भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : १३३ इससे यह स्पष्ट होता है कि तत्त्व-ज्ञान के लिये, चित्त की शुद्धि के लिये मिट्टी, जल आदि से की जाने वाली शारीरिक शुद्धि का तब तक कोई उपयोग नहीं है, जब तक कि व्यक्ति बहिर्मुख बना रहता है। जैसा कि निम्न श्लोक में बताया गया है— मृज्जलादिविशुद्धोऽपि न पवित्रो वहिर्मुखः । बहिर्निर्मलमध्यस्थपुरीषकलशादिवत् ॥ अर्थात् ऊपर से चमचमाता विष्ठा से¹ भरा घड़ा जैसे पवित्र नहीं माना जाता, उसी तरह ते स्नान-सन्ध्या से पवित्र बहिर्मुख व्यक्ति भी पवित्र नहीं माना जा सकता। धर्मशास्त्रों में भी देव सम्बन्धी और पितृ सम्बन्धी कार्यों में ही स्नान की आवश्यकता बताई गई है। यह कहीं भी नहीं लिखा गया है कि मिट्टी, जल आदि से शरीर की शुद्धि किये बिना कोई व्यक्ति ज्ञान का अधिकारी नहीं हो सकता । तत्त्व-ज्ञान के प्रति यह शुद्धि बाधक नहीं है, अतः शारीरिक शुद्धि का पालन तत्त्व- ज्ञानी करे तो इसमें आपत्ति नहीं है, किन्तु कर्मकाण्ड के लिये जैसे शुद्धि अनिवार्य है, वही स्थिति ज्ञान के विषय में नहीं है। इसके विपरीत यह हो सकता है कि मिट्टी आदि से शरीर को निर्मल बनाने पर उसकी सुन्दरता को देखकर तत्त्वज्ञानी का भी अभिमान पुनः एक बार जाग जाय । इससे वह अपनी अन्तर्मुख वृत्ति को भूल जायगा और उसकी बहिर्मुख वृत्ति पुनः जग उठेगी । इससे बचने के लिये ज्ञानी को अपनी ऐसी स्थिति बनानी चाहिये कि बार-बार अपने चिदात्मक स्वरूप का चिन्तन करते रहने से उसकी देह आदि की विस्मृति दृढ़ हो जाय । ऐसा योगी कभी अपने इस नश्वर शरीर की चिन्ता नहीं करता । जैसा कि भागवत में बताया गया है— देहं च नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् । (११।१३।३६) अर्थात् इस नश्वर शरीर की विभिन्न अवस्थाओं के प्रति योगी कोई ध्यान नहीं देता, क्योंकि उसने अपने स्वरूप को भलीभाँति जान लिया है। यदि मिट्टी, जल आदि से होने वाली शुद्धि का तत्त्व-ज्ञान में कोई उपयोग नहीं है, तो भगवान् ने गीता में 'आचार्योपासनं शौचं'¹ (१३।७) इत्यादि स्थल में शौच (पवित्रता) का विधान कैसे बताया है ? इससे तो यही ज्ञात होता है कि शौच भी तत्त्व-ज्ञान का अंग है, तत्त्व-ज्ञान के लिये इसको भी उपयोगिता है। यह बात सही हो सकती है, किन्तु शास्त्रों में

  1. शक्तिसंगम तन्त्र के—"विष्ठापूर्णे मृद्घटे तु बहिःशुद्धौ तु किं फलम् । अन्तःशुद्धिं समासाद्य बहिःशुद्धिं समाचरेत् ॥" (IV ११।७४--७५) इस श्लोक में भी यही बात कही गई है। अर्थात् मिट्टी का घड़ा यदि विष्ठा (मल-मूत्र) से भरा है, तो उसकी ऊपर से सफाई करने से क्या लाभ है ? अतः मन की शुद्धि के बाद ही शरीर की भी शुद्धि रखनी चाहिये, केवल शारीरिक शुद्धि से कुछ भी आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलने वाला है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)