भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : १११ अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वामृशन् । धावन् वा यत्पदं गच्छेत् तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ (श्लो० २२) इस श्लोक में भी इस स्थिति का वर्णन मिलता है, जिसकी कि व्याख्या पहले ही की जा चुकी है। स्पन्दनिर्णय (पृ० ४०-४१) में क्षेमराज का कहना है कि प्रस्तुत धारणा की ही तरह “आनन्दे महति प्राप्ते” (श्लो० ७०) और “क्षुताद्यन्ते” (श्लो० ११६) इन दोनों स्थलों में भी इस स्पन्द तत्त्व में प्रतिष्ठित होने की ही विधि बताई गई है ॥९९॥ [ धारणा-७७ ] 1इन्द्रजालमयं विश्वं न्यस्तं वा चित्रकर्मवत् । भ्रमद्वा१ ध्यायतः सर्वं पश्यतश्च सुखोद्गमः ॥१००॥ विश्वं ग्राह्यग्राहकात्मकमिदं सर्वं जगद् ज्ञानानुभवयुक्त्या निश्चितया बुद्ध्या इन्द्रजालनिभं मायानिर्मितम्, पटादिषु चित्रकर्मवत् न्यस्तं कल्पितम्, नावारूढस्य भ्रमद् गच्छत्तरुपर्वतादिवद् भ्रान्तिकल्पितं वा ध्यायतः पश्यतश्च सुखोद्गमः अक्षयसुखाविर्भावो भवति । ‘भ्रमतः’ इति पाठे भ्रमन्नपि ध्यायन्नपि पश्यन्नपीति योज्यम् ॥१००॥ यह सारा विश्व यद्यपि ग्राह्य और ग्राहक के रूप में दिखाई पड़ता है, किन्तु अनुभव और तर्क के द्वारा परिष्कृत बुद्धि से जब इसके स्वरूप पर विचार किया जाता है तो ये सब इन्द्रजाल (जादू के खेल) की तरह माया से निर्मित; कपड़े, कागज आदि पर बनाये चित्र के समान कल्पित; अथवा नाव आदि सवारी पर चढ़ कर चलने पर जैसे वृक्ष-पर्वत आदि चलते हुए से नजर आते हैं, उसी तरह से भ्रमपूर्ण, कल्पना से प्रसूत (उत्पन्न) मालूम पड़ते हैं। इस सही स्थिति का ज्ञान हो जाने पर और उसी में अपने ध्यान को केन्द्रित कर देने पर योगी के चित्त में अक्षय सुख का आविर्भाव हो जाता है। ‘भ्रमतः’ यह पाठ मानने पर इसका अर्थ होगा कि साधक जब अपने स्पन्द स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, तो वह भ्रमण करे, ध्यान करे अथवा देखे, उनमें अक्षय सुख की स्थिति सदा बनी रहती है। “शाक्ते क्षोभे” (५।७१) इत्यादि तन्त्रालोक के श्लोक की व्याख्या करते हुए जयरथ ने इस श्लोक को भी उद्धृत किया है ॥१००॥ [ धारणा-७८ ] न चित्तं निक्षिपेद् दुःखे न सुखे वा परिक्षिपेत् । भैरवि २ज्ञायतां मध्ये किं तत्त्वमवशिष्यते ॥१०१॥ हे भैरवि, सुखदुःखयोर्विषये चित्तस्थापनं न विधेयम्—अहं सुखी, अहं दुःखीति । शुद्धे स्वात्मनि अन्तःकरणधर्मान् सुखदुःखादीनध्यस्य न स्थेयमिति भावः । १. भ्रमतः-ख०, भ्रमाद्वा-त० । २. ध्या°-ख० ।

  1. तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३८०) में इसको देखा जा सकता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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