विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : २१ पराशक्तिरूपामवस्थां यदा प्रविशति वक्ष्यमाणोपायैः समाविशति उपदेश्योऽणुः, तदास्य निर्विभागेन भावना भवति, शक्तेः शिवावेशात् । तदा स लब्धशाक्तबलः प्रशस्ततमशिवस्वरूपो भवत्येव, यत् शिवस्येयं शैवी शक्तिः, मुखं प्रवेशोपायद्वारमिहा- गमेषूच्यते । यथा हि वक्त्रेणैवायमिति लभ्यते, तथा शक्त्यैव शिवोऽयमिति व्यपदेश इति भावः ॥२०॥ शक्ति के माध्यम से पर भैरव के स्वरूप का ज्ञान किस तरह से होता है, इस बात को उदाहरण देकर समझाया जा रहा है कि आगे बताए गए उपायों से यह उपदेश का पात्र जीव जब परा शक्ति स्वरूप अवस्था में प्रवेश पाता है, उसके साथ एकाकार हो जाता है, तब उसमें निर्विभाग भावना उत्पन्न होती है, अर्थात् शक्ति और शिव में उसकी विभाग-दृष्टि, भेद-दृष्टि लुप्त हो जाती है । उस समय शाक्त बल की उपलब्धि के कारण साधक शिव- स्वरूप हो जाता है, क्योंकि आगमों का कहना है कि शिव की यह शैवी शक्ति शिव के उस परम सुन्दर स्वरूप में प्रवेश पाने का द्वार है । जैसे मुंह देखने से किसी व्यक्ति की पहचान होती है, उसी तरह शक्ति को देखकर अर्थात् परा शक्ति को जानकर उसके माध्यम से शिव को पहचाना जाता है । इसलिए यह शैवी शक्ति शिव का मुख कहलाती है । इस शक्ति के बिना शिव में नाम, धाम आदि की कल्पना नहीं की जा सकती । जैसा कि वामकेश्वरतन्त्र (नित्याषोडशिकार्णव) में कहा गया है— शक्त्या बिना शिवे सूक्ष्मे नाम धाम न विद्यते (४।७) । इस पूरे ग्रन्थ का अभिप्राय यह है कि परा शक्ति की सहायता से ही व्यक्ति शक्ति और शिव में अभिन्नता देख पाता है कि वस्तुतः इनका स्वरूप एक ही है । जब यह अभेद- बोध जाग उठता है, तब परावस्था ही बच रहती है, शिव और शक्ति उसी में विलीन हो जाते हैं । इस स्थिति को यहां बोध(विज्ञान)भैरव दशा कहा गया है ॥२०॥ ¹यथाऽऽलोकेन दीपस्य किरणैर्भास्करस्य च¹ । ज्ञायते दिग्विभागादि तद्वच्छक्त्या शिवः² प्रिये³ ॥२१॥ १. वा-ख० स्व० त० । २. ॰वस्य च-ख० । ३. श्रितः-स्व० । आ० १, पृ० ७, ११५; भा० २, आ० ३, पृ० १७१, १८८; भा० ४, आ० ६, पृ० २०३; भा० ११, अ० २९, पृ० १६३), स्पन्दकारिकाविवृति (पृ० ५४), नेत्रतन्त्रो- द्योत (भा० १, पृ० २०, १९२), ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० १, पृ० २८७), स्वच्छन्दोद्योत (भा० २, प० ४, पृ० १८७; भा० ५B, प० १०, पृ० ५३४), महार्थ- मंजरीपरिमल (पृ० ९६) में देखा जाता है ।
- यह श्लोक स्वच्छन्दतन्त्र (भा० २, प० ४, पृ० २१२) की टीका में क्षेमराज द्वारा तथा तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० २२९) में जयरथ द्वारा उद्धृत है ।