विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : १३१ [ धारणा-९७ ] १किञ्चिज्जैर्या स्मृता२ शुद्धिः साऽशुद्धिः शम्भुदर्शने । न शुचिर्ह्यशुचिस्तस्मान्निर्विकल्पः३ सुखी४ भवेत् ॥१२०॥ किञ्चिज्जैः किञ्चिन्मात्रबोधयुक्तैर्धर्मशास्त्रज्ञैः, या शुद्धिः मृज्जलादिना स्मृता सा शम्भुदर्शने पारमेश्वरतत्त्वसाक्षात्कारे सति अशुद्धिरेव । अथवा शम्भुदर्शने परमेश्वर- भाषिते शास्त्रे सा अशुद्धिरेव । न शुचिः न नैर्मल्यम्, निर्देशस्य भावप्रधानत्वात् । या अन्यशास्त्रोक्ता शुद्धिः सा न शुचिः न शुद्धत्वम्, किन्तु हि अशुचिः । 'हि' अवधारणे हेतौ वा । अशुद्धतैव । मृदादिशुद्धेस्तत्त्वज्ञानं प्रत्यकिञ्चित्करत्वेनानङ्गत्वादिति भावः । 'अशुद्धिः' इति पूर्वमभिधाय तदनु 'न शुचिः' इत्युक्त्वापि पुनः 'हि अशुचिः' इत्यशुचि- पौनरुक्त्यं तत्त्वज्ञानानुपयोगित्वदार्ढ्यप्रतिपादनार्थम् । तस्मान्मृद्दिशौचविनाकृतोऽपि निर्विकल्पः निर्विकल्पज्ञानेन सति मनःशौचे त्यक्तमनोमलः सुखी भवेत् ॥१२०॥ धर्मशास्त्रकारों ने भलीभाँति हाथ-पैर धोकर तीन बार स्वच्छ जल से आचमन करना, स्नान करना आदि अनेक तरह से शुद्धि का विधान किया है । इन धर्मशास्त्रों में मिट्टी, जल आदि से होने वाली शुद्धि पर बड़ा बल दिया गया है, किन्तु परमेश्वर के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करने के प्रसंग में यह शुद्धि सहायक नहीं होती, अतः इसको अशुद्धि ही मानना चाहिये । अथवा इसका यह भी अर्थ किया जा सकता है कि शैव शास्त्र में यह शुद्धि अशुद्धि ही मानी गई है । धर्मशास्त्र की इस शुद्धि को परमेश्वर शिव के द्वारा उपदिष्ट शास्त्रों में चित्त की निर्मलता में कारण नहीं माना गया है । इसके विपरीत इस तरह की शुद्धि को उन शास्त्रों में दम्भ, पाषण्ड आदि चित्त के कालुष्यों का ही प्रवर्त्तक बताया गया है । इसका अभिप्राय यह है कि धर्मशास्त्रों के द्वारा उपदिष्ट शुद्धि शरीर को तो पवित्र करती है, किन्तु वह मन को पवित्र नहीं कर पाती । इसी लिये शैव शास्त्रों में इस तरह की शुद्धि को अशुद्धि में ही गिना गया है । वास्तविक शुद्धि वही है, जिससे कि मन पवित्र हो । शुद्ध मन से ही तत्त्व का साक्षात्कार किया जा सकता है । कोरी शारीरिक शुद्धि तत्त्वज्ञान में सहायक नहीं हो सकती । इस बात को दृढ़तापूर्वक समझाने के लिये ही 'अशुद्धिः, न शुचिः, हि अशुचिः' इस तरह से तीन बार इसमें अशुचिता का विधान किया गया है । 'हि' शब्द का प्रयोग भी अवधारण या कारण के अर्थ में हुआ है, अर्थात् यह धर्मशास्त्रोक्त शारीरिक शुद्धि अशुद्धि ही है, अथवा अशुद्धि का ही कारण है । मन की शुद्धि में इसका कुछ भी उपयोग नहीं है । अतः साधक को चाहिये कि मिट्टी, जल आदि से की जाने वाली शुद्धि का सहारा लिये बिना भी १. °ताऽशु°-ख० म० । २. सा शु°-ख० म० । ३. °ल्पो भवेत् सदा-स्व०, °ल्पो भवेन्नरः- म० । ४. शिवो-ख० । l. स्वच्छन्द० (भा० ३, पृ० ७, पृ० ३१५) और महार्थ० (पृ० २२ में) यह श्लोक उद्धृत है ।