विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : १३७ [ धारणा-१०१ ] यदवेद्यं यदग्राह्यं यच्छून्यं यदभावगम् । तत्सर्वं भैरवं भाव्यं तदन्ते बोधसम्भवः ॥१२४॥ यद् अवेद्यं ज्ञेयदशानास्पदम्, यद् अग्राह्यम् अनुपादेयम्, यत् शून्यं देवनयो- पात्तं स्वातन्त्र्यस्वरूपम्, यद् अभावगं गगनकुसुमादिष्वपि सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेन महा- सामान्यरूपम्, तदेतत्सर्वं भैरवं भाव्यं भैरवत्वेन भावनीयम् । तद्भावनाप्रकर्षेण अन्ते पर्यन्ते बोधसंभवः सम्यग् बोधो भवेत् । सर्वमेतद् ब्रह्मैव भवतीति दृढानुभवबलात् सर्वत्र भैरवस्वरूपबोधवान् भैरव एव भवति, ब्रह्म सम्पद्यत इति भावः ॥१२४॥ जो अवेद्य है, अर्थात् जो ज्ञेय दशा में कभी नहीं आता, जो अग्राह्य अर्थात् अनुपादेय है, जो शून्यस्वरूप है तथा जो गगन-कुसुम जैसे अभावात्मक पदार्थों में भी सत्ता का बोध करा देता है, उसी की सर्वस्वरूप भैरव के रूप में भावना करनी चाहिये । इस भावना का उत्कर्ष होने पर अन्त में सम्यग् बोध का आविर्भाव होता है । यहाँ शून्य तत्त्व परमार्थतः अभावात्मक नहीं है, किन्तु सभी आलम्बन धर्मों से, सभी तत्त्वों से और सभी क्लेशाशयों से शून्य पदार्थ को ही शून्य नाम से अभिहित किया गया है । इस तरह से किसी अवर्णनीय, अविज्ञेय अवस्था (स्वातन्त्र्य शक्ति) को शाक्त मत में शून्यता माना गया है । बौद्धसंमत शून्यता का इस शास्त्र में कोई स्थान नहीं है, जो कि अन्ततः नास्तिकता का कारण बनती है । विमर्शदीपिका में शून्यता का स्वरूप इस तरह से वर्णित है— स्वतन्त्रं परिपूर्णं च शिवारुख्यं शून्यधाम तत् । तत्त्वानि यत्र लीयन्ते यस्मात् समुदयन्ति च ॥ तत्त्वेश्वरास्ततो जातास्तत्रैव निवसन्ति च । क्षीयन्ते किल तत्रैव शिवारुख्ये शून्यधामनि ॥ दर्शनान्तरदृष्टानि यानि शून्यान्तराण्यपि । तेषामुत्पत्तिविलयौ शिवशून्ये सदोदिते ॥ न तदस्ति न यत्तत्र न तदस्ति न यत्र तत् । अन्तर्बहिरूपतया ततोऽन्यन्नोपपद्यते ॥ उपेयमितरन्नास्ति स्वातन्त्र्यात् परमे नये । तदनादृत्य गाहन्ते सौगताः शून्यतां जडाः ॥ अर्थात् स्वतन्त्र, परिपूर्ण शिव ही शून्यता का आश्रय स्थान है, जहाँ से कि सारे तत्त्व निकलते हैं और उसी में लीन होते रहते हैं । इसी शिवनामक शून्य से तत्त्वों के अधिपतियों की सृष्टि होती है और वे रहते भी इसी में हैं । इस शिवनामक शून्य लोक में वे लीन भी हो जाने हैं । अन्य दर्शनों में इस शून्य के नाना स्वरूपों का वर्णन मिलता है, किन्तु उन सबका उदय और विलय इस सदोदित शिव-शून्य में ही होता रहता है । ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो इस शून्य में न रहती हो और न कोई ऐसी ही वस्तु है जहाँ कि शन्य न रहता हो । अन्दर या