विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३० : विज्ञानभैरव अर्थात् हे भव (शिव), आपकी भक्ति कल्पवृक्ष के समान है और अणिमा प्रभृति सिद्धियों की प्राप्ति, सदाशिव प्रभृति का ऐश्वर्य और मुक्ति—ये सब कल्पवृक्ष के पल्लवों (पत्तों) के समान हैं। अभिप्राय यह है कि कल्पवृक्ष से जैसे प्राणी की सारी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं, उसी तरह भगवद्भक्ति रूप कल्पवृक्ष से भी साधक शिवस्वरूप में समाविष्ट हो जाता है ॥११८॥ [ धारणा-९६ ] १वस्त्वन्तरे वेद्यमाने 'शनैर्वस्तुषु शून्यता । तामेव मनसा ध्यात्वा२ विदि३तोऽपि प्रशाम्यति ॥११९॥ वस्त्वन्तरे कस्मिंश्चिदेकस्मिन् वस्तुनि वेद्यमाने चित्स्वरूपत्वेन ज्ञायमाने सर्व- वेद्येषु तदन्येषु बाह्याभ्यन्तरेषु वस्तुषु वेद्यमानेष्वपि शनैः शनैरभ्यासपाटवेन शून्यता भावनीया । शून्यता नाम तत्कालमनाभासनम् । तामेव वेद्याभावात्मकचित्प्रकाशरूपां शून्यतां मनसा निर्विकल्पसंविदा ध्यात्वा विमृश्य विदितोऽपि वेदनादपि प्रशाम्यति शान्त- ब्रह्मस्वरूपो भवति । विदिशब्द इकारान्तो भेदप्रथारूपज्ञानवाचकः । 'विचित्तोऽपि' इति पाठे विविधसंकल्पविकल्पव्यापारसंयुक्तोऽपि मुक्तः स्यादित्यर्थः ॥११९॥ किसी एक वस्तु का चित्स्वरूप में ज्ञान हो जाने पर उससे भिन्न सभी बाह्य और आन्तर वस्तुओं एवं भावों का बोध होने पर धीरे-धीरे उनमें अभ्यास के सहारे शून्यता की भावना करनी चाहिये । यहाँ शून्यता का अभिप्राय एक वस्तु के ज्ञान के रहते उसके विपरीत स्वभाव की किसी दूसरी वस्तु के ज्ञान का उदय न होने में है । इस चित्प्रकाश रूप शून्यता में, जहाँ कि अन्य किसी विरोधी वेद्य की स्थिति नहीं है, निर्विकल्पक मन से ध्यान को केन्द्रित करने पर साधक योगी का भेदप्रथात्मक ज्ञान (भेद-भ्रम) शान्त हो जाता है तब उसका शान्त ब्रह्मस्वरूप प्रकट हो उठता है, अर्थात् वह ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । यहाँ इकारान्त 'विदि' शब्द भेदप्रथात्मक ज्ञान का वाचक है । 'विचित्तोऽपि' ऐसा पाठ मानने पर इसका अर्थ यह होगा कि नाना प्रकार के संकल्प-विकल्प व्यापारों से संयुक्त रहने पर भी साधक मुक्त हो जाता है । इस धारणा में और 'क्वचिद्वस्तुनि' (श्लोक ११७) इत्यादि श्लोक में प्रदर्शित धारणा में शून्यता की भावना की समानता रहते हुए भी इनमें परस्पर विशेषता यह है कि पहली धारणा में एक वस्तु को जान लेने पर उससे संबद्ध वासना आदि में शून्यता की भावना करने की बात कही गई है, जब कि प्रस्तुत धारणा में एक वस्तु के ज्ञान के बाद अन्य समस्त वेद्य वस्तुओं में शून्यता की भावना का विधान है ॥११९॥ १. सर्ववेद्येषु-ने० । २. ध्यायन्-ने० । ३. ॰चित्तो०-ख० ।
- नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २००) में यह श्लोक मिलता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivedi (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)