विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३८ : विज्ञानभैरव बाहर ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो कि उससे भिन्न हो । इस उत्कृष्ट शाक्त दर्शन में इस शून्य से भिन्न कोई उपेय नहीं है । स्वतन्त्र शिव तत्त्व ही वस्तुतः शून्य नाम से यहाँ जाना जाता है । इस शिव तत्त्व का अनादर कर बौद्ध दार्शनिक शून्यता का निरूपण गलत तरीके से करते हैं । वस्तुतः यह शून्य शिव की स्वातन्त्र्य शक्ति का ही विलास है । यह शून्य रूप स्वातन्त्र्य शक्ति से संवलित शिव तत्त्व आकाश-कुसुम जैसी अलीक वस्तुओं की भी सत्ता का बोध करा देने में समर्थ होने से महासामान्य रूप होता है । प्रत्यभिज्ञाकारिका (१।५।१४) में इस स्वातन्त्र्य शक्ति की स्फुरत्ता को ही महासत्ता बताया गया है । स्तवचिन्तामणि (श्लो० ६) में यह परमेश्वर का सर्वसामान्य स्वरूप माना गया है । अभाव को भी अपना विषय बनाने वाले इस महासामान्य का वर्णन महार्थमंजरीकार ने इस तरह से किया है— कः सद्भावविशेषः कुसुमाद्भवति गगनकुसुमस्य । यत्स्फुरणानुप्राणो लोकः स्फुरणं च सर्वसामान्यम् ॥ (श्लो० ३२) अर्थात् सामान्य पुष्प से आकाशकुसुम की क्या विशेषता है कि एक की सत्ता और दूसरे की असत्ता प्रतीत होती है ? किसी वस्तु की स्फुरत्ता के आधार पर ही व्यक्ति भाव और अभाव का बोध करते हैं । यह स्फुरत्ता गगन-कुसुम और सामान्य-कुसुम में समान है, अतः इनमें ऐसी कोई भी विशेषता नहीं प्रतीत होती कि जिसके आधार पर इनमें भेद किया जा सके । इसका अभिप्राय यह है कि भावात्मक और अभावात्मक सभी पदार्थों में परमेश्वर की स्वातंत्र्य शक्ति महासत्ता और स्फुरत्ता के रूप में अनुस्यूत है । अतः इस स्वातन्त्र्य शक्ति संवलित शिव के अतिरिक्त शून्यता का बौद्धसंमत चतुष्कोटिविनिर्मुक्त लक्षण बन ही नहीं सकता, क्योंकि यह सारा जगत् सदात्मक ही है । इसमें सदात्मक कोटि के अतिरिक्त अन्य कोटियों के स्फुरण का कोई प्रसंग ही नहीं है । इस विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि “यतो वाचो निवर्तन्ते” (तै० उ० २।४), “न तत्र सूर्यो भाति” (कठो० ५।१५), “आनन्दाद्ध्येव खल्वि- मानि भूतानि जायन्ते” (तै० उ० ३।६) इत्यादि श्रुतियों में यह प्रतिपादित किया गया है कि यह सारा जगत् ब्रह्मस्वरूप ही है । श्रुति प्रतिपादित इस स्थिति में अपने अनुभव को दृढ़ करने पर साधक के चित्त में सर्वत्र भैरव-बोध का ही स्फुरण होने लगता है और इस तरह से सर्वत्र ब्रह्म-दृष्टि का विकास होने से वह स्वयं ब्रह्म बन जाता है ॥१२४॥ [ धारणा-१०२ ] नित्ये निराश्रये शून्ये व्यापके कलनोज्झिते । बाह्याकाशे मनः कृत्वा निराकाशं¹ समाविशेत् ॥१२५॥ नित्ये निराश्रये शून्ये व्यापके कलनोज्झिते बाह्याकाशे बाह्यगगने मनो विम- र्शात्मकं ज्ञानं कृत्वा समापन्नं विधाय निरालम्बनचिदुदये सति निराकाशम् आकाशा- १. ᵒशे-ख० । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)