भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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१३६ : विज्ञानभैरव शत्रुमित्रादिषु मानापमानकर्तृषु च सर्वत्र ब्रह्मणः स्वात्मस्वरूपस्यैव परिपूर्णत्वात् ओतप्रोतत्वात् यः साधकः "विद्याविनयसंपन्ने" (५।१८) इत्यादिगीतोपदेशरीत्या शत्रौ च मित्रे च समः, मानापमानयोश्च समः, स सुखी भवेत्। इच्छाज्ञानक्रियोल्लासं चिन्मयमेव विश्वप्रपञ्चं विज्ञाय सुखी भवतीति भावः ॥१२२॥ शत्रु और मित्र में, संमान करने वाले और अपमान करने वाले सभी प्राणियों में, स्वात्मस्वरूप ब्रह्म ही विद्यमान है, इस स्वात्मस्वरूप से शत्रु और मित्र आदि की कोई अलग सत्ता नहीं है, ऐसा जान कर जो समझदार साधक— विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ (५।१८) इस गीता वचन के अनुसार विद्या और विनय से संपन्न ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चांडाल में समान दृष्टि रखता है, साथ ही शत्रु और मित्र को भी एक ही भाव से देखता है तथा संमान मिलने पर अथवा अपमान होने पर जो हर्ष और विषाद में नहीं पड़ता, वह सब तरह से सुखी हो जाता है, परमानन्द से परिपूर्ण हो जाता है। वह इस बात को भली भांति जान लेता है कि यह चिन्मय विश्वप्रपंच इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति का उल्लास मात्र है, इसमें शत्रु-मित्र आदि की कोई वास्तविक स्थिति नहीं है, सब कुछ आनन्दमय और चिन्मय ही है। इस स्थिति में पहुँच जाने पर वह सुखस्वरूप हो जाता है ॥१२२॥ [ धारणा-१०० ] नद्वेषं भावयेत् क्वापि न रागं भावयेत् क्वचित् । रागद्वेषविनिर्मुक्तौ मध्ये ब्रह्म प्रसर्पति ॥१२३॥ क्वापि शत्रुसर्पप्रभृतिषु द्वेषं न भावयेत् द्वेषबुद्धिं न कुर्यात्, न च क्वचित् सुहृद्- हारादिषु रागं भावयेत् अनुरागबुद्धिं कुर्यात्। एवं रागद्वेषविनिर्मुक्तौ तद्विनिर्मुक्त- स्वभावापत्तौ सत्यां योगिनो मध्येऽन्तःकरणे ब्रह्म शुद्धस्वात्मस्वरूपं प्रसर्पति विकसति, भावको ब्रह्म सम्पद्यत इति भावः ॥१२३॥ शत्रु, सर्प प्रभृति प्रतिकूल वेदनीय, दुःखजनक पदार्थों में न तो द्वेष की भावना रखे और न मित्र, हार प्रभृति ¹अनुकूल वेदनीय, सुखजनक पदार्थों में राग बुद्धि को ही पैदा होने दे। इस तरह से चित्त के राग और द्वेष से मुक्त हो जाने पर साधक के अन्तःकरण में शुद्ध स्वात्मस्वरूप ब्रह्म प्रकाशित हो उठता है। अर्थात् इस तरह की भावना करने वाला योगी ब्रह्मभाव से संपन्न हो जाता है ॥१२३॥

  1. तर्कसंग्रह में— "अनुकूलवेदनीयं सुखम्। प्रतिकूलवेदनीयं दुःखम्।" यह सुख और दुःख की परिभाषा बताई गई है। अर्थात् अपने मन में अनुकूल प्रतीत होने वाला सुख और प्रतिकूल प्रतीत होने वाला दुःख कहलाता है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)