भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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२० : विज्ञानभैरव यहाँ शंका उठती है कि भैरव की ऊपर बताई गई यह अवस्था जब उसका स्वरूप ही है, काल आदि से परिच्छिन्न कोई दशाविशेष नहीं, तो ऐसी अवस्था में भैरव ही भैरवी कहलावेगा ? इस आपत्ति को स्वीकार करते हुए भैरव कहते हैं कि यह बात सही है कि भैरव की यह परावस्था उसका स्वरूप ही है । शक्तिस्वरूप यह परावस्था शक्तिमान् भैरव से अभिन्न है । शक्ति सामर्थ्य को कहते हैं । यह सामर्थ्य सारे जगत् का निर्माण करने वाले भैरव का ही स्वरूप है । शक्ति और शक्तिमान् में सदा अभेद माना जाता है, अतः शक्तिमान् भैरव से संबद्ध सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता, सर्वात्मता प्रभृति धर्मों से संवलित होने से धर्मिणी यह शक्ति चिदानन्दघनस्वरूप पर आत्मा (भैरव) से अभिन्न होने से परा (भैरवी) कहलाती है ॥१८॥ न¹ वह्नेर्दाहिका शक्तिर्व्यतिरिक्ता विभाव्यते । केवलं ज्ञानसत्तायां² प्रारम्भोऽयं प्रवेशने ॥१९॥ यथा वह्नेर्दाहिका शक्तिस्ततो व्यतिरिक्ता भिन्ना न विभाव्यते विचार्यापि नोपलभ्यते, तथेयं परा शक्तिरपि शक्तिमतो भैरवान्नैव कदाचिद् भिन्ना प्रतिभाति । केवलं ज्ञानसत्तायां वह्नि जिज्ञासाोर्वह्निज्ञप्तौ यत् प्रवेशनं तत्र, अयमिति दाहशक्त्यात्मा वह्निस्वभावः प्रारम्भः, तन्मुखेन पाचकत्वाद्यनन्तशक्त्यात्मकशक्तिमत्स्वरूपावगतेः । तथेयं परा शक्तिरपि भवति । तन्मुखेन हि भैरवसांमुख्यं स्यादिति भावः ॥१९॥ इस बात को दृष्टान्त देकर समझाते हैं कि जैसे आग से उसकी दाहिका शक्ति, जलाने की ताकत, विचार पूर्वक देखने पर भी कभी अलग नहीं होती, उसी तरह से यह परा शक्ति भी शक्तिमान् परभैरव से कभी जुदी नहीं दिखाई पड़ती । यह शक्ति तो शक्ति- मान् की सत्ता की जानकारी और उसके वास्तविक स्वरूप में प्रवेश पाने के प्राथमिक उपाय के रूप में वर्णित है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे यदि किसी को आग का स्वरूप जानने की इच्छा है तो वह उसकी दाह शक्ति के पास जाता है और सब से पहले उसकी जलाने की ताकत को पहचानता है, बाद में अग्नि के पाचकत्व आदि अनन्त व्यापारों को भी समझ लेता है, उसी तरह इस शक्ति के माध्यम से ही उस परभैरव के स्वरूप का ज्ञान कराने वाले मार्ग में प्रवेश पाया जा सकता है ॥१९॥ ²शक्त्यवस्थाप्रविष्टस्य निर्विभागेन भावना । तदासौ शिवरूपी स्यात् शैवी मुखमिहोच्यते ॥२०॥ १. ॰याः-ई० । २. ॰स्यां-स्प० ।

  1. इस श्लोक को अभिनवगुप्त ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० १, पृ० २८७) में उद्धृत किया है ।
  2. स्पन्दनिर्णय (पृ० ७२) और शिवस्तोत्रावली की व्याख्या (पृ० ६४) में क्षेमराज द्वारा यह पूरा श्लोक उद्धृत है । इसके अतिरिक्त इस श्लोक का "शैवी मुखमिहो- च्यते" इतना अंश शिवस्तोत्रावलीव्याख्या (पृ० ११०), तन्त्रालोकविवेक (भा० १,