विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२ : विज्ञानभैरव किन्तु ज्ञायतां त्वया स्वयमेव विचारय त्वम्, मध्ये किं तत्त्वमवशिष्यत इति । सुखदुःख- योर्मध्ये यत् तत्त्वं तत्साक्षिभूतं तदनुसन्धातृ एकं चित्तत्त्वम्, एकाग्र्येण तदेव विमृश इति तात्पर्यम् । 'ध्यायताम्' इति पाठे हे भैरवि, चित्तैकाग्र्यं विधाय किं तत्त्वमवशिष्यत इति ध्यायतां तन्मध्ये ध्यानमध्ये भैरवोदयः स्यादित्यर्थः ॥१०१॥ हे भैरवि, अपने चित्त को न तो सुख के विषय में ही स्थापित करे और न दुःख के विषय में ही कि मैं सुखी हूँ या दुःखी हूँ। शुद्ध स्वात्मा में अन्तःकरण के धर्म सुख-दुःख आदि की कल्पना करनी चाहिये, किन्तु योगी को यह स्वयं विचार करना चाहिये कि इन दोनों के बीच में कौन सा तत्त्व बच रहता है ? सुख और दुःख के बीच में जो तत्त्व है, वही साक्षीभूत, सुख-दुःख का अनुसन्धाता, एक चित् तत्त्व है। एकाग्र भाव से योगी को उसी चित् तत्त्व पर अपने चिन्तन को केन्द्रित कर देना चाहिये। 'ध्यायताम्' ऐसा पाठ मानने पर इसका अर्थ यह होगा कि हे भैरवि, चित्त को एकाग्र करने पर सुख और दुःख के बीच में जो तत्त्व बच रहता है, उसमें अपने ध्यान को केन्द्रित कर देने वाले योगियों को उसी ध्यान में भैरव स्वरूप की अभिव्यक्ति हो जाती है ॥१०१॥ [ धारणा-७९ ] विहाय निजदेहास्थां सर्वत्राऽस्मीति भावयन् २ । दृढेन मनसा दृष्ट्या नान्येक्षिण्या सुखी भवेत् ॥१०२॥ निजदेहे आस्थां स्वदेहे प्रमातृतां न देहोऽहमित्यादिना विहाय, सर्वत्रास्मीति सर्वमिदमहमेवेति सदाशिवेश्वरादिवन्न तु 'चिद्धर्मा' (श्लो० ९८) इत्युक्तचिन्मात्रात्म- शिववत्, दृढेन निःसंशयेन, मनसा चित्तेन, तथा दृष्ट्या स्वसंविदा नान्येक्षिण्या प्रोक्त- वस्तुविमर्शैकाग्रया भावयन् सुखी भवेत् ॥१०२॥ अपने शरीर में आस्था, प्रमातृभाव को छोड़कर, अर्थात् मैं केवल इस देह में ही नहीं हूँ, किन्तु सदाशिव अथवा ईश्वर की तरह सर्वत्र मैं ही हूँ, सब कुछ मैं ही हूँ, इस भावना का अभ्यास करे। संशय रहित चित्त से तथा अपनी संवित्ति के बल पर, जो कि उक्त स्वरूप के विमर्श (विचार) में स्थिर है, अन्य किसी वस्तु का चिन्तन नहीं करती, इस भावना के विकास में लगा योगी सुखी हो जाता है। 'चिद्धर्मा' इत्यादि कारिका में सभी शरीरों में चिति की भावना का उपदेश दिया गया है। उसके विपरीत यहाँ अपने देह के अभिमान को छोड़कर सभी शरीरों में अपनी प्रमातृता, अपनी सत्ता के विकास की भावना का विधान है। इन दोनों धारणाओं का यह स्पष्ट अन्तर है। प्रस्तुत श्लोक में यह स्पष्ट किया गया है कि शिव और शक्ति का अपनी आत्मा के साथ सामरस्य संपादन करने वाले योगी के चित्त में समस्त विश्व के साथ अहंभाव की अभिव्यक्ति होती है, अर्थात् वह अपने को विश्वस्वरूप समझने लगता है। विश्वाहन्ता के १. ॰मस्मी-ख० । २. ॰येत्-ख० ।