विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : १२९ यह सारा विश्व शून्य स्वभाव है, आकाश के समान रूपहीन है, इसका कोई स्वरूप नहीं है, अस्तित्व नहीं है । अथवा शांभवी¹ मुद्रा की सहायता से, जिसमें कि दृष्टि के बाहर रहने पर भी लक्ष्य भीतर ही रहता है, इस कार्य को संपन्न करे । अर्थात् वह अपने शुद्ध स्वरूप को ही देखे और उससे भिन्न सभी विकल्प वासनाओं का परित्याग कर दे । ऐसा करने से, इस धारणा के अभ्यास से, संयमी साधक शून्य में लीन हो जाता है, परम पद में विश्राम प्राप्त कर लेता है ॥११७॥ [ धारणा-९५ ] ²भक्त्युद्रेकाद् विरक्तस्य यादृशी जायते मतिः । सा शक्तिः शाङ्करी नित्यं भावयेत् तां ततः शिवः ॥११८॥ भक्त्युद्रेकाद् भक्त्यतिशयेन विरक्तस्य शान्तचित्तस्य भक्तस्य चित्ते साधकचित्त- समाधानेन यादृशी मतिर्जायते सा शाङ्करी शक्तिरिति गीयत इति तामेव नित्यं भावयेत् । ततः साधकः शिवः शिवमयः स्यात् ॥११८॥ भक्ति के उद्रेक से अर्थात् आधिक्य से विरक्त अर्थात् शान्तचित्त भक्त के चित्त में साधक के चित्त के समाहित हो जाने से जिस तरह की बुद्धि उत्पन्न होती है, वह शांकरी शक्ति कही जाती है । अर्थात् ईश्वर के अनुग्रह (शक्तिपात) से भक्त के हृदय में ऐसी भावना पैदा होती है कि वह सब कुछ भूलकर शान्त भाव से निरन्तर ईश्वर के चिन्तन में लगा रहता है । उसका चित्त ईश्वर की आराधना में लीन हो जाता है । भक्त की इस मानसिक दशा में अपने चित्त को लीन करने वाला साधक भी शिवमय हो जाता है, अर्थात् वह साधक भी उस भक्त के समान ही भगवन्मय हो जाता है । क्षेमेन्द्र ने अपने गीतानिष्यन्द में भक्ति का लक्षण यह किया है— ³न पादपतनं भक्तिर्व्यापिनः परमेशितुः । भक्तिर्भावस्वभावानां तदेकीभावभावनम् ॥ अर्थात् सर्वत्र व्यापक भगवान् के चरणों में साष्टांग प्रणाम करना ही भक्ति नहीं है । वास्तविक भक्ति तो यह है कि भाव स्वभाव के सभी पदार्थों में एक भगवान् का ही अनुचिन्तन किया जाय, अर्थात् सारे जगत् को भगवन्मय समझा जाय । भगवद्भक्ति की महिमा स्तवचिन्तामणि में इस प्रकार वर्णित है— अणिमादिगुणावाप्तिः सदैश्वर्यं भवक्षयः । अमी भव ! भवद्भक्तिकल्पपादपपल्लवाः ॥ (श्लो० ५५)
- भैरवी मुद्रा ही यहाँ शाम्भवी मुद्रा के नाम से कही गई है । भैरवी मुद्रा का लक्षण श्लो० २६ की व्याख्या में बताया जा चुका है ।
- स्तवचिन्तामणि की व्याख्या (पृ० ६५) में क्षेमराज ने इसे उद्धृत किया है ।
- महार्थमञ्जरीपरिमल (पृ० १०८) में यह श्लोक उद्धृत है ।