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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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३६ : विज्ञानभैरव निश्चय ही परमार्थ की प्राप्ति हो जाती है। कहीं कहीं 'शिखिपक्षचित्ररूपैः' ऐसा पाठ मिलता है। इसका अभिप्राय यह है कि रूप, रस आदि विविध विषयों के ग्राहक इन्द्रियों का मण्डल इस लिये है कि ये उन-उन विषयों के सार को लाकर चित्त को समर्पित करती हैं। तन्मात्रा- वस्था में अव्यक्त, अर्थात् शून्य रूप से अवस्थित इन शब्द आदि पाँच विषयों का हृदय में ध्यान करने वाले योगी का अनुत्तर शून्य भैरव रूप में प्रवेश अर्थात् ¹समावेश हो जाता है। योगिनीहृदयदीपिका के रचयिता अमृतानन्द योगी ने शून्यषट्क की व्याख्या करते हुए इस श्लोक को उद्धृत किया है। योगिनीहृदय में 'ह्रीं' इस बीजाक्षर में छः शून्यों की भावना का उपदेश है। प्रणव आदि में भी यह भावना की जा सकती है। 'ह्रीं' बीज में हकार और मायाक्षर (ईकार) के बीच में रेफ की, मायाक्षर और अर्धचन्द्र के बीच में बिन्दु की, अर्धचन्द्र और नाद के बीच में रोधिनी की, नाद और शक्ति के बीच में नादान्त की, शक्ति और समना के बीच में व्यापिका की और समना के ऊपर उन्मनी की शून्य के रूप में भावना करनी चाहिये। इनमें से प्रथम पाँच शून्यों की भावना मयूर के पंख में विद्यमान चन्द्रक के सदृश करनी चाहिये। अन्ततः जब योगी उन्मना नामक षष्ठ शून्य में प्रविष्ट होता है, तब वह परमाकाश में लीन हो जाता है ॥३२॥ [ धारणा-१० ] ईदृशेन क्रमेणैव यत्र ¹कुत्रापि चिन्तना² । शून्ये कुड्ये परे पात्रे स्वयंलीना वरप्रदा ॥३३॥ ईदृशेन क्रमेण हानादानरूपेण गुदाधार-जन्म-कन्द-नाभि-हृदय-कण्ठ-तालु- भ्रूमध्य-ललाट-ब्रह्मरन्ध्र-शक्ति-व्यापिन्यन्तं यत्र कुत्रापि स्वात्मनोऽन्यत्र स्वात्मवत् परत्रापि व्योम्नि प्राकारभाजनादौ, यद्वा परे पात्रे निर्मलचित्ते शिष्यादौ, चिन्तना स्मरणा, स्वयंलीना अहर्निशं स्वदेहान्तः क्रमद्वादशकारोहणगाढतरध्यानावमर्शबलात् स्वयमेव लीना सती, वरप्रदा भवेत् परप्रकाशोदयात्मकोत्कृष्टवस्तुप्रदायिनी भवति। चिन्तनादिति पाठे तु पूर्वोक्तां मरुच्छक्तिं प्रथमान्तत्वेन विपरिणमय्य सा मण्डूकप्लुत्या- ऽनुवर्तनीया, तेन चिन्तनाद् हेतोर्मरुच्छक्तिः शून्ये बाह्ये कुड्यादौ वा स्वयंलीना सती वरप्रदेत्यन्वयः। बाह्यशून्यकुड्यादिकेऽपि स्वात्मवपुषीव प्राणशक्तिक्रमद्वादशकं चिन्तनीयम्, यत्र तत्र परपदपरामर्शैक्यभावेनाहंरूपतादात्म्याभिमानः स्यादिति तात्पर्यम् ॥३३॥ १. य°-ख०। २. °नात्-कटी०, °येत्-ख०।

  1. समावेश, समापत्ति, समाधि—ये सब शब्द पर्यायवाची हैं। समावेश दशा में व्यक्ति अपने बाह्य स्वरूप को भूल जाता है और अपने इष्टदेव के स्वरूप में समाविष्ट ( लीन ) हो जाता है। समावेश का लक्षण और उसके भेदों का, विशेष कर शाम्भव, शाक्त और आणव समावेशों का, निरूपण तन्त्रालोक के प्रथम आह्निक (पृ० २०५-२५५) में विस्तार से मिलता है।

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विज्ञानभैरव : ३७ इसी क्रम से गुदाधार, जन्म, कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र, शक्ति और व्यापिनी में से किसी को छोड़ते और किसी को पकड़ते हुए, अथवा जहाँ कहीं भी अपने शरीर के सिवाय दूसरे के शरीर में भी इसी प्रकार चिन्तन करते हुए, अथवा अपने शरीर के सिवाय अन्यत्र आकाश, प्राकार (परकोटा), पात्र आदि में, अथवा परपात्र, अर्थात् निर्मल मन वाले शिष्य के चित्त में चिन्तन-स्मरण की प्रक्रिया से रात-दिन इस द्वादश क्रम के आरोहण की पद्धति का दृढ़तापूर्वक अभ्यास करने से साधक की स्मृति स्वयं विलीन होकर वरदात्री बन जाती है, अर्थात् परम प्रकाश के उदय के रूप में उत्कृष्ट वस्तु को देने वाली होती है। इसी बात को अभिनवगुप्त ने अपने परमार्थसार में इस तरह से बताया है— सर्वोत्तीर्णं रूपं सोपानपदक्रमेण संश्रयतः । परतत्त्वरूढिलाभे पर्यन्ते शिवमयीभावः ॥ (९७ श्लो०) अर्थात् कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, बिन्दु, नाद, शक्ति ये सब परतत्त्व तक पहुँचने के लिए सीढ़ी का काम करते हैं। धीरे-धीरे एक सीढ़ी को छोड़कर दूसरी पर चढ़ते हुए अन्त में जैसे व्यक्ति गन्तव्य स्थान तक पहुँच जाता है, उसी तरह से इनमें से भी एक को छोड़ कर दूसरे को पकड़ते हुए योगी अन्त में सर्वोत्तीर्ण रूप में, सबसे उत्कृष्ट अवस्था में पहुँच जाता है, अर्थात् वह स्वयं शिवमय हो जाता है। 'चिन्तनात्' ऐसा पाठ मानने पर पूर्व श्लोकों में वर्णित द्वितीयान्त मरुच्छक्ति पद को प्रथमा विभक्ति में बदल कर ¹मण्डूक-प्लुति न्याय से उसकी यहाँ अनुवृत्ति की जाती है। इससे यह अर्थ होगा कि चिन्तन के कारण मरुच्छक्ति शून्य में अथवा बाहर स्थित भित्ति आदि में स्वयं लीन होकर वरप्रदात्री बन जाती है। इसका तात्पर्य यह है कि बाह्य शून्य, कुड्य (भित्ति) आदि में भी अपने शरीर के समान ही प्राणशक्ति के उक्त बारह सोपानों का क्रमशः चिन्तन करना चाहिये । इस प्रक्रिया से अपने शरीर के सिवाय अन्यत्र भित्ति आदि में अथवा पर पात्र में ध्यान को स्थिर करने से योगी की एकाग्रता की भावना जब दृढ़ हो जाती है, तो यह मरुच्छक्ति वहीं अपने आप लीन हो जाती है। तब परम पद के परामर्श से उसके साथ स्वात्मस्वरूप की तादात्म्य भावना, अर्थात् मैं वही हूँ इस प्रकार की

  1. मण्डूक-प्लुति न्याय पाणिनि व्याकरण में प्रसिद्ध है । वहाँ आगे के सूत्रों में पूर्व सूत्रों के कुछ पदों की अनुवृत्ति की जाती है। यह अनुवृत्ति प्रायः निरन्तर चलती है। कभी-कभी आवश्यकता के अनुसार बीच के किसी सूत्र में किसी पद की अनुवृत्ति न होने पर भी आगे के सूत्र में उसकी अनुवृत्ति कर ली जाती है। ऐसे ही स्थलों में मण्डूक-प्लुति न्याय प्रवृत्त होता है। मेढक जैसे कूद कर चलता है, उसी तरह आवश्यक पद की अनुवृत्ति भी बीच के सूत्र या सूत्रों को कुदा कर की जातो है। प्रस्तुत स्थल में २८वें श्लोक में पठित द्वितीयान्त मरुच्छक्ति शब्द की आवृत्ति इसी न्याय से की जाती है और उसको प्रथमान्त पद में बदल लिया जाता है।

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३८ : विज्ञानभैरव प्रत्यभिज्ञा के आधार पर ऐक्य भावना का अभिमान जाग उठता है । इस विषय को स्पन्द- कारिका में इस तरह से समझाया गया है— यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात् । तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥ तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न या शिवः । भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ।: इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । संपश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ (२८-३० श्लो०) अर्थात् यह जीवात्मा सर्वमय सर्वात्मक विश्वरूप है, क्योंकि यह सभी पदार्थों को जानने वाला है और सभी पदार्थ इसी से उत्पन्न होते हैं। यह जीवात्मा सर्वमय इसलिये भी है कि यह सभी संवेद्य (जानने योग्य) पदार्थों के साथ संवेदन (ज्ञान) के रूप में जुड़ा रहने से सदा उनसे अभिन्न ही प्रतीत होता है । इस तादात्म्य अवस्था में शब्द और अर्थ की अलग-अलग प्रतीति न होकर उनकी एकाकार प्रतीति होती है । इस स्थिति में ऐसी कोई अवस्था नहीं बच रहती, जहाँ कि शिव का स्वभाव, चित् का प्रकाश, न प्रकाशित हो रहा हो । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रकाश-स्वभाव चिदात्मक शिव ही ज्ञेय के रूप में भासित होता है । अतः यह कहना ठीक ही है कि यह जीवात्मा सर्वमय है । जिस जीवात्मा को इस स्थिति का ज्ञान हो जाता है, जिसमें इस प्रत्यभिज्ञा का उदय हो जाता है कि सब कुछ मैं ही हूँ, वह इस सारे जगत् को अपनी लीला-भूमि समझने लगता है, वह सदा युक्त अवस्था में, समाधि दशा में रहते हुए जीवन्मुक्त हो जाता है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है । स्पन्दकारिका के व्याख्याकार उत्पल वैष्णव, रामकण्ठ और क्षेमराज ने इन कारिकाओं के अर्थ को विस्तार से समझाया है । जिज्ञासु जनों को उसे वहीं देखना चाहिये । अन्तिम निष्कर्ष यही निकलता है कि जब जीवात्मा को यह ज्ञान हो जाता है कि मैं सर्वमय हूं, तब अपने शरीर में, दूसरे के शरीर में, अथवा भित्ति-प्राकार आदि में भी प्राणशक्ति का क्रमिक विकास कर वह परम पद में प्रतिष्ठित हो सकता है ॥३३॥ [ धारणा-११ ] कपालान्तर्मनो न्यस्य ति¹ष्ठन्मीलितलोचनः । क्रमेण मनसो दाढर्याल्लक्ष्येल्लक्ष्यमुत्तमम् ॥३४॥ कपालान्तः शिरःकपालमध्ये यदन्तश्छिद्रमस्ति तदन्तरे, मनो न्यस्य कपाल- रन्ध्रस्थिते स्वप्रकाशे प्रभास्वरे ज्योतिषि आलम्बने धारणाध्यानसमाधीन् संपाद्य, कूणित- नेत्रः स्थितः सन् क्रमेण मनसो दाढर्याद् उत्तमं लक्ष्यं लक्षयेत्, “मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्” (यो० ३। ३१) इति न्यायात् । अथवा कपालान्तः प्रकाशविमर्शस्वरूपमध्ये शिवशक्ति- १. ॰ल्ले॰-ख० ।

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विज्ञानभैरव : ३९ मयं सर्वं जगदिति विमर्शविषयं मनो न्यस्य मीलितलोचनः संकुचितभेददृष्टिः, अन्तः- संकुचितहृदयादिबाह्यान्तरेन्द्रियवर्गः, क्रमेण मनसो दाढर्यात् सुषुम्णायामस्तङ्गतप्राणा- पानादिचारेण तद्दाढर्याद् यल्लक्ष्यमस्ति तदेव लक्षयेत् । तेन घटोऽयमितिवत् प्रत्यक्षत उत्तमं ज्योतिः पश्यतीत्यर्थः ॥३४॥ शिरःकपाल के भीतर विद्यमान छिद्र (सुषिर) में अपने मन को स्थापित कर, कपाल- रन्ध्र में विद्यमान स्वयंप्रकाश प्रभास्वर ज्योति को आलम्बन बनाकर, उसमें धारणा, ध्यान और समाधि का अभ्यास करना चाहिये । आँख मूँद कर इस प्रक्रिया को निरन्तर दोहराते रहने से योगी के मन में क्रमशः दृढ़ता का संचार होता है और वह उस उत्तम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है, जिसका कि वर्णन “मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्” (३।३१) इस सूत्र में योगसूत्रकार भगवान् पतंजलि ने किया है। 1कशब्देन परा शक्तिः पालकः शिवसंज्ञया । शिवशक्तिसमायोगः कपालः परिपठ्यते ॥ तन्त्रकोश के इस वचन के आधार पर 'क' शब्द परा शक्ति का और 'पाल' शब्द शिव का वाचक है, अतः कपाल शब्द से यहाँ शिव और शक्ति के समायोग (सामरस्य) का ग्रहण होना चाहिये । अनेक स्थानों पर उद्धृत "शवतयोऽस्य जगत् कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महे- श्वरः" इस श्रीकण्ठिसंहिता के वचन के अनुसार यह सारा जगत् शिव और शक्ति के, तन्त्रशास्त्र में प्रकाश और विमर्श के नाम से प्रसिद्ध, स्वरूप में विद्यमान है । साधक को इसी स्वरूप में अपने मन को स्थिर करने का अभ्यास करना चाहिये और बाह्य विषयों से अपने इन्द्रिय-चक्र को समेट लेना चाहिये । धीरे-धीरे उसकी भेद-दृष्टि, दूसरे से अपने को अलग समझने का स्वभाव, घटती जाती है और उसकी बाह्य और आन्तर इन्द्रियाँ अन्तर्मुख हो जाती हैं । क्रमशः उसका प्राण-चार, प्राण और अपान की गति, मध्यनाडी सुषुम्णा में लीन हो जाता है और तब उसका मन दृढ़, अर्थात् अत्यन्त स्थिर हो जाता है । इस अवस्था में वह उस स्वात्मस्वरूप उत्तम ज्योति का दर्शन उसी तरह से कर सकता है, जैसे कि कोई मनुष्य घट, पट आदि पदार्थों को अपनी आँखों के सामने देखता रहता है ॥३४॥ [ धारणा-१२ ] 2मध्यनाडी मध्यसंस्था1 बिससूत्राभरूपया । ध्याताऽन्तर्व्योमया देव्या तया देवः प्रकाशते ॥३५॥ मध्यनाडी सुषुम्णाख्या, मध्यसंस्था हृदयमध्यस्था भवतीत्यन्वयः । बिससूत्र- भरूपया सूक्ष्मत्वात् मृणालतन्तुतुल्याकारया ध्याताऽन्तर्व्योमया ध्यातं चिन्तितमन्तर्व्योम चिदाकाशात्मकं यस्यां सा तथाविधया तया देव्या देवः प्रकाशः प्रकाशते । मध्यनाड्या- १. °स्थ°-तवि० ।

  1. प्रस्तुत श्लोक को इसी श्लोक की व्याख्या में शिवोपाध्याय ने उद्धृत किया है ।
  2. तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १३१) पर यह श्लोक मिलता है ।

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४० : विज्ञानभैरव मन्तश्चिदाकाशात्मकं शून्यमेवास्ति । तस्मात् प्राणशक्तिर्निःसरतीति विमर्शेन प्रकाश- प्रादुर्भाव इति भावः । यद्वा मध्यनाडी मध्यसंस्था चासौ बिससूत्राभरूपा च, मध्यनाडी- मध्यसंस्थबिसरूपा चेति विशेषणोभयपदः समासः । तया एवंविधया मरुच्छक्त्या तन्मध्य- चिन्तिताकाशया देवः प्रकाशते ॥३५॥ सुषुम्णा नाम की मध्यनाडी हृदय के मध्य में रहती है । यह कमल-नाल में विद्यमान अत्यन्त सूक्ष्म तन्तुओं के समान कृश आकार वाली है । इस मध्यनाडी में चिदाकाश स्वरूप आन्तर व्योम (गगन) का ध्यान करने पर इसकी सहायता से साधक के हृदय में प्रकाशात्मक भगवान् शिव प्रकाशित हो उठते हैं । मध्यनाडी के भीतर चिदाकाश रूप शून्य का निवास है । उससे प्राणशक्ति निकलती है । इस तरह से विमर्श शक्ति की सहायता से प्रकाशात्मक शिवस्वभाव का प्रादुर्भाव होता है । अथवा मध्यनाडी मध्यसंस्था भी है और बिसतन्तु के समान सूक्ष्म आकार वाली भी है, इन दोनों विशेषण पदों का यहाँ समास माना जायगा, अर्थात् 'मध्यसंस्थबिससूत्राभरूपया' यह समस्त एक ही पद रहेगा । इस तरह की प्राण वायु की शक्ति से, जिससे कि बीच में चिदाकाश का चिन्तन किया जाता है, प्रकाशस्वरूप देव, परभैरव प्रकाशित हो उठते हैं । स्पन्दकारिका के इस श्लोक में भी यही बात कही गई है— तदा तस्मिन् महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे । सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ।। (२५ श्लो०) इसका अभिप्राय यह है कि साधक जब मध्यनाडी की सहायता से चिदाकाश में प्रविष्ट होता है, तब सोम और सूर्य अर्थात् अपान और प्राण अथवा मन और प्राण सुषुम्णा में अपने आप विलीन हो जाते हैं । इस अवस्था के उपस्थित होने पर जो योगी अपने वास्तविक स्वरूप को न पहचान कर सिद्धियों के चक्कर में पड़ जाता है, वह तो स्वप्न-सुषुप्ति जैसी मूढ़ दशा में ही पड़ा रह जाता है और जो उस अवस्था में भी आगे बढ़ने के लिये प्रयत्नशील रहता है, वह चिदाकाश में प्रविष्ट हो प्रकाशमय प्रबुद्ध स्वरूप हो जाता है ॥३५॥ [ धारणा-१३ ] कररुद्धदृगस्त्रेण भ्रूभेदाद् द्वाररोधनात् । दृष्टे बिन्दौ क्रमाल्लीने तन्मध्ये परमा स्थितिः ॥३६॥ अङ्गुष्ठतर्जन्यादिक्रमेण कराभ्यां रुद्धानि दृगुपलक्षितानि मुखरन्ध्राण्येवास्त्रं तेन करणेन यद् द्वाररोधनं द्वारस्थगनम्, तस्माद्धेतोर्यो भ्रूभेदो भ्रूमध्यस्थग्रन्थिविदारणम्, तस्माद्धेतोर्बिन्दौ दृष्टे क्रमादेकाग्रताप्रकर्षात् संविद्गगने तस्मिन् बिन्दौ लीने च सति संविद्गगनमध्य एव योगिनः परमा स्थितिः परभैरवाभिव्यक्तिः स्यात् ॥३६॥ भ्रूमध्य में अवस्थित ग्रन्थि को काटने के लिये योगी अपने इन्द्रिय रूपी हथियारों से ही काम लेता है, जब कि वह इन आंख आदि इन्द्रियों को अंगूठे से और अपनी तर्जनी आदि अंगुलियों से दबाकर उनके बाहर जाने के मार्गों को रोक लेता है । योगशास्त्र में इस तरह Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ४१ की क्रियाएँ १करण के नाम से प्रसिद्ध हैं । इस प्रकार को क्रिया से योगी को भीतर (भ्रूमध्य में) प्रकाश-बिन्दु का दर्शन होने लगता है । इस बिन्दु में मन को एकाग्र करने का अभ्यास करते- करते यह बिन्दु बोध-गगन में विलीन हो जाता है और उसके साथ ही योगी की इस बोध- गगन में, प्रकाशात्मक अवस्था में, स्थिति हो जाती है, अर्थात् उसका परभैरव स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है । यहाँ वर्णित वस्तु का क्रम इस प्रकार होगा—योगी पहले अपनी अंगुलियों से आँख- कान आदि को दबाने जैसे करणों (मुद्राओं) की सहायता से इन इन्द्रियों के बाहर निकलने के मार्ग को रोक देता है । फिर इन्हीं इन्द्रियों को साधन बनाकर वह भ्रूमध्य तक पहुँचता है और इनकी सहायता से वह भ्रूमध्य स्थित ग्रन्थि को काट डालता है । इस क्रिया के बाद योगी को भ्रूमध्य में ज्योति-बिन्दु के दर्शन होते हैं । ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचने के रास्ते को यह ग्रन्थि ही रोके रहती है, अतः जब इस ग्रन्थि का भेदन हो जाता है और बिन्दु में चित्त एकाग्र हो जाता है, तो अनायास ही ब्रह्मरन्ध्र स्थित बोध-गगन में विहार करने वाली परासंविद् देवी के दर्शन हो जाते हैं ॥३६॥ [ धारणा-१४ ] धामान्तःक्षोभसंभूतसूक्ष्माग्नितिलकाकृतिम् । बिन्दुं शिखान्ते हृदये लयान्ते ध्यायतो लयः ॥३७॥ धाम्नो लोचनवर्तिनस्तेजसः, अन्तःक्षोभेण अत्यन्तनिपीडनादिना संभूतं सूक्ष्मा- ग्नितिलकाकृतिं नयनरश्मिरूपं बिन्दुं शिखान्ते२ द्वादशान्ते हृदि च ध्यायत: । अथवा धाम्नो दीपादितेजसो योऽन्ते निर्वाणसमये क्षोभश्चाञ्चल्यम्, ततः संभूतं सूक्ष्माग्नितिल- काकृतिं बिन्दुं शिखान्तादौ ध्यायत: । लयान्ते गलितविकल्पे पर्यवसाने लयस्तदैक्योप- पत्तिर्भवेत् । विकल्पे गलिते तदवसाने परमतेजस्तत्त्वसमावेशः स्यादित्यर्थः ॥३७॥ लोचन (नेत्र) में निवास करने वाला तेज यहां धाम पद से अभिप्रेत है । पूर्व श्लोक में प्रतिपादित प्रक्रिया से नेत्र को जोर से दबाने से सूक्ष्म अग्नि कणों की सी आकृतियाँ चमक उठती हैं । ये आकृतियाँ नयन (नेत्रों के) तेज से निकली किरणें ही हैं । इनमें से किसी एक

  1. ‘करणं देहसंनिवेशविशेषात्मा मुद्रादिव्यापार:’’ (पृ० ३५) शिवसूत्रविमर्शिनी के परिशिष्ट (टि० १९) में करण का यह लक्षण बताया गया है । योगशास्त्र के ग्रन्थों में वर्णित खेचरी प्रभृति मुद्राओं और जालन्धर प्रभृति बन्धों का इसी में समावेश किया जाता है । इनमें शरीर के अंगों को किसी विशेष प्रकार की स्थिति में रखने का अभ्यास किया जाता है । करण की गणना आणव उपाय में की जाती है । अपने सात भेदों के साथ इसका विवेचन तन्त्रालोक के पंचम आह्निक (पृ० ४३८-४४३) में तथा अन्यत्र भी किया गया है ।
  2. शिखान्त पद यहां ऊर्ध्व द्वादशान्त के अर्थ में प्रयुक्त है । शिखा (चोटी) के नीचे के इस स्थान में ही उन्मना शक्ति निवास करती है । इस विषय को समझने के लिये श्लो० ४२ की टीका देखनी चाहिये ।

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४२ : विज्ञानभैरव बिन्दु को पकड़ कर ऊर्ध्व द्वादशान्त अथवा हृदय में उसका ध्यान करना चाहिये । अथवा धाम पद से दीपक प्रभृति के तेज को भी लिया जा सकता है । दीपक जब बुझने लगता है, तो वह अत्यन्त चंचल हो उठता है और चटकने के साथ उसमें से चिनगारियाँ निकलने लगती हैं । इनमें से किसी एक बिन्दु को पकड़ कर भी ध्यान का अभ्यास किया जा सकता है । इसकी सहायता से योगी के सब जागतिक विकल्प शान्त हो जाते हैं, अर्थात् उनके साथ इसकी ऐक्य बुद्धि हो जाती है कि यह सारा प्रपंच मुझसे भिन्न नहीं है । इस अवस्था में योगी का परम तेज में समावेश हो जाता है ॥३७॥ [ धारणा-१५ ] अनाहते१ पात्रकर्णेऽभग्नशब्दे २सरिद्द्रुते । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति ॥३८॥ पात्रे कर्णौ यस्य तस्मिन् पात्रकर्णे, सरिद्द्रुत् द्रुते वेगवाहिनि, 'परिश्रुते' इति पाठे परितः समन्तात् सर्वेषु प्रदेशेषु निर्गलिते, श्रवणगोचरं गते इत्यर्थः, अभग्नशब्दे अहर्निशं विच्छेदनरहितशब्दे, अनाहते न केनचिदाहते स्वरसत एवोत्थिते दशधोपलक्षिते नाद- भट्टारकात्मनि, शब्दब्रह्मणियो निष्णातः कृतधारणाध्यानसमाधिः, सपरंब्रह्म अधिगच्छति प्राप्नोति, ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः । अविच्छिन्नानाहतध्वनिविषयचित्तैकाग्रतासंपादनेन परमाकाशस्वरूपाविर्भावो भवतीत्यभिप्रायः ॥३८॥ नदी का जल जैसे निरन्तर बहता रहता है, उसी तरह से शरीर के भीतर दस प्रकार का अनाहत नाद (अनहद ध्वनि) निरन्तर दिन-रात स्वाभाविक रूप से बिना रुकावट के चलता रहता है । यह प्रायः देखा जाता है कि कोई भी ध्वनि (आवाज) बिना टकराव के नहीं पैदा होती, किन्हीं दो वस्तुओं (पात्रों) के आपस में टकराने से ही यह पैदा होती है । इसके विपरीत शरीर के भीतर सुनाई पड़ने वाली यह ध्वनि (नादभट्टारक) किसी टकराव से पैदा नहीं होतो । यह तो स्वभावतः सारे शरीर में चारों ओर से निकलती रहती है । इसीलिये इसको 'अनाहत' कहते हैं । इस ध्वनि को सुनने के लिये अपनी श्रवणेन्द्रिय (कानों) को ही पात्र (समर्थ) बनाया जाता है । अन्तर इतना ही है कि बाहरी पात्रों के टकराव से ध्वनि पैदा होती है, तब वह कानों से सुनाई पड़ती है; इसके विपरीत बिना किसी टकराव के प्रवाहित हो रही इस नादसन्तति को सुनने में श्रोत्रेन्द्रिय तब तक समर्थ नहीं हो सकती, जब तक कि योगाभ्यास के द्वारा उसमें इसको सुनने की पात्रता (योग्यता) न पैदा कर दी जाय । यह नादभट्टारक शब्दब्रह्म का ही व्यापार है । यह दस¹ प्रकार का होता है । दस प्रकार के नाद में धारणा, १. ॰तेष्पा॰-ख० । २. परिश्रुते-कटी० ।

  1. तन्त्रालोक (५।५९) में ब्रह्मयामल के प्रमाण पर दस प्रकार के राव का प्रतिपादन किया गया है । टीकाकार जयरथ ने (पृ० ४१०) राव शब्द को नाद का पर्यायवाची मानकर दस प्रकार के नाद का परिचय दिया है । स्वच्छन्दतन्त्र (११।६-७) में इसके आठ भेद माने गये हैं । क्षेमराज ने अपनी टीका में धर्मशिवाचार्य की पद्धति को उद्धृत कर इनका विव- Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ४३ ध्यान और समाधि का अभ्यास करने पर योगी शब्दब्रह्म के स्वरूप को भलीभाँति समझ लेता है। वह यह जान लेता है कि शब्दब्रह्म से ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी—इन चार तरह की वाणियों का विकास होता है। यह नाद तत्त्व परा और पश्यन्ती के क्रम से विकसित होता हुआ मध्यमा में आकर योगाभ्यास द्वारा श्रवणेन्द्रिय के अन्तर्मुख होने पर सुनाई पड़ता है। अन्तर्मुखता की ओर बढ़ते-बढ़ते, अर्थात् इस नाद के सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम स्वरूप का अन्वेषण करते-करते योगी शब्दब्रह्म के स्वरूप को भलीभाँति समझने में समर्थ हो जाता है, निष्णात हो जाता है। शब्दब्रह्म के स्वरूप को ठीक से पहचान लेने पर साधक अनायास परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् इस निरन्तर प्रवहमान अनाहत ध्वनि में चित्त को एकाग्र कर लेने पर योगी का परमाकाश स्वभाव, चिदाकाशमय प्रकाशात्मक स्वरूप, प्रकट हो जाता है। कुछ टीकाकार 'अनाहते पात्रकर्णे' इन दो पदों के बीच अकार का प्रश्लेष मानकर 'अपात्रकर्णे' ऐसा पदच्छेद करते हैं और इसका अर्थ करते हैं कि यह अनाहत ध्वनि कानों से नहीं सुनाई पड़ती। वस्तुतः सभी साधक इस विषय में एकमत हैं कि यह ध्वनि भी कानों की सहायता से ही सुनी जा सकती है। इसलिये इन दोनों मतों का समन्वय इस तरह से किया जा सकता है कि श्रवणेन्द्रिय की बाहर की ओर वृत्ति रहने पर यह नहीं सुनाई पड़ती। अभी ऊपर यह बताया जा चुका है कि श्रवणेन्द्रिय की आन्तर वृत्ति होने पर ही यह नाद सुनाई पड़ता है ॥३८॥ [ धारणा-१६ ] प्रणवादिसमुच्चारात् प्लुतान्ते शून्यभावनात् । शून्यया परया शक्त्या शून्यतामेति भैरवि ॥३९॥ हे भैरवि, प्रणवादयः प्रणवप्रकाराः, आदिशब्दोऽत्र प्रकारार्थे प्रयुक्तः । यथा वेदप्रणव ॐकारः, शिवप्रणवो हूंकारः, मायाप्रणवो ह्रींकार इत्यादयो बहवः प्रकारा- स्तन्त्रेषु उद्दिष्टाः । तेषां समुच्चारः कुक्कुटरुतवद् ह्रस्वदीर्घप्लुतभेदेनोच्चारणम्, तस्मात्, प्लुतान्ते गुर्वक्षरेषु शून्यपात्रध्वनिवद् दीर्घकालमुच्चरितो यः प्लुतो मात्रात्रयपरिमितो वर्णस्तस्य अन्ते विश्रान्तौ बिन्द्वादिप्रमेयानारोहेण शून्यभावनात् शून्यावस्थाऽलम्बनेन ¹शून्यातिशून्योच्चारेण शून्यतामुल्लङ्घ्यान्तर्मुखताभावनात्, शून्यया वेद्यशून्यता- माप्तया परया शक्त्या शून्यतामेति भेदशून्यपरभैरवरूपां परमां गतिं प्राप्नोति ॥३९॥ रण दिया है। अर्थरत्नावली (पृ० ३६) में उद्धृत संकेतपद्धति में भी अनाहत नाद के आठ ही भेद माने गये हैं। स्वच्छन्दतन्त्र (१।१७) में महाशब्द के नाम से नवम नाद भी माना गया है। अर्थरत्नावली (पृ०३६) में उद्धृत हंसनिर्णय में नवम नाद को निर्विशेष विशेषण दिया गया है।

  1. स्वच्छन्दतन्त्र (७।५-७) की टीका में क्षेमराज ने शून्यातिशून्य को महामाया का और शून्य शब्द को माया का बोधक माना है। महामाया से सदाशिव, ईश्वर और शुद्धविद्या Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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४४ : विज्ञानभैरव प्रणवादि पद से यहाँ प्रणव के भेदों का ग्रहण किया जाता है। आदि शब्द यहाँ प्रकार के अर्थ में आया है। जैसे कि ॐकार वेद का प्रणव है, हूंकार शैवागम संमत प्रणव है और ह्रींकार शाक्तागम संमत । इस तरह से प्रणव के अनेक प्रकार तन्त्रशास्त्र में वर्णित हैं। इनके समुच्चार का अर्थ है ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत के भेद से इनका कुक्कुटरुतवत् उच्चारण, अर्थात् मुर्गा जैसे पहले धीमी आवाज में बाँग देता है, बाद में कुछ तेज आवाज में और अंत में बड़ी तेज आवाज कुछ क्षणों तक अपने गले से निकालता रहता है, यही ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत स्वरों के उच्चारण की विधि है। उक्त प्रणवों का उच्चारण इसी विधि से किया जाता है। अथर्वशिखोपनिषद् में इस विषय को समझाया गया है— "अन्त¹ में जो चौथी आधी मात्रा है, वह विद्युदती कहलाती है। इसमें सभी वर्ण रहते हैं और पुरुष इसका देवता है। इस प्रकार यह ॐकार चार अक्षर, चार पद और चार मात्रा वाला है। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत इसके स्थूल रूप हैं", "ॐ ॐ ॐ इस प्रकार ॐकार का तीन बार उच्चारण कर अन्त में चतुर्थ अर्धमात्रा का उच्चारण करने से साधक की आत्मा परमशान्ति का अनुभव करती है। समस्त ॐकार की प्लुत उच्चारण द्वारा एक आवृत्ति करने से साधक का हृदय प्रकाश से ओत-प्रोत हो जाता है"। काँसे का खाली बरतन बजाने पर जैसे बहुत देर तक बजता रहता है, उसी तरह से गुरु अक्षरों को बहुत देर तक, तीन मात्रा या उससे अधिक समय तक बोलते रहने से वह उच्चारण प्लुत कहा जाता है। इस तरह के प्लुत उच्चारण के अन्त में प्लुत की विश्रान्ति हो जाने पर बिन्दु प्रभृति प्रमेयों का सहारा न लेकर शून्य की भावना करने से, सभी तरह के वेद्य विषयों से शून्य अवस्था को प्राप्त परा शक्ति की सहायता से साधक शून्यता को अर्थात् भेदरहित, द्वैतविवर्जित, परभैरव स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। इसका अभिप्राय यह है कि अर्धमात्रा का प्लुत उच्चारण करने से बिन्दु, अर्धचन्द्र प्रभृति सूक्ष्म से सूक्ष्मतर ध्वनियां निष्पन्न होती हैं। इस प्रकार यह प्लुत उच्चारण अपनी समुदाय शक्ति से अखण्ड ब्रह्म के ज्ञान में सहायक होता है, अर्थात् यह साधक को उस उन्मना- वस्था में पहुँचा देता है, जहां कि साधक को ब्रह्मदशा के सिवाय किसी जागतिक अवस्था की अनुभूति नहीं होती। यह सामान्य प्रक्रिया है। प्रस्तुत श्लोक में भगवान् विज्ञानभैरव भैरवी को की, अर्थात् मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर और मन्त्र नामक शुद्ध प्रमाताओं की, अधिकारी पुरुषों की सृष्टि होती है और माया से विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल नामक अशुद्ध प्रमाताओं की। अथवा बिन्दु से समना पर्यन्त अर्धमात्रा की स्थिति शून्य में और उन्मना की स्थिति शून्यातिशून्य पदवी में मानी गई है। मध्यधाम सुषुम्ना और शिवतत्त्व के अर्थ में भी शून्य और शून्यातिशून्य शब्दों का प्रयोग मिलता है। प्रस्तुत स्थल में शून्यातिशून्य के उच्चारण का तात्पर्य उन्मना पर्यन्त पिण्ड मन्त्र के उच्चारण के अभ्यास से है।

  1. शिवोपाध्याय की टीका में स्थित ये दोनों उद्धरण अथर्वशिखोपनिषद् की प्रथम कण्डिका से लिये गये हैं। दोनों ही स्थलों के पाठ त्रुटिपूर्ण हैं। इनका संशोधन परस्पर एक दूसरे की सहायता से किया जा सकता है।

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विज्ञानभैरव : ४५ इस प्रक्रिया से विलक्षण एक दूसरा उपाय बताते हैं कि प्लुत का उच्चारण निष्पन्न हो जाने पर जब बिन्दु, अर्धचन्द्र आदि सूक्ष्म ध्वनि-तरंगों की प्रतीति होने वाली हो, तब साधक अपने चित्त को उनके साथ न लगाकर शून्य में विलीन कर दे । इस शून्यावस्था का सहारा लेकर के भी साधक अन्त में उस ¹ अर्धमात्रा वाली अखण्ड-स्वभाव चिन्मात्र-स्वरूपिणी परा शक्ति में प्रविष्ट हो जाता है, जिसको कि दुर्गासप्तशती में अनुच्चार्य (उच्चारण के अयोग्य) कहा गया है। प्रणव में स्थित अकार, उकार और मकार उस परब्रह्म के व्यस्त स्वरूप को बताते हैं और चतुर्थ अर्धमात्रा स्वरूप अक्षर समस्त ब्रह्मतत्त्व का वाचक है । “तस्य वाचकः प्रणवः” (१।२७) इस योगसूत्र के अनुसार यह प्रणव सभी विकारों से अतीत तुरीय धामस्वरूप अखण्ड चैतन्यात्मक एक तत्त्व का, अर्थात् परमेश्वर का बोधक है। इस विषय को महिम्नस्तव के रचयिता पुष्पदन्त ने इस तरह से समझाया है— त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा- नकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति । तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥ (२७ श्लो०) जिज्ञासु जनों को इस श्लोक का विस्तृत अर्थ महिम्नस्तव की मधुसूदनी टीका में देखना चाहिये ॥३९॥ [ धारणा-१७ ] यस्य कस्यापि वर्णस्य पूर्वान्तावनुभावयेत् । शून्यया शून्यभूतोऽसौ शून्याकारः पुमान् भवेत् ॥४०॥ यस्य कस्यापि वर्णस्य पूर्वान्ताविति उच्चिचारयिषाविरामौ, अनुभावयेत् शून्या- नुगततया भावयेत् । असौ पुमान् शून्यया वेद्यशून्यतामाप्तया परया शक्त्या शून्यभूतः शून्याकारो निवृत्तदेहादिप्रमातृत्वाभिमानो भवेत् । तदयं प्रघट्टकार्थः—पूर्वं शिक्षा, ततस्तदनुभवः, ततोऽपि गुरुप्रसादादिना तन्निश्चयः, ततोऽन्तर्नाडीचक्रादिपरीक्षा, ततश्च शून्यातिशून्ययोजनया शब्दब्रह्ममयं प्रणवस्वरूपं परिवर्ज्य परब्रह्मणि प्रविशति, ततश्च शून्यातिशून्यतामेति । वस्तुतः सर्वमिदं गन्धर्वनगरतुल्यवृत्तान्तम् । इतो यदन्यत् तदेव ब्रह्म ॥४०॥ केवल प्रणव का ही नहीं, अपितु वर्णमाला में विद्यमान जिस किसी के भी वर्ण की पूर्व और अपर अवस्था का, अर्थात् उच्चारण करने की इच्छा तथा उसकी विराम अवस्था का शून्य १. “अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः” (१।७४) दुर्गासप्तशती के इस श्लोक में अर्धमात्रा को अनुच्चार्य (जिसका उच्चारण नहीं किया जा सकता) माना है । पिण्ड मन्त्र में अर्धमात्रा की स्थिति बिन्दु से समना पर्यन्त मानी गई है । इसको अनुच्चार्य इसलिये कहते हैं कि यह केवल भावनागम्य है, इसका उच्चारण नहीं होता ।

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४६ : विज्ञानभैरव से अनुगत रूप में ध्यान करे । उच्चारण करने की इच्छा के उत्पन्न होने से पूर्व और उच्चा- रण का विराम हो जाने के उपरान्त भी सभी वर्ण शून्यस्वभाव ही हैं, इस तरह की भावना करने से साधक पूर्व कारिका में व्याख्यात शून्य शक्ति के माध्यम से शून्यस्वरूप, शून्याकार होकर, अर्थात् देहादि प्रमातृता के अभिमान को छोड़कर शून्य में लीन हो जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि साधक पहले योग की शिक्षा प्राप्त करता है । तदनुसार साधना करने से उसको कुछ नये अनुभव होते हैं । गुरु की कृपा से इन अनुभवों के आधार पर वह किसी एक निश्चय पर पहुँचता है । तब उसकी वृत्ति अन्तर्मुखी हो जाती है और वह नाडीचक्र की परीक्षा में प्रवृत्त हो जाता है, उनको शून्य में लीन करता चलता है । शून्य से अतिशून्य में प्रविष्ट होता हुआ वह शब्दब्रह्ममय प्रणव स्वरूप को भी छोड़कर अन्त में परब्रह्म में प्रविष्ट हो तदा- कार हो जाता है । वस्तुतः यह सारा जगत् गन्धर्वनगर की तरह कल्पना का विलासमात्र है । इसके ऊपर ही वह परब्रह्म अवस्थित है ॥४०॥ [ धारणा-१८ ] तन्त्र्यादिवाद्यशब्देषु दीर्घेषु क्रमसंस्थितेः । अनन्यचेताः प्रत्यन्ते परव्योमवपुर्भवेत् ॥४१॥ तन्त्र्यादिवाद्यशब्देषु तन्त्री आदिरवयवो येषां तानि तन्त्र्यादीनि तानि च तानि वाद्यानि वादनीयद्रव्याणि शततन्त्री-परिवादिनी-तुम्बवीणादीनि, तेषां ये शब्दा मूर्छना- त्मकाः स्वरास्तेषु क्रमसंस्थितेः क्रमस्थित्या दीर्घेषु बहुलेषु सत्सु योऽनन्यचेतास्तदाल- म्बनचित्तवृत्तिसन्तानयुक्तः स प्रत्यन्ते तच्छब्दनिवृत्तौ आलम्बनान्तरानुदये परव्योमतनुः परमाकाशशरीरो भवेत् । तस्य परभैरवात्मके परमाकाशे समावेशो जायते, ब्रह्मौव भवतीति भावः ॥४१॥ जो साधक तन्त्री, शततन्त्री, परिवादिनी, तुम्बवीणा आदि तन्तुवाद्यों की ध्वनि अर्थात् ¹मूर्छनात्मक स्वरों में, जो कि अपनी क्रमिकता के आधार पर दीर्घ काल तक अवस्थित रहते हैं, अपने चित्त को एकाग्र कर उन्हीं आलम्बनों में अपनी चित्त-वृत्ति की सन्तति को डाल देता है, वह उस ध्वनि के साथ चित्त की एकाग्रता के कारण परमाकाश शरीर हो जाता है, अर्थात् अन्त में उस शब्द के भी निवृत्त हो जाने पर तथा दूसरे आलम्बन का उदय न होने से उसका परमव्योम में समावेश हो जाता है । मूर्छनात्मक स्वरों की अवस्थिति दीर्घ काल तक रहती है । अतः इनमें चित्त की एकाग्रता अन्य उपायों की अपेक्षा अधिक सरलता से प्राप्त हो सकती है । इसी विशेषता की ओर इंगित करने के लिये श्लोक में 'दीर्घेषु' यह विशेषण दिया गया है । इसका अभिप्राय यह है कि 'दे व द त्त' ये शब्द एक एक पहर के बाद यदि बोले जाँय, तो इनसे किसी अर्थ का बोध नहीं होगा । इन्हीं वर्णों का 'देवदत्त' इस तरह से एक

  1. संगीतशास्त्र में स्वरों की नियमित क्रम से आरोह और अवरोह की प्रक्रिया को मूर्छना कहते हैं ।

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विज्ञानभैरव : ४७ साथ उच्चारण किया जाता है, तो प्रतीत होता है कि यह कुछ है । उसके बाद १शब्दानुरणन न्याय से अथवा पानकचर्वण न्याय से इसके अभिप्राय का बोध किया जाता है कि यह क्या है ? इसका क्या प्रयोजन है ? एक ज्ञान से दूसरे ज्ञान की उत्पत्ति होती है। फलतः प्रतीति होती है कि देवदत्त कोई ब्राह्मण है। उसके बाद यह जाना जाता है कि यह पूर्व, पश्चिम, दक्षिण अथवा उत्तर का रहने वाला है। तब यह वेदाध्ययनशील है, उसके बाद यह वामनदत्त का पुत्र, सुखदत्त का भाई, पृथूदकी का पुत्र है, इस तरह से उसकी जाति आदि का परिचय मिलता है। इसी प्रकार तन्त्री प्रभृति वाद्यों से पैदा हुए क्रमिक स्वरों के २लय, सम, ताल आदि में मन लगा कर एकाग्रतापूर्वक दृढ़ अभ्यास कर उसके साथ अपनी चित्त-वृत्ति को लीन कर लेने वाला साधक परमव्योम शरीर हो जाता है, परब्रह्मदशा में समाविष्ट हो जाता है। ३८ वीं कारिका में बताया जा चुका है कि शब्दब्रह्म में निष्णात व्यक्ति परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मवेत्ता योगिराज महर्षि याज्ञवल्क्य ने भी— वीणावादनतत्त्वज्ञः स्वरजातिविशारदः । तालज्ञश्चाप्रयासेन मोक्षमार्गं नियच्छति ॥ (३।११५) इस स्मृति-वाक्य में इस बात को स्वीकार किया है कि संगीतशास्त्र में प्रवीण व्यक्ति अनायास ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥४१॥

  1. नैयायिकों के मत के अनुसार श्रोत्रेन्द्रिय स्थित आकाश में वीचीतरंग न्याय और कदम्ब- गोलक न्याय से शब्द की उपलब्धि होती है। शब्द अपने उत्पत्ति स्थल से उसी तरह कानों तक पहुँचता है, जैसे कि तालाब आदि के पानी में ढेला फेकने से उठी तरंग लहरों के सहारे किनारे आ लगती है। इसी को वीचीतरंग न्याय कहते हैं। कदम्बगोलक न्याय के अनुसार शब्द उत्पन्न होने के साथ कदम्ब के गोल फल के आकार में दसों दिशाओं में फैल जाता है और तब वह क्रमशः कानों तक पहुँचता है। शब्द कानों तक पहुँच कर अनुरणन करता है, कुछ देर तक प्रतिध्वनित होता रहता है। घंटे के बजने से जो देर तक कंपन होता रहता है, एक घनघनाहट सी होती रहती है, उसी को अनुरणन कहते हैं। इस क्रम से कानों में जब शब्द टकराता है, तो इस बात का अनुसन्धान चलने लगता है कि यह शब्द किस अर्थ को अभिव्यक्त करता है। यही शब्दानुरणन न्याय है। पानकचर्वण न्याय से इसकी स्थिति अधिक स्पष्ट होती है। बादाम, गुलकन्द, मुनक्का, अंगूर, काली मिर्च आदि से तैयार किये गये पानक (शर्बत) को स्वाद के साथ धीरे-धीरे चखने पर जैसे उसमें पड़े सभी पदार्थों के अलग अलग स्वाद और गन्ध की प्रतीति होती है, उसी तरह से कानों तक पहुँचे हुए शब्दों से उनका अर्थ समझा जाता है।
  2. नपे तुले क्रम में स्वर की गति को लय कहते हैं । विलम्बित, मध्य और द्रुत के नाम से इसके तीन भेद होते हैं । ताल का जहाँ से उठान होता है और जहाँ समाप्ति होती है, उसे सम कहते हैं । मात्राओं के आधार पर काल-मापन की क्रिया के चक्र को ताल कहते हैं।

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४८ : विज्ञानभैरव [ धारणा-१९ ] १पिण्डमन्त्रस्य१ २सर्वस्य स्थूलवर्णक्रमेण तु । अर्धेन्दुबिन्दुनादान्त३शून्योच्चाराद् भवेच्छिवः ॥४२॥ स्थूलवर्णक्रमेणेति विशेषणे तृतीया, तेन स्थूलवर्णक्रमेणोपलक्षितस्य पिण्डमन्त्रस्येत्य- न्वयः । सर्वस्य स्थूलवर्णक्रमेणोपलक्षितस्य प्रणवनवात्मादेः पिण्डमन्त्रस्य अर्धेन्दुबिन्दु- नादान्तशून्योच्चारात् । अत्र बिन्द्वर्धचन्द्रनादान्तेति पठनीयम्, बिन्दोरनन्तरं हि अर्धचन्द्रोच्चारः । तेन प्रणवात्मके पिण्डमन्त्रे अकार-उकार-मकारोच्चारणानन्तरं हकारात् प्रभृति षष्ठस्वरान्ते नवात्मपिण्डमन्त्रे च अकारोच्चारणानन्तरं बिन्दु- अर्धचन्द्र-निरोधिनी-नाद-नादान्त-शक्ति-व्यापिनी-समना-उन्मनानामन्ते पर्यवसाने शून्य- रूपात् प्लुतोच्चारात् शिवः परमशिवो भैरवभट्टारको भवेत् ॥४२॥ प्रणव, नवात्म प्रभृति पिण्ड मन्त्र कहलाते हैं। इनको पिण्ड मन्त्र इस लिये कहा जाता है कि इनमें पृथक् पृथक् अनेक वर्णों की स्थिति रहती है और अन्त मे प्रायः एक संयोजक स्वर रहता है । इस तरह के सभी पिण्ड मन्त्रों के स्थूल वर्णों का क्रम से उच्चारण कर लेने के बाद बिन्दु, अर्धेन्दु, नादान्त प्रभृति सूक्ष्म से सूक्ष्मतर मात्रा में बदलते जा रहे सूक्ष्म वर्णों के उच्चारण का शून्य अवस्था पर्यन्त अनुसन्धान किया जाता है। जैसे कि प्रणवात्मक पिण्ड मन्त्र में अकार, उकार और मकार इन स्थूल वर्णों के बाद तथा नवात्मक पिण्ड मन्त्र में हकार से लेकर ऊकार पर्यन्त स्थूल वर्णों का उच्चारण कर लेने के बाद एक मात्रा के चतुर्थांश, अष्टमांश, षोडशांश के क्रम से सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था की ओर बढ़ती जा रही बिन्दु, अर्धचन्द्र, निरोधिनी आदि मात्राओं का, जो कि वर्णों की सूक्ष्म स्थितियां मानी जाती हैं, अनुसन्धान करते करते शून्यावस्था उन्मना में पहुँच कर, वहाँ इस प्लुत वर्ण के उच्चारण की अन्तिम परिणति की भावना करने पर, साधक स्वयं शिव बन जाता है। योगिनीहृदय, नेत्रतन्त्र प्रभृति ग्रन्थों में यह विषय विस्तार से समझाया गया है। शिवोपाध्याय ने प्रणव की इन मात्राओं को परम शिव अवस्था तक पहुँचने के लिये सोपान (सीढ़ियां) मान कर उन पर चढ़ने का क्रम इस तरह से बताया है-आकार की नाभि में, उकार की हृदय में, मकार की मुख में, बिन्दु की भ्रूमध्य में, अर्धचन्द्र की ललाट में, निरोधिनी की ललाट के ऊर्ध्व भाग में, नाद की शिर में, नादान्त की ब्रह्मरन्ध्र में, शक्ति की त्वक् में, व्यापिनी की शिखा के मूल में, समना की शिखा में और उन्मना की शिखा के अन्तिम भाग में स्थिति रहती है। इस उन्मना स्थिति को भी लांघ कर, अर्थात् द्वादशान्त पर्यन्त सभी सोलह भूमियों को पार कर लेने पर सत्रहवें निरञ्जन द्वादशान्त स्थान में अवस्थित व्योमाकार परमशिव के रूप में साधक अपने को देखने लगता है। प्रणव को, ॐकार को पिण्ड मन्त्र इसलिये कहा जाता है कि यह नाभि से लेकर द्वादशान्त पर्यन्त १. बिन्दुरूपस्य-यो० चि० । २. मन्त्रस्य-यो०, चक्रस्य-चि० । ३. °स्तः-क० ।

  1. यह श्लोक कामकलाविलास की टीका चिद्वल्ली (पृ० २४) में तथा योगिनीहृदयदीपिका (पृ० ५२) में मिलता है ।

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विज्ञानभैरव : ४९ इस पिण्ड में विभक्त है। 'सोहं' यह भी प्रणव का ही स्वरूप है। इसमें से सकार और हकार रूप हल् का लोप हो जाने पर 'ॐ' यह स्वरूप रह जाता है। इस प्रणव¹ का 'सोहं' यह स्वरूप अजपा से गर्भित होकर अर्थात् दिन-रात बिना रुके निरन्तर चलती रहने वाली श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से मिल कर हृदय में बहुत ही स्पष्ट रूप में ध्वनित होता रहता है। जैसा कि— ओमिति स्फुरदुरस्यनाहतं गर्भगुम्फितसमस्तवाङ्मयम् । दन्ध्वनीति हृदि यत्परं पदं तत्सदक्षरमुपास्महे महः ॥ शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत इस श्लोक में बताया गया है कि समस्त वाङ्मय को अपने पेट में समेटे हुए यह ॐकार प्रत्येक प्राणी के हृदय में अनाहत नाद के रूप में ध्वनित होता रहता है। हृदय में विद्यमान यह प्रणव रूप सदक्षर ही परमपदस्थानीय है। हम इसी तेज की उपासना करते हैं। यह प्रणव अपनी अकार से लेकर उन्मना पर्यन्त बारह मात्राओं को नाभि से लेकर शिखान्त पर्यन्त स्थानों में बांट देता है। वर्णों के उच्चारण का क्रम स्थूल दशा कहा जाता है। नाभि, हृदय और मुख में क्रमशः प्रथम तीन मात्राओं का उच्चारण होता है, अतः इनको स्थूल कहा जाता है। स्थूल वर्णों का उच्चारण काल 'मात्रा' कहा जाता है। बिन्दु से समना पर्यन्त अर्धमात्रा और उसके ऊपर परम शिव का स्थान है। यहाँ स्थूल अक्षरों के क्रम से संयुक्त पिण्ड मन्त्र में बिन्दु, अर्धचन्द्र, नादान्त और शून्य के उच्चारण से परमशिव भाव की प्राप्ति की बात कही गई है। निरोधिनी, नाद, शक्ति, व्यापिनी और समना का उल्लेख न होने पर भी उनका ग्रहण किया जाता है। 'शून्या' शब्द से उन्मना का उल्लेख किया गया है। अतः संक्षेप में इस श्लोक का अर्थ यह होगा कि बिन्दु, अर्धचन्द्र, निरोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना और उन्मना के उच्चार से, अर्थात् द्वादश मात्रा के उच्चारण काल की भावना करने से, योगी स्वयं शिव हो जाता है। अथवा इसका यह भी अर्थ किया जा सकता है कि अकार से लेकर समना पर्यन्त मात्राओं का शून्य रूप से परामर्श करने पर उन्मना रूप परम शिव धाम की प्राप्ति हो जाती है। यहाँ समना पर्यन्त विश्व हेय (त्याज्य) कोटि में और उन्मना में होने वाला परतत्त्व का समावेश उपादेय (ग्राह्य) कोटि में आता है। यह प्रक्रिया अन्य सभी पिण्ड मन्त्रों के स्थूल और सूक्ष्म मात्राओं के विचार के प्रसंग में भी लागू होती है। इन द्वादश मात्राओं के स्वरूप का विचार नेत्रतन्त्र प्रभृति ग्रन्थों में किया गया है। उपोद्घात में इन पर प्रकाश डाला जायगा ॥४२॥

  1. शक्तिसंगमतन्त्र ( I. ३. ७७-८७ ) में प्रणव के प्रसंग में हंसस्वरूपिणी कामकला का विवरण बताते हुए कहा गया है कि 'सोऽहम्' इस अजपा मन्त्र में प्रणव और कामकला दोनों की स्थिति है। उक्त ग्रंथ के चतुर्थ खण्ड के उपोद्घात (पृ० ५६-५७) में इस विषय पर प्रकाश डाला गया है।

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५० : विज्ञानभैरव [ धारणा-२० ] निजदेहे सर्वदिक्कं युगपद् भावयेद् वियत् । निर्विकल्पमनास्तस्य वियत् सर्वं प्रवर्तते ॥४३॥ निर्विकल्पमना एकाग्रचित्तः साधकः, निजदेहे स्वात्मशरीरे, सर्वदिक्कं सर्वासु दिक्षु, पुरतो दक्षिणे वामे पृष्ठतश्च, व्याप्तम्, वियत् शून्यम्, युगपद् अक्रमेण भावयेत् । ततस्तस्य न नीलपीतादिकं किमप्यस्तीति 'शुक्ताविदं रजतम्' इतिवद्विषयमेतत्सर्वमिति सर्वत एव शून्यतां भावयतः सर्वं वियत् प्रवर्तते । परमाकाशसमावेशोऽभिव्यज्यत इति भावः ॥४३॥ साधक निर्विकल्प, एकाग्र चित्त होकर अपने शरीर में सभी दिशाओं में पूर्व, दक्षिण, उत्तर, पश्चिम में व्याप्त शून्य की एक साथ बिना क्रम के भावना करे । इस भावना के अभ्यास से उसे इस यथार्थ स्थिति का बोध होने लगता है कि सीप में चाँदी की प्रतीति जैसे मिथ्या है, उसी तरह से नील, पीत आदि के रूप में प्रतीत हो रहा यह सारा प्रपंच भी असत्स्वरूप है, परमार्थतः इसकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है । इस तरह से उसकी सब पदार्थों में शून्यता की भावना पुष्ट होती जाती है और अन्त में यह परमाकाश में, परम शून्य में समाविष्ट हो जाता है । अर्थात् इस सारे प्रपंच के शून्य स्वरूप हो जाने पर उसका प्रकाशमय सत्स्वरूप (उपाधिरहित वास्तविक स्वरूप) अभिव्यक्त हो उठता है । बाह्य नील-पीत आदि से लेकर शून्यपर्यन्त सभी पदार्थ विकल्पस्वरूप माने गये हैं । जैसा कि ईश्वरप्रत्यभिज्ञा में निर्दिष्ट है— चित्तत्त्वं मायया हित्वा भिन्न एवावभाति यः । देहे बुद्धावथ प्राणे कल्पिते नभसीव वा ॥ प्रमातृत्वेनाहमिति विमर्शोऽन्यव्यपोहनात् । विकल्प एव स परप्रतियोग्यवभासजः ॥ (१।६।४-५) इसका अभिप्राय यह है कि अहं परामर्श दो प्रकार होता है—शुद्ध और मायीय । इनमें से शुद्ध परामर्श विश्व से अभिन्न रूप में विद्यमान संविन्मात्र में अथवा विश्व की छाया से अस्पृष्ट स्वच्छ आत्मा में होता है और मायीय अथवा अशुद्ध परामर्श वेद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि को अपना आलम्बन बनाता है, अर्थात् इन्हीं को अपना स्वरूप मान लेता है । इनमें से शुद्ध परामर्श में किसी प्रतियोगी (विरोधी) पदार्थ की सत्ता के न रहने से कोई भी वस्तु ¹अपोहनीय (त्याज्य) नहीं रहती । घट प्रभृति बाह्य पदार्थ भी उस प्रकाशस्वरूप

  1. परमार्थतः अपोहन व्यापार की कोई स्थिति नहीं है, किन्तु जागतिक व्यवहार का संचालन ज्ञान, स्मृति और अपोहन नाम की शक्तियों के सहारे ही चलता है । “मत्तः स्मृति- र्ज्ञानमपोहनं च" (भ० गी० १५।१५), “स्यादेकश्चिद्रूपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान्” (ई० प्र० १।३।७) इत्यादि वचनों के सहारे इस विषय का प्रतिपादन महार्थमंजरी की परिमल टीका (पृ० १३५-१३६) में किया गया है । बौद्ध दर्शन में भी एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ को अलग करने के लिए अपोह की कल्पना की गई है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ५१ परमतत्त्व से ही अपना अस्तित्व बनाते हैं, अतः वे उससे अभिन्न ही हैं, उसके विरोधी नहीं। इस अवस्था में जब कोई स्थिति अपोहनीय नहीं है, तो वह विकल्प कैसे हो सकती है। इसके विपरीत अशुद्ध (मायीय) परामर्श में वेद्यरूप शरीर प्रभृति में, उससे भिन्न देह आदि का और घट प्रभृति पदार्थों का भी व्यपोहन, व्यवच्छेद, भेद विद्यमान है। इसी भेददशा की प्रतीति को 'विकल्प' के नाम से जाना जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इन विकल्प दशाओं से अतीत शून्यातिशून्य शिवतत्त्व ही साधक का लक्ष्य होना चाहिये। विभिन्न विकल्प अवस्थाओं में पड़े हुये ^१विज्ञानाकल, प्रलयाकल आदि जीवों की दशाओं का वर्णन ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (३।२।४-१२) आदि में विस्तार से किया गया है। इनका प्रयोजन यही है कि साधक इन विकल्प दशाओं का परित्याग कर अपने निर्विकल्प प्रकाशमय स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाय ॥४३॥ [ धारणा-२१ ] पृष्ठशून्यं मूलशून्यं युगपद् भावयेच्च यः१। युगपन्निर्विकल्पत्वान्निर्विकल्पोदयस्ततः ॥४४॥ यश्च साधकः पृष्ठशून्यं मूलशून्यं च युगपद् भावयेत् ऊर्ध्वाधो दक्षिणोत्तरतः सर्वतोऽपि शून्यमेव ध्यायेत् ततस्तस्यानया भावनया निर्विकल्पत्वाद् विकल्पशून्यत्वात्, युगपत् सहसा निर्विकल्पोदयः निर्विकल्पस्य चिद्धाम्न उदयः अभिव्यक्तिर्जायते ॥४४॥ जो साधक पृष्ठशून्य और मूलशून्य की, अर्थात् ऊपर-नीचे, दाहिने-बाये सभी जगह एक साथ शून्य की भावना करता है, तो इस निर्विकल्प भावना के अभ्यास से उसके हृदय में किसी भी समय एकाएक निर्विकल्प चिद्धाम शिवस्वभाव की अभिव्यक्ति हो सकती है। शिवोपाध्याय ने इस भावना की संपुष्टि के लिये वासुदेव का यह श्लोक उद्धृत किया है— ऊर्ध्वशून्यमधःशून्यं मध्ये शून्यं निराश्रयम् । त्रिशून्यं योऽभिजानाति स भवेत् कुलन्दनः ॥ अर्थात् ऊर्ध्वशून्य, अधःशून्य और बिना आश्रय के मध्यशून्य को, इन तीन शून्यों को, जो साधक जान लेता है, वह कुलन्दन हो जाता है, अर्थात् देह से लेकर शक्तिपर्यन्त अपने समस्त कुल को परमाकाश में लीन कर आनन्दमय बना देता है। इसका अभिप्राय यही है कि १. इतः परम्—“शरीरनिरपेक्षिण्या शक्त्या शून्यमना भवेत् ॥ पृष्ठशून्यं मूलशून्यं हृच्छून्यं भावयेत् स्थिरम् ।” इत्येष श्लोकोऽधिको व्याख्यातः शिवोपाध्यायेन । पुनरुक्तिप्राय इति कृत्वा सोऽयं भट्टानन्देन न व्याख्यातः। धारणानां ११२ संख्यासम्पत्तये चास्माभिर्नैष श्लोको मूले स्थापितः, तथा कृते संख्याधिक्यप्रसङ्गात् ।

  1. विज्ञानाकल, प्रलयाकल प्रभृति सात प्रकार के प्रमाताओं का निरूपण पृ० २८ की 2 संख्या की टिप्पणी में किया जा चुका है। ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के प्रस्तुत प्रकरण में भी त्रिविध मलों और विज्ञानाकल प्रभृति प्रमाताओं का स्वरूप वर्णित है।

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५२ : विज्ञानभैरव इस भावना के अभ्यास से साधक को अपने शिवस्वरूप का करामलकवत् (हथेली पर रखे आंवले की तरह) साक्षात्कार हो जाता है ॥४४॥ [ धारणा-२२ ] तनूदेशे शून्यतैव क्षणमात्रं विभावयेत् । निर्विकल्पं१ निर्विकल्पो निर्विकल्पस्वरूपभाक् ॥४५॥ तनूदेशे परिमितग्राहकपदे स्थूलशरीरे शून्यतैव इत्येतावन्मात्रं क्षणमल्पकालमपि निर्विकल्पं मनः कृत्वा भावयेत् । भावनयाऽनया भावको निर्विकल्पो विकल्पातीतः सन् निर्विकल्पस्वरूपभाक् चिद्विलासमयो जायते । शिवतत्त्वं विना न किमपि सर्वमेतत् चिद्विलासास्पदमाश्यानतया चित्रितमिव विभातीत्येवं गन्धर्वनगरादिवत् प्रसिद्धमप्रति- ष्ठितमिति ज्ञानेन चिदाकाशे स प्रतिष्ठितो भवतीति भावः ॥४५॥ तनूदेश अर्थात् परिमित ग्राहकता के स्थान इस स्थूल शरीर में पूर्वोक्त पद्धति से शून्यता ही सर्वत्र विद्यमान है, इस स्थिति की एक क्षण के लिये, स्वल्प काल के लिये भी निर्विकल्प रूप में भावना करे । इस तरह की भावना करने वाला साधक विकल्प व्यापार से ऊपर उठकर निर्विकल्प स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, वह यह जान लेता है कि सब कुछ चित् का विलासमात्र है । इसका अभिप्राय यह है कि शिवतत्त्व के सिवाय यहाँ कुछ भी सत् नहीं है । यह सारा जगत् चित् का विलास मात्र है, चित्र के समान अथवा गन्धर्वनगर के समान यह केवल कल्पना का विलास मात्र है । अतः इसकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। इस प्रकार के ज्ञान का जब इस धारणा के अभ्यास से उदय होता है, तो वह साधक अपने स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥४५॥ [ धारणा-२३ ] सर्वं देहगतं द्रव्यं वियद्व्याप्तं मृगेक्षणे । विभावयेत् ततस्तस्य भावन स्थिरा भवेत् ॥४६॥ हे मृगेक्षणे, प्रोक्तशून्यभावना यस्य न झगिति हृदयमध्यास्ते, स देहगतमस्थि- मांसादि सर्वं द्रव्यं वियता शून्येन व्याप्तं विशेषेण भावयेत् । तदनन्तरं तस्य संयमिनः सा भावना उपादेयशून्यवासना दृढा भवेत् । सर्वमिदं रज्जुभुजङ्गवत्, असत्यस्वरूपसाध्य- त्वाद्वा गन्धर्वनगरादिवत् शून्यव्याप्तमित्येवं धारणया देहगतमांसादिद्रव्याणामपि यदा शून्यताभावना दृढं प्ररूढा भवति, तदा भावकः प्रकाशमानप्रकाशो भवतीति भावः ॥४६॥ हे मृगेक्षणे, जिसके हृदय में उक्त शून्यता की भावना सरलता से न जम सके, उसको चाहिये कि वह अपने शरीर में विद्यमान अस्थि, मांस प्रभृति सभी धातुओं की शून्यरूप में भावना करे कि मेरे इस स्थूल शरीर में शून्य आकाश के सिवाय कुछ भी विद्यमान नहीं है । १. °ल्पे-ख० ।

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विज्ञानभैरव : ५३ इस तरह से स्थूल शरीर की हेय वासना के त्याग का अभ्यास करने से साधक के हृदय में उपादेय शून्यता की वासना दृढ़ होती जाती है और अन्ततः उसके हृदय में प्रकाश का आवि- र्भाव हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि यह सारा जगत् रज्जु में कल्पित सर्प की तरह अथवा सर्वथा असत्य स्वरूप में कल्पित गन्धर्वनगर की भांति कल्पनामय है, अर्थात् यह सब कुछ शून्य ही शून्य है, शून्य के सिवाय कुछ भी नहीं है। इस धारणा के अभ्यास से जब रज्जुसर्प, गन्धर्वनगर की तरह देहगत मांस प्रभृति द्रव्यों में भी यह शून्यता-भावना दृढ़ हो जाती है, तो साधक का हृदय सहसा आलोक से आलोकित हो जाता है, प्रकाश से भर जाता है ॥४६॥ [ धारणा-२४ ] देहान्तरे १त्वग्विभागं भित्तिभूतं२ विचिन्तयेत् । न किञ्चिदन्तरे तस्य ध्यायन्न३ध्येयभाग् भवेत् ॥४७॥ देहान्तरे स्वस्मिन् देहविषये त्वग्लक्षणो यो विशिष्टो बर्हिष्ठो भागस्तं भित्तिभूतं जडबाह्यभित्तिकल्पं विचिन्तयेत् भावयेत्। तस्य चान्तर्नं किञ्चिदस्तीति ध्यायन् अध्येय- भाक् परव्याप्तिरूपः स्यात्। पञ्चभूतपञ्चीकरणयुक्त्या संबद्धं सत् शरीरमुद्भूतम्। तच्च स्थूलं विनश्यत्स्वभावं करिकर्णाग्रिचपलं चेति नात्र स्थिरताऽऽसीदस्ति स्याद्वा। तथाऽत्र दिग्विभागादि नास्ति, बाह्यजडभित्तिमात्रमिदं दक्षिणपार्श्वमिदं वोत्तरमित्यादि, तस्मादस्रदिति समीक्षयेत्। एवं पुर्यष्टकप्रमातृभावोपशमात् शुद्धप्रमातृपदाविर्भावाद् भावको भैरवरूपो भवति ॥४७॥ अपने शरीर में त्वचा (चमड़ी) के रूप में जो बाहरी भाग विद्यमान है, उसकी भित्ति (दीवाल) के समान जड़ पदार्थ के रूप में भावना करे। उस त्वचा से आवृत शरीर के भीतर कुछ भी साररूप नहीं है, ऐसा ध्यान करते करते उस साधक को परतत्त्व का साक्षात्कार हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि पंचोकरण प्रक्रिया से पंच महाभूतों के परस्पर संबद्ध होने पर यह शरीर उत्पन्न होता है। यह स्थूल शरीर नाशवान् है, हाथी के कान की तरह अत्यन्त चंचल है, एक स्थान पर स्थिर नहीं रह पाता। इसमें न कभी स्थिरता थी, न है और न भविष्य में ही रहेगी। इसी तरह से इस शरीर के साथ दिशाओं के विभाग आदि की भी सत्ता नहीं है। इसका यह दक्षिण भाग है, यह उत्तर भाग है, यह सब कल्पना-प्रसूत होने से असत् है और निर्जीव दीवाल की तरह है। केवल प्रमाता ही सत्स्वभाव है, इस बात को जो व्यक्ति ठीक तरह से जानता है, वही ज्ञानी कहलाता है। इसलिये कि उसका १पुर्यष्टक के साथ प्रमातृभाव उपशमित, शान्त हो जाता है ॥४७॥ १. दि०-ख० । २. मात्रं-ख० । ३. ०न्त-ख० । १. पुर्यष्टक एक पारिभाषिक शब्द है। शास्त्रों में इसके अनेक अर्थ किये गये हैं। संक्षेप में सांख्य-संमत सूक्ष्म शरीर से इसकी तुलना की जा सकती है। स्पन्द-कारिका (श्लोक ४९)

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५४ : विज्ञानभैरव [ धारणा-२५ ] १हृद्याकाशे निलीनाक्षः पद्मसंपुटमध्यगः । अनन्यचेताः सुभगे परं सौभाग्यमाप्नुयात् ॥४८॥ हे सुभगे, हृदि भवे हृद्ये, हारिणि च आकाशे प्राणापानान्तरालपदे निलीनाक्षः, निलीनमक्षं मनस्तद्द्वारेण चान्येन्द्रियचक्रं यस्य तादृक्, पद्मसंपुटमध्यगः ऊर्ध्वाधरगत- पद्मसंपुटमध्यंगतो भावनयाऽनुप्रविष्टः । ऊर्ध्वगतं पद्मं प्रमाणम्, अधरगतं प्रमेयम् । तयोर्मध्ये चिन्मात्राख्ये प्रमातरि स्वस्वरूपे स्थितः । अत एव अनन्यचेताः, नान्यस्मि- श्चिन्मात्रातिरिक्ते चेतो यस्य तादृशः सन्, परं सौभाग्यं विश्वेश्वरतास्वरूपं परमानन्दम्, आप्नुयात् प्राप्नुयात् । हृत्पद्मे बद्धबाह्याभ्यन्तरेन्द्रियचक्रस्य बाह्यविषयोपरमादाभ्यन्त- रोदयः संभवेदित्यर्थः । प्रमेयादिरूपस्य संसारस्य निमेषोन्मेषात्मकसंकोचविकासधर्म- कत्वात् पद्मसंपुटेन रूपणा ॥४८॥ हे सुभगे, हृदय में उत्पन्न हुए मनोहर आकाश में, अर्थात् प्राण और अपान के मध्यवर्ती२ स्थान में जिसका आन्तर और बाह्य इन्द्रियचक्र (मन और उससे नियन्त्रित चक्षुरादि इन्द्रियां) लीन हो जाता है और जो ऊर्ध्व स्थान और अधर स्थान में विद्यमान पद्मों के संपुट के मध्य में भावना के बल से प्रविष्ट हो गया है, अर्थात् ऊर्ध्वगत प्रमाण रूपी पद्म और अधःस्थित प्रमेय रूपी पद्म के मध्य में चिन्मात्र प्रमाता के अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है और इसी लिये चिन्मात्रता के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु में जिसका चित्त संलग्न नहीं है, वह योगी विश्वेश्वरता रूप सौभाग्य के, परमानन्द के, विकसित हो जाने से अत्यन्त स्पृहणीय अवस्था को प्राप्त कर लेता है। अर्थात् बाह्य विषयों का उपराम हो जाने से उसमें आन्तर प्रकाश की अभिव्यक्ति हो जाती है। वहां प्रमेयादि रूप संसार का निमेष और उन्मेष व्यापार पद्मदल के संकोच और विकास के तुल्य है, इसीलिये इसकी पद्मसंपुट से तुलना की गई है। चित्त जब चित्प्रकाश से भर जाता है, तो वह चित्प्रकाश से परिव्याप्त इस सारे विश्व को में पंच तन्मात्रा, मन, अहंकार और बुद्धि की समष्टि को पुर्यष्टक बताया गया है। तन्मात्रा को विषयों (प्रमेय) का तथा अन्तःकरण को प्रमाण का उपलक्षक (प्रदर्शक) मान कर इस पंक्ति का यह सरल अर्थ किया जा सकता है कि ज्ञानी पुरुष की दृष्टि में प्रमाण और प्रमेय की कोई सत्ता न रह जाने से उसका संकुचित प्रमाता का स्वरूप तिरो- हित हो जाता है और निरावरण स्वात्मस्वरूप (शुद्ध प्रमाता = पर प्रमाता का स्वरूप) प्रकट हो जाता है। १. यह श्लोक शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १६) और प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ८९) पर उद्धृत है। २. प्राण और अपान के मध्यवर्ती स्थान से यहां सुषुम्ना (मध्य) नाड़ी अभिप्रेत है। बाह्य और आन्तर इन्द्रियचक्र का, प्रमाण और प्रमेय व्यापार का, इसी में लय हो जाता है। हृदय के मध्य में इसकी स्थिति मानी गई है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ५५ देख सकता है । "हृदये चित्तसंघट्टाद् दृश्यस्वापदर्शनम्" (१।१५) इस शिवसूत्र में, "स च सर्वेषु भूतेषु भावतत्त्वेन्द्रियेषु च । स्थावरं जङ्गमं चैव चेतनाचेतनं स्थितम् ।। अध्वानं व्याप्य सर्वं तु सामरस्येन संस्थितम् ।" (४।३०७-३०८) स्वच्छन्दतन्त्र के इन श्लोकों में तथा "तथा स्वात्मन्यधिष्ठानात् सर्वत्रैव भविष्यति" (श्लो० ३९) इस स्पन्दकारिका में यही विषय प्रतिपादित है ॥४८॥ [ धारणा-२६ ] सर्वतः स्वशरीरस्य द्वादशान्ते मनो¹लयात् । दृढबुद्धेर्दृढीभूतं तत्त्वलक्ष्यं प्रवर्तते ॥४९॥ सर्वतो रोमकूपान्तरेष्वपि चैतन्यदेवस्य प्रवेशेन स्वशरीरस्य द्वादशान्ते स्वकीये शरीरे द्वादशान्तो योऽस्ति तत्र मनोलयात् मनसो लयात् वासनाक्षयात्, अथवा द्वादशान्ते शून्यातिशून्ये मध्यधाम्नि सुषुम्णायां मनसो लयात् दृढबुद्धेर्योगिनः, दृढीभूतं प्राप्तै- काग्र्यं तत्त्वलक्ष्यं परप्रकाशरूपं प्रवर्तते प्रसरति ॥४९॥ अपने शरीर में, सब तरफ से रोमकूपों के भीतर भी, चैतन्यस्वरूपी देवता के प्रविष्ट हो जाने से शरीर स्थित द्वादशान्त में एकाग्रता-प्राप्त मन दृढ़तापूर्वक प्रविष्ट हो जाता है । अथवा द्वादशान्त, अर्थात् सुषुम्णा नामक मध्यनाडी के शून्यातिशून्य धाम में यह लीन हो जाता है । द्वादशान्त में लीन हो जाने के कारण मन की वासनाओं का क्षय हो जाने से योगी का चित्त एकाग्रता की ओर दृढ़तापूर्वक बढ़ता जाता है और अन्ततः वह विश्रान्ति दशा में पहुँच जाता है, जहाँ कि उसके हृदय में परतत्त्व का प्रकाश आलोकित हो उठता है । ‘सोषुम्नेऽध्वन्यस्तमितो हित्वा ब्रह्माण्डगोचरम्" (श्लो० २४) इस स्पन्दकारिका की विभिन्न व्याख्याओं में इस विषय का विस्तार अवलोकनीय है ॥४९॥ [ धारणा-२७ ] ¹यथा तथा यत्र तत्र द्वादशान्ते मनः क्षिपेत् । प्रतिक्षणं क्षीणवृत्तेर्वैलक्षण्यं दिनैर्भवेत् ॥५०॥ यथा तथेति स्वरसोदितेन येन तेन संवित्प्रसरप्रकारेण, यत्र तत्रेति पूर्वोक्तेषु यस्मिन् तस्मिन् प्रदेशे, द्वादशान्ते प्रतिक्षणं मुहुर्मुहुः, मनः क्षिपेत् एकाग्रीकुर्यात् । इत्थं क्षीणवृत्तेः प्रशान्तचाञ्चल्यस्य अस्य, दिनैरल्पेनैव कालेन, वैलक्षण्यम् असामान्यभैरवताऽ- भिव्यक्तिर्भवेत् स्यादेव । 'यथा यथा यत्र यत्र' इति पाठे तु येन येन प्रकारेण यस्मिन् यस्मिन् विषये मनोनिक्षेपणं तथा तथा तत्र तत्र वैलक्षण्यं भवेदित्यन्वयः ॥५०॥ १. °नो-क० ।

  1. तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७८) तथा प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ८९) में यह श्लोक मिलता है ।