वाली शुद्धि पर बड़ा बल दिया गया है, किन्तु परमेश्वर के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करने के प्रसंग में यह शुद्धि सहायक नहीं होती, अतः इसको अशुद्धि ही मानना चाहिये । अथवा इसका यह भी अर्थ किया जा सकता है कि शैव शास्त्र में यह शुद्धि अशुद्धि ही मानी गई है । धर्मशास्त्र की इस शुद्धि को परमेश्वर शिव के द्वारा उपदिष्ट शास्त्रों में चित्त की निर्मलता में कारण नहीं माना गया है । इसके विपरीत इस तरह की शुद्धि को उन शास्त्रों में दम्भ, पाषण्ड आदि चित्त के कालुष्यों का ही प्रवर्त्तक बताया गया है । इसका अभिप्राय यह है कि धर्मशास्त्रों के द्वारा उपदिष्ट शुद्धि शरीर को तो पवित्र करती है, किन्तु वह मन को पवित्र नहीं कर पाती । इसी लिये शैव शास्त्रों में इस तरह की शुद्धि को अशुद्धि में ही गिना गया है । वास्तविक शुद्धि वही है, जिससे कि मन पवित्र हो । शुद्ध मन से ही तत्त्व का साक्षात्कार किया जा सकता है । कोरी शारीरिक शुद्धि तत्त्वज्ञान में सहायक नहीं हो सकती । इस बात को दृढ़तापूर्वक समझाने के लिये ही 'अशुद्धिः, न शुचिः, हि अशुचिः' इस तरह से तीन बार इसमें अशुचिता का विधान किया गया है । 'हि' शब्द का प्रयोग भी अवधारण या कारण के अर्थ में हुआ है, अर्थात् यह धर्मशास्त्रोक्त शारीरिक शुद्धि अशुद्धि ही है, अथवा अशुद्धि का ही कारण है । मन की शुद्धि में इसका कुछ भी उपयोग नहीं है । अतः साधक को चाहिये कि मिट्टी, जल आदि से की जाने वाली शुद्धि का सहारा लिये बिना भी १. °ताऽशु°-ख० म० । २. सा शु°-ख० म० । ३. °ल्पो भवेत् सदा-स्व०, °ल्पो भवेन्नरः- म० । ४. शिवो-ख० । l. स्वच्छन्द० (भा० ३, पृ० ७, पृ० ३१५) और महार्थ० (पृ० २२ में) यह श्लोक उद्धृत है ।

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१३२ : विज्ञानभैरव अपने निर्विकल्प ज्ञान से मन के मैल को धोकर सर्वत्र सुखपूर्वक विचरण करे। मालिनीविजय तन्त्र में बताया गया है— नात्र शुद्धिर्न चाशुद्धिर्न भक्ष्यादिविचारणम् । न द्वैतं नापि चाद्वैतं लिङ्गपूजादिकं न च ॥ न चापि तत्परित्यागो निष्परिग्रहतापि वा । सपरिग्रहता वापि जटाभस्मादिसंग्रहः ॥ तत्यागो न व्रतादीनां चरणाचरणं च यत् । क्षेत्रादिसंप्रवेशश्च समयादिप्रपालनम् ॥ परस्वरूपलिङ्गादिनामगोत्रादिकं च यत् । नास्मिन् विधीयते किञ्चिन्न चापि प्रतिषिध्यते ॥ विहितं सर्वमेवात्र प्रतिषिद्धमथापि वा । किन्त्वेतदत्र देवेशि नियमेन विधीयते ॥ तत्त्वे चेतः स्थिरीकार्यं सुप्रयत्नेन योगिना । तच्च यस्य यथैव स्यात् स तथैव समाचरेत् ॥ तत्त्वे निश्चलचित्तस्तु भुञ्जानो विषयानपि । न संस्पृशेत् दोषैः स पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ विषापहारिमन्त्रादिसंनद्धो भक्षयन्नपि । विषं न मुह्यते तेन तद्वद् योगी महामतिः ॥ (१८।७४-८१) अर्थात् योगी का आचरण कैसा होना चाहिये, इस विषय का निरूपण करते हुए परमेश्वर ने इस ग्रन्थ के अठारहवें पटल में बताया है कि इनके लिये शुद्धि और अशुद्धि का विधान, भक्ष्य और अभक्ष्य का निरूपण, द्वैत या अद्वैत का उपदेश, लिंग-पूजा आदि का विधान या निषेध, निष्परिग्रह रहने या सपरिग्रह होने का विधान, जटा-भस्म आदि का स्वीकार या परित्याग, व्रत आदि का आचरण करना या न करना, क्षेत्र-संन्यास आदि लेकर नियमों का पालन करना न करना, तिलक आदि चिह्न, नाम, गोत्र, आदि को रखना न रखना—जैसी बातों के बारे में पक्ष या विपक्ष में कुछ भी नहीं कहा जाता है। ये सभी वस्तुएँ विहित भी मानी जा सकती हैं और निषिद्ध भी। इसमें साधक की इच्छा ही प्रमाण है कि वह इनका आचरण करे या न करे। वस्तुतः तत्त्वज्ञान में इनकी कोई उपयोगिता नहीं है। नियम के नाम पर शास्त्र में केवल इतना ही विधान है कि योगी को प्रयत्नपूर्वक परम तत्त्व में अपने चित्त को स्थिर करना चाहिये। चित्त की यह स्थिरता जैसे भी हो, योगी को तदनुसार ही अपनी चर्या बना लेनी चाहिये। जिस योगी का चित्त परम तत्त्व में स्थिर हो गया है, वह विषयों का उपभोग करते हुए भी उनके दोषों से उसी प्रकार लिप्त नहीं होता, जैसे कि जल में रहते हुए भी कमलपत्र उससे निर्लिप्त रहता है। विष को दूर करने वाला गारुडिक अपने शरीर को मन्त्रों से जब सुरक्षित कर लेता है, तो उस पर जहर का असर नहीं होता, उसी तरह से यह महान् मतिशाली योगी विषय रूपी विष को खाकर भी मोहित नहीं होता । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : १३३ इससे यह स्पष्ट होता है कि तत्त्व-ज्ञान के लिये, चित्त की शुद्धि के लिये मिट्टी, जल आदि से की जाने वाली शारीरिक शुद्धि का तब तक कोई उपयोग नहीं है, जब तक कि व्यक्ति बहिर्मुख बना रहता है। जैसा कि निम्न श्लोक में बताया गया है— मृज्जलादिविशुद्धोऽपि न पवित्रो वहिर्मुखः । बहिर्निर्मलमध्यस्थपुरीषकलशादिवत् ॥ अर्थात् ऊपर से चमचमाता विष्ठा से¹ भरा घड़ा जैसे पवित्र नहीं माना जाता, उसी तरह ते स्नान-सन्ध्या से पवित्र बहिर्मुख व्यक्ति भी पवित्र नहीं माना जा सकता। धर्मशास्त्रों में भी देव सम्बन्धी और पितृ सम्बन्धी कार्यों में ही स्नान की आवश्यकता बताई गई है। यह कहीं भी नहीं लिखा गया है कि मिट्टी, जल आदि से शरीर की शुद्धि किये बिना कोई व्यक्ति ज्ञान का अधिकारी नहीं हो सकता । तत्त्व-ज्ञान के प्रति यह शुद्धि बाधक नहीं है, अतः शारीरिक शुद्धि का पालन तत्त्व- ज्ञानी करे तो इसमें आपत्ति नहीं है, किन्तु कर्मकाण्ड के लिये जैसे शुद्धि अनिवार्य है, वही स्थिति ज्ञान के विषय में नहीं है। इसके विपरीत यह हो सकता है कि मिट्टी आदि से शरीर को निर्मल बनाने पर उसकी सुन्दरता को देखकर तत्त्वज्ञानी का भी अभिमान पुनः एक बार जाग जाय । इससे वह अपनी अन्तर्मुख वृत्ति को भूल जायगा और उसकी बहिर्मुख वृत्ति पुनः जग उठेगी । इससे बचने के लिये ज्ञानी को अपनी ऐसी स्थिति बनानी चाहिये कि बार-बार अपने चिदात्मक स्वरूप का चिन्तन करते रहने से उसकी देह आदि की विस्मृति दृढ़ हो जाय । ऐसा योगी कभी अपने इस नश्वर शरीर की चिन्ता नहीं करता । जैसा कि भागवत में बताया गया है— देहं च नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् । (११।१३।३६) अर्थात् इस नश्वर शरीर की विभिन्न अवस्थाओं के प्रति योगी कोई ध्यान नहीं देता, क्योंकि उसने अपने स्वरूप को भलीभाँति जान लिया है। यदि मिट्टी, जल आदि से होने वाली शुद्धि का तत्त्व-ज्ञान में कोई उपयोग नहीं है, तो भगवान् ने गीता में 'आचार्योपासनं शौचं'¹ (१३।७) इत्यादि स्थल में शौच (पवित्रता) का विधान कैसे बताया है ? इससे तो यही ज्ञात होता है कि शौच भी तत्त्व-ज्ञान का अंग है, तत्त्व-ज्ञान के लिये इसको भी उपयोगिता है। यह बात सही हो सकती है, किन्तु शास्त्रों में

  1. शक्तिसंगम तन्त्र के—"विष्ठापूर्णे मृद्घटे तु बहिःशुद्धौ तु किं फलम् । अन्तःशुद्धिं समासाद्य बहिःशुद्धिं समाचरेत् ॥" (IV ११।७४--७५) इस श्लोक में भी यही बात कही गई है। अर्थात् मिट्टी का घड़ा यदि विष्ठा (मल-मूत्र) से भरा है, तो उसकी ऊपर से सफाई करने से क्या लाभ है ? अतः मन की शुद्धि के बाद ही शरीर की भी शुद्धि रखनी चाहिये, केवल शारीरिक शुद्धि से कुछ भी आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलने वाला है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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१३४ : विज्ञानभैरव मान्त्र, भौम, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण और मानस इन सात प्रकार के स्नानों का वर्णन मिलता है। इनमें मानस स्नान ही सर्वोत्तम माना गया है, जिसमें कि मन के द्वारा भगवान् के स्वरूप का ध्यान किया जाता है। अतः भगवद्गीता के उक्त वचन में इस मानस शौच की ही चर्चा मानी जानी चाहिये, शारीरिक शौच की नहीं। धर्मशास्त्रों में भी शारीरिक शौच को सामान्य धर्म ही माना गया है, इसके विपरीत तत्त्व-ज्ञान को परम धर्म माना गया है, जो कि मिट्टी, जल आदि से की गई शारीरिक शुद्धि से उत्पन्न होने वाले धर्म से अधिक श्रेय- स्कर है। जैसा कि याज्ञवल्क्य स्मृति में बताया गया है- इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम् । अयं तु परमो धर्मो यद् योगेनात्मदर्शनम् ॥ (१।८) अर्थात् इज्या (यज्ञ), आचार, दम, अहिंसा, दान, स्वाध्याय आदि की अपेक्षा योगा- भ्यास से आत्मदर्शन करना अधिक श्रेयस्कर है, उन सब से बढ़ कर धर्म है। उक्त शारीरिक शुद्धि के न करने पर परमात्मा की कोई हानि नहीं है, क्योंकि वह तो आकाश की तरह निराकार है। शुद्धि यदि की जाती है, उससे कुछ बढ़ोतरी होने वाली नहीं है। मिट्टी आदि से शुद्ध करने पर भी शरीर तो मलिन ही रहेगा। इस तरह से धर्म- शास्त्रों में प्रदर्शित शुद्धि शैव-शास्त्र की दृष्टि में अशुद्धि ही है। वास्तव में तो इस बाह्य शारीरिक शुद्धि के बिना भी निर्विकल्पक ज्ञान की सहायता से मन को निर्मल बना कर साधक स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो सकता है ॥१२०॥ [ धारणा-९८ ] सर्वत्र भैरवो भावः सामान्येष्वपि गोचरः । न च तद्व्यतिरेकेण परोऽस्तीत्यद्वया गतिः ॥१२१॥ सर्वत्र सर्वेषु प्रदेशेषु बाह्याभ्यन्तरेषु पदार्थेषु भावो भैरवः सत्स्वरूपो विज्ञा- त्रात्मा, न तु बौद्धादिवज्ज्ञेयशून्यरूपः, सामान्येषु विवेकहीनेषु, अपि गोचरः स्फुटः । सर्वेषां प्रमातृणां सकलप्रलयाकलादीनामहं जानामि, करोमीत्याद्यहंविमर्शस्य स्फुटतया स्फुरणात् । न च तद्व्यतिरेकेण भैरवव्यतिरेकेण परोऽन्यः कश्चिदस्तीति संबोध्याप्त्या अद्वया द्वयातीता गतिरद्वैतज्ञानमहंविमर्शस्यैक्यं स्यात् । अहंरूप एव परमेश्वरः । स तु प्रकट एव, किमाणवाद्युपायत्रयेण ? नहि स्फुटतरस्य उपायान्वेषणमुचितमिति भावः ॥१२१॥ सभी स्थानों में, बाह्य और आन्तर सभी पदार्थों में, भावस्वभाव, सत्स्वरूप विज्ञा- नात्मा का, न कि बौद्ध दार्शनिकों की तरह ज्ञेयशून्य स्वरूप का, विवेकहीन सामान्य जनों को भी स्पष्ट भान होता है, क्योंकि 1सकल, प्रलयाकल आदि सभी प्रमाताओं को 'मैं जानता हूँ', मैं करता हूँ' इस तरह से अहंविमर्श की स्पष्ट प्रतीति होती है। ये सारे विमर्श भैरव-विमर्श

  1. सकल, प्रलयाकल प्रभृति प्रमाताओं का निरूपण पृ० ३८ की २ टिप्पणी में किया जा चुका है।

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विज्ञानभैरव : १३५ से भिन्न नहीं हैं, इस लिये सारे विमर्श एक ही हैं, विज्ञानात्मा भैरव से भिन्न और कुछ भी नहीं है, इस तरह का ज्ञान हो जाने पर अद्वैत ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है । इससे यह बात स्पष्ट होती है कि परमेश्वर अहंस্বরূপ ही है और यह सबको स्पष्ट रूप से ज्ञात है । तब उसके लिये आणव, शाक्त और शांभव-इन तीन उपायों की क्या आवश्यकता है ? जो वस्तु स्वयं स्पष्ट प्रतीत हो रही है, उसको खोजने के लिये कोई उपाय नहीं किया जाता । जैसा कि कहा गया है- उपायजालं न शिवं प्रकाशयेद् घटेन किं भाति सहस्रदीधितिः । विवेचयन्नित्यमुदारदर्शनः स्वयंप्रकाशं शिवमाविशेत् क्षणात् ॥ अर्थात् कोई भी लौकिक उपाय शिव को नहीं प्रकाशित कर सकता । क्या घट सूर्य को प्रका- शित कर सकता है ? उदार दृष्टि वाला मनुष्य इस तरह विचार करते-करते ही किसी समय स्वयंप्रकाश शिव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है । संवित्प्रकाश में भी बताया गया है- अपरोक्षे भवत्तत्त्वे सर्वतः प्रकटे स्थिते । यैरूपायाः प्रतन्यन्ते नूनं त्वां न विदन्ति ते ॥ आपका तत्त्व अर्थात् स्वरूप तो स्पष्ट रूप से सबकी आँखों के सामने विद्यमान है । ऐसी स्थिति में जो व्यक्ति आपको देखने के लिये भाँति-भाँति के उपायों की खोज में लगे रहते हैं, यह निश्चित है कि वे आपको नहीं जानते । श्रुति ने भी इस बात को स्पष्ट किया है- उतैनं गोपा अदृशन्नुतैनमुदहार्यः । उतैनं विश्वा भूतानि स दृष्टो मृडयाति नः ॥ (वा० सं० १६।७; तै० सं० ४।५।१।३) अर्थात् इसको ग्वालबाले जानते हैं, पनहारिनें इसको जानती हैं और विश्व के सारे प्राणी इसको जानते हैं । इसको देख कर कौन आनन्द-विभोर नहीं हो जाता ? इसी बात को महेश्वरानन्द ने भी "यं जानन्ति" (श्लो० ४) इत्यादि गाथा में निबद्ध किया है । इन सब प्रमाणों के आधार पर यह स्पष्ट है कि विज्ञानात्मा स्वात्मस्वरूप की प्रतीति सबको होती है और इसके अतिरिक्त जगत् की कोई सत्ता नहीं है । इस बात को जान लेने पर साधक स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ।।१२१।। [ धारणा-९९ ] 1समः शत्रौ च मित्रे च समो मानावमानयोः । ब्रह्मणः परिपूर्णत्वादिति ज्ञात्वा सुखी भवेत् ।।१२२।। १. °प°-ख० ।

  1. “मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥” (१४।२५) भगवद्गीता के इस श्लोक में प्रस्तुत धारणा का ही स्पष्ट विवेचन मिलता है । दोनों श्लोकों के पूर्वार्ध में अद्भुत समानता है ।

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१३६ : विज्ञानभैरव शत्रुमित्रादिषु मानापमानकर्तृषु च सर्वत्र ब्रह्मणः स्वात्मस्वरूपस्यैव परिपूर्णत्वात् ओतप्रोतत्वात् यः साधकः "विद्याविनयसंपन्ने" (५।१८) इत्यादिगीतोपदेशरीत्या शत्रौ च मित्रे च समः, मानापमानयोश्च समः, स सुखी भवेत्। इच्छाज्ञानक्रियोल्लासं चिन्मयमेव विश्वप्रपञ्चं विज्ञाय सुखी भवतीति भावः ॥१२२॥ शत्रु और मित्र में, संमान करने वाले और अपमान करने वाले सभी प्राणियों में, स्वात्मस्वरूप ब्रह्म ही विद्यमान है, इस स्वात्मस्वरूप से शत्रु और मित्र आदि की कोई अलग सत्ता नहीं है, ऐसा जान कर जो समझदार साधक— विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ (५।१८) इस गीता वचन के अनुसार विद्या और विनय से संपन्न ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चांडाल में समान दृष्टि रखता है, साथ ही शत्रु और मित्र को भी एक ही भाव से देखता है तथा संमान मिलने पर अथवा अपमान होने पर जो हर्ष और विषाद में नहीं पड़ता, वह सब तरह से सुखी हो जाता है, परमानन्द से परिपूर्ण हो जाता है। वह इस बात को भली भांति जान लेता है कि यह चिन्मय विश्वप्रपंच इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति का उल्लास मात्र है, इसमें शत्रु-मित्र आदि की कोई वास्तविक स्थिति नहीं है, सब कुछ आनन्दमय और चिन्मय ही है। इस स्थिति में पहुँच जाने पर वह सुखस्वरूप हो जाता है ॥१२२॥ [ धारणा-१०० ] नद्वेषं भावयेत् क्वापि न रागं भावयेत् क्वचित् । रागद्वेषविनिर्मुक्तौ मध्ये ब्रह्म प्रसर्पति ॥१२३॥ क्वापि शत्रुसर्पप्रभृतिषु द्वेषं न भावयेत् द्वेषबुद्धिं न कुर्यात्, न च क्वचित् सुहृद्- हारादिषु रागं भावयेत् अनुरागबुद्धिं कुर्यात्। एवं रागद्वेषविनिर्मुक्तौ तद्विनिर्मुक्त- स्वभावापत्तौ सत्यां योगिनो मध्येऽन्तःकरणे ब्रह्म शुद्धस्वात्मस्वरूपं प्रसर्पति विकसति, भावको ब्रह्म सम्पद्यत इति भावः ॥१२३॥ शत्रु, सर्प प्रभृति प्रतिकूल वेदनीय, दुःखजनक पदार्थों में न तो द्वेष की भावना रखे और न मित्र, हार प्रभृति ¹अनुकूल वेदनीय, सुखजनक पदार्थों में राग बुद्धि को ही पैदा होने दे। इस तरह से चित्त के राग और द्वेष से मुक्त हो जाने पर साधक के अन्तःकरण में शुद्ध स्वात्मस्वरूप ब्रह्म प्रकाशित हो उठता है। अर्थात् इस तरह की भावना करने वाला योगी ब्रह्मभाव से संपन्न हो जाता है ॥१२३॥

  1. तर्कसंग्रह में— "अनुकूलवेदनीयं सुखम्। प्रतिकूलवेदनीयं दुःखम्।" यह सुख और दुःख की परिभाषा बताई गई है। अर्थात् अपने मन में अनुकूल प्रतीत होने वाला सुख और प्रतिकूल प्रतीत होने वाला दुःख कहलाता है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : १३७ [ धारणा-१०१ ] यदवेद्यं यदग्राह्यं यच्छून्यं यदभावगम् । तत्सर्वं भैरवं भाव्यं तदन्ते बोधसम्भवः ॥१२४॥ यद् अवेद्यं ज्ञेयदशानास्पदम्, यद् अग्राह्यम् अनुपादेयम्, यत् शून्यं देवनयो- पात्तं स्वातन्त्र्यस्वरूपम्, यद् अभावगं गगनकुसुमादिष्वपि सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेन महा- सामान्यरूपम्, तदेतत्सर्वं भैरवं भाव्यं भैरवत्वेन भावनीयम् । तद्भावनाप्रकर्षेण अन्ते पर्यन्ते बोधसंभवः सम्यग् बोधो भवेत् । सर्वमेतद् ब्रह्मैव भवतीति दृढानुभवबलात् सर्वत्र भैरवस्वरूपबोधवान् भैरव एव भवति, ब्रह्म सम्पद्यत इति भावः ॥१२४॥ जो अवेद्य है, अर्थात् जो ज्ञेय दशा में कभी नहीं आता, जो अग्राह्य अर्थात् अनुपादेय है, जो शून्यस्वरूप है तथा जो गगन-कुसुम जैसे अभावात्मक पदार्थों में भी सत्ता का बोध करा देता है, उसी की सर्वस्वरूप भैरव के रूप में भावना करनी चाहिये । इस भावना का उत्कर्ष होने पर अन्त में सम्यग् बोध का आविर्भाव होता है । यहाँ शून्य तत्त्व परमार्थतः अभावात्मक नहीं है, किन्तु सभी आलम्बन धर्मों से, सभी तत्त्वों से और सभी क्लेशाशयों से शून्य पदार्थ को ही शून्य नाम से अभिहित किया गया है । इस तरह से किसी अवर्णनीय, अविज्ञेय अवस्था (स्वातन्त्र्य शक्ति) को शाक्त मत में शून्यता माना गया है । बौद्धसंमत शून्यता का इस शास्त्र में कोई स्थान नहीं है, जो कि अन्ततः नास्तिकता का कारण बनती है । विमर्शदीपिका में शून्यता का स्वरूप इस तरह से वर्णित है— स्वतन्त्रं परिपूर्णं च शिवारुख्यं शून्यधाम तत् । तत्त्वानि यत्र लीयन्ते यस्मात् समुदयन्ति च ॥ तत्त्वेश्वरास्ततो जातास्तत्रैव निवसन्ति च । क्षीयन्ते किल तत्रैव शिवारुख्ये शून्यधामनि ॥ दर्शनान्तरदृष्टानि यानि शून्यान्तराण्यपि । तेषामुत्पत्तिविलयौ शिवशून्ये सदोदिते ॥ न तदस्ति न यत्तत्र न तदस्ति न यत्र तत् । अन्तर्बहिरूपतया ततोऽन्यन्नोपपद्यते ॥ उपेयमितरन्नास्ति स्वातन्त्र्यात् परमे नये । तदनादृत्य गाहन्ते सौगताः शून्यतां जडाः ॥ अर्थात् स्वतन्त्र, परिपूर्ण शिव ही शून्यता का आश्रय स्थान है, जहाँ से कि सारे तत्त्व निकलते हैं और उसी में लीन होते रहते हैं । इसी शिवनामक शून्य से तत्त्वों के अधिपतियों की सृष्टि होती है और वे रहते भी इसी में हैं । इस शिवनामक शून्य लोक में वे लीन भी हो जाने हैं । अन्य दर्शनों में इस शून्य के नाना स्वरूपों का वर्णन मिलता है, किन्तु उन सबका उदय और विलय इस सदोदित शिव-शून्य में ही होता रहता है । ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो इस शून्य में न रहती हो और न कोई ऐसी ही वस्तु है जहाँ कि शन्य न रहता हो । अन्दर या

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१३८ : विज्ञानभैरव बाहर ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो कि उससे भिन्न हो । इस उत्कृष्ट शाक्त दर्शन में इस शून्य से भिन्न कोई उपेय नहीं है । स्वतन्त्र शिव तत्त्व ही वस्तुतः शून्य नाम से यहाँ जाना जाता है । इस शिव तत्त्व का अनादर कर बौद्ध दार्शनिक शून्यता का निरूपण गलत तरीके से करते हैं । वस्तुतः यह शून्य शिव की स्वातन्त्र्य शक्ति का ही विलास है । यह शून्य रूप स्वातन्त्र्य शक्ति से संवलित शिव तत्त्व आकाश-कुसुम जैसी अलीक वस्तुओं की भी सत्ता का बोध करा देने में समर्थ होने से महासामान्य रूप होता है । प्रत्यभिज्ञाकारिका (१।५।१४) में इस स्वातन्त्र्य शक्ति की स्फुरत्ता को ही महासत्ता बताया गया है । स्तवचिन्तामणि (श्लो० ६) में यह परमेश्वर का सर्वसामान्य स्वरूप माना गया है । अभाव को भी अपना विषय बनाने वाले इस महासामान्य का वर्णन महार्थमंजरीकार ने इस तरह से किया है— कः सद्भावविशेषः कुसुमाद्भवति गगनकुसुमस्य । यत्स्फुरणानुप्राणो लोकः स्फुरणं च सर्वसामान्यम् ॥ (श्लो० ३२) अर्थात् सामान्य पुष्प से आकाशकुसुम की क्या विशेषता है कि एक की सत्ता और दूसरे की असत्ता प्रतीत होती है ? किसी वस्तु की स्फुरत्ता के आधार पर ही व्यक्ति भाव और अभाव का बोध करते हैं । यह स्फुरत्ता गगन-कुसुम और सामान्य-कुसुम में समान है, अतः इनमें ऐसी कोई भी विशेषता नहीं प्रतीत होती कि जिसके आधार पर इनमें भेद किया जा सके । इसका अभिप्राय यह है कि भावात्मक और अभावात्मक सभी पदार्थों में परमेश्वर की स्वातंत्र्य शक्ति महासत्ता और स्फुरत्ता के रूप में अनुस्यूत है । अतः इस स्वातन्त्र्य शक्ति संवलित शिव के अतिरिक्त शून्यता का बौद्धसंमत चतुष्कोटिविनिर्मुक्त लक्षण बन ही नहीं सकता, क्योंकि यह सारा जगत् सदात्मक ही है । इसमें सदात्मक कोटि के अतिरिक्त अन्य कोटियों के स्फुरण का कोई प्रसंग ही नहीं है । इस विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि “यतो वाचो निवर्तन्ते” (तै० उ० २।४), “न तत्र सूर्यो भाति” (कठो० ५।१५), “आनन्दाद्ध्येव खल्वि- मानि भूतानि जायन्ते” (तै० उ० ३।६) इत्यादि श्रुतियों में यह प्रतिपादित किया गया है कि यह सारा जगत् ब्रह्मस्वरूप ही है । श्रुति प्रतिपादित इस स्थिति में अपने अनुभव को दृढ़ करने पर साधक के चित्त में सर्वत्र भैरव-बोध का ही स्फुरण होने लगता है और इस तरह से सर्वत्र ब्रह्म-दृष्टि का विकास होने से वह स्वयं ब्रह्म बन जाता है ॥१२४॥ [ धारणा-१०२ ] नित्ये निराश्रये शून्ये व्यापके कलनोज्झिते । बाह्याकाशे मनः कृत्वा निराकाशं¹ समाविशेत् ॥१२५॥ नित्ये निराश्रये शून्ये व्यापके कलनोज्झिते बाह्याकाशे बाह्यगगने मनो विम- र्शात्मकं ज्ञानं कृत्वा समापन्नं विधाय निरालम्बनचिदुदये सति निराकाशम् आकाशा- १. ᵒशे-ख० । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : १३९ निष्क्रान्तमशून्यं धाम समाविशेत्। नित्यत्वादिविशेषणप्रतिपादितव्यासिके बाह्याकाशे शून्यधारणातिशयेन तदभ्यासातिशयाच्छून्यातिशून्यभूतं यद्धाम तत्रैव योगी समाविश- तीति भावः ॥१२५॥ नित्य, निराश्रय, शून्य, व्यापक और कलना अर्थात् इयत्ता से रहित सर्वत्र व्याप्त बाह्य आकाश में विमर्शात्मक ज्ञान से सम्पन्न मन को समाहित करने पर साधक के चित्त में धीरे-धीरे निरालम्बन चिच्छक्ति का, घट, नील, सुख आदि विकल्पों से अतीत शुद्ध निर्वि- कल्पक ज्ञान का उदय होने लगता है। इस धारणा के अभ्यास से अन्ततः वह निराकाश अशून्य धाम में, अर्थात् शिव तत्त्व में समाविष्ट हो जाता है। पूर्व श्लोक की व्याख्या में शिव तत्त्व को शून्यता का धाम अर्थात् आश्रय-स्थान बताया गया था। अतः यह उचित ही है कि शून्यता का यह धाम शिव तत्त्व स्वयं अशून्य अर्थात् महासामान्य, महासत्ता स्वरूप माना जाय। इसका अभिप्राय यह है कि नित्यत्व आदि विशेषणों से जिसकी सर्वव्यापकता प्रतीत होती है, उस बाह्य आकाश में भी योगी जब शून्यता की भावना को दृढ़ करता है कि यह भी कुछ नहीं है, तो इस भावना के अभ्यास को बढ़ाने पर उसके चित्त में सभी बाह्य आलम्बनों का अभाव हो जाने से वह योगी शून्यता के आश्रयभूत अतिशून्य अर्थात् अशून्य शिव तत्त्व में समाविष्ट हो जाता है ॥१२५॥ [ धारणा-१०३ ] यत्र यत्र मनो याति तत्तत् तेनैव तत्क्षणम् । परित्यज्यानवस्थित्या निस्तरङ्गस्ततो भवेत् ॥१२६॥ यत्र यत्र विषये मनश्चाञ्चल्याद् याति तत्तद् वस्तु तत्सर्वम्, तेनैव अविकल्प- संवेदनरूपेण मनसा तत्क्षणं परित्यज्य परिहृत्य, पुनरपि गतं चेत् पुनरपि प्रत्याहृत्य, अनवस्थित्या चित्तवृत्तिनिरोधे सति वैराग्याभ्यासयुगलदाढर्यान्मनसो निरालम्बनता- प्राप्तियुक्त्या, ततो निस्तरङ्गो भवेत् परभैरवावेशवान् परभैरवस्वरूपवान् भवेत् ॥१२६॥ अपनी चंचलता के कारण मन जहाँ-जहाँ भी जाता है, उन सब विषयों से उसको निर्विकल्पक संवेदन के माध्यम से तत्काल हटा ले कि वस्तुतः उन विकल्पों की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। हटा लेने के बाद भी यदि वह फिर वहीं चला जाता है, तो उसको पुनः वहाँ से हटाने का निरन्तर अभ्यास करता रहे, जब तक कि वह पूर्णतः प्रत्याहृत नहीं हो जाता, अपने वश में नहीं आ जाता। जैसा कि गीता के— यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ (६।२६) इस श्लोक में प्रतिपादित है। इस तरह से अपने चित्त की वृत्तियों की विषय-प्रवणता को रोक कर तथा वैराग्य और अभ्यास के द्वारा चित्त को एकाग्र बना कर उसको निरालम्बन, (निर्विकल्पक) समाधि में स्थिर कर दे। योगी के इस समाधि दशा में स्थित हो जाने पर वह निस्तरंग हो जाता है, अर्थात् सांसारिक विषय-विकल्पों के कारण उसके चित्त-समुद्र में तब Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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१४० : विज्ञानभैरव किसी प्रकार का क्षोभ (चंचलता) नहीं उठता। इस स्थिति के स्थिर हो जाने पर वह परभैरव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। अभ्यास और वैराग्य दोनों की सहायता से चित्त के निरोध की बात "अभ्यास- वैराग्याभ्यां तन्निरोधः" (१।१२) इस योगसूत्र में तथा "अभ्यासेनैव कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते" (६।३५) इस भगवद्गीता के वचन में भी प्रतिपादित है। 'यत्र यत्र' (श्लो० ७३, ११३-११४) इत्यादि श्लोकों में मन जिस विषय की ओर आकृष्ट हो, उसी में धारणा को स्थिर करने की बात कही गई थी। यहां गीता के उपदेश के अनुसार मन के निरोध की बात बताई गई है ॥१२६॥ [ धारणा-१०४ ] १भया' सर्वं २रवयति सर्वदो३ व्यापकोऽखिले । इति भैरवशब्दस्य ४सन्ततोच्चारणाच्छिवः ॥१२७॥ भैरवपदान्तर्गतस्य 'भा ऐ र व' इत्यक्षरचतुष्कस्यायमर्थः-भया संवित्प्रकाश- रूपया, ऐकारः क्रियाशक्तिमान् महेश्वरः, सर्वं रवयति विमृशतीति भैरवः। यद्वा भया ज्ञानात्मिकया शक्त्या, ऐकारेण माहेश्वर्यात्मिकया क्रियाशक्त्या, सर्वमखिलमिदं विश्वं विमृशतीति भैरवः। 'भिया' इति पाठे भिया भयेन अवति रक्षति नीलानीलसुखासुख- वेद्यराशेः सर्वस्याहमिति विमर्शनादित्यसौ भैरवः। सर्वदो व्यापकोऽखिले। तया भया सर्वं शुभाशुभं राति ददातीति सर्वदः, सर्वं वाति अनुगच्छति व्यापकतेयेति व्यापकः, अखिले संसारे व्यापकतायाऽवस्थितो भैरव इत्येवमर्थानुसन्धानपूर्वकं भैरवशब्दस्य सन्त- तोच्चारणात् अहर्निशमुच्चारणेन साधको बाह्याभ्यन्तरे सर्वत्र 'अहमस्मि' इत्यनुभव- दार्ढ्याधिगमात् शिवः संपद्यते, साधकस्य परमशिवीभावोऽभिव्यज्यते। समस्ततादात्म्य- भावनया जीवन्मुक्ततायां परमेश्वरैकरूपतावेशात् परसिद्धिलाभ इति तात्पर्यम् । तथा च “न सावस्था न या शिवः” (स्प० २९) इत्यादिना एतदाम्नातमस्ति ॥१२७॥ 'भैरव' पद में स्थित 'भा ऐ र व' इन चार अक्षरों के अर्थ को विस्तार से समझने की आवश्यकता है। अकार अनुत्तर स्वरूप और इकार इच्छारूप है। अनुत्तर में विश्रान्ति आनन्द अर्थात् आकार और इच्छा में विश्रान्ति ईशन अर्थात् ईकार कहलाती है। इसी लिये आकार और ईकार में क्रिया-शक्ति का व्यापार चल पड़ता है। भा संवित्स्वरूप प्रकाश को कहते हैं। इच्छा और ईशन अर्थात् इकार और ईकार जब आनन्दस्वरूप आकार और उसके पूर्व में विद्यमान अनुत्तर धामरूप अकार में प्रविष्ट होते हैं, तो ये एकार का रूप धारण कर लेते हैं, अर्थात् अनुत्तर और आनन्द का इच्छा या ईशन में प्रसार होने पर एकार की उत्पत्ति १. भिया-ख० स्त०, भ्रियात्-त० ई० । २. रच°-त० । ३. °गो-ख० । ४. सत°-त० ।

  1. तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १४३; भा० ३, आ० ५, पृ० ४४८), स्तव- चिन्तामणिटीका (पृ० २८) और ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० २, पृ० २१४) में यह श्लोक उद्धृत है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : १४१

होती है। इस एकार के साथ अनुत्तर या आनन्द का पुनः संघट्ट (सन्धि) होने पर ऐकार की उत्पत्ति होती है। इस संघट्ट (सन्धि) से होने वाली उत्पत्ति के कारण ही एकार और ऐकार सन्ध्यक्षर कहलाते हैं। इस संघट्ट के कारण ही संवित् का प्रकाश एक दूसरे में मिल- कर नाना रूप धारण कर लेता है। यहाँ आकर क्रिया-शक्ति का व्यापार स्फुट (स्पष्ट) हो जाता है। क्रिया-शक्ति की स्फुटता ही ऐकार का अर्थ है। अक्षरों के अर्थों के इस विश्लेषण के आधार पर भैरव पद का अर्थ यह होगा—ऐकार रूप क्रिया-शक्ति से संयुक्त महेश्वर अपने संवित् प्रकाश रूप स्वभाव से सारे पदार्थों का विमर्श करता है, अथवा अपनी भा अर्थात् ज्ञानात्मिका शक्ति से और ऐकार अर्थात् माहेश्वर्य की अभिव्यञ्जिका क्रिया-शक्ति से अखिल विश्व का विमर्श करता है, अतः इसको भैरव कहा जाता है। 'भिया सर्वं रवयति' ऐसा पाठ मानने पर भैरव पद का अर्थ यह होगा कि नील आदि बाह्य और सुख आदि आन्तर समस्त वेद्य राशि को अपने से अभिन्न बताकर यह भगवान् भैरव समस्त प्राणियों को भय से मुक्त कर देते हैं। “द्वितीयाद्वै भयं भवति” (बृ० उ० १।४।२) इस श्रुति के अनुसार अपने से भिन्न किसी दूसरी वस्तु से ही भय हो सकता है। अपने से भिन्न जब कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, तब भय किससे होगा ? इस तरह से साधक के चित्त में अभेद बोध की उत्पत्ति कर भैरव उसको भय से मुक्त कर देता है। भैरव पद का अर्थान्तर द्वितीय पाद से इस तरह से स्पष्ट होता है—उस भा अर्थात् संवित्प्रकाश रूप शक्ति की सहायता से यह भैरव सभी तरह के शुभ और अशुभ कर्मों का फल देता रहता है और सभी पदार्थों में व्यापक अन्तर्यामी के रूप मे अनुस्यूत रहता है। जैसा कि ^1 “ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा” इस वचन में प्रतिपादित है। इस तरह से भैरव शब्द के उक्त अर्थों का अनुसन्धान करते हुए जो साधक रात-दिन इसका उच्चारण करता रहता है, उसके चित्त में बाह्य और आभ्यन्तर सभी पदार्थों के प्रति यह सब कुछ मैं ही हूँ, इस तरह के दृढ़ अनुभव की अनुस्यूति निरन्तर चलती रहने से भावना में दृढ़ता आने पर वह स्वयं शिव बन जाता है, साधक का परमशिव स्वभाव प्रकट हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि साधक जब सभी जागतिक आन्तर-बाह्य भावों में अपने तादात्म्य का विस्तार कर लेता है, तो वह जीवन्मुक्त हो जाता है। तब वह स्वयं परमेश्वर स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है और इस तरह से परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। इसी लिये शास्त्रों में बताया गया है कि ऐसी कोई अवस्था नहीं है, जिसमें कि शिव न प्रकाशित हो रहा हो ॥१२७॥


  1. “अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा ॥” यह श्लोक महाभारत के वनपर्व (३०।२८) के अतिरिक्त अन्य अनेक पुराण प्रभृति ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। इसका अभिप्राय यह है कि अज्ञानी जीव अपने सुख-दुःख के विधान में भी असमर्थ है। वह ईश्वर से प्रेरित होकर ही स्वर्ग अथवा नरक में जाता है।

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१४२ : विज्ञानभैरव [ धारणा-१०५ ] अहं १ममेदमित्यादिप्रतिपत्तिप्रसङ्गतः । निराधारे मनो याति तद्ध्यानप्रेरणाच्छमी ॥१२८॥ अहम्, मम इदम्—इत्यादिन्यूनाहन्ताज्ञानप्रसङ्गेनापि निराधारे वस्तुनि प्रबुद्ध- गोचरे पूर्णाहंभाव एव मनो याति, अहंविमर्शस्यात्रुटितत्वेन निर्विशेषत्वात् । परमानन्दा- त्मकत्वमात्मनो न कदाचिद् विच्छिद्यते, पूर्णाहन्ताविमर्शस्य परमात्मत्वेन सर्वत्र सत्त्वात् । अप्रबुद्धादीनां सर्वेषामेक एवात्मा, सर्वेऽपि स्वात्मन्येव रागिणः । तस्मान्नात्र कञ्चिद- प्रबुद्धो न कश्चित् प्रबुद्धः संप्रबुद्धो वा, किन्तु स्वतन्त्रः परमेश्वर एव तथा तथा सर्वत्र भाति । अबोधबोधसंबोधकल्पनया तत्स्वातन्त्र्यं विघटते । अतो बोधादिविकल्परहित- त्वेन शान्तो भवेत् । “नेह नानास्ति किञ्चन” (बृ० उ० ४।४।१९) इति श्रुतिवचना- नुसारं तद्ध्यानाभ्यासनेन प्रेरणात् अहंविमर्शाबाधिगमात् शमी शान्तद्वन्द्वोऽवाप्तपरनिर्वाणो जायत इत्यर्थः ॥१२८॥ यह मैं हूँ, यह मेरा है, इस तरह के परिमित अहन्ता के ज्ञान से भी, जो कि समझ- दार व्यक्ति को प्रतीत होने वाली पूर्ण अहन्ता दशा के ज्ञान से भिन्न नहीं है, अन्ततः निरा- धार वस्तु में ही मन जाता है, क्योंकि अहंस্বরূপ का विमर्श वहाँ भी समान रूप में अनुस्यूत रहता है । आत्मा का परमानन्दस्वरूप स्वभाव कभी भी विच्छिन्न नहीं होता । पूर्णाहन्ता का विमर्श ही तो परमात्मा का परमानन्द स्वरूप है और वह पूर्णाहन्ता सर्वत्र विद्यमान है । अज्ञानी हो या ज्ञानी सबकी आत्मा एक ही है । सभी अपनी आत्मा में अनुराग रखते हैं । अतः अपनी आत्मा के साथ होने वाले इस अनुराग को ही परमेश्वर का भजन मान सकते हैं । शास्त्रों में प्रेम को ही ब्रह्म माना गया है । न्यूनता और पूर्णता के आधार पर स्वात्म- स्वरूप के विमर्श का विच्छेद या प्रादुर्भाव नहीं माना जा सकता । अतः ज्ञानी हो या अज्ञानी, वह रहेगा आनन्दस्वभाव ही । इसी लिये महेश्वरानन्द प्रभृति ने यह बताया है कि जीव अविद्या में पड़ा हुआ हो या उससे मुक्त हो, वह अपनी आनन्दात्मक स्थिति के कारण स्वात्मविषयक परम प्रेम से कभी विलग नहीं होता, जैसा कि महार्थमंजरी के इस श्लोक में वर्णित है— नन्वात्मनः प्रियार्थं सर्वस्य प्रियत्वं भणति श्रुतिः । तस्मादानन्दस्वभाव आत्मा मुक्तोऽप्यमुक्तो वा ॥ (श्लो० ५५) “आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति” (बृ० उ० २।४।५) यह श्रुति बताती है कि मनुष्य अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिये सब से प्रेम करता है । इसलिये मुक्त हो या बद्ध आत्मा सदा आनन्दस्वभाव ही है । पञ्चदशी नामक वेदान्त ग्रन्थ में भी बताया गया है— मा न भूवं हि भूयासमिति प्रेमात्मनीक्ष्यते ।•••• अतस्तत्परमं तेन परमानन्दतात्मनः ॥ (१।८-९) १. मम मये०-ख० ।

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विज्ञानभैरव : १४३ अर्थात् मेरी स्थिति सदा रहे, ऐसा न हो कि मैं कभी न रहूँ, इस तरह का प्रेम आत्मा में देखा जाता है । इस आत्मप्रेम से बढ़कर और कोई प्रेम नहीं है, अतः आत्मा को परमानन्द- स्वभाव मानना पड़ता है । भट्ट उत्पल ने भी अपनी स्तोत्रावली में कहा है— त्वमेवात्मेश ! सर्वस्य सर्वश्चात्मनि रागवान् । इति स्वभावसिद्धां त्वद्भक्तिं जानन् जयेज्जनः ॥ (१।७) अर्थात् हे स्वतन्त्र प्रभु, आप ही प्रत्येक पुरुष की आत्मा हैं और प्रत्येक पुरुष अपनी आत्मा से अनुराग रखता है । इस प्रकार स्वभावतः, अर्थात् अनायास ही होने वाली आपकी भक्ति को जो भक्त अपनी समावेश दृष्टि से जान लेता है, वह इस संसार को जीत लेता है । इस दृष्टि से विचार करने पर यहाँ न तो कोई अज्ञानी ही है और न कोई ज्ञानी अथवा परम ज्ञानी ही है, किन्तु स्वतन्त्र परमेश्वर ही इन सभी रूपों में भासित होता रहता है । अज्ञानी, ज्ञानी और परम ज्ञानी की कल्पना से उस परमेश्वर का स्वातन्त्र्य नष्ट हो जाता है । इसलिये ¹अप्रबुद्ध, प्रबुद्ध, सुप्रबुद्ध आदि विकल्पों से मुक्त होकर साधक को शान्तभाव से स्वात्मस्वरूप का चिन्तन करते रहना चाहिये । इसका अभिप्राय यह है कि "इस जगत् में नाना पदार्थों की कोई सत्ता नहीं है" इस श्रुति वचन के अनुसार मन को निराधार (निर्वि- कल्प) बना कर अपने परमार्थ स्वरूप के ध्यान का अभ्यास करने से चित्त शान्त हो जाता है, उसको एक प्रकार का बल प्राप्त होता है, जिससे कि साधक के सभी प्रकार के द्वन्द्व शान्त हो जाते हैं और उसको परम निर्वाण की प्राप्ति हो जाती है ॥१२८॥ [ धारणा-१०६ ] नित्यो विभुर्निराधारो व्यापकश्चाखिलाधिपः । शब्दान् प्रतिक्षणं ध्यायन् ¹कृतार्थोऽर्थानुरूपतः ॥१२९॥ विभुः परमेश्वरः, नित्य-निराधार-व्यापक-अखिलाधिपत्वादिरूप इति अर्थानु- रूपतः अर्थानुसन्धानपूर्वकं तान् शब्दान् प्रतिक्षणं मुहुर्मुहुः ध्यायन् चिन्तयन् कृतार्थः कृतकृत्यो भवति । जानामि, करोमीत्यत्रैव मुक्तस्वभावः स्यादिति भावः ॥१२९॥ स्वतन्त्र-स्वभाव प्रभु परमेश्वर नित्य, निराधार, व्यापक और सारे जगत् का स्वामी है, इस तरह से नित्य आदि शब्दों के अर्थ का बार-बार अनुसन्धान करते हुए जो साधक १. प्रकृतार्था-ख० ।

  1. अप्रबुद्ध, प्रबुद्धकल्प, प्रबुद्ध, सुप्रबुद्धकल्प और सुप्रबुद्ध—इन पाँच प्रकार के प्रमाताओं का विवेचन विरूपाक्षपंचाशिका की ४१-४४ कारिकाओं में किया गया है । स्पन्दकारिका के १७, १९-२०, २५, ४४ संख्या के श्लोकों में अप्रबुद्ध, प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध का स्वरूप वर्णित है । इन शब्दों की चर्चा पहले भी हो चुकी है ।

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१४४ : विज्ञानभैरव अपने चित्त को एकाग्र कर लेता है, वह कृतकृत्य हो जाता है। अर्थात् सर्वज्ञता आदि गुणों से विशिष्ट शिव ही सर्वत्र व्याप्त है, उससे भिन्न किसी भी वस्तु की कोई सत्ता नहीं है, वही सब कुछ करता है, इस तरह से ईश्वर के ऐश्वर्यबोधक नामों के अर्थ का चिन्तन करने वाला योगी धीरे-धीरे यह जान जाता है कि यह सारा ऐश्वर्य मेरा ही है। मुझसे भिन्न किसी की कोई सत्ता नहीं है, सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता आदि गुण भी मेरे ही है। यह स्वाभाविक बात है कि इस स्थिति पर पहुँच जाने पर वह सभी प्रकार के विकल्पों से मुक्त हो अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाय। स्पन्दकारिका के ‘गुणादिस्पन्द’ इत्यादि श्लोकों में इसी स्थिति का वर्णन मिलता है। इन श्लोकों को उद्धृतकर उनकी व्याख्या पहले (पृ० १०७) की जा चुकी है। नामकीर्तन का माहात्म्य भट्ट नारायण की स्तवचिन्तामणि में अनेक स्थलों पर (श्लो० १९,७९,८२) वर्णित है। इनका यही अभिप्राय है कि बिना अर्थ का चिन्तन किये ईश्वर के केवल नाम मात्र के उच्चारण से भी मानव मोक्ष पर्यन्त सिद्धि प्राप्त कर लेता है। यही प्रस्तुत धारणा का भी प्रतिपाद्य है ॥१२९॥ [ धारणा-१०७ ] अतत्त्वमिन्द्रजालाभमिदं ¹सर्वमवस्थितम् । किं तत्त्वमिन्द्रजालस्य ²इति दाढर्याच्छमं व्रजेत् ॥१३०॥ इदं सर्वं जगत्, अतत्त्वं निस्तत्त्वरूपम्, असारमिति यावत्। अत एव इन्द्रजाला- भम् इन्द्रजालतुल्यमवस्थितं वर्तते। इन्द्रजालस्य किं तत्त्वम् ? न किञ्चिदित्यर्थः। अतः सर्वमिदमिन्द्रजालवत् प्रतीयमानं जगन्न वस्तुसदिति भावनादार्थ्यात् साधकः शमं व्रजेत्। सद्वस्तुव्यपदेश्यं प्रमातृतत्त्वमितो भिन्नमेवेति भावनाबलेन तत्त्वविदो निर्वाणपदावाप्तिर्भवेदिति भावः ॥१३०॥ यह सारा जगत् निस्तत्त्व है, अर्थात् सारहीन है। इसी लिये इसकी स्थिति इन्द्रजाल के समान है, जादूगर की बनाई हुई चीजों की भांति है। जादूगर अपने जादू से, हाथ की सफाई से जिन वस्तुओं को जिस रूप से दिखाता है, क्या उनकी कोई वास्तविक सत्ता है ? नहीं। जैसे उनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। उसी तरह से यह प्रतीयमान जगत् भी वास्तविक नहीं है। इस परमार्थ दृष्टि में जो साधक अपनी भावना को दृढ़ करता है, वह शान्त समाधि में लीन हो जाता है। अर्थात् परमार्थसत् नाम से जाना जाने वाला प्रमातृ- तत्त्व इस इन्द्रजाल तुल्य संसार से सर्वथा पृथक् है; अपनी भावना के आधार पर इस वस्तु- स्थिति को समझने वाला तत्त्ववेत्ता निर्वाण पदवी को प्राप्त कर लेता है ॥१३०॥ [ धारणा-१०८ ] आत्मनो निर्विकारस्य क्व ज्ञानं क्व च वा क्रिया । ज्ञानायत्ता बहिर्भावा अतः शून्यमिदं जगत् ॥१३१॥ आत्मनो निर्विकारस्य बोधात्मकस्य चिदात्मनो निर्विभागत्वेन निर्विकारत्वात् १. °वं व्य°—ख०। २. चेति—ख०।

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विज्ञानभैरव : १४५ ज्ञानं क्व, क्व च वा क्रिया। ज्ञानक्रिये विकारे एव। विकारयोरनयोर्निर्विकारे चिदा- त्मनि स्थितिनैव भवितुमर्हति। बहिर्भावाः सर्वे बाह्याः पदार्था ज्ञानायत्ता एव प्रति- भान्ति, अतो ज्ञानक्रिययोर्विकारभूतयोर्वस्तुतोऽभावादिदं सर्वं जगत् शून्यमेव ध्यायेत्। एवं ज्ञेयकार्यादिरूपं जगदपि न किञ्चिदिति निरूढशुद्धसंविदोऽनुत्तरभावप्राप्तिरिति तात्पर्यम्। ज्ञानक्रियादिशक्त्ययोगाज्ज्ञेयादिकल्पना कुतः ? न कुतश्चन । अतो निर्वि- कल्पात्मकस्य निर्विकल्पमेवेदं जगत् प्रतिभासत इति भावः ॥१३१॥ बोधात्मक चिदात्मा निर्विभाग होता है, अर्थात् बोध की चिद्धनता के कारण उसमें विभाग की कल्पना नहीं की जा सकती। इसीलिये वह निर्विकार है। चिदात्मा के निर्विकार होने से इसमें ज्ञान और क्रिया की स्थिति नहीं रह सकती, क्योंकि ये दोनों भी तो विकार ही हैं। बाह्य पदार्थ की सत्ता ज्ञान और क्रिया पर ही आधृत है। अतः ज्ञान और क्रिया के अभाव में यह सारा जगत् शून्यस्वभाव ही माना जायगा, अर्थात् इसकी कोई पारमार्थिक सत्ता नहीं मानी जायगी। चन्द्रज्ञान नामक आगम ग्रन्थ में शून्य के स्वरूप का वर्णन इस तरह से किया गया है— अध ऊर्ध्वं दिशः सर्वा भूमिरापोऽनलस्तथा। वायुश्च खं मनो बुद्धिरहङ्कारश्च ये गुणाः ॥ सर्वं शून्यं निरालम्बं तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्। यत्किञ्चित् सकलं भावरूपं तन्त्रेषु वर्णितम् ॥ तदसारतरं चन्द्र मायास्वप्नोपमं स्थितम्। भ्रान्तिं त्यजस्व वै पुत्र सर्वं शून्ये प्रतिष्ठितम् ॥ शून्यात् प्रवर्तते शक्तिः शक्तेर्वर्णाः प्रजज्ञिरे। वर्णेभ्यश्च तथा मन्त्रा मन्त्रेभ्यः सृष्टिरव्यया ॥ तस्माच्छून्यं जगद् ध्यायेन्न नश्येत् कदाचन । अर्थात् नीचे, ऊपर, सभी दिशाएँ, भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, 1मन, बुद्धि, अहंकार तथा सत्त्व, रज, तम आदि गुण—ये सब निरालम्ब, निराधार, शून्यस्वभाव हैं। शून्य में ही इन सबकी स्थिति है। शास्त्रों में भावरूप में वर्णित सभी पदार्थ नितान्त सारहीन हैं। हे चन्द्र, इनकी स्थिति इन्द्रजाल से कल्पित वस्तुओं जैसी अथवा स्वप्न में दिखाई पड़ने वाली वस्तुओं की सी क्षणिक एवं अवास्तविक है। हे पुत्र, तुम अपने इस भ्रम को दूर कर दो कि

  1. मन, बुद्धि अहंकार—यह क्रम पूर्व वर्णित (पृ० १००) अद्वयसम्पत्तिवार्त्तिक के अनुसार है। सांख्य-संमत क्रम होगा—मन, अहंकार और बुद्धि । अहंकार शब्द के अर्थ के भेद के कारण ऐसा होगा । इसका विवेचन पहले (पृ० १००-१०१) व्याख्या और टिप्पणी में किया जा चुका है।