भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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१३४ : विज्ञानभैरव मान्त्र, भौम, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण और मानस इन सात प्रकार के स्नानों का वर्णन मिलता है। इनमें मानस स्नान ही सर्वोत्तम माना गया है, जिसमें कि मन के द्वारा भगवान् के स्वरूप का ध्यान किया जाता है। अतः भगवद्गीता के उक्त वचन में इस मानस शौच की ही चर्चा मानी जानी चाहिये, शारीरिक शौच की नहीं। धर्मशास्त्रों में भी शारीरिक शौच को सामान्य धर्म ही माना गया है, इसके विपरीत तत्त्व-ज्ञान को परम धर्म माना गया है, जो कि मिट्टी, जल आदि से की गई शारीरिक शुद्धि से उत्पन्न होने वाले धर्म से अधिक श्रेय- स्कर है। जैसा कि याज्ञवल्क्य स्मृति में बताया गया है- इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम् । अयं तु परमो धर्मो यद् योगेनात्मदर्शनम् ॥ (१।८) अर्थात् इज्या (यज्ञ), आचार, दम, अहिंसा, दान, स्वाध्याय आदि की अपेक्षा योगा- भ्यास से आत्मदर्शन करना अधिक श्रेयस्कर है, उन सब से बढ़ कर धर्म है। उक्त शारीरिक शुद्धि के न करने पर परमात्मा की कोई हानि नहीं है, क्योंकि वह तो आकाश की तरह निराकार है। शुद्धि यदि की जाती है, उससे कुछ बढ़ोतरी होने वाली नहीं है। मिट्टी आदि से शुद्ध करने पर भी शरीर तो मलिन ही रहेगा। इस तरह से धर्म- शास्त्रों में प्रदर्शित शुद्धि शैव-शास्त्र की दृष्टि में अशुद्धि ही है। वास्तव में तो इस बाह्य शारीरिक शुद्धि के बिना भी निर्विकल्पक ज्ञान की सहायता से मन को निर्मल बना कर साधक स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो सकता है ॥१२०॥ [ धारणा-९८ ] सर्वत्र भैरवो भावः सामान्येष्वपि गोचरः । न च तद्व्यतिरेकेण परोऽस्तीत्यद्वया गतिः ॥१२१॥ सर्वत्र सर्वेषु प्रदेशेषु बाह्याभ्यन्तरेषु पदार्थेषु भावो भैरवः सत्स्वरूपो विज्ञा- त्रात्मा, न तु बौद्धादिवज्ज्ञेयशून्यरूपः, सामान्येषु विवेकहीनेषु, अपि गोचरः स्फुटः । सर्वेषां प्रमातृणां सकलप्रलयाकलादीनामहं जानामि, करोमीत्याद्यहंविमर्शस्य स्फुटतया स्फुरणात् । न च तद्व्यतिरेकेण भैरवव्यतिरेकेण परोऽन्यः कश्चिदस्तीति संबोध्याप्त्या अद्वया द्वयातीता गतिरद्वैतज्ञानमहंविमर्शस्यैक्यं स्यात् । अहंरूप एव परमेश्वरः । स तु प्रकट एव, किमाणवाद्युपायत्रयेण ? नहि स्फुटतरस्य उपायान्वेषणमुचितमिति भावः ॥१२१॥ सभी स्थानों में, बाह्य और आन्तर सभी पदार्थों में, भावस्वभाव, सत्स्वरूप विज्ञा- नात्मा का, न कि बौद्ध दार्शनिकों की तरह ज्ञेयशून्य स्वरूप का, विवेकहीन सामान्य जनों को भी स्पष्ट भान होता है, क्योंकि 1सकल, प्रलयाकल आदि सभी प्रमाताओं को 'मैं जानता हूँ', मैं करता हूँ' इस तरह से अहंविमर्श की स्पष्ट प्रतीति होती है। ये सारे विमर्श भैरव-विमर्श

  1. सकल, प्रलयाकल प्रभृति प्रमाताओं का निरूपण पृ० ३८ की २ टिप्पणी में किया जा चुका है।
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