विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : १०९ हे प्रिये, यदिदं घटादिज्ञानं तद् निराधारं निराश्रयम्, तत्त्वतः स्थिरस्य कस्य- चिदात्मनो घटादेराधारस्य वाऽवास्तवत्वात्। अत एव निर्निमित्तं निर्हेतुकम्, तत्त्वतश्चक्षुरालोकादिनिमित्तस्याप्यवास्तवत्वात्। भ्रमात्मकं मायावशोत्थितम्, विकल्पात्मकत्वात्, तत्त्वतो ज्ञानव्यतिरिक्तस्यान्यस्याभावात्। स एवायं घट इति संवेदनं तु सोऽयं गङ्गाया प्रवाह इतिवद् भ्रान्तिरेवेति भावः। अस्ति हि सर्वं चिन्मात्रम्, चिद्व्यतिरिक्तस्यान्यस्याभादित्येवं भावनादार्ढ्यात् शिव एव स्यादिति ॥९७॥ हे प्रिये, यह जो घट आदि का ज्ञान है, उसका कोई आधार नहीं है, क्योंकि वस्तुतः किसी स्थिर आत्मा अथवा घट आदि वस्तुओं की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। इसी लिये यह निर्हेतुक भी है, क्योंकि चक्षु, आलोक (प्रकाश) आदि पदार्थों की भी वास्तविक सत्ता नहीं है। इसी लिये यह सब कुछ भ्रमात्मक है, माया के कारण उत्पन्न है। अत एव विकल्प- स्वरूप है, क्योंकि ज्ञान के अतिरिक्त अन्य सभी वस्तुओं का अभाव है। 'यह वही घट है' इस तरह का ज्ञान 'यह वही गंगा का प्रवाह है' इस ज्ञान की तरह भ्रमात्मक ही माना जायगा। अर्थात् गंगा के प्रवाह में जैसे 'यह वही प्रवाह है' यह प्रत्यभिज्ञा भ्रान्ति-जन्य है, उसी तरह से घट, पट, देवदत्त आदि की प्रत्यभिज्ञा को भी भ्रमात्मक ही मानना चाहिये। इस तरह से अन्ततः सब कुछ चिन्मात्र, विज्ञानात्मक ही सिद्ध होता है। इस चिदात्मक विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी की भी सत्ता नहीं है, इस तरह की भावना का दृढ़ता से अभ्यास करने से साधक शिव हो जाता है। तन्त्रालोक (५।७१) में यह स्थिति 'सर्वात्म-संकोच' के नाम से वर्णित है और टीकाकार ने इस स्थिति के उदाहरण के रूप में इसी श्लोक को प्रस्तुत किया है ॥९७॥ [ धारणा-७५ ] ^1चिद्धर्मा सर्वदेहेषु विशेषो नास्ति कुत्रचित्। अतश्चयं तन्म सर्वं भावयन् भवजिज्जनः ॥९८॥ चिद् ज्ञानं क्रिया वा धर्मो गुणो यस्य स चिद्धर्मा चेतनः, सर्वदेहेषु हस्तिपिपी- लिकादिशरीरेषु सामान्यतया वर्तते, कीटादिसदाशिवान्तं नास्ति कुत्रचित् कश्चिद् विशेषः। अतश्च चैतन्यस्य साधारणत्वात् तन्मयं चिन्मयं सर्वं भावयन् निर्विशेषं ब्रह्म सर्वत्रास्तीति बोधमेवं धारयन् जनो भवजित् दुस्तरसंसारोत्तीर्णो भवति। 'चिद्धर्माः' इति पाठे देवासुरनरतिर्यगादिमूर्तिषु चिद्धर्माः सामान्येन सन्तीति न तत्र विशेषोऽस्ति कुत्रचित्। देहादेरेव विशेषोऽस्ति न तु चितेरिति भावयतः सर्वत्र चिदेव जृम्भतेऽनुभव- दाढ्यादित्यर्थः ॥९८॥ चित् अर्थात् ज्ञान अथवा क्रिया जिसका धर्म है, वह चेतन प्राणी चिद्धर्मा कहलाता है। यहाँ “धर्मादनिच् केवलात्” (५।४।१२४) इस पाणिनि सूत्र से अनिच् प्रत्यय होता है। १. °र्माः-ख०।
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३) पर यह श्लोक मिलता है।