भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 165

१०८ : विज्ञानभैरव कर स्पन्द तत्त्व के स्वरूप को जानने के लिये निरन्तर क्रियाशील रहता है, उद्योग करता रहता है, वह जाग्रदवस्था में ही अपने निज स्वभाव को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् जीवन्मुक्त हो जाता है । प्रस्तुत धारणा के अभ्यास से भी योगी इसी स्थिति को प्राप्त करता है ॥९५॥ [ धारणा -७३ ] ^१इच्छायामथवा ज्ञाने जाते चित्तं निवेशयेत् । ^२आत्मबुद्ध्याऽनन्यचेतास्ततस्तत्त्वार्थदर्शनम् ॥९६॥ अत्रापि ज्ञानं क्रियाया उपलक्षणम् । इच्छायां जातमात्रायाम्, ज्ञाने वा जाते सति, क्रियायां वा समुत्पन्नायाम् अनन्यचेताः विषयसंकल्पं विहाय आत्मबुद्ध्या आत्मैवैतदिति बुद्ध्या चित्तं निवेशयेत् निक्षिपेत् । ततस्तत्त्वार्थदर्शनं तयैव भावनया परमार्थज्ञानं भवेत् । सर्वस्मिन् स्वात्मरूपदृढभावनयाऽनन्यचेतसस्तत्त्वार्थदर्शनं स्यादेवेति भावः ॥९६॥ इस श्लोक में भी ज्ञान पद क्रिया का भी बोध कराता है । इच्छा, ज्ञान अथवा किसी क्रिया के उत्पन्न होने के साथ ही अपने चित्त को उसी में स्थिर करके अन्य सभी प्रकार के विषयों के संकल्प का परित्याग कर दे, 'यह सब कुछ आत्मा ही है' इस प्रकार की दृढ़ भावना से इच्छा, ज्ञान अथवा क्रिया में ही अपने चित्त को स्थिर कर अन्य सभी बाह्य विषयों से अपने चित्त को हटा ले । “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” (छा० ३।१४।१), “अयमात्मा ब्रह्म” (बृ० २।५।१९) इन श्रुतिवचनों के अनुसार सभी सांसारिक वस्तुओं में जब योगी का चित्त स्वात्मस्वरूप को ही देखने लगता है, तो इस भावना के दृढ़ होने पर परमार्थ तत्त्व का ज्ञान हो जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि जब योगी सभी पदार्थों को अपना ही रूप मानकर एकाग्र चित्त से उनमें अपनी धारणा को स्थिर कर देता है, तो उसको परमार्थ तत्त्व का परिज्ञान हो जाता है । इस श्लोक में सालम्बन अर्थात् साकार भावना का विधान है । नेत्रतन्त्र (८।४१-४४) में ^२अनुत्तर योग का विवेचन करते समय अनेक प्रकार की धारणाओं का निषेध किया गया है । क्षेमराज ने इसकी व्याख्या करते हुए सालम्बन भावना के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत किया है ॥९६॥ [ धारणा-७४ ] ^३निर्निमित्तं^४ भवेज्ज्ञानं ^३निराधारं प्रमात्मकम् । तत्त्वतः कस्यचिन्नैतदेवंभावी शिवः प्रिये ॥९७॥ १. तत्र-ने० । २. °तः स्यादात्म°-ने० । ३. निराधारं-त० । ४. निर्निमित्तं-त० ।

  1. नेत्रतन्त्र की उद्योत टीका (भा० १, पृ० २०१) में यह श्लोक मिलता है ।
  2. जैसा कि पृ० ९९ की २ टिप्पणी में बताया गया है, अनुत्तर योग का बौद्ध तान्त्रिक ग्रन्थों में विशेष वर्णन मिलता है । नेत्रतन्त्र में वर्णित पर योग अनुत्तर योग ही है, क्योंकि यह स्थूल और सूक्ष्म योग की अपेक्षा उत्कृष्ट है ।
  3. तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७९) में यह उपलब्ध है ।