विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : १०७ [ धारणा-७२ ] यदा ममेच्छा नोत्पन्ना ज्ञानं वा कस्तदाऽस्मि वै । तत्त्वतोऽहं तथाभूतस्तन्लीनस्तन्मना भवेत् ॥९५॥ यदा मम इच्छा न उत्पन्ना, ज्ञानं वा न उत्पन्नम्। ज्ञानमिति क्रियाया उप- लक्षणम् । क्रिया च नोत्पन्ना। तदा कोऽस्मि ? इच्छाज्ञानक्रियाणामनाविर्भावेऽहमेव नास्मि, किन्तु चिदानन्दरूप एवास्तीत्यर्थः। तदेवाह—तत्त्वतो वस्तुतः, तथाभूतश्चिदा- नन्दात्मक एवाहम् इति भावनयाऽनया तस्मिन् चिदानन्दस्वरूपे लीनस्तन्मना भवेत् तन्मयश्चिदानन्दमयो भवेत् ॥९५॥ इस श्लोक में ज्ञान पद क्रिया का भी बोध कराता है, अतः इसका अर्थ यह होगा कि जब मेरे अन्दर इच्छा, ज्ञान और क्रिया में से किसी की भी उत्पत्ति नहीं होगी, तो उस स्थिति में मेरा स्वरूप क्या होगा ? अर्थात् इनके अभाव में अहन्ता, ममता, इदन्ता की कोई भी स्थिति नहीं बन सकती, किन्तु उस अवस्था में तो चित् और आनन्द स्वरूप की ही स्थिति रहती है। इसलिये साधक को सदा इसी स्थिति की भावना करनी चाहिये कि वास्तव में मैं चित् और आनन्द स्वरूप ही हूँ। इस धारणा के अभ्यास से योगी उस चिदानन्द स्वरूप में ही लीन हो जाता है और अनन्तः स्वयं उसका चिदानन्दमय स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है। स्पन्दकारिका में इस स्थिति को इस प्रकार स्पष्ट किया है— गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥ अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्थगनोद्यताः । पातयन्ति दुरुत्तारे घोरे संसारवर्त्मनि ॥ अतः ^1सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये । जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ॥ (१९-२१ श्लो०) अर्थात् सत्त्व, रज, तम आदि गुण तथा महत्, अहङ्कार, तन्मात्रा, इन्द्रिय, पंच महा- भूत आदि सभी पदार्थ और इनके कारण प्रादुर्भूत होने वाली सुख, दुःख, मोह आदि की लहरें —ये सब अनन्त विशेषताओं को अपने में समेटे हुए स्पन्द तत्त्व से ही उठती हैं, इस बात को जानने वाले योगी के मार्ग में ये सब वस्तुएँ रुकावट नहीं डाल पातीं, उसके स्वरूप को नहीं ढक पातीं। इसके विपरीत ^2अप्रबुद्ध मनुष्य के स्वात्मस्वरूप को ढक कर ये वृत्तियाँ उसको घोर दुस्तर संसार-समुद्र में गिरा देती हैं। इसलिये जो व्यक्ति इस स्थिति को समझ
- स्पन्द तत्त्व के स्वरूप को समझने के लिये निरन्तर प्रयत्नरत रहने की बात यहाँ बताई गई है। इसीलिये "उद्यमो भैरवः" (१।५) इस शिवसूत्र में उद्यम को भैरव का ही स्वरूप माना गया है। योगवासिष्ठ में अनेक स्थलों पर पुरुषार्थ की बड़ी महिमा गाई गई है।
- अप्रबुद्ध आदि शब्दों के अर्थ के लिये १२८वें श्लोक की व्याख्या के अवसर पर की गई टिप्पणी देखनी चाहिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)