विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२८ : विज्ञानभैरव प्रसरति प्रादुर्भवति । अत्रायं भावः—अनुभवात् स्मरणादौ सूत्र इव मणिगणः प्रोतश्चैतन्यप्रसर इति सिद्धम् । अतस्तमेव ध्यायेत् ततः स्वयमेव प्रभुः प्रादुर्भवतीति निश्चय इति ।।११६।। किसी सहकारी उद्बोधक के रहने पर हमारे मन में अनेक प्रकार की स्मृतियाँ जागती रहती हैं। स्मृति से प्रतीत हो रहे ऐसे पदार्थों के उपस्थित होने पर उन स्मृतियों के आधारभूत अनुभव में अपने मन को नियोजित कर दे । प्रत्येक स्मृति का जन्म अनुभव के आधार पर ही होता है, अतः जिस अनुभव से स्मृति का जन्म हुआ, उस स्मृति के उपस्थित होने पर उसका परित्याग कर उसके 'आधारभूत ज्ञान को पूरी सावधानी से पकड़े । इसके साथ ही अपने शरीर को भी इस अनुभव से अलग कर दे । साँप जब केंचुली उतार देता है, तो उस केंचुली से जैसे उसको कोई माया-मोह नहीं रहता, उसी तरह से साधक को चाहिये कि जब उसने स्मृति का परित्याग कर उसके आधारभूत अनुभव को पकड़ा है, तो उस समय उस शरीर के साथ भी ममता को छोड़ दे, जिसमें कि रहकर वह अनुभवों और स्मृतियों को तथा उनके संस्कारों को संचित करता रहता है । इस स्थिति में उसका चित्त अहन्ता, ममता और संचित वासनाओं के अभाव में शुद्ध अनुभव रूप हो जाता है । वह स्मृति और अनुभव में तथा स्मर्यमाण तथा अनुभूयमान पदार्थों में किसी प्रकार का भेद नहीं देखता । यही तो प्रभु का, परभैरव का वास्तविक स्वरूप है । अतः इस धारणा के अभ्यास से साधक के चित्त में निरन्तर अनुभव दशा का ही स्फुरण होते रहने से परभैरव स्वरूप का प्रकाश आलोकित हो उठता है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे माला की सारी मणियां तागे में गुँथी रहती हैं, वैसे ही सारी स्मृतियाँ अनुभवों में गुँथी रहती हैं । यह अनुभव स्वात्मचैतन्य स्वरूप है । अतः जिस किसी भी अनुभव को अपनी धारणा का विषय बनाया जाय, उसमें इस स्वात्मचैतन्य की भावना करने से यह परभैरव स्वरूप स्वात्मचैतन्य प्रकट हो जाता है । अतः साधक को इसी में अपनी धारणा स्थिर करनी चाहिये ।।११६।। [ धारणा-९४ ] क्वचिद्वस्तुनि विन्यस्य शनैर्दृष्टिं निवर्तयेत् । तज्ज्ञानं चित्तसहितं देवि शून्यालयो भवेत् ।।११७।। हे देवि, क्वचिद्वस्तुनि कस्मिंश्चिद् वस्तुनि दृष्टिमक्षिरूपां विन्यस्य निक्षिप्य, कञ्चित् पदार्थं घटोऽयमित्येवं दृष्ट्वेत्यर्थः । तज्ज्ञानं शनैः शनैस्तस्य पदार्थस्य ज्ञानम्, चित्तसहितं तद्विषयसंकल्पसहितम्, तद्वासनायुक्तमिति यावत् । निवर्तयेत् शून्यभावनया, अन्तर्लक्ष्यबहिर्दृष्टिन्यायेन वा । तेनैव शून्यालयः शून्ये आलयो विश्रान्तिर्यस्य एवंविधः संयमी भवेत् ।।११७।। हे देवि, जिस किसी भी घट-पट आदि पदार्थ में अपनी दृष्टि डालकर, अर्थात् घट-पट आदि किसी भी पदार्थ को सावधानी से देखकर, धीरे-धीरे उस पदार्थ के ज्ञान को उसके संकल्प के साथ और उस अनुभव से संचित वासनाओं के साथ चित्त से निकाल दे । अनुभव, संकल्प और वासनाओं को अपने चित्त से निकाल देने के लिए साधक शून्यभावना का सहारा ले कि