भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : १३९ निष्क्रान्तमशून्यं धाम समाविशेत्। नित्यत्वादिविशेषणप्रतिपादितव्यासिके बाह्याकाशे शून्यधारणातिशयेन तदभ्यासातिशयाच्छून्यातिशून्यभूतं यद्धाम तत्रैव योगी समाविश- तीति भावः ॥१२५॥ नित्य, निराश्रय, शून्य, व्यापक और कलना अर्थात् इयत्ता से रहित सर्वत्र व्याप्त बाह्य आकाश में विमर्शात्मक ज्ञान से सम्पन्न मन को समाहित करने पर साधक के चित्त में धीरे-धीरे निरालम्बन चिच्छक्ति का, घट, नील, सुख आदि विकल्पों से अतीत शुद्ध निर्वि- कल्पक ज्ञान का उदय होने लगता है। इस धारणा के अभ्यास से अन्ततः वह निराकाश अशून्य धाम में, अर्थात् शिव तत्त्व में समाविष्ट हो जाता है। पूर्व श्लोक की व्याख्या में शिव तत्त्व को शून्यता का धाम अर्थात् आश्रय-स्थान बताया गया था। अतः यह उचित ही है कि शून्यता का यह धाम शिव तत्त्व स्वयं अशून्य अर्थात् महासामान्य, महासत्ता स्वरूप माना जाय। इसका अभिप्राय यह है कि नित्यत्व आदि विशेषणों से जिसकी सर्वव्यापकता प्रतीत होती है, उस बाह्य आकाश में भी योगी जब शून्यता की भावना को दृढ़ करता है कि यह भी कुछ नहीं है, तो इस भावना के अभ्यास को बढ़ाने पर उसके चित्त में सभी बाह्य आलम्बनों का अभाव हो जाने से वह योगी शून्यता के आश्रयभूत अतिशून्य अर्थात् अशून्य शिव तत्त्व में समाविष्ट हो जाता है ॥१२५॥ [ धारणा-१०३ ] यत्र यत्र मनो याति तत्तत् तेनैव तत्क्षणम् । परित्यज्यानवस्थित्या निस्तरङ्गस्ततो भवेत् ॥१२६॥ यत्र यत्र विषये मनश्चाञ्चल्याद् याति तत्तद् वस्तु तत्सर्वम्, तेनैव अविकल्प- संवेदनरूपेण मनसा तत्क्षणं परित्यज्य परिहृत्य, पुनरपि गतं चेत् पुनरपि प्रत्याहृत्य, अनवस्थित्या चित्तवृत्तिनिरोधे सति वैराग्याभ्यासयुगलदाढर्यान्मनसो निरालम्बनता- प्राप्तियुक्त्या, ततो निस्तरङ्गो भवेत् परभैरवावेशवान् परभैरवस्वरूपवान् भवेत् ॥१२६॥ अपनी चंचलता के कारण मन जहाँ-जहाँ भी जाता है, उन सब विषयों से उसको निर्विकल्पक संवेदन के माध्यम से तत्काल हटा ले कि वस्तुतः उन विकल्पों की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। हटा लेने के बाद भी यदि वह फिर वहीं चला जाता है, तो उसको पुनः वहाँ से हटाने का निरन्तर अभ्यास करता रहे, जब तक कि वह पूर्णतः प्रत्याहृत नहीं हो जाता, अपने वश में नहीं आ जाता। जैसा कि गीता के— यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ (६।२६) इस श्लोक में प्रतिपादित है। इस तरह से अपने चित्त की वृत्तियों की विषय-प्रवणता को रोक कर तथा वैराग्य और अभ्यास के द्वारा चित्त को एकाग्र बना कर उसको निरालम्बन, (निर्विकल्पक) समाधि में स्थिर कर दे। योगी के इस समाधि दशा में स्थित हो जाने पर वह निस्तरंग हो जाता है, अर्थात् सांसारिक विषय-विकल्पों के कारण उसके चित्त-समुद्र में तब Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)