भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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२२ : विज्ञानभैरव हे प्रिये, यथा दीपस्य शिखात्मन आलोकेन प्रकाशेन, भास्करस्य च किरणैः मरीचिभिरेवात्मीयैः, दिग्विभागसंनिवेशादि ज्ञायते, तद्वत् स्फुरत्तारूपया स्वशक्त्यैव शिवः स्वात्मा ज्ञायते प्रत्यभिज्ञायते ॥२१॥ इसी विषय को दो अन्य स्पष्ट उदाहरणों की सहायता से समझाया जाता है—हे प्रिये, जैसे दीपक की अपनी लौ के प्रकाश से और सूर्य की ही किरणों से सारी दिशाएँ और उनमें विद्यमान सभी वस्तुएँ जानी जाती हैं, उसी तरह से स्फुरत्ता¹ स्वरूप अपनी शक्ति से ही स्वात्मस्वरूप शिव का लाभ, अवभास अर्थात् प्रत्यभिज्ञा (पहचान) हो जाती है। इसका अभिप्रायः यह है कि जैसे दीपक की लौ दीपक से भिन्न नहीं है, सूर्य की किरणें सूर्य से भिन्न नहीं हैं, उसी तरह शक्ति भी शिव से भिन्न नहीं है। दीपक की लौ से और सूर्य की किरणों से जैसे दिग्विभाग (भिन्न-भिन्न दिशा) आदि का ज्ञान होता है, उसी तरह से शक्ति की सहायता से इस जागतिक प्रपंच का ज्ञान होता है। जैसे दीपक को देखने के लिए दूसरे दीपक की और सूर्य के लिए दूसरे सूर्य की आवश्यकता नहीं रहती, किन्तु अपनी ही लौ और अपनी ही किरणों से जैसे ये भासित होते हैं, उसी तरह से अपनी इस शक्ति की सहायता से ही अपना यह स्वरूप पहचान लिया जाता है ॥२१॥ श्रीभैरवी¹ उवाच देवदेव त्रिशूलाङ्क कपालकृतभूषण । दिग्देशकालशून्या च व्यपदेशविवर्जिता ॥२२॥ याऽ²वस्था भरिताकारा भैरवस्योपलभ्यते । कैरुपायैर्मुखं तस्य³ परा देवी कथं भवेत् ॥ यथा सम्यगहं वेद्मि तथा मे⁴ ब्रूहि भैरव ॥२३॥ १. °देवी-क० । २. शक्तिर्भ°-ख० । ३. °स्याः-ख० । ४. ब्रूहि मम प्रभो-ख० ।

  1. बीज से जैसे अंकुर स्फुरित होता है, उसी तरह से शिव से यह सारा जगत् निकलता है। बीज मिट्टी-पानी आदि सहकारी कारणों का संयोग होने पर ही प्रस्फुटित होता है। सहकारी कारणों के सम्पर्क में आने के साथ ही बीज में स्पन्दन होने लगता है और वह अंकुर के रूप में परिणत हो जाता है। किन्तु शिव को किसी सहकारी कारण की आवश्यकता नहीं पड़ती। स्वेच्छा से जब उसमें स्पन्दन होने लगता है, तो वह अपनी इस स्पन्द शक्ति के माध्यम से जगत् के रूप में परिणत होता है। इसी व्यापार को स्फुरत्ता कहते हैं। यह स्फुरत्ता जैसे शिव को परिमित प्रमाता बना देती है, उसी तरह से स्वात्मस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा भी इस स्फुरत्ता शक्ति से ही निष्पन्न होती हैं। “सा स्फुरत्ता महासत्ता” (१.५.१४) इस प्रत्यभिज्ञाकारिका में स्फुरत्ता को ही महासत्ता, स्पन्दतत्त्व आदि नामों से जाना गया है।