भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ११३ विकास की यह प्रक्रिया विरूपाक्षपञ्चाशिका जैसे शास्त्रों में भी वर्णित है। तत्त्वमंजरीकार इस तरह के अहम्भाव को भी स्वीकार नहीं करते । वे बौद्ध मत का अनुमोदन करने में रस लेते हुए से कहते हैं— यतस्ततो वाऽस्तु भयं यद्यहं नाम किञ्चन । अहमेव न किञ्चिच्चेद् भयं कस्योपजायते ॥ अर्थात् यदि मैं कुछ होऊँ, तब मुझे इधर-उधर, जहाँ-तहाँ से भय हो सकता है । यदि मैं ही कुछ नहीं हूं, तो फिर भय किसको पैदा होगा । इसविचार से बौद्ध विद्वान् सहमत हैं, जब कि वे कहते हैं— सत्यात्मनि परसंज्ञा स्वपरविभागे च रागविद्वेषौ । अनयोः संप्रतिबद्धा सर्वे दोषाः प्रजायन्ते ।। (प्र० वा० १।२२१-२२२) अर्थात् अपनी आत्मा के रहने पर दूसरी आत्मा की बात उठती है । यह अपना है, यह पराया है, ऐसी कल्पना हो जाने पर अपने से राग और दूसरे से द्वेष उत्पन्न होने लगता है । समस्त प्राणियों में इस राग और द्वेष से जुड़े हुए ही अन्य समस्त छोटे-छोटे दोष उत्पन्न होते हैं । इसके विपरीत विमर्शदीपिका में इस अहम्भाव की एक अलग व्याख्या की गई है । जैसे कि— विश्वात्म विश्वोत्तीर्णं च स्वतन्त्रं दिव्यमक्षरम् । अहमित्युत्तमं तत्त्वं समाविश्य बिभेतिः कः ॥ अर्थात् विश्वात्मक होते हुए भी विश्वोत्तीर्ण, स्वतन्त्र, दिव्य, अक्षर तत्त्व ही 'अहम्' नाम से कहा जाता है। इस प्रकार के 'अहम्' तत्त्व में धारणा स्थिर हो जाने पर भय किसको छू सकता है ? किसी आचार्य ने ठीक ही कहा है— एककोऽहमिति संसृतौ जनस्त्राससाहसरसेन खिद्यते । एककोऽहमिति कोऽपरोऽस्ति मे इत्थमस्मि गतभीर्व्यवस्थितः ॥ अर्थात् इस संसार में जब मनुष्य यह सोचता है कि मैं अकेला हूँ, मेरा कोई सहायक नहीं है, तब वह भयभीत रहता है । किन्तु जब वह यह सोचता है कि मैं अकेला ही तो इस संसार में हूँ, यह सब कुछ मुझ से अलग छोड़े ही है, तब वह निर्भय होकर रहता है । इस प्रकार आगमशास्त्र में अहम्भाव को भगवत्स्वरूप ही माना गया है । अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ के द्वारा प्रतिपादित अहम्भाव की व्याख्या पहले (श्लो० ८८) की जा चुकी है । इस प्रकार यह अहम्भाव उपादेय है, त्याज्य नहीं । परिमित अहन्ता का, अहंकार का तो त्याग होना ही चाहिये । जैसा कि तपस्वीराज ने कहा है— सुविषमममतादंष्ट्राविदलितजनधैर्यशोणितपिपासुः । अहमिति पिशाच एष त्वत्स्मृतिमात्रेण किङ्करीभवति ।।