भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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११० : विज्ञानभैरव हाथी और चींटी आदि छोटे-बड़े सभी प्राणियों के शरीरों में, अर्थात् कीट से लेकर सदाशिव पर्यन्त सभी प्राणियों में चैतन्य की दृष्टि से कोई विशेष भेद नहीं है। अतः यह सब चिन्मय ही है, क्योंकि चैतन्य इन सब का साधारण धर्म है। इस तरह से सभी प्राणियों में चिन्मय निर्विशेष ब्रह्म विद्यमान है, इस भावना का दृढ़तापूर्वक अभ्यास करने वाला साधक इस संसार को जीत लेता है, इस दुस्तर संसार-सागर को पार कर लेता है। 'चिद्धर्माः' ऐसा पाठ मानने पर इसका अर्थ यह होगा कि देव, असुर, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावर, जंगम आदि सभी मूर्तियों में चिति (चैतन्य) समान रूप से विद्यमान है, चैतन्य की दृष्टि से इनमें परस्पर कोई विशेषता नहीं है। विशेषता केवल शरीरों की है, चिति की नहीं। इस तरह से चैतन्य- सामान्य सर्वत्र स्फुरित हो रहा है, इस अनुभव को दृढ़ता से अपनी भावना का आधार बनाने वाला योगी दुस्तर संसार-सागर को पार कर लेता है, उसको सर्वत्र चिन्मात्रस्वरूप ब्रह्म की प्रतीति होने लगती है। "चैतन्यमात्मा" (१।१) इस शिव-सूत्र की व्याख्या करते हुए क्षेम- राज ने इस श्लोक को प्रस्तुत किया है ॥९८॥ [ धारणा-७६ ] ¹कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यगोचरे । बुद्धिं निस्तिमितां कृत्वा तत्तत्त्वमवशिष्यते ॥९९॥ कामक्रोधादिषु मात्सर्यपर्यन्तेषु अरिषड्वर्गेषु बुद्धिं स्वसंविदं निस्तिमितामेकाग्रां विकारानधिगमान्निष्पन्दां कृत्वा विधाय तत् तत्त्वं चिन्मात्रस्वरूपमवशिष्यते । कामादिविषये चित्ते एकाग्र्यप्रकर्षादपहारितबाह्यविषयाश्लेषं चिदानन्दमयमेवावि- र्भवतीत्यभिप्रायः ॥९९॥ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य ये छः चित्तगत दोष शास्त्रों में अरिषड्वर्ग के नाम से प्रसिद्ध हैं । इन चित्त-वृत्तियों में से किसी एक उत्कट चित्त-वृत्ति में धारणा को स्थिर कर देने पर अन्य समस्त वृत्तियां शान्त हो जातो हैं। इसी स्थिति में योगी को निरन्तर स्पन्दनशील स्वात्मस्वरूप के विवेक में लग जाना चाहिये, जिससे कि उसकी वृत्ति पुनः बहिर्मुख न हो। ऐसा करने से उसकी बुद्धि एकाग्र हो जाती है, बाह्य विषयों का संपर्क छूट जाने से निश्चल (स्थिर) और विकारशून्य हो जाती है। इस प्रकार की वृत्ति-क्षय दशा को जगा कर योगी अपनी उत्कट काम, क्रोध आदि वृत्तियों को उसी तरह से शान्त कर लेता है, जैसे कि कछुआ अपने अंगों को भीतर समेट लेता है। भगवद्गीता (२।५८) में स्थितप्रज्ञ का लक्षण बताते समय इसी स्थिति की ओर इंगित किया गया है। इस स्थिति में योगी का केवल चित् स्वरूप बच रहता है । अर्थात् काम, क्रोध आदि विषयों में चित्त की एकाग्रता के बढ़ जाने पर जब अन्य बाह्य विषयों से उसकी बुद्धि का संपर्क छूट जाता है, तब साधक का चिदानन्दमय बोधस्वरूप अभिव्यक्त हो उठता है। स्पन्दकारिका के—

  1. स्पन्दनिर्णय (पृ० ४०) पर यह श्लोक उद्धृत है ।