भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

img040_1L

१८ : विज्ञानभैरव ¹अन्तःस्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्तगोचरा । याऽवस्था भरिताकारा भैरवी भैरवात्मनः ॥१५॥ तद्वपुस्तत्त्वतो ज्ञेयं विमलं विश्वपूरणम् । परभैरवस्यास्य परावस्था पूर्वापरादिक्षु वर्तमानादिकालेषु च कलनातीता, देशेन दूरासन्नादिना ²उद्देशेन च इदन्तानिर्देश्येन न विद्यते विशेषो यस्यास्तादृशी देशादेशाविशेषिणी च विद्यते । अत एव परमार्थतो व्यपदेष्टुमुपदेष्टुमशक्या मध्यमा- जल्पाविषया, अभिधित्सागोचरत्वाभावादकथ्या वैखर्याऽप्यव्यावर्णनीया । अन्तःस्वानु- भवानन्दा अन्तरिति पूर्णाहन्तायां स्वानुभवः स्वप्रकाश आनन्द एव रूपं यस्यास्तादृशी स्वप्रकाशैकस्वरूपा । विकल्पोन्मुक्तगोचरा निर्विकल्पपरमार्था च पूर्णस्वरूपस्य भैरवस्य या भरिताकाराऽवस्था भरितोऽशेषविश्वभेदचमत्कारमय आकारः स्वरूपं यस्याः सा तादृशी, अहमिति विश्रान्तिमयी भैरवी, तदेव तत्त्वतः परमार्थतो विमलं स्वात्मभित्त्या- भासितजगदनाच्छादितं विश्वपूरणमशेषावभासकं वपुः स्वरूपं ज्ञेयम्, न त्वन्यदाकृत्यादि ॥१४-१५॥ यदि ऊपर बताया गया स्वरूप सकल है, तो उस निष्कल स्वरूप को भी आप बताइये, जिससे कि मेरा परा शक्ति सम्बन्धी संशय भी दूर हो सके ? देवी के इसी संशय को दूर करने के अभिप्राय से भैरव कहते हैं कि पर भैरव की यह परावस्था पूर्व-पश्चिम प्रभृति सभी दिशाओं में और वर्तमान आदि सभी कालों में कलना से शून्य है; दूर, आसन्न (निकट) आदि देश और इसका यह नाम है, इस तरह के उद्देश (व्यवहार) से इसमें किसी विशेषता का आधान नहीं हो पाता, देश और काल आदि विशेषणों से सीमित करके उसको बताया नहीं जा सकता । वस्तुतः इसके स्वरूप को समझा पाना इसलिये कठिन है कि न तो इसका मध्यमा वाणी में ही स्फुरण होता है और न वैखरी वाणी से ही इसका वर्णन किया जा सकता है । अर्थात् दिशा, काल, देश, नाम, रूप आदि से परिच्छिन्न न होने से इस परावस्था के स्वरूप को वाणी के माध्यम से समझा पाना बड़ा कठिन है । इसका अनुभव तो पूर्णाहन्ता का विकास होने पर अपने भीतर अपने आप प्रकाशित हो रहे आनन्द के रूप में होता है । इसका यह स्वरूप सभी तरह की कल्पनाओं से, नाम-रूप, क्षणिकता आदि उपाधियों से रहित होने से निर्विकल्प अत एव वास्तविक है । पूर्णस्वरूप बोध-भैरव की यह अवस्था सारे विश्व में अहमाकार में सर्वत्र भरी हुई है, व्याप्त है । वस्तुतः यही विमल (निर्मल), अर्थात् स्वात्मभित्ति में आभासित हो रहे जगत् के दोषों से अनाच्छादित (असंयुक्त) रह कर विश्व का पूरक, अर्थात् सारे जगत् का प्रकाशक, निष्कल स्वरूप उस परावस्था में प्रकट होता है । इससे भिन्न इसकी कोई आकृति नहीं मानी जाती ॥१४-१५॥

  1. शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३) में 'अन्तःस्वानु०' इत्यादि तीन पंक्तियाँ उद्धृत हैं ।
  2. "तत्र नामधेयेन पदार्थमात्रस्याभिधानमुद्देशः" (न्या० भा० १।१।३) ।

img040_2R

विज्ञानभैरव : १९ एवंविधे परे तत्त्वे कः पूज्यः कश्च तृप्यति ॥१६॥ एवंविधे निष्कले परे तत्त्वेऽहमात्मनि परभैरवस्वरूपे सति कः पूज्यः कश्च तृप्यति ? कस्यचनान्यस्य पूज्यस्य तर्पणीयस्य चाभावात् पूज्यपूजकपूजानां तर्पकादीनां च चिदानन्दैकघनपरमार्थत्वात् सर्वमपि क्रियाडम्बरं व्यर्थमेवेति भावः ॥१६॥ इस प्रकार निष्कल परस्वरूप का विवेचन करने के उपरान्त पूर्व प्रतिपादित कर्म- काण्ड के आडम्बरों की व्यर्थता का यहाँ भैरव पुनः समर्थन करते हैं कि अहमात्मक परभैरव स्वरूप की इस निष्कलावस्था में कौन पूज्य होगा और उस पूजा से कौन तृप्त होने वाला है ? अर्थात् साधक के अपने स्वात्मस्वरूप से अतिरिक्त कोई पूजनीय और तर्पणीय तत्त्व नहीं है, क्योंकि पूज्य, पूजक और पूजा तथा तर्पक, तर्पणीय, तर्पण प्रभृति सभी स्वरूप परमार्थतः चिदानन्दघन परम तत्त्व की ही विभिन्न अवस्थाएँ हैं । इस स्थिति में कर्मकाण्ड का यह सारा आडम्बर व्यर्थ है ॥१६॥ एवंविधा भैरवस्य याऽवस्था परिगीयते । सा परा पररूपेण परा देवी प्रकीर्तिता ॥१७॥ एवंविधा उपरि वर्णितप्रकारा भैरवस्य या निष्कलस्वरूपा अवस्था परिगीयते शास्त्रेषु, सैषा पररूपेण परा प्रकृष्टा सती परा देवीति प्रकीर्तिता कथिता ॥१७॥ परा भट्टारिका संबन्धी संशय की पूर्णतः निवृत्ति के लिये भैरव अब उसके स्वरूप का स्पष्ट निरूपण करते हुए कहते हैं कि ऊपर वर्णित भैरव की जिस निष्कल अवस्था का शास्त्रों में गुणगान किया गया है, वस्तुतः वह भैरव से भिन्न नहीं है। यद्यपि कभी-कभी इनके स्वरूप का विश्लेषण करते समय इनमें परस्पर भेद का निरूपण भी किया जाता है, किन्तु यह वास्तविकता नहीं है । अतः बोध-भैरव के इस उत्कृष्ट निष्कल परस्वरूप से अभिन्न स्वरूप वाली यह परा देवी केवल नाम से ही परा नहीं है, किन्तु अपनी प्रकृष्टता के आधार पर भी परा कहलाती है ॥१७॥ १शक्तिशक्तिमतोर्यद्वदभेदः सर्वदा२ स्थितः । अतस्तद्धर्मधर्मित्वात् परा शक्तिः परात्मनः ॥१८॥ भैरवस्य इयमवस्था तस्य स्वरूपमेव । शक्तिस्वरूपा इयमवस्था शक्तिमतो भैरवादभिन्नैव । शक्तिः सामर्थ्यं विश्वनिर्माणकारि, तद् भैरवस्वरूपमेव । यतो हि शक्तिशक्तिमतोः सदा अभेदः स्वीक्रियते, अतः शक्तिमतो भैरवस्य संबन्धिनिः सर्वज्ञता- सर्वकर्तृ ता-सर्वात्मतादिभिर्धर्मैर्धर्मिणी परस्य चिदानन्दैकघनस्यात्मन इयं शक्तिः परेति प्रकीर्त्यते ॥१८॥ १. ॰स्मा॰-ख० ने० । २. संयवस्थितः-ने० ।

  1. यह श्लोक नेत्रतन्त्र (भा० २, पृ० ४४ और २७३) की उद्योत टीका में क्षेमराज द्वारा उद्धृत है ।

img041_1L

२० : विज्ञानभैरव यहाँ शंका उठती है कि भैरव की ऊपर बताई गई यह अवस्था जब उसका स्वरूप ही है, काल आदि से परिच्छिन्न कोई दशाविशेष नहीं, तो ऐसी अवस्था में भैरव ही भैरवी कहलावेगा ? इस आपत्ति को स्वीकार करते हुए भैरव कहते हैं कि यह बात सही है कि भैरव की यह परावस्था उसका स्वरूप ही है । शक्तिस्वरूप यह परावस्था शक्तिमान् भैरव से अभिन्न है । शक्ति सामर्थ्य को कहते हैं । यह सामर्थ्य सारे जगत् का निर्माण करने वाले भैरव का ही स्वरूप है । शक्ति और शक्तिमान् में सदा अभेद माना जाता है, अतः शक्तिमान् भैरव से संबद्ध सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता, सर्वात्मता प्रभृति धर्मों से संवलित होने से धर्मिणी यह शक्ति चिदानन्दघनस्वरूप पर आत्मा (भैरव) से अभिन्न होने से परा (भैरवी) कहलाती है ॥१८॥ न¹ वह्नेर्दाहिका शक्तिर्व्यतिरिक्ता विभाव्यते । केवलं ज्ञानसत्तायां² प्रारम्भोऽयं प्रवेशने ॥१९॥ यथा वह्नेर्दाहिका शक्तिस्ततो व्यतिरिक्ता भिन्ना न विभाव्यते विचार्यापि नोपलभ्यते, तथेयं परा शक्तिरपि शक्तिमतो भैरवान्नैव कदाचिद् भिन्ना प्रतिभाति । केवलं ज्ञानसत्तायां वह्नि जिज्ञासाोर्वह्निज्ञप्तौ यत् प्रवेशनं तत्र, अयमिति दाहशक्त्यात्मा वह्निस्वभावः प्रारम्भः, तन्मुखेन पाचकत्वाद्यनन्तशक्त्यात्मकशक्तिमत्स्वरूपावगतेः । तथेयं परा शक्तिरपि भवति । तन्मुखेन हि भैरवसांमुख्यं स्यादिति भावः ॥१९॥ इस बात को दृष्टान्त देकर समझाते हैं कि जैसे आग से उसकी दाहिका शक्ति, जलाने की ताकत, विचार पूर्वक देखने पर भी कभी अलग नहीं होती, उसी तरह से यह परा शक्ति भी शक्तिमान् परभैरव से कभी जुदी नहीं दिखाई पड़ती । यह शक्ति तो शक्ति- मान् की सत्ता की जानकारी और उसके वास्तविक स्वरूप में प्रवेश पाने के प्राथमिक उपाय के रूप में वर्णित है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे यदि किसी को आग का स्वरूप जानने की इच्छा है तो वह उसकी दाह शक्ति के पास जाता है और सब से पहले उसकी जलाने की ताकत को पहचानता है, बाद में अग्नि के पाचकत्व आदि अनन्त व्यापारों को भी समझ लेता है, उसी तरह इस शक्ति के माध्यम से ही उस परभैरव के स्वरूप का ज्ञान कराने वाले मार्ग में प्रवेश पाया जा सकता है ॥१९॥ ²शक्त्यवस्थाप्रविष्टस्य निर्विभागेन भावना । तदासौ शिवरूपी स्यात् शैवी मुखमिहोच्यते ॥२०॥ १. ॰याः-ई० । २. ॰स्यां-स्प० ।

  1. इस श्लोक को अभिनवगुप्त ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० १, पृ० २८७) में उद्धृत किया है ।
  2. स्पन्दनिर्णय (पृ० ७२) और शिवस्तोत्रावली की व्याख्या (पृ० ६४) में क्षेमराज द्वारा यह पूरा श्लोक उद्धृत है । इसके अतिरिक्त इस श्लोक का "शैवी मुखमिहो- च्यते" इतना अंश शिवस्तोत्रावलीव्याख्या (पृ० ११०), तन्त्रालोकविवेक (भा० १,

img041_2R

विज्ञानभैरव : २१ पराशक्तिरूपामवस्थां यदा प्रविशति वक्ष्यमाणोपायैः समाविशति उपदेश्योऽणुः, तदास्य निर्विभागेन भावना भवति, शक्तेः शिवावेशात् । तदा स लब्धशाक्तबलः प्रशस्ततमशिवस्वरूपो भवत्येव, यत् शिवस्येयं शैवी शक्तिः, मुखं प्रवेशोपायद्वारमिहा- गमेषूच्यते । यथा हि वक्त्रेणैवायमिति लभ्यते, तथा शक्त्यैव शिवोऽयमिति व्यपदेश इति भावः ॥२०॥ शक्ति के माध्यम से पर भैरव के स्वरूप का ज्ञान किस तरह से होता है, इस बात को उदाहरण देकर समझाया जा रहा है कि आगे बताए गए उपायों से यह उपदेश का पात्र जीव जब परा शक्ति स्वरूप अवस्था में प्रवेश पाता है, उसके साथ एकाकार हो जाता है, तब उसमें निर्विभाग भावना उत्पन्न होती है, अर्थात् शक्ति और शिव में उसकी विभाग-दृष्टि, भेद-दृष्टि लुप्त हो जाती है । उस समय शाक्त बल की उपलब्धि के कारण साधक शिव- स्वरूप हो जाता है, क्योंकि आगमों का कहना है कि शिव की यह शैवी शक्ति शिव के उस परम सुन्दर स्वरूप में प्रवेश पाने का द्वार है । जैसे मुंह देखने से किसी व्यक्ति की पहचान होती है, उसी तरह शक्ति को देखकर अर्थात् परा शक्ति को जानकर उसके माध्यम से शिव को पहचाना जाता है । इसलिए यह शैवी शक्ति शिव का मुख कहलाती है । इस शक्ति के बिना शिव में नाम, धाम आदि की कल्पना नहीं की जा सकती । जैसा कि वामकेश्वरतन्त्र (नित्याषोडशिकार्णव) में कहा गया है— शक्त्या बिना शिवे सूक्ष्मे नाम धाम न विद्यते (४।७) । इस पूरे ग्रन्थ का अभिप्राय यह है कि परा शक्ति की सहायता से ही व्यक्ति शक्ति और शिव में अभिन्नता देख पाता है कि वस्तुतः इनका स्वरूप एक ही है । जब यह अभेद- बोध जाग उठता है, तब परावस्था ही बच रहती है, शिव और शक्ति उसी में विलीन हो जाते हैं । इस स्थिति को यहां बोध(विज्ञान)भैरव दशा कहा गया है ॥२०॥ ¹यथाऽऽलोकेन दीपस्य किरणैर्भास्करस्य च¹ । ज्ञायते दिग्विभागादि तद्वच्छक्त्या शिवः² प्रिये³ ॥२१॥ १. वा-ख० स्व० त० । २. ॰वस्य च-ख० । ३. श्रितः-स्व० । आ० १, पृ० ७, ११५; भा० २, आ० ३, पृ० १७१, १८८; भा० ४, आ० ६, पृ० २०३; भा० ११, अ० २९, पृ० १६३), स्पन्दकारिकाविवृति (पृ० ५४), नेत्रतन्त्रो- द्योत (भा० १, पृ० २०, १९२), ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० १, पृ० २८७), स्वच्छन्दोद्योत (भा० २, प० ४, पृ० १८७; भा० ५B, प० १०, पृ० ५३४), महार्थ- मंजरीपरिमल (पृ० ९६) में देखा जाता है ।

  1. यह श्लोक स्वच्छन्दतन्त्र (भा० २, प० ४, पृ० २१२) की टीका में क्षेमराज द्वारा तथा तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० २२९) में जयरथ द्वारा उद्धृत है ।

img042_1L

२२ : विज्ञानभैरव हे प्रिये, यथा दीपस्य शिखात्मन आलोकेन प्रकाशेन, भास्करस्य च किरणैः मरीचिभिरेवात्मीयैः, दिग्विभागसंनिवेशादि ज्ञायते, तद्वत् स्फुरत्तारूपया स्वशक्त्यैव शिवः स्वात्मा ज्ञायते प्रत्यभिज्ञायते ॥२१॥ इसी विषय को दो अन्य स्पष्ट उदाहरणों की सहायता से समझाया जाता है—हे प्रिये, जैसे दीपक की अपनी लौ के प्रकाश से और सूर्य की ही किरणों से सारी दिशाएँ और उनमें विद्यमान सभी वस्तुएँ जानी जाती हैं, उसी तरह से स्फुरत्ता¹ स्वरूप अपनी शक्ति से ही स्वात्मस्वरूप शिव का लाभ, अवभास अर्थात् प्रत्यभिज्ञा (पहचान) हो जाती है। इसका अभिप्रायः यह है कि जैसे दीपक की लौ दीपक से भिन्न नहीं है, सूर्य की किरणें सूर्य से भिन्न नहीं हैं, उसी तरह शक्ति भी शिव से भिन्न नहीं है। दीपक की लौ से और सूर्य की किरणों से जैसे दिग्विभाग (भिन्न-भिन्न दिशा) आदि का ज्ञान होता है, उसी तरह से शक्ति की सहायता से इस जागतिक प्रपंच का ज्ञान होता है। जैसे दीपक को देखने के लिए दूसरे दीपक की और सूर्य के लिए दूसरे सूर्य की आवश्यकता नहीं रहती, किन्तु अपनी ही लौ और अपनी ही किरणों से जैसे ये भासित होते हैं, उसी तरह से अपनी इस शक्ति की सहायता से ही अपना यह स्वरूप पहचान लिया जाता है ॥२१॥ श्रीभैरवी¹ उवाच देवदेव त्रिशूलाङ्क कपालकृतभूषण । दिग्देशकालशून्या च व्यपदेशविवर्जिता ॥२२॥ याऽ²वस्था भरिताकारा भैरवस्योपलभ्यते । कैरुपायैर्मुखं तस्य³ परा देवी कथं भवेत् ॥ यथा सम्यगहं वेद्मि तथा मे⁴ ब्रूहि भैरव ॥२३॥ १. °देवी-क० । २. शक्तिर्भ°-ख० । ३. °स्याः-ख० । ४. ब्रूहि मम प्रभो-ख० ।

  1. बीज से जैसे अंकुर स्फुरित होता है, उसी तरह से शिव से यह सारा जगत् निकलता है। बीज मिट्टी-पानी आदि सहकारी कारणों का संयोग होने पर ही प्रस्फुटित होता है। सहकारी कारणों के सम्पर्क में आने के साथ ही बीज में स्पन्दन होने लगता है और वह अंकुर के रूप में परिणत हो जाता है। किन्तु शिव को किसी सहकारी कारण की आवश्यकता नहीं पड़ती। स्वेच्छा से जब उसमें स्पन्दन होने लगता है, तो वह अपनी इस स्पन्द शक्ति के माध्यम से जगत् के रूप में परिणत होता है। इसी व्यापार को स्फुरत्ता कहते हैं। यह स्फुरत्ता जैसे शिव को परिमित प्रमाता बना देती है, उसी तरह से स्वात्मस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा भी इस स्फुरत्ता शक्ति से ही निष्पन्न होती हैं। “सा स्फुरत्ता महासत्ता” (१.५.१४) इस प्रत्यभिज्ञाकारिका में स्फुरत्ता को ही महासत्ता, स्पन्दतत्त्व आदि नामों से जाना गया है।

img042_2R

विज्ञानभैरव : २३ एवं परास्वरूपे निर्णीते तदुपलब्ध्युपायजिज्ञासया श्रीदेव्युवाच—हे देवदेव देवानां ब्रह्माद्यनाश्रितान्तानां देव स्वामिन्, त्रिशूलाङ्क स्वातन्त्र्यशक्तिस्फारितेच्छा- द्यरात्रयात्मकत्रिशूलधारिन्, कपालकृतभूषण समस्तवाच्यवाचकात्मकजगत्खण्डरूप- कपालैश्चैतन्यस्वातन्त्र्याभिव्यञ्जकत्वात् कृतभूषण भ्राजमानानाच्छादितस्वरूप ! भैरवस्य 'दिक्काल' (श्लो० १४) इत्यादिनाऽनुपदमुपदिष्टा दिग्देशकालशून्या व्यपदेशविवर्जिता भरिताकारा या अवस्था उपलभ्यते, सा परा देवी कथं ज्ञाता भवेत् ? कैश्चोपायैः सा तस्य भैरवस्य 'शैवी मुखम्' (श्लो० २०) इत्यत्र प्रतिपादितं मुखं भवेत् ? उपायैरिति बहुवचनमुपलब्धुरणोः प्राणदेहबुद्धिशून्याश्रयोच्चारकरणध्यानवर्णस्थानकल्पनाभेदात्, सार्वात्म्यभावनादिशुद्धविकल्पनानात्वात्, अविकल्पोपायवैचित्र्याच्च आणव-शाक्त- शाम्भवोपायनानात्वं कटाक्षयति । हे भैरव, एतत्सर्वं यथा अहं सम्यक् प्रकारेण जानामि तथा मे वद ।।२२-२३।। इस तरह से परा देवी के स्वरूप का निर्णय हो जाने पर श्रीदेवी उस स्वरूप की प्राप्ति के उपाय को जानने के अभिप्राय से पूछती है—हे देवदेव ! ब्रह्मा से लेकर अनाश्रित पर्यन्त सभी देवताओं के स्वामी, हे त्रिशूलाङ्क ! स्वातन्त्र्य शक्ति के विस्फार (विस्तार) स्वरूप इच्छा, ज्ञान और क्रिया—इन तीन शक्तियों के फलक वाले त्रिशूल को धारण करने वाले, हे कपालकृतभूषण ! समस्त वाच्यवाचकात्मक जगत्खण्ड रूप कपाल में चैतन्य और स्वातन्त्र्य की अभिव्यक्ति करने वाले अत एव सर्वत्र प्रकाशमान, निरावरण स्वरूप वाले हे खप्परधारी भैरव ! पूर्व पश्चिम आदि दिशा, दूर-आसन्न (पास) आदि देश, वर्तमान प्रभृति काल के परिच्छेद (इयत्ता) से रहित, नाम-रूप आदि से असंस्पृष्ट, परिपूर्ण स्वरूप वाली भैरव की जो अवस्था उपलब्ध होती है, जिसका कि वर्णन 'दिक्काल' (श्लो० १४) इत्यादि के द्वारा पहले भी किया जा चुका है, वह परा देवी कैसे जानी जा सकती है ? और किन उपायों से वह 'शैवी मुखम्' (श्लो० २०) इत्यादि से प्रतिपादित शिवावस्था में प्रवेश का द्वार बन सकती है ? उसका दर्शन किन उपायों से किया जा सकता है ? इस बात को आप विस्तार से समझावें । उपाय शब्द में बहुवचन इस अभिप्राय से लगाया गया है कि अपने स्वरूप की उपलब्धि में लगा जीव प्राण, देह, बुद्धि और शून्य में उच्चार, करण, ध्यान, वर्ण और ¹स्थानकल्पना के माध्यम से आणव उपाय का, सार्वात्म्य भावना प्रभृति शुद्ध विकल्पों के सहारे शाक्त उपाय का और निर्विकल्पात्मक नाना प्रकार के शाम्भव उपाय का सहारा लेकर अपने सही स्वरूप को पहचान सके । देवी के प्रश्न का अभिप्राय यह है कि जिन उपायों का सहारा लेकर मैं परा देवी और बोध(विज्ञान)भैरव के स्वरूप को ठीक से समझ सकूँ, उनको आप विस्तार से मुझे बताइये ।।२२-२३।।

  1. इन पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या उपोद्घात में 'त्रिविध उपाय और समावेश' शीर्षक के अन्तर्गत देखनी चाहिये ।

img043_1L

२४ : विज्ञानभैरव [ धारणा-१ ] श्रीभैरव उवाच १ऊर्ध्वे प्राणो ह्यधो जीवो विसर्गात्मा परोच्चरेत् । उत्पत्तिद्वितयस्थाने भरणाद् भरिता२ स्थितिः ॥२४॥ योऽयमूर्ध्व इति हृदो द्वादशान्तं यावद् वहन् प्राणः, यश्चाधो जीवो द्वादशान्ताद् हृदन्तमपानः, एषा परा देवी उच्चरेत् सततं स्वयमुच्चरन्ती स्थिता । कीदृशी ? विसर्गात्मा विसर्गोऽन्तर्बहिर्भावकरणरूपो विमर्श आत्मा यस्याः सा अप्राणाद्यशाक्त- स्पन्दोन्मेषा, तदाच्छुरणेन विना नियतप्राणप्रवाहायोगात् । यत एवमत उत्पत्तिद्वितयस्य बाह्याभ्यन्तरोत्पाद्यद्वयस्य यत् स्थानं हृद् द्वादशान्तश्च, तत्र भरणादिति नित्योन्मिष- दाद्यस्फुरत्तात्मभैरवीयशक्त्युपलक्षणात्, भरिता स्थितिः भैरवस्वरूपाभिव्यक्तिर्भवति । अथवा ऊर्ध्वे द्वादशान्ते प्राणः प्राणनरूपो जीवनाख्यश्चित्तवृत्तिविशेषः संस्थाप्यः । अधश्च हृदि हृदयस्थाने जीवोऽपानः, जीव्यतेऽनेनेति जीवः, भक्षणपानादेरधोमार्गप्रस- रणाज्जीव इत्युच्यते तदुपाधिमान्, अत एव जीव इति । विसर्गात्मा अन्तर्बहिर्भावकरण- रूप आत्मा यस्य। तेनापि परैव उच्चारमायाति अह्मित्यन्तश्चक्रारूढा, एतयोर्द्वयो- र्विभेदापत्त्या अहमिति प्रकाशनात् । उत्पत्तौ द्वादशान्ते द्वितीये हृदि च धारणात् । तत्र स्थित्या भरितस्थितिः स्यादेवेति सर्वोपाधिविस्मरणादहमिति विमर्शवान् स्यादिति भावः ॥२४॥ इस तरह से देवी के द्वारा पूछे गये परा देवी के स्वरूप को पहचानने के लिए उपाय के रूप में क्रमशः एक के बाद दूसरी ११२ धारणाओं का निरूपण करते हुए भगवान् भैरव कहते हैं--ऊपर हृदय से द्वादशान्त२ तक जाने वाला प्राण और नीचे १. °त°-ख० त० ।

  1. तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १४३) में इस श्लोक का ‘भरणाद् भरितस्थितिः’ इतना अंश मिलता है।
  2. प्राण और अपान की गति जिस स्थान पर जाकर रुक जाती है, उसको द्वादशान्त कहते हैं। बाह्य और आन्तर, शिव द्वादशान्त और शक्ति द्वादशान्त के भेद से इसकी कई स्थानों में स्थिति मानी गई है। प्राण और अपान के विसर्ग और पूरण व्यापार के द्वारा प्राणी का शरीर आप्यायित होता रहता है। ४९ वें श्लोक में द्वादशान्त पद का अर्थ शून्यातिशून्य मध्यधाम, अर्थात् सुषुम्ना नाडी किया गया है। तन्त्रालोक (५।७१) में सभी नाड़ियों के अग्रभाग में द्वादशान्त की स्थिति मानी गई है। विभिन्न श्लोकों की व्याख्या में इन शब्दों की चर्चा आई है। उपोद्घात में भी इन पर विचार किया जायगा।

img043_2R

विज्ञानभैरव : २५ द्वादशान्त से हृदय तक आने वाला जीव नामक अपान, यह परा देवी का उच्चारण है, स्पन्दन है। परा देवी ही स्वयं इसका निरन्तर उच्चारण करती रहती है, अर्थात् प्राण और अपान के रूप में स्पन्दित होती रहती है। यह परा देवी विसर्ग-स्वभाव है। अर्थात् आन्तर और बाह्य भावों की सृष्टि करना ही इसका स्वरूप है। यह परा देवी "अबिन्दुमविसगं च" (८८ श्लो०) इत्यादि कारिका में आगे वर्णित होने वाले अशाक्त स्पन्द अर्थात् शैव सृष्टि के प्रथम स्पन्द अकार से उन्मिषित होती है, स्वरूप-लाभ करती है। क्योंकि उससे जब तक इसका संपर्क नहीं होता, तब तक प्राण का प्रवाह नियमित रूप से नहीं चल सकता । "प्राणा- पानमयः प्राणो विसर्गापूरणं प्रति" (७।२५) इत्यादि स्थल में स्वच्छन्दतन्त्र में इसी बात को विस्तार से समझाया गया है। इस स्थिति में बाह्य और आन्तर विषय प्राण और अपान की सृष्टि के स्थान हृदय और द्वादशान्त में नित्य उन्मिषित हो रही प्रथम स्फुरत्तास्वरूप भैरव की शक्ति की भावना करने से योगी में भैरव स्वभाव की अभिव्यक्ति हो जाती है, उसका भैरव स्वरूप प्रकट हो जाता है। अथवा ऊपर द्वादशान्त में प्राण की स्थापना करनी चाहिये, जो कि प्राणन रूप अर्थात् जीवन रूप चित्त की एक वृत्ति है। नीचे हृदय में जीव उपाधि वाले अपान को स्थापित करना चाहिये । इसको जीव इसलिए कहा जाता है कि अपान वायु खाई गई अथवा पी गई वस्तु को नीचे के मार्ग में ले जाता है। इसी उपाधि के कारण इसको जीव कहते हैं। अन्दर आना और बाहर जाना जिसका स्वरूप है, स्वभाव है, प्राण वृत्ति का यह स्वाभाविक व्यापार ही परा शक्ति का उच्चारण, स्पन्दन है, जो कि शरीर के भीतर निरन्तर चल रहे 'अहम्' चक्र में अपना स्थान बनाए हुए है। उक्त दोनों स्थितियों का जब अलग-अलग चिन्तन होता है, तभी 'अहम्' तत्त्व प्रकाशित होता है, उत्पन्न होता है। वह द्वादशान्त और हृदय में अवस्थित रहता है। इस स्थिति के कारण साधक को भरित (भरी-पूरी = सम्पूर्ण स्वरूप लाभ की) स्थिति प्राप्त हो जाती है। अर्थात् सभी तरह की उपाधियों का विस्मरण हो जाने से 'अहम्' यह विमर्श, अर्थात् 'मैं ही भैरव हूँ' इस तरह की प्रत्यभिज्ञा निश्चित रूप से हो जाती है। ऊपर प्रथम अनुच्छेद में बताये गये अर्थ के अतिरिक्त शिवोपाध्याय ने इस श्लोक के पाँच अन्य अर्थ भी किये हैं, जो कि क्रमशः इस प्रकार हैं- ऊपर अर्थात् सभी इन्द्रियों के प्रसार के मार्ग में प्राण वायु विषयों का आप्यायक है, यह सूक्ष्म प्राण के रूप में निरन्तर स्पन्दन करता रहता है और बाह्य विषयों का बोध कराता है। नीचे जीव इन सभी विषयों में अपान के रूप में प्रविष्ट होता है। इन दोनों स्थितियों में परा शक्ति ही निरन्तर प्रकाशित होती रहती है। इस लिये ग्राह्य की उत्पत्ति की जगह हृदय और ग्राहक की उत्पत्ति के स्थान द्वादशान्त में, जहाँ कि उसका प्रमेय से सम्पर्क होता है, शक्ति की भरित अवस्था का ध्यान करने पर साधक भैरव स्वरूप हो जाता है। ऊपर, जहाँ कि प्राण और अपान का उन्मेष होता है, समस्त वाचक शब्दों का अनु- प्राणक अकार रहता है और नीचे, सबके अन्त में जीव अर्थात् सकार की स्थिति रहती है।

img044_1L

२६ : विज्ञानभैरव इस तरह से प्राण और जीव पद से यहाँ अकारादि सकारान्त मातृका के वर्णों का बोध होता है। विसर्ग स्वभाव के अपने एक भाग में हकार कला को धारण करने वाली नाद रूपा यह परा देवी मातृका चक्र के क्रम से समस्त वाच्य-वाचकात्मक जगत् को लांघ कर, अपने प्रकाश से समस्त भेद दृष्टि को दबाकर स्फुरित होती है। इस लिये उक्त दोनों उत्पत्ति स्थानों में, हृदय और द्वादशान्त में, अकार और हकार का परामर्श करने से शिव और शक्ति का साम- रस्य हो जाने पर साधक भैरव-स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। 'ऊर्ध्व' पद का अर्थ है उत्कृष्ट प्राण, क्योंकि इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति का इसी में विस्तार होता है और उसी से यह सारा विश्व अनुप्राणित है। 'अधः' पद का अर्थ है इदन्ता परामर्श का विषय होकर निकृष्ट दशा को प्राप्त हुआ जीव, क्योंकि इच्छा के विषय ज्ञेय वर्ग का यह कार्य बन जाता है। सोमरूप आप्यायक शक्ति संसारी जीवों की स्थिति का कारण बनती है। यह शक्ति परा, परापरा और अपरा शक्तियों के रूप में स्फुरित होती हुई विश्व से अभिन्न रूप में सदा भासित होती रहती है। इस लिये उत्पत्ति स्थल अर्थात् प्रमेय पद में, द्वितय शब्द वाच्य प्रकाश्य-प्रकाशक के सामरस्य रूप प्रमाण पद में तथा प्रमेय¹ और प्रमाण की जहाँ विश्रान्ति होती है, उस प्रमातृ पद में भरण से अर्थात् परा भट्टारिका स्वरूप तुरीय में आनन्द से आप्यायित हो जाने से साधक में भैरव दशा की अभि- व्यक्ति हो जाती है। अथवा ऊर्ध्व पद का अर्थ है माया पर्यन्त अध्वा के ऊपर, प्राण का अर्थ है इनका अनु- प्राणक शुद्ध और अशुद्ध अध्वा में व्याप्त शिव-शक्ति तत्त्व। इसके नीचे जीव की स्थिति है, जिसने कि माया प्रभृति तत्त्वों की अधीनता स्वीकार कर ली है और मनुष्य नाम से अभिहित होता है। यही आत्मतत्त्व कहलाता है। इन सब स्वरूपों में शिव की परात्मिका स्वातन्त्र्य शक्ति ही स्पन्दित होती रहती है। उत्पद्यमान शुद्ध और अशुद्ध दोनों मार्गों में पर शक्ति की इस व्याप्ति के कारण ही सब सब कुछ है, इस भावना के अभ्यास से जगत् के समस्त पदार्थों के साथ सामरस्य की स्थिति प्राप्त हो जाने पर साधक को भरितावस्था प्राप्त हो जाती है। अन्तिम अर्थ यह है—अनुत्तर, अकुल स्वरूप चिद्धाम से स्वयं उन्मिषित होने वाले हकार की स्थिति ऊपर और नीचे विसर्जनीय अनुप्राणित विसर्गस्वरूप जीव की, सकार की स्थिति रहती है। हान और समादान, त्याग और ग्रहण की प्रक्रिया के आधार पर इस हंस

  1. "त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम्" (३।२०) इस शिवसूत्र में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय दशाओं में तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं में चतुर्थ शिवपद (शुद्ध प्रमाता) तथा तुरीय अवस्था के आसेचन की बात कही गई है। जल पर तेल गिराने से जैसे वह चारों तरफ फैल जाता है, उसी तरह से उक्त तीनों स्थितियों में चतुर्थ दशा का आसे- चन करने से (फैला देने से) साधक शिव-स्वरूप का, तुरीय अवस्था का सभी स्थानों और अवस्थाओं में साक्षात्कार करने लगता है।

img044_2R

विज्ञानभैरव : २७ मन्त्र का उच्चारण, जो कि 'अजपा जप'1 के नाम से प्रसिद्ध है, परा शक्ति स्वयं ही करती है। इसीलिये 'मैं वह शिव हूँ' इस तरह के अपने स्वरूप का परिचय यहाँ प्राप्त होता है। इस स्थिति में हकार और सकार इन दोनों की उत्पत्ति के स्थल में, अर्थात् हकार की उत्पत्ति के स्थान हृदय और सकार की उत्पत्ति के स्थान द्वादशान्त में भरण से, अर्थात् उन वर्णों के स्वरूप का चिन्तन करने से, शाक्त बल की प्राप्ति होती है और अन्त में साधक भैरव-स्वरूप हो जाता है। ऊपर बताई गई छः व्याख्याओं में से पहली और दूसरी व्याख्या के अनुसार अविकल्प स्वरूप के चिन्तन से साधक शाम्भव समावेश में, चौथी और पांचवीं व्याख्या के अनुसार सब कुछ अपना ही स्वरूप है, इस तरह की भावना के आधार पर शुद्ध विकल्प का चिन्तन करने से शाक्त समावेश में एवं तीसरी और छठी व्याख्या के अनुसार धारणा में वर्णविशेष के परामर्श की प्रधानता के आधार पर आणव समावेश में समाहित होता है। इन त्रिविध समावेशों का वर्णन मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में 'उच्चारकरण' (२।२१-२३) इत्यादि तीन श्लोकों में किया गया है। उपोद्घात में इस विषय पर विशेष प्रकाश डाला जायगा। इस प्रथम धारणा में और आगे दी जा रही सभी धारणाओं में शाम्भव, शाक्त और आणव उपायों में से किसी एक का सहारा लेकर ही योगी अनुपाय प्रक्रिया में प्रविष्ट होता है या कभी-कभी बिना इनका सहारा लिये भी अपने स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है, इस बात का विशेष विवेचन भी हम वहीं करेंगे। आवश्यकता के अनुसार श्लोकों की व्याख्या के प्रसंग में भी इनका संक्षिप्त उल्लेख हो सकता है ॥२४॥ [ धारणा-२ ] मरुतोऽन्तर्बहिर्वाऽपि वियद्युग्मानि१वर्तनात् । भैरव्या२ भैरवस्येत्थं भैरवि व्यज्यते वपुः ॥२५॥ भैरवि, मरुतः प्राणस्यापानस्य च, अन्तर्बहिश्च यद् वियद्युग्मं हृदाकाशो द्वादशान्तश्च यद् वियद्द्वयम्, ततोऽनिवर्तनात् प्रत्यावर्तनाभावेन क्षणमात्रमन्तर्मुखत्वेना- वस्थानात् प्राणापानयोर्द्वयोरस्तंगतत्वात्, भैरवीस्वरूपस्य भैरवस्य परमात्मनः, वपुः शरीरं स्वरूपमिति यावत्। धर्मिधर्मात्मकत्वेन शिवशक्तिद्वैधं प्रकाशविमर्शस्वरूपं परमार्थत एकमेव तत्त्वं व्यज्यते प्रकाशते, प्रकटीभवति। 'अनुवर्तनात्' इति पाठे अनुन्मेषनिमेषणादित्यर्थः ॥२५॥ हे भैरवि, प्राण और अपान नामक पवन के आधारभूत स्थान आन्तर आकाश हृदय और बाह्य आकाश द्वादशान्त से प्रत्यावृत्ति के अभाव में एक क्षण के लिये उसकी वृत्ति १. ॰नु॰-ख० । २. ॰वं-ख० ।

  1. आगे १५१ संख्या के श्लोक की व्याख्या में इस विषय पर विस्तार से विचार किया जायगा।

img045_1L

२८ : विज्ञानभैरव अन्तर्मुख हो जाती है। तब ऐसी प्रतीति होती है मानों प्राण और अपान कहीं विलीन हो गये हैं। इस स्थिति को इस शास्त्र में 'मध्यदशा' के नाम से जाना गया है, जिसका कि विश्लेषण आगे किया जा रहा है। इस मध्यदशा का जब विकास किया जाता है, तब परा शक्ति भैरवी से अभिन्न रूप में विद्यमान भगवान् भैरव का स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। धर्म और धर्मी के रूप में प्रकाश और विमर्श स्वभाव शिव और शक्ति भिन्न होते हुए भी परमार्थतः एक ही हैं, इसका विवेचन अभी यहीं (१४-२१ श्लोक) किया जा चुका है। 'अनिवर्तनात्' के स्थान पर 'अनुवर्तनात्' ऐसा पाठ भी उपलब्ध होता है। यहाँ अनुवर्तन शब्द का अर्थ प्राण और अपान की उन्मेष और निमेष दशा की स्थिर अनुवृत्ति है। अर्थात् प्राण और अपान की जो स्थिति है, उसी के अनुवृत्त रहने पर, उनमें नये उन्मेष और निमेष व्यापार के न चलने पर, पहली व्याख्या में प्रतिपादित मध्यदशा का अन्वेषण किया जा सकता है। योगशास्त्र¹ की प्रक्रिया के अनुसार इस श्लोक का अभिप्राय यह होगा—सकल², प्रलयाकल प्रभृति सभी प्रमाता जीवों के प्राण की पूरक, कुम्भक और रेचक अवस्थाएँ स्वाभा- विक रूप से बिना प्रयत्न के निरन्तर गतिशील रहती हैं। हृदय स्थित कमलकोश से प्राण का उदय होता है। नासिका मार्ग से बाहर निकल कर यह बारह अंगुल चल कर अन्त में आकाश में विलीन हो जाता है। इसलिए बाह्य आकाश भी योगशास्त्र में द्वादशान्त के नाम से प्रसिद्ध है। प्राण की इस स्वाभाविक बाह्य गति को 'रेचक' नाम से जाना जाता है। बाह्य द्वादशान्त से अपान का उदय होता है और नासिका मार्ग से ही चलकर यह हृदय स्थित कमल- कोश में विलीन हो जाता है। अपान की यह स्वाभाविक आन्तर गति 'पूरक' कही जाती है। प्राण द्वादशान्त में और अपान हृदय में क्षणमात्र के लिये विलीन हो जाता है। यही प्राण की १. शिवोपाध्याय ने इस श्लोक की व्याख्या, विशेष कर आठ प्रकार के प्राणायामों का विवेचन योगवासिष्ठ के आधार पर किया है। योगवासिष्ठ 'मोक्षोपाय' के नाम से भी प्रसिद्ध है। द्रष्टव्य—प्रकरण ६ पूर्वार्ध, २५ वां सर्ग। २. शैव शास्त्रों में प्रमाता के सात भेद माने गये हैं। ये हैं—शिव, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर, मन्त्र, विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल। शिव और शक्ति तत्त्व मिलकर शिव प्रमाता का रूप धारण करते हैं। इसकी स्थिति राजा के समान है। सदाशिव मन्त्रमहेश्वर, ईश्वर मन्त्रेश्वर और शुद्धविद्या मन्त्र के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनकी स्थिति अधिकारी राजपुरुष की सी है। विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल जीवों पर ये शिवप्रमाता रूपी राजा के प्रतिनिधि होकर शासन करते हैं। आणव, मायीय और कार्म—ये तीन प्रकार के मल माने गये हैं। इनमें से एक मल से आवृत विज्ञानाकल, दो मलों से आवृत प्रलयाकल और तीनों मलों से आवृत सकल प्रमाता कहलाते हैं। ये सभी भेद परिमित प्रमाता के हैं। प्रथम चार भेद शुद्ध सृष्टि के और अन्तिम तीन अशुद्ध सृष्टि के अन्तर्गत हैं। अशुद्ध सृष्टि के प्रमाताओं को ही अपने मलीय आवरणों को हटाने के लिए उपायों का सहारा लेना पड़ता है।

img045_2R

विज्ञानभैरव : २९ 'कुम्भक' अवस्था कही जाती है। बाहर और भीतर दोनों स्थानों में निष्पन्न होने से यह बाह्य और आन्तर के भेद से दो तरह की होती है। मनुष्य के श्वास-प्रश्वास की निरन्तर चलने वाली स्वाभाविक प्रक्रिया से निष्पन्न होने वाली इन रेचक, पूरक तथा बाह्य एवं आन्तर कुम्भक अवस्थाओं का निरन्तर सावधानी से निरीक्षण¹ करने वाला योगी फिर आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ता। पातंजल योग में प्राणायाम के अभ्यास से प्राण वायु की गति को नियन्त्रित इसलिये किया जाता है कि उसी अभ्यास की पद्धति से मन को भी नियन्त्रित किया जा सके। सहज योग के प्रतिपादक इस ग्रन्थ में न तो प्राण वायु के और न मन के ही निग्रह के लिये कोई आयास-साध्य उपाय बताया गया है। वायु स्वभाव से ही चल है। चलते-फिरते, सोते-जागते, उठते-बैठते प्राणों की गति निरन्तर चलती रहती है। सकल, प्रलयाकल प्रभृति प्रमाता जीवों में ही नहीं, पशु पक्षी, मृग आदि में भी सदा, सर्वत्र दिन-रात बिना प्रयत्न के स्वाभाविक रूप से आठ प्रकार के प्राणायाम निरन्तर निष्पन्न होते रहते हैं। इन आठ प्रकार के प्राणायामों के स्वरूप को ठीक तरह से जान लेने पर योगी मुक्त हो जाता है। साधक जो कुछ करता है, उन सभी अवस्थाओं में अपने स्वाभाविक बोध से इन कुम्भक प्रभृति प्राण की अवस्थाओं को जानता रहता है, वह अन्तर्मुख हो जाता है, अर्थात् सब कुछ करते हुए भी वह उनमें लिप्त नहीं होता। इन आठ प्राणायामों की स्थिति इस प्रकार है—१. हृदय कमल से प्राण स्वेच्छा से ही बहिर्मुख हो जाता है। यह प्राण की रेचक अवस्था है। २. हृदय से बाहर निकलते समय बारह अंगुल तक प्राण का अंगों से जो स्पर्श होता है, वह पूरक दशा है। ३. पुरुष के प्रयत्न के बिना ही बाहर से अपान के लौटते समय, अंगों में उसके भरते समय जो स्पर्श होता है, उसको भी पूरक ही कहते हैं। ४. अपान के हृदय में आकर विलीन हो जानेपर जब तक प्राण का उदय नहीं होता, तब तक की अवस्था कुम्भक कहलाती है। इस अवस्था का अनुभव केवल योगी को ही हो सकता है। इस तरह प्राण वायु शरीर के बाहर और भीतर निरन्तर स्वाभा- विक रूप से प्राण² के आयाम के अभ्यास में निरत रहता है। प्राण की भांति अपान भी दिन-रात शरीर के भीतर और बाहर चलता हुआ अपान के आयाम के स्वाभाविक अभ्यास

  1. बौद्ध (पालि और संस्कृत) अभिधर्म ग्रन्थों में दस अनुस्मृतियां वर्णित हैं। इनमें अन्तिम अनुस्मृति का नाम आनापान स्मृति है (द्रष्टव्य—अभिधम्मत्थसंगहो ९।८)। इसका संबन्ध प्राण और अपान की इस सूक्ष्म प्रक्रिया से ही है।
  2. "तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः" (२।४९) इस योग-सूत्र और इसके व्यास-भाष्य प्रभृति ग्रन्थों में प्राणायाम शब्द की विस्तृत व्याख्या देखनी चाहिये। संक्षेप में श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना ही प्राणायाम कहलाता है। श्लो० ६६ की व्याख्या में इसका अवयवार्थ स्पष्ट किया गया है। प्राणायाम शब्द की व्याख्या करते हुए आचार्य नरेन्द्रदेव अपने ग्रन्थ 'बौद्ध-धर्म-दर्शन' में आश्वास-प्रश्वास शब्द पर टिप्पणी करते हैं—"विनय की अर्थकथा के अनुसार 'आश्वास' सांस छोड़ने को

img046_1L

३० : विज्ञानभैरव में निरन्तर लगा रहता है। जैसे कि १. उदय के बिना अपान की अन्तर्मुखता बाह्य रेचक के नाम से जानी जाती है। २. अपान के द्वादशान्त से उठ कर स्थूल स्वरूप धारण करने की दशा को बाह्य पूरक कहा जाता है। ३. इसी तरह से द्वादशान्त (बाह्य आकाश) से उठ कर नासिका के अग्रभाग तक की अपान की गति को भी बाह्य पूरक कहा जाता है। ४. बाह्य आकाश (द्वादशान्त) में प्राण के अस्त हो जाने पर जब तक अपान का उदय नहीं हो जाता, तब तक की अवस्था को बाह्य कुम्भक कहा जाता है। अपान की उस समय वैसी ही स्थिति रहती है, जैसी कि मिट्टी में अभी पैदा नहीं हुए घड़े की होती है। इस तरह से प्राण और अपान के पूरण के दो प्रकारों के अनुसार प्राणायाम के आठ भेद होते हैं। इन सभी आठों प्राणायामों को अपना ही स्वरूप समझ कर इनकी भावना करनी चाहिये। हृदय, कण्ठ, तालु, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त में प्राण की गति रहती है और हृदय-कमल, मुख का संकोच-विकास तथा द्वादशान्त अपान की गति के स्थान हैं। इनमें एक क्षण के लिये प्राण के अस्त हो जाने पर और अपान का उदय न होने पर बिना प्रयत्न के बाह्य कुम्भक की प्राप्ति होती है। इसी तरह से एक क्षण के लिये अपान के अस्त हो जाने पर और प्राण का उदय न होने पर बिना प्रयत्न के अन्तः कुम्भक की प्राप्ति होती है। यह 1मध्यदशा ही परम पद कहलाती है। प्राण और अपान की इस मध्यदशा को योगी ही जान सकते हैं। एक 2त्रुटि, लव अथवा क्षण के लिये भी अन्तर्मुख हो जाने पर योगी में इस मध्य- और 'प्रश्वास' सांस लेने को कहते हैं। लेकिन सूत्र की अर्थकथा में दिया हुआ अर्थ इसका ठीक उल्टा है। आचार्य बुद्धघोष विनय की अर्थकथा का अनुसरण करते हैं। उनका कहना है कि बालक माता की कोख से बाहर आता है तो पहले भीतर की हवा बाहर जाती है और पीछे बाहर की हवा भीतर प्रवेश करती है। इस प्रवृत्ति क्रम से 'आश्वास' वह वायु है, जिसका निःसारण होता है। सूत्र की अर्थकथा में किया गया अर्थ पातंजल योगसूत्र के व्यास-भाष्य के अनुसार है (२।४९ पर व्यासभाष्य- “बाह्यस्थवायोरानयनं (चमनं) श्वासः, कोष्ठ्यस्य वायोर्निःसारणं प्रश्वासः)'' (पृ० ८१)। ६६ वें श्लोक की व्याख्या में भी इस तरह का मतभेद देखने में आता है। इस पर उपोद्घात में विचार किया जायगा।

  1. “मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः” और “विकल्पक्षय-शक्तिसंकोचविकास-वाहच्छेदद्यन्त- कोटिनिभालनादय इहोपायाः” (सू० १७-१८) प्रत्यभिज्ञाहृदय के इन दो सूत्रों और उनकी व्याख्या में क्षेमराज ने इस विषय को स्पष्ट रूप से समझाया है।
  2. प्राण के सवा दो अंगुल चलने में जितना समय लगता हैं, उसे 'त्रुटि' कहते हैं। कमल के कोमल पत्तों में तीखी सुई चुभोने पर एक पत्ते को छेदने में जो समय लगता है, उसे 'लव' कहा जाता है। अठारह निमेष (पलक झपने का समय) की एक काष्ठा, तीस काष्ठा की एक कला और तीस कला का एक क्षण होता है। त्रुटि, लव और क्षण की यह परिभाषा क्रमशः तन्त्रसार (अभिनवगुप्त कृत, पृ० ४८), प्रपंचसार (१।३९) और अमर- कोश (१।४।११) में दी गई है।

img046_2R

विज्ञानभैरव : ३१ दशा का आविर्भाव हो जाता है और तब प्राण और अपान की पुनः प्रत्यावृत्ति नहीं होती, अर्थात् वह साधक मुक्त हो जाता है ॥२५॥ [ धारणा-३ ] ¹न व्रजेन्न विशेच्छक्तिर्मरुद्रूपा विकासि¹ते । निर्विकल्पतया मध्ये तया भैरवरूपता² ॥२६॥ मध्ये मध्यनाडीधाम्नि निर्विकल्पतया विकल्पहान्युपायतो विकासिते सति मरु- द्रूपा शक्तिः प्राणात्मिका न व्रजेद् हृदयतो द्वादशान्तं न यायात्, न चापानात्मिका शक्तिः, विशेद् द्वादशान्ताद् हृदयं गच्छेत् । एवंविधया तया प्राणात्मिकया अपाना- त्मिकया वा शक्त्या भैरवरूपता भवेत् भैरवरूपधारी योगी भवति ॥२६॥ वायुरूप यह प्राणात्मक और अपानात्मक शक्ति हृदय से द्वादशान्त तक न तो जायगी और न द्वादशान्त से हृदय की ओर वापस ही लौटेगी, जब कि मध्यनाडी का धाम (स्थान) विकल्पहानि रूप उपाय से विकसित कर दिया जाय, अर्थात् पूर्व श्लोक में प्रतिपादित मध्य- दशा का योगाभ्यास की पद्धति से विकास कर लिया जाय । इसका अभिप्राय यह है— सर्वाः शक्तीश्चेतसा दर्शनाद्याः स्वे स्वे वेद्ये यौगपद्येन विश्वक् । क्षिप्त्वा मध्ये हाटकस्तम्भभूतस्तिष्ठन् विश्वाकार एकोऽवभासि ॥ कक्ष्यास्तोत्र के इस वचन के अनुसार दर्शन आदि सब शक्तियों के समूह को अपने अपने विषय में एक साथ डाल कर, उसके आधार के रूप में— तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् । स्मयमान इवास्ते यस्तस्येयं कुसृतिः कुतः ॥ (श्लो० ११) इस स्पन्दकारिका के श्लोक में प्रतिपादित स्पन्दतत्त्वात्मक अपने स्वभाव को जान कर, निर्विकल्पभाव से निमीलन और उन्मीलन समाधि में एक साथ रहने वाली व्यापक मध्यदशा का सहारा लेकर योगी भैरव मुद्रा में प्रविष्ट हो जाता है । इस मुद्रा का लक्षण यह है— अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिनिमेषोन्मेषवर्जिता । इयं सा भैरवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ इस अवस्था में प्रविष्ट हो जाने पर योगी दर्पण में बनते-बिगड़ते हुए नाना प्रकार के प्रतिबिम्बों की भांति चिदाकाश में उदित और विलीन हो रहे बाह्य पदार्थों और आन्तर भावों को, अर्थात् समस्त विकल्पों को, निमीलन और उन्मीलन ²समापत्ति (समाधि) के बीच १. °स°-ख० । २. °धृत्-ख० तवि०, °धृक्-रप० ।

  1. यह श्लोक स्पन्दनिर्णय (पृ० २४) और तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३३३) में उद्धृत है ।
  2. समाधि के अर्थ में समापत्ति शब्द का प्रयोग बौद्ध साहित्य में भी मिलता है । भैरवी मुद्रा में अन्तर्लीन व्यक्ति की इन्द्रियाँ खुली रहती हैं, तो भी वे अपने विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होतीं। इसी स्थिति को उन्मीलन समाधि कहते हैं। बाह्य और आन्तर इन्द्रियों (करणों) के प्रवाह को रोक कर प्राप्त की गई समाधि को निमीलन समाधि कहते हैं ।

img047_1L

३२ : विज्ञानभैरव में ध्यान रूपी अरणि से जलाई गई ज्ञानाग्नि के द्वारा भस्म कर अपने समस्त करणचक्र (इन्द्रिय समूह) को आलम्बन के अभाव में अक्रम रूप से अपने स्वरूप में ही विस्फारित (विस्तीर्ण) कर लेता है। उस समय ऐसी प्रतीति होती है, मानों ये इन्द्रियां अपने अद्भुत स्वरूप को आँखें फाड़ कर देख रही हों। इस निर्विकल्प अवस्था में प्रवेश कर लेने पर साधक भैरवस्वरूप हो जाता है, अर्थात् उसको अपने स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा हो जाती है, प्राण और अपान की गति के शान्त हो जाने से, हृदय और द्वादशान्त में प्राण और अपान की अस्पन्द अवस्था में स्थिति हो जाने से, मध्यदशा का विकास होने पर साधक अपने भैरवीय स्वरूप को पहचान लेता है, वह साक्षात् भैरव स्वरूप हो जाता है। इसी विषय को अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक में— तद्ध्यानारणिसंक्षोभान्महाभैरववह्न्यभुक् । हृदयाख्ये महाकुण्डे जाज्वलन् स्फीततां व्रजेत् ॥ इत्यादि ग्रन्थ से स्पष्ट किया है। पचीसवें और छब्बीसवें श्लोक में मध्यम धाम (स्थान) का सहारा लेने वाले आणव उपाय का वर्णन है ॥२६॥ [ धारणा-४ ] कुम्भिता रेचिता वापि पूरिता वा यदा भवेत् । तदन्ते शान्तनामासौ शक्त्या शान्तः प्रकाशते ॥२७॥ शास्त्रमार्गानुसारेण रेचिता सती कुम्भिता बहिः, पूरिता वा सती कुम्भिता अन्तः, यदा मरुद्रूपा शक्तिर्भवति, तदा तदन्ते तत्तदभ्यासपरिशीलनेन शान्तवेगानुभवेन प्रशान्तकुम्भकावस्थोदये प्रकाशमात्रावस्थोदये भेदोपशमात् तया शक्त्या शान्तनामा नामरूपातीतः, असौ शान्तः परमस्वभावः प्रकाशतेऽभिव्यक्तो भवति ॥२७॥ योगशास्त्र में उपदिष्ट पूर्वोक्त विधि से बाह्य कुम्भक अवस्था में, अथवा आन्तर कुम्भक अवस्था में प्राण और अपान रूप शक्ति आदरपूर्वक निरन्तर अभ्यास का परिशीलन करने से शान्त हो जाती है, अर्थात् मध्यदशा का विकास हो जाता है। कुम्भक की प्रशान्त अवस्था का उदय होने से सभी भेद विगलित हो जाते हैं और शक्ति भी अपने शान्त स्वरूप में विलीन हो जाती है। तब नाम और रूप से अतीत प्रकाशमात्र अवस्था का उदय होने पर परम शान्तस्वभाव स्वात्मस्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है ॥२७॥ [ धारणा-५ ] १आमूलात् किरणाभासां १सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरात्मिकाम् । चिन्तयेत् तां द्विषट्कान्ते शाम्यन्तीं भैरवोदयः ॥२८॥ १. सूक्ष्मसूक्ष्मत°-त० ।

  1. नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २००) तथा तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ४०१) में यह श्लोक उद्धृत है।

img047_2R

विज्ञानभैरव : ३३ आमूलात् आहृदयाद् जन्माधाराद्वा द्वादशान्तं यावत् किरणाभासां मरीचिरूपां क्रमात्क्रमं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरात्मिकां तनिमानमाश्रयन्तीं तां मरुच्छक्तिं चिन्तयेत् ध्यायेत् । कीदृशीम् ? द्विषट्कान्ते द्वादशान्ते शाम्यन्तीम् । एवं सुसूक्ष्मतमस्यापि ध्येयाकारस्य गलनाद् भैरवोदयो भैरवस्वरूपाविर्भावः, भवेदिति शेषः ॥२८॥ हृदय से अथवा मूलाधार से लेकर द्वादशान्त तक चन्द्र और सूर्य के समान अपनी किरणों से भासित हो रही तथा क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था की ओर अग्रसर हो रही उस पवन की शक्ति का चिन्तन करे, जो कि द्वादशान्त में जाकर शान्त हो जाती है, नाम और रूप से अतीत अवस्था को प्राप्त कर लेती है । इस प्रकार के अभ्यास से अत्यन्त सूक्ष्म ध्येय के आकार के भी विगलित हो जाने पर योगी भैरव स्वरूप हो जाता है, अर्थात् उसकी स्वाभाविक भैरव दशा का आविर्भाव हो जाता है । नेत्रतन्त्र (८।४१) की टीका में क्षेमराज ने तथा तन्त्रालोक (५।८९-९१) की टीका में जयरथ ने इस श्लोक को उद्धृत कर जो विवरण प्रस्तुत किया है, तदनुसार यहाँ द्वादशान्त पद से ब्रह्मरन्ध्र का ग्रहण किया जाना चाहिये । मूलाधार में अथवा हृदय में विद्यमान प्राण शक्ति यौगिक पद्धति के अनुसार सुषुम्णा मार्ग से अथवा मध्यदशा के विकास के कारण ब्रह्मरन्ध्र तक जाते जाते अत्यन्त सूक्ष्म होकर अन्त मे प्रकाश में विलीन हो जाती है ॥२८॥ [ धारणा-६ ] ¹उद्गच्छन्तीं तडिद्रूपां प्रतिचक्रं क्रमात्क्रमम् । ऊर्ध्वं मुष्टित्रयं यावत् तावदन्ते महोदयः ॥२९॥ तामेत शक्तिं तडिद्रूपां विद्युद्वत् चलद्दीप्त्योज्ज्वलां प्रतिचक्रं कन्दादिब्रह्मरन्धा- न्तचक्रेभ्यः क्रमात्क्रमम् उद्गच्छन्तीमुल्लसन्तीं चिन्तयेत्, यावत् परं विश्वपूरकमूर्ध्वं मुष्टित्रयं द्वादशान्तधाम तावत् । अन्ते महोदयः महाभैरवैकात्मतोदयः, अहमेव महाभैरव इत्यवमर्शः स्यादेव ॥२९॥ इसी विद्युतस्वरूप, बिजली के समान एकाएक चमकने वाली शक्ति का प्रत्येक चक्र में, कन्द से लेकर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त क्रमशः ऊपर उठती हुई अवस्था में चिन्तन करे । इससे ²मुष्टित्रय परिमित द्वादशान्त धाम में परम उत्कृष्ट विश्वपूरक, सारे विश्व को अपने प्रकाश से भर देने वाला, महाभैरव का स्वरूप प्रकाशित हो उठता है । इसी बात को तन्त्रालोक में इस प्रकार से कहा गया है— अधःप्रवाहसंरोधादूर्ध्वक्षेपविवर्जनात् । महाप्रकाशमुदयज्ञानव्यक्तिप्रदायकम् ॥ अनुभूय परे धाम्नि मात्रावृत्त्या पुरं विशेत् । (५।८८-८९) १. यह श्लोक तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३९७) में उद्धृत है । २. एक मुट्ठी का परिमाण चार अंगुल माना गया है । तीन मुट्ठी, अर्थात् बाहर अंगुल । इस तरह से मुष्टित्रय शब्द यहाँ द्वादशान्त के अर्थ में प्रयुक्त है ।

img048_1L

३४ : विज्ञानभैरव इसका अभिप्राय यह है कि प्राण और अपान की गति को रोक कर मध्यदशा का विकास कर उससे उत्पन्न शक्ति की सहायता से ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश पाकर योगी परम प्रकाश- मय स्थिति में अवस्थित हो जाता है ॥२९॥ [ धारणा-७ ] क्रमद्वादशकं सम्यग् द्वादशाक्षरभेदितम् । स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या मुक्त्वा मुक्त्वा¹ऽन्ततः शिवः ॥३०॥ जन्माग्र-मूल-कन्द-नाभि-हृत् - कण्ठ-तालु-भ्रूमध्य - ललाट-ब्रह्मरन्ध्र-शक्ति-व्यापि- न्याख्यं यत्क्रमाणां चक्राणां द्वादशकं द्वादशस्थाननामभिः प्रसिद्धम्, तत् सम्यगिति यथा- यथं क्रमेण अकारादिविसर्गान्तैः षण्ढस्वरवर्जैर्द्वादशाक्षरैः, भेदितं रञ्जितम्, ध्यायेदिति शेषः । तच्च प्रत्येकं स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या आदौ ध्यानेन स्फुटं ततश्च स्पन्दमानं ततोऽपि ज्योतीरूपतां प्राप्तं स्थूलं सूक्ष्मं परमित्यभिधीयते । इति सोपानपदक्रमं मुक्त्वा मुक्त्वा परित्यज्य, अन्ततोऽन्ते, शिवः परमार्थतः सर्वत्रावभासकः स्वात्मस्वरूपः शिव एव भवति ॥३०॥ जन्माग्र, मूल, कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र, शक्ति, व्यापिनी ये बारह चक्र, जो कि द्वादश स्थान के नाम से प्रसिद्ध हैं, क्रमशः एक दूसरे के ऊर्ध्व स्थान में स्थित हैं । इन चक्रों के स्थान और स्वरूप को ठीक तरह से समझ कर उनमें अकार से लेकर विसर्ग पर्यन्त स्वरों का ध्यान करना चाहिये । तन्त्रशास्त्र में ऋ ॠ लृ लॄ ये चार स्वर षण्ढ (नपुंसक) कहे गये हैं, अतः ध्यान आदि में इनका उपयोग नहीं किया जाता । सोलह स्वरों में से इन चार षण्ढ स्वरों को निकाल देने पर इनकी संख्या भी बारह रह जाती है । अतः इन बारह स्वरों का क्रमशः उक्त बारह चक्र स्थानों में ध्यान करना चाहिये । यह ध्यान स्थूल, सूक्ष्म और पर पद्धति से त्रिविध¹ उपाय के रूप में मृत्युंजयभट्टारक (नेत्रतन्त्र) के ६-८ अधि- कारों में विस्तार से वर्णित है । योगी जब अपने दृढ़ संकल्प से इन ध्यानों का अभ्यास करते हुए स्पष्ट स्थूल वस्तु के ध्यान को छोड़ कर स्पन्दावस्था में विद्यमान सूक्ष्म वस्तु के ध्यान में और सूक्ष्म ध्यान को छोड़कर ज्योतिर्मय पर वस्तु के ध्यान में प्रविष्ट होता है, तो अन्ततः इस अभ्यास-पद्धति से वह परमार्थ रूप से सर्वत्र प्रकाशित हो रहे कल्याणमय स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, अर्थात् स्वयं शिव बन जाता है ॥३०॥ [ धारणा-८ ] तया²ऽऽपूर्याशु मूर्धान्तं भङ्क्त्वा भ्रूक्षेपसेतुना । निर्विकल्पं मनः कृत्वा सर्वोर्ध्वे सर्वगोद्गमः ॥३१॥ १. ˚क्त्वा त˚-ख० । २. ˚था˚-ख० ।

  1. याग, होम, जप, ध्यान, मुद्रा, यन्त्र, मन्त्र—ये सब स्थूल उपाय हैं । षट्चक्र, षोडश आधार आदि में प्राण-चार की भावना को सूक्ष्म उपाय बताया गया है । अष्टांग योग के अभ्यास से प्राप्त होने वाली सर्वात्मभाव की स्थिति को पर उपाय माना गया है ।

img048_2R

विज्ञानभैरव : ३५ तया जन्मादिचक्राक्रमणशक्त्या प्राणाख्यया मूर्धान्तं द्वादशान्तमापूर्य, तथा तमेव द्वादशान्तं भ्रूक्षेपसेतुना भ्रूभेदनक्रमेण सेतुनेव वारिप्रवाहं गुरूपदेशयुक्त्या भङ्क्त्वा, तदन- न्तरं मनो निर्विकल्पं त्यक्तचापलं कृत्वा विधाय, सर्वोर्ध्वे द्वादशान्तादप्युपरि परमाकाशे सर्वगोद्गमः सर्वव्यापकताप्रादुर्भावः स्यात् ॥३१॥ पूर्व श्लोक में प्रतिपादित जन्माग्र प्रभृति बारह चक्रों का भेदन करने वाली प्राण-शक्ति से मूर्धान्त, अर्थात् द्वादशान्त को भर कर तथा उस द्वादशान्त को भ्रूक्षेप के सेतु से, अर्थात् भ्रूभेद के क्रम से, जैसे पुल (सेतु) की सहायता से नदी आदि के पानी को पार किया जाता है, उसी तरह गुरु के द्वारा उपदिष्ट युक्ति से पार कर और इसके बाद मन को निर्विकल्प, निश्चल, स्थिर बना कर द्वादशान्त के भी ऊपर स्थित सबसे ऊपर वाले स्थान परमाकाश में जब योगी पहुँचता है, उस समय उसमें सर्वव्यापकता का उद्गम हो जाता है, अर्थात् वह सर्वव्यापक पर- भैरव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है ॥३१॥ [ धारणा-९ ] १शिखिपक्षैश्चित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपञ्चकम्२ । ध्यायतोऽनुत्तरे शून्ये प्रवेशो३ हृदये भवेत् ॥३२॥ यथा हि शिखिपक्षैर्मयूरपुच्छैः, चित्ररूपैरनेकवर्णैः, मण्डलैश्चन्द्रकैः, शून्यपञ्चक- मूर्ध्वाधोमध्यपार्श्वद्वयस्थितमिव पञ्चेन्द्रियमण्डलैश्चित्रवद्भासमानस्य जगतो शून्यपञ्चकरूपत्वं हृदये ध्यायतः, अनुत्तरे शून्ये परमाकाशे परमधामनि प्रवेशः समावेशो भवेत् । गन्धर्वनगरतुल्यं चित्रमिवेदमिति निश्चयेन परमार्थसिद्धिः स्यादेवेति भावः । शिखिपक्षचित्ररूपैरिति पाठे त्वयमर्थः—शिखिपक्षवच्चित्ररूपैः रूपरसादिग्रहणानानारूपै- मण्डलैः । मण्डं रससारं लान्तीदृंशि मण्डलानीन्द्रियाणि तैः । शून्यपञ्चकं तन्मात्रत्वे- नाव्यक्तत्वात् शून्यरूपं विषयपञ्चकं शब्दादिरूपं ध्यायतोऽनुत्तरे शून्ये भैरवरूपे प्रवेशः समावेशो भवेदिति ॥३२॥ जैसे चित्र-विचित्र चन्द्रकों से देदीप्यमान मोर के पंखों में पाँच शून्य दिखाई पड़ते हैं, इनकी स्थिति ऊपर, नीचे, मध्य तथा दोनों पार्श्वों में होती है, इसी तरह पाँच इन्द्रिय- मण्डलों से चित्र-विचित्र रूप में प्रतीत हो रहे इस जगत् के प्रति अपने हृदय में पाँच इन्द्रियों के विषयों के स्थान पर पाँच शून्यों की भावना करने पर योगी का अनुत्तर शून्य, अर्थात् परम आकाश में समावेश हो जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि योगी को अपने इन्द्रिय- मण्डल की सहायता से यह जगत् मयूर के पंख के समान नाना वर्णों से चित्रित चित्र के समान विविध रूपों में भासित होता है । यह आभास शून्य-स्वरूप है, यह सब गन्धर्व- नगर के समान अथवा चित्र के समान कल्पना का व्यापार मात्र है, ऐसी भावना करने पर १. °पिच्छचि°-योक०, °पक्षचि°-योख० । २. °ष्ट्ककम्-योख० । ३. परं व्योमतनुर्भ°-योख० ।

  1. योगिनीहृदयदीपिका (पृ० ३१९) में यह श्लोक मिलता है ।

img049_1L

३६ : विज्ञानभैरव निश्चय ही परमार्थ की प्राप्ति हो जाती है। कहीं कहीं 'शिखिपक्षचित्ररूपैः' ऐसा पाठ मिलता है। इसका अभिप्राय यह है कि रूप, रस आदि विविध विषयों के ग्राहक इन्द्रियों का मण्डल इस लिये है कि ये उन-उन विषयों के सार को लाकर चित्त को समर्पित करती हैं। तन्मात्रा- वस्था में अव्यक्त, अर्थात् शून्य रूप से अवस्थित इन शब्द आदि पाँच विषयों का हृदय में ध्यान करने वाले योगी का अनुत्तर शून्य भैरव रूप में प्रवेश अर्थात् ¹समावेश हो जाता है। योगिनीहृदयदीपिका के रचयिता अमृतानन्द योगी ने शून्यषट्क की व्याख्या करते हुए इस श्लोक को उद्धृत किया है। योगिनीहृदय में 'ह्रीं' इस बीजाक्षर में छः शून्यों की भावना का उपदेश है। प्रणव आदि में भी यह भावना की जा सकती है। 'ह्रीं' बीज में हकार और मायाक्षर (ईकार) के बीच में रेफ की, मायाक्षर और अर्धचन्द्र के बीच में बिन्दु की, अर्धचन्द्र और नाद के बीच में रोधिनी की, नाद और शक्ति के बीच में नादान्त की, शक्ति और समना के बीच में व्यापिका की और समना के ऊपर उन्मनी की शून्य के रूप में भावना करनी चाहिये। इनमें से प्रथम पाँच शून्यों की भावना मयूर के पंख में विद्यमान चन्द्रक के सदृश करनी चाहिये। अन्ततः जब योगी उन्मना नामक षष्ठ शून्य में प्रविष्ट होता है, तब वह परमाकाश में लीन हो जाता है ॥३२॥ [ धारणा-१० ] ईदृशेन क्रमेणैव यत्र ¹कुत्रापि चिन्तना² । शून्ये कुड्ये परे पात्रे स्वयंलीना वरप्रदा ॥३३॥ ईदृशेन क्रमेण हानादानरूपेण गुदाधार-जन्म-कन्द-नाभि-हृदय-कण्ठ-तालु- भ्रूमध्य-ललाट-ब्रह्मरन्ध्र-शक्ति-व्यापिन्यन्तं यत्र कुत्रापि स्वात्मनोऽन्यत्र स्वात्मवत् परत्रापि व्योम्नि प्राकारभाजनादौ, यद्वा परे पात्रे निर्मलचित्ते शिष्यादौ, चिन्तना स्मरणा, स्वयंलीना अहर्निशं स्वदेहान्तः क्रमद्वादशकारोहणगाढतरध्यानावमर्शबलात् स्वयमेव लीना सती, वरप्रदा भवेत् परप्रकाशोदयात्मकोत्कृष्टवस्तुप्रदायिनी भवति। चिन्तनादिति पाठे तु पूर्वोक्तां मरुच्छक्तिं प्रथमान्तत्वेन विपरिणमय्य सा मण्डूकप्लुत्या- ऽनुवर्तनीया, तेन चिन्तनाद् हेतोर्मरुच्छक्तिः शून्ये बाह्ये कुड्यादौ वा स्वयंलीना सती वरप्रदेत्यन्वयः। बाह्यशून्यकुड्यादिकेऽपि स्वात्मवपुषीव प्राणशक्तिक्रमद्वादशकं चिन्तनीयम्, यत्र तत्र परपदपरामर्शैक्यभावेनाहंरूपतादात्म्याभिमानः स्यादिति तात्पर्यम् ॥३३॥ १. य°-ख०। २. °नात्-कटी०, °येत्-ख०।

  1. समावेश, समापत्ति, समाधि—ये सब शब्द पर्यायवाची हैं। समावेश दशा में व्यक्ति अपने बाह्य स्वरूप को भूल जाता है और अपने इष्टदेव के स्वरूप में समाविष्ट ( लीन ) हो जाता है। समावेश का लक्षण और उसके भेदों का, विशेष कर शाम्भव, शाक्त और आणव समावेशों का, निरूपण तन्त्रालोक के प्रथम आह्निक (पृ० २०५-२५५) में विस्तार से मिलता है।

img049_2R

विज्ञानभैरव : ३७ इसी क्रम से गुदाधार, जन्म, कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र, शक्ति और व्यापिनी में से किसी को छोड़ते और किसी को पकड़ते हुए, अथवा जहाँ कहीं भी अपने शरीर के सिवाय दूसरे के शरीर में भी इसी प्रकार चिन्तन करते हुए, अथवा अपने शरीर के सिवाय अन्यत्र आकाश, प्राकार (परकोटा), पात्र आदि में, अथवा परपात्र, अर्थात् निर्मल मन वाले शिष्य के चित्त में चिन्तन-स्मरण की प्रक्रिया से रात-दिन इस द्वादश क्रम के आरोहण की पद्धति का दृढ़तापूर्वक अभ्यास करने से साधक की स्मृति स्वयं विलीन होकर वरदात्री बन जाती है, अर्थात् परम प्रकाश के उदय के रूप में उत्कृष्ट वस्तु को देने वाली होती है। इसी बात को अभिनवगुप्त ने अपने परमार्थसार में इस तरह से बताया है— सर्वोत्तीर्णं रूपं सोपानपदक्रमेण संश्रयतः । परतत्त्वरूढिलाभे पर्यन्ते शिवमयीभावः ॥ (९७ श्लो०) अर्थात् कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, बिन्दु, नाद, शक्ति ये सब परतत्त्व तक पहुँचने के लिए सीढ़ी का काम करते हैं। धीरे-धीरे एक सीढ़ी को छोड़कर दूसरी पर चढ़ते हुए अन्त में जैसे व्यक्ति गन्तव्य स्थान तक पहुँच जाता है, उसी तरह से इनमें से भी एक को छोड़ कर दूसरे को पकड़ते हुए योगी अन्त में सर्वोत्तीर्ण रूप में, सबसे उत्कृष्ट अवस्था में पहुँच जाता है, अर्थात् वह स्वयं शिवमय हो जाता है। 'चिन्तनात्' ऐसा पाठ मानने पर पूर्व श्लोकों में वर्णित द्वितीयान्त मरुच्छक्ति पद को प्रथमा विभक्ति में बदल कर ¹मण्डूक-प्लुति न्याय से उसकी यहाँ अनुवृत्ति की जाती है। इससे यह अर्थ होगा कि चिन्तन के कारण मरुच्छक्ति शून्य में अथवा बाहर स्थित भित्ति आदि में स्वयं लीन होकर वरप्रदात्री बन जाती है। इसका तात्पर्य यह है कि बाह्य शून्य, कुड्य (भित्ति) आदि में भी अपने शरीर के समान ही प्राणशक्ति के उक्त बारह सोपानों का क्रमशः चिन्तन करना चाहिये । इस प्रक्रिया से अपने शरीर के सिवाय अन्यत्र भित्ति आदि में अथवा पर पात्र में ध्यान को स्थिर करने से योगी की एकाग्रता की भावना जब दृढ़ हो जाती है, तो यह मरुच्छक्ति वहीं अपने आप लीन हो जाती है। तब परम पद के परामर्श से उसके साथ स्वात्मस्वरूप की तादात्म्य भावना, अर्थात् मैं वही हूँ इस प्रकार की

  1. मण्डूक-प्लुति न्याय पाणिनि व्याकरण में प्रसिद्ध है । वहाँ आगे के सूत्रों में पूर्व सूत्रों के कुछ पदों की अनुवृत्ति की जाती है। यह अनुवृत्ति प्रायः निरन्तर चलती है। कभी-कभी आवश्यकता के अनुसार बीच के किसी सूत्र में किसी पद की अनुवृत्ति न होने पर भी आगे के सूत्र में उसकी अनुवृत्ति कर ली जाती है। ऐसे ही स्थलों में मण्डूक-प्लुति न्याय प्रवृत्त होता है। मेढक जैसे कूद कर चलता है, उसी तरह आवश्यक पद की अनुवृत्ति भी बीच के सूत्र या सूत्रों को कुदा कर की जातो है। प्रस्तुत स्थल में २८वें श्लोक में पठित द्वितीयान्त मरुच्छक्ति शब्द की आवृत्ति इसी न्याय से की जाती है और उसको प्रथमान्त पद में बदल लिया जाता है।