विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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विज्ञानभैरव : ११३ विकास की यह प्रक्रिया विरूपाक्षपञ्चाशिका जैसे शास्त्रों में भी वर्णित है। तत्त्वमंजरीकार इस तरह के अहम्भाव को भी स्वीकार नहीं करते । वे बौद्ध मत का अनुमोदन करने में रस लेते हुए से कहते हैं— यतस्ततो वाऽस्तु भयं यद्यहं नाम किञ्चन । अहमेव न किञ्चिच्चेद् भयं कस्योपजायते ॥ अर्थात् यदि मैं कुछ होऊँ, तब मुझे इधर-उधर, जहाँ-तहाँ से भय हो सकता है । यदि मैं ही कुछ नहीं हूं, तो फिर भय किसको पैदा होगा । इसविचार से बौद्ध विद्वान् सहमत हैं, जब कि वे कहते हैं— सत्यात्मनि परसंज्ञा स्वपरविभागे च रागविद्वेषौ । अनयोः संप्रतिबद्धा सर्वे दोषाः प्रजायन्ते ।। (प्र० वा० १।२२१-२२२) अर्थात् अपनी आत्मा के रहने पर दूसरी आत्मा की बात उठती है । यह अपना है, यह पराया है, ऐसी कल्पना हो जाने पर अपने से राग और दूसरे से द्वेष उत्पन्न होने लगता है । समस्त प्राणियों में इस राग और द्वेष से जुड़े हुए ही अन्य समस्त छोटे-छोटे दोष उत्पन्न होते हैं । इसके विपरीत विमर्शदीपिका में इस अहम्भाव की एक अलग व्याख्या की गई है । जैसे कि— विश्वात्म विश्वोत्तीर्णं च स्वतन्त्रं दिव्यमक्षरम् । अहमित्युत्तमं तत्त्वं समाविश्य बिभेतिः कः ॥ अर्थात् विश्वात्मक होते हुए भी विश्वोत्तीर्ण, स्वतन्त्र, दिव्य, अक्षर तत्त्व ही 'अहम्' नाम से कहा जाता है। इस प्रकार के 'अहम्' तत्त्व में धारणा स्थिर हो जाने पर भय किसको छू सकता है ? किसी आचार्य ने ठीक ही कहा है— एककोऽहमिति संसृतौ जनस्त्राससाहसरसेन खिद्यते । एककोऽहमिति कोऽपरोऽस्ति मे इत्थमस्मि गतभीर्व्यवस्थितः ॥ अर्थात् इस संसार में जब मनुष्य यह सोचता है कि मैं अकेला हूँ, मेरा कोई सहायक नहीं है, तब वह भयभीत रहता है । किन्तु जब वह यह सोचता है कि मैं अकेला ही तो इस संसार में हूँ, यह सब कुछ मुझ से अलग छोड़े ही है, तब वह निर्भय होकर रहता है । इस प्रकार आगमशास्त्र में अहम्भाव को भगवत्स्वरूप ही माना गया है । अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ के द्वारा प्रतिपादित अहम्भाव की व्याख्या पहले (श्लो० ८८) की जा चुकी है । इस प्रकार यह अहम्भाव उपादेय है, त्याज्य नहीं । परिमित अहन्ता का, अहंकार का तो त्याग होना ही चाहिये । जैसा कि तपस्वीराज ने कहा है— सुविषमममतादंष्ट्राविदलितजनधैर्यशोणितपिपासुः । अहमिति पिशाच एष त्वत्स्मृतिमात्रेण किङ्करीभवति ।।
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११४ : विज्ञानभैरव अर्थात् अहंकार की ममता रूपी बड़ी तीखी दाढ़ें होती हैं। इनकी पकड़ में आने पर मनुष्य का धैर्य छूट जाता है । तब यह अहंकार रूपी पिशाच उस मनुष्य का रक्त चूसने लगता है, अर्थात् उसकी सद्बुद्धि पर आवरण डाल देता है। किन्तु मनुष्य जब भगवान् की शरण में पहुँच जाता है, तो यही पिशाच उसका सेवक बन जाता है। भगवान् ने भगवद्गीता¹ के सोलहवें अध्याय में आसुरी सम्पत्ति के रूप में इस अहंकार रूपी पिशाच का बड़ा हृदयहारी वर्णन किया है ॥१०२॥ [ धारणा-८० ] घटादौ यच्च विज्ञानमिच्छाद्यं वा ममान्तरे । नैव सर्वगतं जातं भावयन्निति सर्वगः ॥१०३॥ सर्वगतं सदा सर्वत्र सर्वास्ववस्थासु परिदृश्यमानं यद् घटादौ विज्ञानं घटोऽय- मित्यादिनाऽनुभूयमानम्, यच्च ममान्तरे इच्छादिकम् एवं करोमीत्यादिना प्रतीयमानम्, तत्सर्वं जातमपि किमपि न भवति, निःसारत्वादिति भावयन् सर्वगः सर्वत्र प्रकाशस्वरूपः, स्यादिति शेषः । अथवा घटादौ विषये यदस्मदादेर्विषयिणो ज्ञानमिच्छाद्यं वा यदस्ति तन्ममै- वान्तरे हृदयमध्ये नैव, किन्तु सर्वगतं जातं तद्भवतीत्यन्वयः । एवकारो भिन्नक्रमः, स तु 'मम' इत्यनन्तरं बोद्धव्यः । सर्वेषां घटादीनामप्यस्मदादिविषयं ज्ञानमिच्छाद्यं वाऽस्ति । तेन किं जातम् ? घटादयोऽपि जानन्त्यस्मदादिज्ञानेन, तथा सदाशिवादिरपि क्रिमिपर्यन्तं मदात्मना जानाति इच्छति वा, क्रिमिरप्यस्मदादिप्रभृति सदाशिवान्तं जानाति इच्छति चेति ज्ञानक्रियात्मकं सर्वं सर्वात्मकमिति भावयन् धारणां कुर्वन् सर्वगतो भवेत् ॥१०३॥ सदा, सर्वत्र, सभी अवस्थाओं में दिखाई पड़ने वाला 'यह घट है' इस प्रकार का बाह्य घट प्रभृति पदार्थों का अनुभव और मेरे भीतर प्रतीत हो रहे, 'मैं ऐसा करता हूँ' इस प्रकार के इच्छा प्रभृति भाव, वे सब निःसार होने से पैदा होते हुए भी कुछ नहीं है। अतः उनकी शून्य रूप में भावना करने पर योगी सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, सभी स्थितियों में प्रकाश- स्वरूप हो जाता है। अथवा इस श्लोक की दूसरी व्याख्या इस तरह से की जा सकती है—घट आदि विषय में भी अस्मदादि विषयी का भान अथवा इच्छा प्रभृति भावों का उदय होता है, अर्थात् वह केवल मेरे हृदय में ही नहीं होते, किन्तु उनकी प्रतीति तो सर्वत्र घट-पट आदि में भी होती है । यहाँ 'नैव' के साथ जुड़े हुए एवकार को 'मम' के साथ जोड़ना चाहिये । तब श्लोक का अन्वय इस तरह से होगा—ममैव अन्तरे न, (किन्तु) सर्वगतं जातम् । तदनुसार ही यह
- भगवद्गीता में इस आसुरी सम्पत्ति का वर्णन 'आसुरं पार्थ मे शृणु' इस छठे श्लोक से लेकर 'आसुरीं योनिमापन्नाः' इस बीसवें श्लोक तक विस्तार से किया गया है ।
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विज्ञानभैरव : ११५ दूसरा अर्थ किया गया है । घट-पट आदि सभी पदार्थों में अस्मदादि विषयक ज्ञान अथवा इच्छा प्रभृति भाव विद्यमान हैं, यह कह कर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? इससे हम यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हमारे ज्ञान के घट आदि में संक्रान्त हो जाने से वे भी ज्ञानवान् हो जाते हैं । सदाशिव प्रभृति जैसे क्रिमि-कीट पर्यन्त सभी पदार्थों को अपने से अभिन्न मानते हैं और उनको चाहते हैं, उसी तरह क्रिमि-कीट भी अस्मदादि से लेकर सदाशिव पर्यन्त सभी को जानते हैं और उनको चाहते हैं । ज्ञान और क्रिया की इस समानता के आधार पर जगत् के सभी पदार्थ सर्वात्मक हैं । इस तरह की धारणा का अभ्यास करने वाला योगी सर्वत्र व्याप्त हो जाता है । यही विषय सोमानन्द की शिवदृष्टि में भी प्रतिपादित है— घटो मदात्मना वेत्ति वेद्म्यहं च घटात्मना ॥ सदाशिवात्मना वेत्सि स वा वेत्ति मदात्मना । नानाभावैः स्वमात्मानं जानन्नास्ते स्वयं शिवः ॥ (५।१०५-१०६, १०९) सभी भावों की सर्वात्मकता का प्रतिपादन शिवदृष्टि के प्रथम और पंचम आह्निक के अन्त में विस्तार से किया गया है । यह वहीं अवलोकनीय है ।।१०३।। [ धारणा-८१ ] १ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽयं१ संबन्धे सावधानता ।।१०४।। सर्वदेहिनां सदाशिवादिकीटान्तानाम् इदं ग्राह्यम् अयं ग्राहक इत्यादिना यो व्यवहारः स सामान्य एव । यदेको जानाति तदपरोऽपि जानातीति नात्र कश्चन विशेष इति भावः । परन्तु योगिनामयमेव विशेषः—सम्बन्धे ग्राह्यग्राहकस्वरूपावधारणे सावधानता ग्रहीतृरूपाविस्मरणम् ।।१०४।। सदाशिव से लेकर कीट पर्यन्त सभी प्राणियों में यह वस्तु ग्राह्य है और यह प्रमाता उसका ग्राहक है, इस तरह का व्यवहार समान रूप से विद्यमान है । इनके संवेदन (ज्ञान) में परस्पर कोई विशेषता या विलक्षणता नहीं है, क्योंकि किसी वस्तु को एक प्रमाता जिस तरह से देखता है, दूसरा प्रमाता भी उसी तरह से देखता है । यह तो योगियों की ही विशेषता है कि वे सम्बन्ध के प्रति अधिक सावधान रहते हैं, अर्थात् ग्राह्य और ग्राहक के स्वरूप का अवधारण करते समय उनको अपने चित् स्वरूप की कभी विस्मृति नहीं होती और वे इस १. ॰षोऽस्ति-क० ।
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १८, ६८), महा० परि० (पृ० १५४), तन्त्रा० वि० (भा० ७, आ० १०, पृ० १४०), ई० प्र० वि० वि० (भा० १, पृ० ७७; भा० २, पृ० ४०५), प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ३८) में यह श्लोक उद्धृत है । नेत्रतन्त्र० (भा० २, पृ० ३७), ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० ५०; भा० ३, पृ० ३०, ५२) में केवल चतुर्थ चरण उद्धृत है ।
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११६ : विज्ञानभैरव बात में सदा सावधान रहते हैं कि मैं स्मर्ता हूँ, सदा प्रकाशस्वरूप हूँ तथा मुझसे भिन्न सब कुछ वेद्य (ज्ञेय) है, अनित्य है, अत एव असत् कहलाता है। यह सत् और असत् वस्तु का विवेक कभी योगी से अलग नहीं होता। यह श्लोक, विशेष कर इसका चतुर्थ चरण अनेक ग्रन्थों में उद्धृत है। इससे इस श्लोक की महत्ता सिद्ध होती है। यह सावधानी लौकिक कार्यों को पूरा करने के लिए भी जब अत्यन्त आवश्यक है, तब योगी के लिए तो इसकी उपयोगिता के विषय में कहना ही क्या ! कहा जा सकता है कि किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए सावधानी पहली शर्त है ॥१०४॥ [ धारणा-८२ ] स्ववदन्यशरीरेऽपि संवित्तिमनुभावयेत् । अपेक्षां स्वशरीरस्य त्यक्त्वा व्यापी दिनैर्भवेत् ॥१०५॥ स्ववत् स्वीयदेहवत्, अन्यशरीरेऽपि स्वावयवभूते सर्वदेहसमूहे संवित्तिं चेतनां स्वकीयामहन्ताम्^२ अनुभावयेत् । कथम् ? स्वशरीरस्य अपेक्षां त्यक्त्वा चिन्मात्ररूपस्य मम सर्वत्र तुल्यस्थितित्वेन निखिलं जगन्ममैव वपुः, न तु एकदेशावयवतुल्योऽयं देहवराकः, एतस्मिन् देहावयवे नष्टेऽप्यन्ये सर्वे देहा मम सन्त्येवेति किमनेन ? इत्थं ममताविषयोकृतां स्वशरीरापेक्षां त्यक्त्वा कतिपयैर्द्दिनैरेव सर्वव्यापको भवेत् ॥१०५॥ किसी ज्ञान के लिये अपने शरीर की भी आवश्यकता रहती है, इस बात का विचार किये बिना अपने बाह्य देह की तरह दूसरे व्यक्ति के बाह्य देह में भी एक ही तरह की संवित्ति अनुगत रूप से प्रवाहित हो रही है, ऐसी भावना करे। अपने शरीर में अविनाभाव सम्बन्ध से विद्यमान संवित् का रूप दूसरे के बाह्य शरीर में भी अनुगत है, इस तरह के विचार को निरन्तर अभ्यास के द्वारा दृढ़ करे। इस भावना का अभ्यास करने से "तद्बुद्धय- स्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः" (५।१७) इत्यादि भगवद्गीता के वचन के अनुसार विदेह कैवल्य की सिद्धि हो जाती है। साथ ही "विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि" (५।१८) इस गीता वाक्य में उपदिष्ट पद्धति से सर्वत्र ब्रह्म का दर्शन करने से महाविदेह कैवल्य की भी प्राप्ति होती है। ^३विदेह कैवल्य और महाविदेह कैवल्य की सिद्धि हो जाने पर योगी में
- ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० ३११) में इस श्लोक का प्रथम और तृतीय चरण तथा वहीं (पृ० ४२७) उत्तरार्ध मात्र मिलता है।
- पृ० १०० की तीसरी टिप्पणी में विश्वाहन्ता की संक्षिप्त व्याख्या की गई है। इस विश्वाहन्ता का विकास होने पर योगी की अपने शरीर की ही भांति अन्य शरीरों में भी अहन्ता-बुद्धि स्थिर हो जाती है।
- विवेक ख्याति से मनुष्य जड़ से अर्थात् त्रिगुणात्मक प्रकृति से अपने को पृथक् अर्थात् द्रष्टा के रूप में समझ या पहचान सकता है। इस अवस्था में देह का बोध नहीं रहता, केवल निष्क्रिय आत्मस्वरूप ही रहता है। इसी स्थिति को साधारणतया विदेह कैवल्य के नाम Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ११७ परकायप्रवेश आदि के द्वारा नाना प्रकार के शरीरों में उन-उन कर्मों का भोग पूरा करने के अभिप्राय से विहार करने का और नाना सुखों को भोगने का सामर्थ्य आ जाता है । अपने देह का सहारा लिये बिना दूसरे के शरीर में संवित् स्वरूप की भावना कैसे करें ? इसका उत्तर श्लोक में ही 'स्ववत्' पद से दिया गया है । जैसे अपनी आत्मा में अपने शरीर का सहारा छोड़ कर योगी अपने संवित्स्वरूप का चिन्तन करता है, वैसे ही दूसरे के जीवित अथवा मृत शरीर में भी अपने संवित्स्वरूप के विमर्श को अनुगत करे । इसमें योगी की इच्छा ही नियामिका है कि वह अपने विमर्श को जीवित शरीर से अनुगत करेगा या मृत शरीर से । जीवित शरीर में विमर्श को अनुगत करने पर १वशिता, यत्रकामावसायिता आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । अपने संवित्स्वरूप के परामर्श के बल से किसी मरे हुए राजा आदि के शरीर में प्रविष्ट होकर योगी नाना प्रकार के भोगों को भोगता है, अथवा अपना अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध करता है । इससे यह सिद्ध होता है कि संवित्स्वरूप को कभी भी शरीर की अपेक्षा नहीं रहती, क्योंकि यह संवित्स्वरूप सर्वत्र अनुगत है । एक शरीर तो दूसरी जगह नहीं रह सकता । जैसे कि स्वप्नावस्था में चिदात्मा की तो अनुवृत्ति रहती है, क्योंकि स्वप्न के साक्षी के रूप में उस समय भी उसका स्फुरण विद्यमान है; किन्तु स्थूल शरीर उस समय नहीं रहता, क्योंकि उसकी वहाँ प्रतीति नहीं होती । सुषुप्ति अवस्था में तो केवल चिति की ही अनुवृत्ति रहती है, क्योंकि साक्षी के रूप में उस समय भी उसका स्फुरण विद्यमान हैं। अन्यथा यह कौन सोया है ? इस प्रश्न का उत्तर आप क्या देंगे ? इसके लिये स्वात्मस्वरूप संवित्ति की अनुवृत्ति माननी पड़ेगी । स्वप्नावस्था में जैसे स्थूल शरीर की निवृत्ति हो जाती है, उसी तरह सुषुप्ति दशा में सूक्ष्म शरीर की भी निवृत्ति माननी पड़ती है, क्योंकि उस अवस्था में गाढ निद्रा के कारण पदार्थों के दर्शन-स्पर्शन का आभास भी नहीं बच रहता । इसी तरह से चित्त के समाधिस्थ हो जाने पर तुरीय दशा में शुद्ध चिदानन्द का स्फुरण होने से आत्मा की वृत्ति रहती है, क्योंकि उस समय वह समाहित अवस्था में रहता है । सुषुप्ति दशा में प्रतीत होने वाले कारण देह रूप अज्ञान की भी तुरीय दशा में निवृत्ति हो जाती है । इस तरह से उक्त चार अवस्थाओं में उक्त तीनों शरीरों की नियमतः अनुवृत्ति नहीं होती, किन्तु आत्मा की संवित्स्वरूपता तो सर्वत्र अनुवृत्त रहती है । अतः इसके लिए उस-उस शरीर की अपेक्षा के न रहने से यह कहना से जाना जाता है । “बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः” (३।४३) इस योगसूत्र के व्यासभाष्य में विदेह और महाविदेह कैवल्य की व्याख्या की गई है और परकायप्रवेश की चर्चा आई है । . वशिता का अर्थ है सर्ववशीकार, सबको अपने वश में कर लेने का सामर्थ्य । यत्रकामाव- सायिता का तात्पर्य है जिस वस्तु को प्राप्त करने की चाह (इच्छा) योगी के मन में उत्पन्न होती है, वह अवसित हो जाती है, पूरी हो जाती है, उसकी इच्छा का कभी विघात नहीं होता ।
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११८ : विज्ञानभैरव ठीक ही है कि अपने शरीर की अपेक्षा को त्याग कर और सभी शरीरों को अपना ही मान कर योगी कुछ ही दिनों में सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, अर्थात् वह सांसारिक दोष-जालों से सर्वथा स्वतन्त्र हो जाता है । इस श्लोक का वास्तविक अभिप्राय यह है कि अपने शरीर की भाँति अन्य शरीरों में भी-“स्वाङ्गकल्पेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च सा” (४।१।४) इस प्रत्यभिज्ञाकारिका के अनुसार भगवान् की ज्ञान और क्रिया शक्ति का विकास मानकर सर्वत्र चैतन्य की समान स्थिति की ही भावना करे कि अपने शरीर की उपेक्षा कर देने पर अथवा सभी शरीरों को अपना मान लेने पर चिन्मात्रस्वरूप सर्वत्र समान रूप से अनुस्यूत (अनुगत) है । अर्थात् यह सारा जगत् मेरा ही शरीर है, इस तरह की भावना का योगी को अभ्यास करना चाहिये । इस एक शरीर के नष्ट हो जाने पर भी मेरे ये सब दूसरे शरीर तो विद्यमान हैं ही, इस भावना के आधार पर अपने शरीर की ममता योगी को छोड़ देनी चाहिये । इस बेचारे अपने एक शरीर को उस अंग की तरह नहीं मान लेना चाहिये, जहाँ से कि प्राण के निकल कर गले में अटक जाने पर व्यक्ति को मरा समझ लिया जाता है। ऐसी नासमझी कर बैठने पर तो यह साधक भी मृतप्राय, मुर्दे के बराबर हो जायगा। जैसा कि विरूपाक्षपंचाशिका के इस श्लोक में बताया गया है— 1 उत्क्रम्य विश्वतोऽङ्गात् तद्भागैकतनुनिष्ठिताहन्तः । कण्ठलुठत्प्राण इव व्यक्तं जीवन्मृतो लोकः ।। (श्लो० ५) ऐसी भूल न हो, इसके लिये साधक को चाहिये कि अपने शरीर की तरह अन्य शरीरों में भी स्वसंवित्ति की समान रूप से अनुवृत्ति की भावना करे । ऐसा करने पर वह कुछ ही दिनों में सर्वव्यापक हो जाता है । ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० २, पृ० ३११, ४२७) में दो स्थलों पर यह श्लोक उद्धृत है ।।१०५।। [ धारणा-८३ ] निराधारं मनः कृत्वा विकल्पान्न विकल्पयेत् । तदात्मपरमात्मत्वे भैरवो मृगलोचने ॥१०६॥ हे मृगलोचने, निराधारं त्यक्तबाह्यालम्बनं मनः कृत्वा यदा विकल्पान् न विकल्पयेत् संकल्पकला यदा न विकल्पयेत्, तदा आत्मपरमात्मत्वे जीवात्मपरमात्म- भावे, उभयोरप्यवस्थयोरिति यावत्, भैरव एव भैरवरूपः परमात्मैव भवति । संकल्प- कलया जीवत्वम्, निर्विकल्पदशया ब्रह्मत्वमित्यतो विकल्पान् न विदध्यादिति भावः ॥१०६॥
- श्लोक का अर्थ इस प्रकार होगा—अपने विश्वमय शरीर को अज्ञानवश भूलकर प्राणी मनुष्य, देव आदि के कल्पित स्थूल शरीर को अपना मानने लगता है । इस जरा-रोग ग्रस्त शरीर में उसके प्राण कंठ में अटके रहते हैं और वह जीवित रहता हुआ भी मुर्दे के समान लगता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ११६ हे मृगनयनि, बाह्य और आन्तर आलम्बनों का परित्याग कर मन को निराधार कर देना चाहिये और ऐसा कर लेने के बाद संकल्प-विकल्प के लवलेश को भी फिर मन के पास नहीं फटकने देना चाहिये । इस धारणा का अभ्यास पूर्ण हो जाने पर वह जीवात्मा की दशा हो या परमात्मा की, इन दोनों ही अवस्थाओं में भैरव स्वरूप ही मात्र बच रहता है । संकल्प की कला में जीवभाव और निर्विकल्प दशा में ब्रह्मभाव विद्यमान रहता है, अतः साधक को चाहिये कि वह सभी विकल्पों का परित्याग कर ब्रह्मभाव में, परभैरव स्वरूप में, समाविष्ट होने के लिये सतत इस धारणा का अभ्यास करता रहे ।।१०६।। [ धारणा-८४ ] ^1सर्वज्ञः सर्वकर्ता च व्यापकः परमेश्वरः । स एवाहं शैवधर्मा इति दाढर्याच्छिवो^१ ^२भवेत् ॥१०७॥ शिवस्यायं शैवो धर्मः स्वच्छस्वातन्त्र्यादिर्यस्य स शैवधर्मा, स एवाहम् अहमेव स सर्वज्ञः सर्वकर्ता व्यापकः परमेश्वर इति दाढर्यादसंदिग्धत्वेन भावनात् शिवो भवेत् परमशिवस्वरूपः स्यात् ॥१०७॥ ईश्वरप्रत्यभिज्ञा की निम्न कारिका में दो तरह की प्र भज्ञा का प्रतिपादन किया गया है । इसमें प्रथम प्रत्यभिज्ञा का स्वरूप यह है कि मैं शुद्ध बोधस्वरूप हूँ । दूसरे प्रकार की प्रत्यभिज्ञा यह है कि सारा जगत् मेरा ही विस्तार है, अर्थात् इस जगत् के रूप में मैं ही फैला हुआ हूँ । इन दोनों तरह की प्रत्यभिज्ञाओं का उदय हो जाने पर साधक विश्वमय हो जाता है । उस स्थिति में उसके चित्त में विकल्पों का प्रादुर्भाव होने पर भी वह अपनी शिवा- वस्था में ही प्रतिष्ठित रहता है । जैसे कि— सोऽहं ममायं विभव इति प्रत्यभिजानतः । विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥ (४।१।१२) शिवोपाध्याय का यहाँ कहना है कि प्रस्तुत श्लोक में और इसके आगे के श्लोक में प्रत्यभिज्ञा के इन्हीं दो स्वरूपों में धारणा को केन्द्रित करने का विधान है । मैं शुद्ध स्वरूप हूँ, प्रत्यभिज्ञा के इस अंश पर धारणा को स्थिर करने की विधि यह है कि साधक यह भावना करे कि स्वच्छ, स्वातन्त्र्य आदि शिव धर्मों से युक्त, सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, व्यापक, परमेश्वर मुझ से अलग नहीं है, अर्थात् ये सब धर्म मेरे ही हैं । इस तरह का दृढ़ निश्चय जब साधक के चित्त में गहरा पैठ जाता है, तो वह शिव ही बन जाता है, अर्थात् उसके चित्त में प्रथम प्रकार की प्रत्यभिज्ञा प्रकट हो जाती है और ऐसा होने पर जागतिक प्रपंच उसके चित्त में किसी प्रकार का विकार नहीं पैदा कर सकते, क्योंकि सभी अवस्थाओं में उसका यह शिवस्वरूप निरन्तर अनुस्यूत रहता है ॥१०७॥ १. °द् भवेच्छिवः-क० । २. °दयः-स्व० ।
- स्वच्छन्द० (भा० ६, पृ० १२, पृ० ७७), शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १७), महा० परि० (पृ० २५) और तन्त्रा० वि० (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७९) में यह उद्धृत है ।
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१२० : विज्ञानभैरव [ धारणा-८५ ] १जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालाभङ्ग्यः१ प्रभा रवेः । ममैव भैरवस्यैता विश्वभङ्ग्यो विभेदिताः२ ॥१०८॥ यथा जलस्य ऊर्मयो जलादेव, वह्नेर्वा ज्वालाः, रवेर्वा प्रभाः, तथा एता विश्व- भङ्ग्यो गमनागमनभोजनहवनदानप्रसारणनिर्गमनाद्याः संसारविच्छित्तिलहर्यो ममैव भैरवस्य मदीयादेव भैरवस्वरूपाद् विभेदिताः संजातभेदाः, सन्तीति भावयेदिति शेषः ॥१०८॥ यह जगत् मेरा ही विस्तार है, प्रत्यभिज्ञा के इस द्वितीय अंश पर धारणा को स्थिर करने की विधि यह है कि साधक यह भावना करे कि जैसे जल की लहरें जल से ही उठती हैं, अग्नि की ज्वाला अग्नि से ही निकलती है अथवा जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य से ही पैदा होता है, उसी तरह से स्वात्मस्वरूप भैरव से ही चलना-फिरना, भोजन, हवन, दान, प्रसा- रण, निर्गमन प्रभृति इस विश्व की सारी विचित्रताएँ प्रकट होती हैं। इस धारणा में दृढ़ता आ जाने पर योगी इस पूरे विश्व में अपने ही शिवस्वरूप को देखता है। शिवोपाध्याय का कहना है कि ईश्वरप्रत्यभिज्ञा की उक्त कारिका में कुछ लोग 'सर्वो ममाऽयम्' अथवा 'सर्गो ममाऽयम्' इस तरह के पाठभेद की कल्पना करते हैं, जो कि गलत है। यह बात तो सही है कि अभिनवगुप्त ने शिवोपाध्याय संमत पाठ को ही स्वीकार किया है और तदनुसार ही इसकी व्याख्या भी की है, यद्यपि वहाँ भी मूल में पाठ 'सर्वो ममाऽयम्' ही छपा है, किन्तु अपनी बात की पुष्टि में उनका यह कहना कहाँ तक उचित माना जा सकता है कि इन दो तरह की प्रत्यभिज्ञाओं के आधार पर ही 'स एवाहं शैवधर्मा (श्लो० १०७) और 'ममैव भैरवस्यैताः' (श्लो० १०८) विज्ञानभैरव के इन दो श्लोकों में दो तरह की धारणाओं का विधान किया गया है। इसका अर्थ तो यह हो जाता है कि विज्ञानभैरव की रचना उत्पल की ईश्वरप्रत्यभिज्ञा की रचना के बाद हुई, जहाँ कि उक्त दो प्रकार की प्रत्यभिज्ञा का विधान है, जिनके आधार पर कि विज्ञानभैरव में दो प्रकार की धारणाओं का विधान करना पड़ा। इसके विपरीत इस कल्पना को कौन रोक सकता है कि आपने ही विज्ञान- भैरव के इन दो श्लोकों के आधार पर 'सोऽहं ममायम्' इस पाठ की परिकल्पना कर ली है, क्योंकि विज्ञानभैरव एक ईश्वर प्रोक्त शास्त्र है और इसका आविर्भाव अवश्य ही उत्पल से पहले हो चुका होगा। अभिनवगुप्त के प्रमाण पर इसी पाठ को उचित मानने का आग्रह किया जाय, तो उस परिस्थिति में यही मानना उचित होगा कि प्रत्यभिज्ञाकार ने पूर्व पर म्परा से चली आ रही दो प्रकार की प्रत्यभिज्ञा का यहाँ वर्णन किया है, जिसकी कि स्पष्ट पुष्टि विज्ञानभैरव के इन दो श्लोकों से भी होती है ॥१०८॥ १. ङ्गाः-शि० त० । २. विनिर्गताः-शि० । १. शिवसूत्रवि० (पृ० १५) और तन्त्रा० वि० (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७९) में यह श्लोक उद्धृत है।
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विज्ञानभैरव : १२१ [ धारणा-८६ ] भ्रान्त्वा भ्रान्त्वा शरीरेण१ त्वरितं भुवि पातनात् । क्षोभशक्तिविरामेण परा संजायते दशा ॥१०९॥ शरीरेण स्वदेहेन पुनः पुनरतिशयेन परिभ्रम्य अन्ते तस्य शरीरस्य त्वरितं शीघ्रं भुवि पातनात् क्षोभशक्तिविरामेण भुवि स्थितस्य शरीरस्य वेगशक्तेर्विरामे सति प रा निर्विकल्पदशा संजायते प्रादुर्भवति ॥१०९॥ अपने शरीर को साधक उसी तरह से चारों तरफ तेजी से घुमावे, जैसा कि बच्चे चक्करघानी खाते समय तेजी से घूमते हैं। घूमते-घूमते वह अपने शरीर को पृथिवी पर गिरा दे । भूमि पर लुढ़क जाने पर उसको सब कुछ घूमता हुआ सा नजर आवेगा और थोड़ी देर के बाद एक विचित्र शान्ति का अनुभव होगा। यह एक प्रकार की निर्विकल्प अवस्था है। इस स्थिति में अपनी धारणा को स्थिर करने पर परम निर्विकल्प स्वात्मस्वरूप की अभि- व्यक्ति हो जाती है। टीकाकारों ने यहाँ पूजा के अंग के रूप में प्रदक्षिण परिभ्रमण का और जीव के नाना योनियों में जन्म-मरण की परम्परा का उल्लेख कर इनमें धारणा जमाने की बात कही है, जिनका कि प्रस्तुत ग्रन्थ की धारणा-पद्धति से कोई साम्य नहीं है ॥१०९॥ [ धारणा-८७ ] आधारेष्वथवा२ऽशक्त्या३ऽज्ञानाच्चित्तलयेन वा । जातशक्तिसमावेशक्षोभान्ते भैरवं वपुः ॥११०॥ आधारेषु ज्ञानविषयेषु पदार्थेषु अशक्त्या असामर्थ्येन, अथवा अज्ञानात् ज्ञानादे- रभावतः, वा अथवा, चित्तलयेन यो जातः शक्तौ अनाश्रिताख्यायां समावेशस्तेन क्षोभान्ते चञ्चलताविरामे सति भैरवं वपुः पूर्वोक्तस्वानुभवानन्दावस्थारूपम्, व्यज्यत इति शेषः ॥११०॥ आधार अर्थात् ज्ञान के विषयीभूत पदार्थों में असामर्थ्य के कारण जो चित्त का लय होता है, अथवा अज्ञान के कारण जो चित्त का लय होता है और इसके कारण जो अनाश्रित शक्ति में समावेश होता है, उससे क्षोभ अर्थात् चंचलता का विराम हो जाने पर साधक भैरव- शरीर हो जाता है, अर्थात् उसमें अपने अनुभव से ही जानी जा सकने वाली आनन्दात्मक अवस्था का आविर्भाव हो जाता है ॥११०॥ [ धारणा-८८ ] १सम्प्रदायमिमं देवि४ शृणु सम्यग् वदाम्यहम् । कैवल्यं जायते सद्यो नेत्रयोः स्तब्धमात्रयोः५ ॥१११॥ १. ॰राणि-ख० । २. ॰वा श०-ख० । ३. ध्या०-ख० । ४. भद्रे-ख० ई० । ५. इतः परम्-‘संकोचं कर्णयोः’ इत्यादिकः श्लोकोऽधिको वर्तते-क० ।
- ई० प्र० वि० वि० (भा० १, पृ० ७७; भा० ३, पृ० १६९, ३८६) में यह पूरा श्लोक अथवा उत्तरार्ध मात्र उद्धृत है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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१२२ : विज्ञानभैरव हे देवि, इमं सम्प्रदायं शृणु, अहं ते सम्यग् वदामि—नेत्रयोः स्तब्धमात्रयोः सर्वस्यास्य भेदाभेदमयस्य जगतो विस्मरणादन्तरात्मनि च दत्तदृष्टेर्योगिनः सद्यः कैवल्यं जायते, यत्र तत्र ज्ञानप्रकाशः स्यादेवेत्यर्थः । सर्वेषूक्तवक्ष्यमाणानुशासनेष्वेतेषु चिन्मात्रा- वधारणचित्तैकाग्र्याभ्यसनमभिप्रेतमस्तीत्यवधेयम् ।।१११।। हे देवि, सुनो । मैं तुम्हें उस परम्परा का उपदेश करता हूँ, जिसका कि सही पद्धति से अभ्यास करने पर, अर्थात् भैरवी मुद्रा में प्रदर्शित विधि से अपने नेत्रों को विषयों की ओर से समेट कर स्थिर कर लेने पर, इस सारे भेदात्मक और अभेदात्मक जगत् को भूलकर अपनी अन्तरात्मा की ओर दृष्टि फेर लेने पर योगी तत्काल कैवल्य को प्राप्त कर लेता है, जिस किसी भी परिस्थिति में हो शुद्ध स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । इस ग्रन्थ में पहले बताई गई अथवा आगे बताई जाने वाली सभी धारणाओं का मुख्य उद्देश्य चित्त की एकाग्रता के संपादन के द्वारा चिन्मात्र स्वरूप की अभिव्यक्ति है ।।१११।। [ धारणा-८९ ] ¹कूपादिके महागर्ते स्थित्वोपरि निरीक्षणात् । अविकल्पमतेः सम्यक् सद्यश्चित्तलयः स्फुटम् ।।११२।। कूप उदपानम्, आदिना गिरिशृङ्गादेर्ग्रहणम् । महागर्ते बृहत्सुषिरे कूपादौ स्थित्वा । सामीप्यं सप्तम्यर्थः । महाश्वभ्रादिसमीपे स्थित्वेति यावत् । उपरि निरीक्ष- णात् ऊर्ध्वमेव कूपाद्याकाशनिश्चलदृष्ट्यवलोकनाद्धेतोः, अविकल्पमतेः अविद्यमानो विकल्पो यस्याः सा तथाविधा मतिर्यस्य तस्य निर्विकल्पबुद्धेर्भावकस्य सद्यस्तत्क्षणमेव चित्तलयश्चित्तप्रशान्तिरिति स्फुटं निश्चितम् ।।११२।। बहुत गहरे कूप, खड्ड आदि के पास खड़ा होकर नीचे देखने पर अथवा पर्वत के ऊँचे शिखर के पास खड़ा होकर ऊपर ताकने पर एक अज्ञात भय की कल्पना से एक क्षण के लिये शरीर रोमांचित हो उठता है, चित्त निर्विकल्प दशा में प्रविष्ट हो जाता है । साधक जब इस क्षणिक निर्विकल्प दशा में अपने चित्त को तल्लीन कर लेता है, तो तत्क्षण उसका चित्त शान्त हो जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है । किसी भी भयानक स्थिति में कुछ क्षण के लिये वेद्य अथवा अवेद्य कोटि में प्रविष्ट नील-पीत आदि पदार्थों की कोई सत्ता नहीं रह जाती । इस स्थिति में भैरव का परम घोरतर स्वरूप ही मात्र भासित होता है । इस भैरव स्वरूप में चित्त को स्थिर लेने पर साधक का चित्त तत्काल शान्त हो जाता है और तब उसके चित्त में परभैरव स्वरूप शिव का शान्त स्वरूप अभिव्यक्त हो उठता है ।।११२।। १. ॰ते परिनि॰-ख० ।
- नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २००) में यह श्लोक मिलता है ।
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विज्ञानभैरव : १२३ [ धारणा-९० ] १यत्र यत्र' मनो याति बाह्ये वाऽऽभ्यन्तरे२ प्रिये । तत्र तत्र ३शिवावस्था व्यापकत्वात् क्व४ यास्यति ।।११३।। यत्र यत्र यस्मिन् यस्मिन्, बाह्ये नीलपीतादौ, अपि वा अथवा, आभ्यन्तरे सुखदुःखादौ, मनो याति मनोविकल्पः संवेदनं प्रसरति, तत्र तत्र स्फुरत्संवित्सतत्त्वे, शिवावस्था शिवस्य चित्प्रकाशस्य अवस्था अवस्थानं क्व यास्यति ? न क्वचिद् गमिष्यतीति भावः । अत्र हेतुः—व्यापकत्वादिति । दिक्कालाकारैः प्रकाशसारत्वात् प्रकाशमानैः प्रकाशात्मनः स्वात्मभैरवस्यानवच्छेदादित्यर्थः ।।११३।। हे प्रिये, जहाँ-जहाँ नील-पीत आदि बाह्य पदार्थों में अथवा सुख-दुःख आदि आभ्यन्तर विषयों में मन का, अर्थात् उसके संकल्प-विकल्पात्मक संवेदनों का प्रसार होता है, वहाँ-वहाँ संवित् स्वरूप शिव ही चित्प्रकाश अवस्था में विद्यमान है । ऐसी स्थिति में यह मन उसको छोड़ कर जायगा कहाँ ? इसका अभिप्राय यह है कि इस जगत् में ऐसी कोई स्थिति नहीं है, जहाँ कि शिव न प्रकाशित हो रहे हों । अतः जहाँ भी मन जायगा वहाँ शिव का प्रकाशात्मक स्वरूप अवश्य रहेगा । इसके विपरीत यह प्रकाशात्मक स्वात्मस्वरूप भैरव दिशा, काल, आकार आदि को तो प्रकाशित करता है, क्योंकि उसी भैरव के प्रकाश से ये प्रकाशित हैं, किन्तु ऐसा होते हुए भी वे उस प्रकाशात्मक भैरव को परिच्छिन्न नहीं कर सकते । इसी लिये यह प्रकाशात्मक भैरव मन से भी परिच्छिन्न नहीं हो सकता । इसके साक्षात्कार के लिये तो इस भावना के अभ्यास को ही तीव्र करना पड़ता है कि मेरा मन जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ- वहाँ सर्वत्र प्रकाशात्मक शिव विद्यमान है ! इस धारणा का दृढ़ अभ्यास करने पर वह स्वात्म- स्वरूप स्वयं प्रकाशित हो जाता है । यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ।। (६।२६) भगवद्गीता के इस वचन में चंचल मन को नियमित कर उसको आत्मप्रवण बनाने की बात कही गई है । इसके विपरीत प्रस्तुत श्लोक में यह बताया गया है कि मन जहाँ भी जायगा, वही प्रकाशात्मक स्वात्मस्वरूप विद्यमान रहेगा । अतः मन को उस विषय से हटा कर अन्तरात्मा की ओर खींच लाने की आवश्यकता नहीं है । किन्तु जहाँ भी मन लग जाय, उसको वहीं उसी स्थिति में स्थिर कर देना चाहिये । ऐसा करने से वहीं शिवावस्था विकसित हो जायगी, जिसकी कि चर्चा स्पन्दकारिका के (२८-३० श्लोकों) को उद्धृत कर पहले (श्लो० ३३ की व्याख्या में) की जा चुकी है । १. तत्र-यो० । २. °पि वा-क० । ३. परा°-यो० । ४. प्रकाश्यते-यो० ।
- परमार्थसार (पृ० १४८), स्वच्छन्द० (भा० ३, प० ७, पृ० ३१२) और योगिनी० दीपिका (पृ० १९२, २९९, ३४३) में यह श्लोक प्राप्त होता है ।
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१२४ : विज्ञानभैरव इस अवस्था को योगशास्त्र में छः समाधियों का अभ्यास पूरा हो जाने पर प्राप्त सप्तम समाधि कहते हैं, जो कि बिना ही प्रयत्न के (ईश्वर या गुरु की कृपा से अथवा स्वतः उत्पन्न प्रातिभ ज्ञान से) अपने स्वरूप का साक्षात्कार कराने में समर्थ होने के कारण 'नित्य समाधि' के नाम से प्रसिद्ध है। शिवोपाध्याय के द्वारा उद्धृत 1 वाक्यसुधा नामक ग्रन्थ में इन समाधियों के लक्षण बताये गये हैं। चित्त जब अखण्ड आत्मा में, अद्वयस्वरूप ब्रह्म में स्थिर हो जाता है, तो उसे 'समाधि' कहते हैं। इस समाधि का अभ्यास बाह्य और आन्तर विषयों को आलम्बन बना कर दो स्थानों में किया जा सकता है—भीतर और बाहर । आन्तर विषयों को आलम्बन बना कर हृदय प्रदेश में अभ्यस्त समाधि सविकल्पक और निर्विकल्पक के भेद से दो तरह की होती है। इनमें से सविकल्पक समाधि के भी दो भेद होते हैं—दृश्यसंपृक्त और शब्दसंपृक्त । इनमें से दृश्यसंपृक्त समाधि का स्वरूप इस तरह से बताया गया है— कामाद्याश्चित्तसादृश्यात् तत्साक्षित्वेन चेतनाम् । ध्यायेद् दृश्यानुविद्धोऽयं समाधिः सविकल्पकः ॥२४॥ अर्थात् काम, क्रोध आदि चित्त के धर्म हैं, क्योंकि इनमें परस्पर समानता है। अतः इनके साक्षी के रूप में अपनी चेतना को स्थिर करना चाहिये। यह दृश्यानुविद्ध सविकल्पक समाधि कहलाती है। इसको स्थूल सविकल्पक समाधि कहते हैं। सूक्ष्म सविकल्पक समाधि का स्वरूप वहीं इस तरह से वर्णित है— असङ्गः सच्चिदानन्दः स्वप्रभो द्वैतवर्जितः । अस्मीति शब्दविद्धोऽयं समाधिः सविकल्पकः ॥२५॥ अर्थात् मैं असंग, सच्चिदानन्द स्वरूप, स्वयंप्रकाश, अद्वय तत्त्व हूँ, इस भान (ज्ञान) में चित्त को अवस्थित करने का नाम सविकल्पक शब्दसंपृक्त समाधि है। इस तरह प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने से उक्त दो समाधि दशाओं की प्राप्ति हो जाने पर अपने आप होने वाली तीसरी निर्विकल्पक समाधि का स्वरूप यह बताया गया है— स्वानुभूतिरसावेशाद् दृश्यशब्दावुपेक्ष्य तु । निर्विकल्पः समाधिः स्यान्नि1वातस्थलदीपवत् ॥२६॥ अर्थात् स्वात्मस्वरूप के अनुभव का आनन्द मिलने पर दृश्य और शब्द की उपेक्षा कर साधक जब अपने चित्त को पवन रहित स्थान में रखे दीपक की तरह स्थिर कर लेता है, तो यह निर्विकल्पक समाधि कही जाती है। इस तरह सविकल्पक के दो भेदों के साथ इस निर्विकल्पक १. °र्वातस्थित°–वा० ।
- शंकराचार्य विरचित ग्रन्थों में वाक्यसुधा की भी गणना की जाती है। अन्य टीकाकार इसको विद्यारण्य की कृति मानते हैं। इसके २२-२३ श्लोकों में समाधि का लक्षण और उसके भेद बताये गये हैं। जैसे कि—"उपेक्ष्य नामरूपे द्वे सच्चिदानन्दवस्तुनि । समाधिं सर्वदा कुर्याद् हृदये चाथवा बहिः ।। सविकल्पो निर्विकल्पः समाधिर्द्विविधो हृदि । दृश्य- शब्दानुवेधेन सविकल्पः पुनर्द्विधा ।।" इनका अर्थ ऊपर टीका में कर दिया गया है।
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विज्ञानभैरव : १२५ समाधि को मिला देने से समाधि के तीन भेद हो जाते हैं। ये तीनों भेद आन्तर समाधि के हैं। सूर्य, चन्द्र, आकाश आदि बाह्य वस्तुओं को आलम्बन बनाने से भी समाधि के तीन भेद होते हैं। जैसे कि— हृदीव बाह्यदेशेऽपि यस्मिन् कस्मिंश्च वस्तुनि । समाधिराद्यः सन्मात्रे१ नामरूपपृथक्स्थितः ॥२७॥ अर्थात् हृदय की ही भांति जिस किसी बाह्य आलम्बन चन्द्र, सूर्य, आकाश प्रभृति सत्स्वभाव दृश्यों के नाम और रूप की अलग-अलग हो रही प्रतीति में चित्त को स्थिर करना दृश्यानुविद्ध सविकल्पक समाधि कही जाती है। शब्दानुविद्ध सविकल्पक समाधि का स्वरूप यह है— अखण्डैकरसं वस्तु सच्चिदानन्दलक्षणम् । इत्यविच्छिन्नचिन्तेयं समाधिर्मध्यमो भवेत् ॥२८॥ अर्थात् सच्चिदानन्द स्वरूप वस्तु अखण्ड और एकरस है, इस तरह की निरन्तर प्रवहमान चित्त की दशा को मध्यम समाधि, अर्थात् शब्दानुविद्ध सविकल्पक समाधि कहते हैं। बाह्य आलम्बन में भी केवल ब्रह्माकार वृत्ति का उदय होने पर जब मन निश्चेष्ट हो जाता है, तो यह निर्विकल्पक समाधि संपन्न होती है, जिसका कि लक्षण इस प्रकार बताया गया है— स्तब्धीभावो रसास्वादात् तृतीयः पूर्ववन्मतः । एतैः समाधिभिः षड्भिर्नयेत् कालं निरन्तरम् ॥२९॥ अर्थात् ब्रह्म से भिन्न बाह्य वस्तु कुछ भी नहीं है, इस भावना के अभ्यास से मन को निश्चेष्ट कर देने पर तीसरी निर्विकल्पक समाधि की उपलब्धि होती है। इस तरह से इन छः प्रकार की समाधियों का अभ्यास करता हुआ साधक निरन्तर कालयापन करता रहे। इन समाधियों के पुष्ट हो जाने पर स्पन्दकारिका में प्रदर्शित जीवन्मुक्त दशा की प्राप्ति हो जाती है, जो कि विज्ञानभैरव की प्रस्तुत धारणा का भी लक्ष्य है। वाक्यसुधा में इस स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया गया है— देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः ॥३०॥ अर्थात् देह में अहंभाव के नष्ट हो जाने पर और परमात्मा के स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर जहाँ जहाँ मन जाता है, वहीं वहीं समाधि लग जाती है। स्वच्छन्दतन्त्र में भी यही स्थिति इस तरह से वर्णित है— यत्र यत्र मनो याति ज्ञेयं तत्रैव चिन्तयेत् । चलित्वा यास्यते कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥ (४।३१३) अर्थात् जहाँ जहाँ मन जाता है, उसी विषय के साथ अपने ध्येय को एकाकार बना उसका चिन्तन करने लगे। जब सब कुछ शिवमयं ही है, तब यह चित्त अन्ततः जायगा कहाँ ? इसका अभिप्राय यह है कि जब सब कुछ शिव ही शिव है, तब जिस किसी भी विषय पर मन आकृष्ट हो, उसको रोकने का प्रयास न करे, किन्तु सहज गति से उस विषय को भी शिव १. °त्रान्नामरूपपृथक्कृतिः-वा० ।
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१२६ : विज्ञानभैरव का ही स्वरूप मान कर मन को वहीं स्थिर कर दे । इस प्रकार के अभ्यास के स्थिर हो जाने पर अन्ततः मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है ॥११३॥ [ धारणा-९१ ] ¹यत्र¹ यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते विभोः२ । तस्य तन्मात्र³धर्मित्वाच्चिल्लयाद् भरितात्मता४ ॥११४॥ यत्र यत्र नीलसुखादौ, अक्षमार्गेण चक्षुरादिसुषिरमार्गेण, विभोः प्रभोः पर- भैरवात्मनः, चैतन्यं चित्प्रकाशः, अभिव्यज्यते स्फुरति, तस्य नीलसुखादेः, तन्मात्र- धर्मित्वात् दर्पणप्रतिबिम्बिताभासवैचित्र्येण चैतन्यमात्रस्वभावत्वात्, चिल्लयात् चितौ लयाद् विश्रान्तेः, भरितात्मता परभैरवस्वरूपता । भावनाया अस्या दाढर्येन भावकः ‘अहमेव विश्वमयो महच्चैतन्यभरितः’ इत्यनुभूततात्त्विकावस्थः संपद्यत इति भावः । यथा घनीभूतः प्रकाश एव सूर्यमण्डलं जातम्, तथा चिदेव हि आश्यानीभूता जगदा- त्मना भातीत्याम्नायः ॥११४॥ जहाँ जहाँ नील, सुख प्रभृति बाह्य अथवा आन्तर भावों में चक्षु प्रभृति बाह्य अथवा आन्तर इन्द्रियों के माध्यम से प्रभु परभैरव स्वरूप आत्मा का चित्प्रकाश अभिव्यक्त होता है, वहाँ वहाँ उन नील, सुख आदि भावों को केवल चित्प्रकाशात्मक ही मानना चाहिये। यदि इनको चैतन्य से अतिरिक्त माना जाय तो इनकी चेत्यता अर्थात् ज्ञानविषयता भी नहीं बन सकेगी, ये ज्ञान के विषय भी न हो सकेंगे । दर्पण में प्रतिबिम्बित हो रहे नाना प्रकार के आभास जैसे दर्पणमात्र स्वभाव हैं, दर्पण के अतिरिक्त इनकी कोई सत्ता नहीं है, दर्पण के कारण ही इनकी प्रतीति होती है; उसी तरह से प्रकाशात्मक शिव में स्थित चैतन्यमात्र स्वभाव ही यह सारा जगत् है, प्रकाशात्मक चैतन्य के अतिरिक्त इसकी कोई सत्ता नहीं है, चैतन्य के कारण ही यह भासित हो रहा है। इस धारणा का अभ्यास करने से यह भावना दृढ़ हो जाती है कि उस विभु के अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीं है। ऐसा विचार करते-करते साधक इस सारे विश्व की भित्तिभूत ( आधारस्वरूप ) चिति में लीन हो जाता है और उसका परभैरव स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है, उसको अपनी तात्त्विक पूर्णता का बोध हो जाता है कि अखण्ड चैतन्य से ओतप्रोत यह सारा विश्व मैं ही हूँ। जैसे घनीभूत प्रकाश ही सूर्यमण्डल कहलाता है, उसी तरह से यह घनीभूत चिच्छक्ति ही जगत् के रूप में भासित होने लगती है। आगमशास्त्र की यह प्रमुख मान्यता है। इसका अभिप्राय यह है कि जैसे १. तत्र तत्रा°-यो० । २. प्रभोः-यो० । ३. °रूपत्वा°-यो० । ४. स्थितिः-यो०, मतिः-यो० ।
- तन्त्रालोकवि० ( भा० ११, आ० २९, पृ० ८२ ), शिव० विम० (पृ० ४२), योगिनी० दीपिका (पृ० १९२, २६४, २९९, ३३३. ३४३) में यह उपलब्ध है। तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० २१) में ऐसा पाठ मिलता है—"येन येनाक्षमार्गेण यो योऽर्थः प्रतिभासते । स्वावष्टम्भबलाद् योगी तद्गतस्तन्मयो भवेत् ॥"
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विज्ञानभैरव : १२७ ¹घनीभूत (जमा हुआ) घृत अथवा हिम (बर्फ़) ही पिघल कर तरल बन जाता है, उसी तरह से घनीभूत चिच्छक्ति ही जगत् का रूप धारण कर लेती है । तरल द्रव्य जैसे घन द्रव्य से भिन्न नहीं है, उसी तरह से यह जगत् भी उस चिच्छक्ति से अतिरिक्त नहीं है । अतः सर्वत्र चिति की उपस्थिति के कारण जहाँ कहीं भी धारणा स्थिर की जायगी, वहीं चैतन्य की अभिव्यक्ति हो जायगी ॥११४॥ [ धारणा-९२ ] ²क्षुता¹द्यन्ते भये शोके गह्वरे वा रणाद्² द्रुते । कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्ता³ समीपगा ॥११५॥ क्षुतादीनां छिक्काप्रभृतीनामन्ते, भये, शोके, गह्वरे, रणाद् द्रुते, कुतूहले, क्षुधा- दीनां बुभुक्षापिपासादीनामन्ते वा ब्रह्मसत्ता अनवच्छिन्नचिदानन्दस्फुरत्ता समीपगा निकटस्थिता । तां तत्र तत्रावसरे विमृश्य सुप्रबुद्धः समाविशेत् । अप्रबुद्धः पुनरत्र मूढ एव तिष्ठतीति भावः ॥११५॥ छींक आने के बाद अथवा भय, शोक, आदि भावों के उत्पन्न होने पर, गढ्ढे में गिर पड़ने पर, युद्धस्थल से भाग जाने पर, किसी आश्चर्यजनक घटना के घट जाने पर या भूख- प्यास आदि तीव्र संवेगों की निवृत्ति हो जाने पर एक क्षण के लिये ब्रह्मानन्द सरीखे आनन्द का अनुभव होता है । व्यक्ति का अनवच्छिन्न चिदानन्द, जो कि जीव दशा के कारण अवच्छिन्न हो गया था, कुछ क्षण के लिए अपने परमार्थ स्वरूप में प्रकट हो जाता है । इन अव- सरों का लाभ उठाकर अर्थात् कुछ क्षण के लिये अभिव्यक्त अपने सहज स्वरूप में धारणा का अभ्यास कर उसको स्थायी बना लेने वाला सुप्रबुद्ध साधक समावेश दशा में लीन हो जाता है । इसके विपरीत अप्रबुद्ध साधक उस ब्रह्मसत्ता के पास पहुँच कर भी उसको जान नहीं पाता । “अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा” (श्लोक २२) इत्यादि स्पन्दकारिका से भी इस धारणा की पुष्टि होती है ॥११५॥ [ धारणा-९३ ] वस्तुषु स्मर्यमाणेषु दृष्टे देशे मनस्त्यजेत् । स्वशरीरं निराधारं कृत्वा प्रसरति प्रभुः ॥११६॥ स्मर्यमाणेषु स इति तदिति स्मृतिज्ञानेन वेद्यमानेषु, वस्तुषु पदार्थेषु, दृष्टे देशे- ऽनुभवशक्तौ स्वाधारभूतायाम्, मनस्त्यजेत् प्रक्षिपेद् एकाग्र्येणादध्यात्, अनुभवपूर्वकत्वात् स्मृतेः । स्वशरीरं स्वदेहं निराधारं निरालम्बनमहिकञ्चुकवदसङ्गं विभावयेत् । ततोऽनुभवरूपः प्रभुः स्मरणानुभवयोः स्मर्यमाणानुभूयमानयोश्च एकत्वानुसन्धात्रात्मा, १. क्रोधा°-स्पप्र० । २. वारणद्रुते-ख० स्पनि०, वारणे रणे-स्पप्र० । ३. °मयी दशा-क० ।
- इसके स्पष्टीकरण के लिए पृ० ४ की ३ संख्या की टिप्पणी देखनी चाहिये ।
- स्पन्दनिर्णय (पृ० ४१) और स्पन्दप्रदीपिका (पृ० १०७) में उद्धृत है ।
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१२८ : विज्ञानभैरव प्रसरति प्रादुर्भवति । अत्रायं भावः—अनुभवात् स्मरणादौ सूत्र इव मणिगणः प्रोतश्चैतन्यप्रसर इति सिद्धम् । अतस्तमेव ध्यायेत् ततः स्वयमेव प्रभुः प्रादुर्भवतीति निश्चय इति ।।११६।। किसी सहकारी उद्बोधक के रहने पर हमारे मन में अनेक प्रकार की स्मृतियाँ जागती रहती हैं। स्मृति से प्रतीत हो रहे ऐसे पदार्थों के उपस्थित होने पर उन स्मृतियों के आधारभूत अनुभव में अपने मन को नियोजित कर दे । प्रत्येक स्मृति का जन्म अनुभव के आधार पर ही होता है, अतः जिस अनुभव से स्मृति का जन्म हुआ, उस स्मृति के उपस्थित होने पर उसका परित्याग कर उसके 'आधारभूत ज्ञान को पूरी सावधानी से पकड़े । इसके साथ ही अपने शरीर को भी इस अनुभव से अलग कर दे । साँप जब केंचुली उतार देता है, तो उस केंचुली से जैसे उसको कोई माया-मोह नहीं रहता, उसी तरह से साधक को चाहिये कि जब उसने स्मृति का परित्याग कर उसके आधारभूत अनुभव को पकड़ा है, तो उस समय उस शरीर के साथ भी ममता को छोड़ दे, जिसमें कि रहकर वह अनुभवों और स्मृतियों को तथा उनके संस्कारों को संचित करता रहता है । इस स्थिति में उसका चित्त अहन्ता, ममता और संचित वासनाओं के अभाव में शुद्ध अनुभव रूप हो जाता है । वह स्मृति और अनुभव में तथा स्मर्यमाण तथा अनुभूयमान पदार्थों में किसी प्रकार का भेद नहीं देखता । यही तो प्रभु का, परभैरव का वास्तविक स्वरूप है । अतः इस धारणा के अभ्यास से साधक के चित्त में निरन्तर अनुभव दशा का ही स्फुरण होते रहने से परभैरव स्वरूप का प्रकाश आलोकित हो उठता है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे माला की सारी मणियां तागे में गुँथी रहती हैं, वैसे ही सारी स्मृतियाँ अनुभवों में गुँथी रहती हैं । यह अनुभव स्वात्मचैतन्य स्वरूप है । अतः जिस किसी भी अनुभव को अपनी धारणा का विषय बनाया जाय, उसमें इस स्वात्मचैतन्य की भावना करने से यह परभैरव स्वरूप स्वात्मचैतन्य प्रकट हो जाता है । अतः साधक को इसी में अपनी धारणा स्थिर करनी चाहिये ।।११६।। [ धारणा-९४ ] क्वचिद्वस्तुनि विन्यस्य शनैर्दृष्टिं निवर्तयेत् । तज्ज्ञानं चित्तसहितं देवि शून्यालयो भवेत् ।।११७।। हे देवि, क्वचिद्वस्तुनि कस्मिंश्चिद् वस्तुनि दृष्टिमक्षिरूपां विन्यस्य निक्षिप्य, कञ्चित् पदार्थं घटोऽयमित्येवं दृष्ट्वेत्यर्थः । तज्ज्ञानं शनैः शनैस्तस्य पदार्थस्य ज्ञानम्, चित्तसहितं तद्विषयसंकल्पसहितम्, तद्वासनायुक्तमिति यावत् । निवर्तयेत् शून्यभावनया, अन्तर्लक्ष्यबहिर्दृष्टिन्यायेन वा । तेनैव शून्यालयः शून्ये आलयो विश्रान्तिर्यस्य एवंविधः संयमी भवेत् ।।११७।। हे देवि, जिस किसी भी घट-पट आदि पदार्थ में अपनी दृष्टि डालकर, अर्थात् घट-पट आदि किसी भी पदार्थ को सावधानी से देखकर, धीरे-धीरे उस पदार्थ के ज्ञान को उसके संकल्प के साथ और उस अनुभव से संचित वासनाओं के साथ चित्त से निकाल दे । अनुभव, संकल्प और वासनाओं को अपने चित्त से निकाल देने के लिए साधक शून्यभावना का सहारा ले कि
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विज्ञानभैरव : १२९ यह सारा विश्व शून्य स्वभाव है, आकाश के समान रूपहीन है, इसका कोई स्वरूप नहीं है, अस्तित्व नहीं है । अथवा शांभवी¹ मुद्रा की सहायता से, जिसमें कि दृष्टि के बाहर रहने पर भी लक्ष्य भीतर ही रहता है, इस कार्य को संपन्न करे । अर्थात् वह अपने शुद्ध स्वरूप को ही देखे और उससे भिन्न सभी विकल्प वासनाओं का परित्याग कर दे । ऐसा करने से, इस धारणा के अभ्यास से, संयमी साधक शून्य में लीन हो जाता है, परम पद में विश्राम प्राप्त कर लेता है ॥११७॥ [ धारणा-९५ ] ²भक्त्युद्रेकाद् विरक्तस्य यादृशी जायते मतिः । सा शक्तिः शाङ्करी नित्यं भावयेत् तां ततः शिवः ॥११८॥ भक्त्युद्रेकाद् भक्त्यतिशयेन विरक्तस्य शान्तचित्तस्य भक्तस्य चित्ते साधकचित्त- समाधानेन यादृशी मतिर्जायते सा शाङ्करी शक्तिरिति गीयत इति तामेव नित्यं भावयेत् । ततः साधकः शिवः शिवमयः स्यात् ॥११८॥ भक्ति के उद्रेक से अर्थात् आधिक्य से विरक्त अर्थात् शान्तचित्त भक्त के चित्त में साधक के चित्त के समाहित हो जाने से जिस तरह की बुद्धि उत्पन्न होती है, वह शांकरी शक्ति कही जाती है । अर्थात् ईश्वर के अनुग्रह (शक्तिपात) से भक्त के हृदय में ऐसी भावना पैदा होती है कि वह सब कुछ भूलकर शान्त भाव से निरन्तर ईश्वर के चिन्तन में लगा रहता है । उसका चित्त ईश्वर की आराधना में लीन हो जाता है । भक्त की इस मानसिक दशा में अपने चित्त को लीन करने वाला साधक भी शिवमय हो जाता है, अर्थात् वह साधक भी उस भक्त के समान ही भगवन्मय हो जाता है । क्षेमेन्द्र ने अपने गीतानिष्यन्द में भक्ति का लक्षण यह किया है— ³न पादपतनं भक्तिर्व्यापिनः परमेशितुः । भक्तिर्भावस्वभावानां तदेकीभावभावनम् ॥ अर्थात् सर्वत्र व्यापक भगवान् के चरणों में साष्टांग प्रणाम करना ही भक्ति नहीं है । वास्तविक भक्ति तो यह है कि भाव स्वभाव के सभी पदार्थों में एक भगवान् का ही अनुचिन्तन किया जाय, अर्थात् सारे जगत् को भगवन्मय समझा जाय । भगवद्भक्ति की महिमा स्तवचिन्तामणि में इस प्रकार वर्णित है— अणिमादिगुणावाप्तिः सदैश्वर्यं भवक्षयः । अमी भव ! भवद्भक्तिकल्पपादपपल्लवाः ॥ (श्लो० ५५)
- भैरवी मुद्रा ही यहाँ शाम्भवी मुद्रा के नाम से कही गई है । भैरवी मुद्रा का लक्षण श्लो० २६ की व्याख्या में बताया जा चुका है ।
- स्तवचिन्तामणि की व्याख्या (पृ० ६५) में क्षेमराज ने इसे उद्धृत किया है ।
- महार्थमञ्जरीपरिमल (पृ० १०८) में यह श्लोक उद्धृत है ।
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१३० : विज्ञानभैरव अर्थात् हे भव (शिव), आपकी भक्ति कल्पवृक्ष के समान है और अणिमा प्रभृति सिद्धियों की प्राप्ति, सदाशिव प्रभृति का ऐश्वर्य और मुक्ति—ये सब कल्पवृक्ष के पल्लवों (पत्तों) के समान हैं। अभिप्राय यह है कि कल्पवृक्ष से जैसे प्राणी की सारी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं, उसी तरह भगवद्भक्ति रूप कल्पवृक्ष से भी साधक शिवस्वरूप में समाविष्ट हो जाता है ॥११८॥ [ धारणा-९६ ] १वस्त्वन्तरे वेद्यमाने 'शनैर्वस्तुषु शून्यता । तामेव मनसा ध्यात्वा२ विदि३तोऽपि प्रशाम्यति ॥११९॥ वस्त्वन्तरे कस्मिंश्चिदेकस्मिन् वस्तुनि वेद्यमाने चित्स्वरूपत्वेन ज्ञायमाने सर्व- वेद्येषु तदन्येषु बाह्याभ्यन्तरेषु वस्तुषु वेद्यमानेष्वपि शनैः शनैरभ्यासपाटवेन शून्यता भावनीया । शून्यता नाम तत्कालमनाभासनम् । तामेव वेद्याभावात्मकचित्प्रकाशरूपां शून्यतां मनसा निर्विकल्पसंविदा ध्यात्वा विमृश्य विदितोऽपि वेदनादपि प्रशाम्यति शान्त- ब्रह्मस्वरूपो भवति । विदिशब्द इकारान्तो भेदप्रथारूपज्ञानवाचकः । 'विचित्तोऽपि' इति पाठे विविधसंकल्पविकल्पव्यापारसंयुक्तोऽपि मुक्तः स्यादित्यर्थः ॥११९॥ किसी एक वस्तु का चित्स्वरूप में ज्ञान हो जाने पर उससे भिन्न सभी बाह्य और आन्तर वस्तुओं एवं भावों का बोध होने पर धीरे-धीरे उनमें अभ्यास के सहारे शून्यता की भावना करनी चाहिये । यहाँ शून्यता का अभिप्राय एक वस्तु के ज्ञान के रहते उसके विपरीत स्वभाव की किसी दूसरी वस्तु के ज्ञान का उदय न होने में है । इस चित्प्रकाश रूप शून्यता में, जहाँ कि अन्य किसी विरोधी वेद्य की स्थिति नहीं है, निर्विकल्पक मन से ध्यान को केन्द्रित करने पर साधक योगी का भेदप्रथात्मक ज्ञान (भेद-भ्रम) शान्त हो जाता है तब उसका शान्त ब्रह्मस्वरूप प्रकट हो उठता है, अर्थात् वह ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । यहाँ इकारान्त 'विदि' शब्द भेदप्रथात्मक ज्ञान का वाचक है । 'विचित्तोऽपि' ऐसा पाठ मानने पर इसका अर्थ यह होगा कि नाना प्रकार के संकल्प-विकल्प व्यापारों से संयुक्त रहने पर भी साधक मुक्त हो जाता है । इस धारणा में और 'क्वचिद्वस्तुनि' (श्लोक ११७) इत्यादि श्लोक में प्रदर्शित धारणा में शून्यता की भावना की समानता रहते हुए भी इनमें परस्पर विशेषता यह है कि पहली धारणा में एक वस्तु को जान लेने पर उससे संबद्ध वासना आदि में शून्यता की भावना करने की बात कही गई है, जब कि प्रस्तुत धारणा में एक वस्तु के ज्ञान के बाद अन्य समस्त वेद्य वस्तुओं में शून्यता की भावना का विधान है ॥११९॥ १. सर्ववेद्येषु-ने० । २. ध्यायन्-ने० । ३. ॰चित्तो०-ख० ।
- नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २००) में यह श्लोक मिलता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivedi (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १३१ [ धारणा-९७ ] १किञ्चिज्जैर्या स्मृता२ शुद्धिः साऽशुद्धिः शम्भुदर्शने । न शुचिर्ह्यशुचिस्तस्मान्निर्विकल्पः३ सुखी४ भवेत् ॥१२०॥ किञ्चिज्जैः किञ्चिन्मात्रबोधयुक्तैर्धर्मशास्त्रज्ञैः, या शुद्धिः मृज्जलादिना स्मृता सा शम्भुदर्शने पारमेश्वरतत्त्वसाक्षात्कारे सति अशुद्धिरेव । अथवा शम्भुदर्शने परमेश्वर- भाषिते शास्त्रे सा अशुद्धिरेव । न शुचिः न नैर्मल्यम्, निर्देशस्य भावप्रधानत्वात् । या अन्यशास्त्रोक्ता शुद्धिः सा न शुचिः न शुद्धत्वम्, किन्तु हि अशुचिः । 'हि' अवधारणे हेतौ वा । अशुद्धतैव । मृदादिशुद्धेस्तत्त्वज्ञानं प्रत्यकिञ्चित्करत्वेनानङ्गत्वादिति भावः । 'अशुद्धिः' इति पूर्वमभिधाय तदनु 'न शुचिः' इत्युक्त्वापि पुनः 'हि अशुचिः' इत्यशुचि- पौनरुक्त्यं तत्त्वज्ञानानुपयोगित्वदार्ढ्यप्रतिपादनार्थम् । तस्मान्मृद्दिशौचविनाकृतोऽपि निर्विकल्पः निर्विकल्पज्ञानेन सति मनःशौचे त्यक्तमनोमलः सुखी भवेत् ॥१२०॥ धर्मशास्त्रकारों ने भलीभाँति हाथ-पैर धोकर तीन बार स्वच्छ जल से आचमन करना, स्नान करना आदि अनेक तरह से शुद्धि का विधान किया है । इन धर्मशास्त्रों में मिट्टी, जल आदि से होने वाली शुद्धि पर बड़ा बल दिया गया है, किन्तु परमेश्वर के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करने के प्रसंग में यह शुद्धि सहायक नहीं होती, अतः इसको अशुद्धि ही मानना चाहिये । अथवा इसका यह भी अर्थ किया जा सकता है कि शैव शास्त्र में यह शुद्धि अशुद्धि ही मानी गई है । धर्मशास्त्र की इस शुद्धि को परमेश्वर शिव के द्वारा उपदिष्ट शास्त्रों में चित्त की निर्मलता में कारण नहीं माना गया है । इसके विपरीत इस तरह की शुद्धि को उन शास्त्रों में दम्भ, पाषण्ड आदि चित्त के कालुष्यों का ही प्रवर्त्तक बताया गया है । इसका अभिप्राय यह है कि धर्मशास्त्रों के द्वारा उपदिष्ट शुद्धि शरीर को तो पवित्र करती है, किन्तु वह मन को पवित्र नहीं कर पाती । इसी लिये शैव शास्त्रों में इस तरह की शुद्धि को अशुद्धि में ही गिना गया है । वास्तविक शुद्धि वही है, जिससे कि मन पवित्र हो । शुद्ध मन से ही तत्त्व का साक्षात्कार किया जा सकता है । कोरी शारीरिक शुद्धि तत्त्वज्ञान में सहायक नहीं हो सकती । इस बात को दृढ़तापूर्वक समझाने के लिये ही 'अशुद्धिः, न शुचिः, हि अशुचिः' इस तरह से तीन बार इसमें अशुचिता का विधान किया गया है । 'हि' शब्द का प्रयोग भी अवधारण या कारण के अर्थ में हुआ है, अर्थात् यह धर्मशास्त्रोक्त शारीरिक शुद्धि अशुद्धि ही है, अथवा अशुद्धि का ही कारण है । मन की शुद्धि में इसका कुछ भी उपयोग नहीं है । अतः साधक को चाहिये कि मिट्टी, जल आदि से की जाने वाली शुद्धि का सहारा लिये बिना भी १. °ताऽशु°-ख० म० । २. सा शु°-ख० म० । ३. °ल्पो भवेत् सदा-स्व०, °ल्पो भवेन्नरः- म० । ४. शिवो-ख० । l. स्वच्छन्द० (भा० ३, पृ० ७, पृ० ३१५) और महार्थ० (पृ० २२ में) यह श्लोक उद्धृत है ।
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१३२ : विज्ञानभैरव अपने निर्विकल्प ज्ञान से मन के मैल को धोकर सर्वत्र सुखपूर्वक विचरण करे। मालिनीविजय तन्त्र में बताया गया है— नात्र शुद्धिर्न चाशुद्धिर्न भक्ष्यादिविचारणम् । न द्वैतं नापि चाद्वैतं लिङ्गपूजादिकं न च ॥ न चापि तत्परित्यागो निष्परिग्रहतापि वा । सपरिग्रहता वापि जटाभस्मादिसंग्रहः ॥ तत्यागो न व्रतादीनां चरणाचरणं च यत् । क्षेत्रादिसंप्रवेशश्च समयादिप्रपालनम् ॥ परस्वरूपलिङ्गादिनामगोत्रादिकं च यत् । नास्मिन् विधीयते किञ्चिन्न चापि प्रतिषिध्यते ॥ विहितं सर्वमेवात्र प्रतिषिद्धमथापि वा । किन्त्वेतदत्र देवेशि नियमेन विधीयते ॥ तत्त्वे चेतः स्थिरीकार्यं सुप्रयत्नेन योगिना । तच्च यस्य यथैव स्यात् स तथैव समाचरेत् ॥ तत्त्वे निश्चलचित्तस्तु भुञ्जानो विषयानपि । न संस्पृशेत् दोषैः स पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ विषापहारिमन्त्रादिसंनद्धो भक्षयन्नपि । विषं न मुह्यते तेन तद्वद् योगी महामतिः ॥ (१८।७४-८१) अर्थात् योगी का आचरण कैसा होना चाहिये, इस विषय का निरूपण करते हुए परमेश्वर ने इस ग्रन्थ के अठारहवें पटल में बताया है कि इनके लिये शुद्धि और अशुद्धि का विधान, भक्ष्य और अभक्ष्य का निरूपण, द्वैत या अद्वैत का उपदेश, लिंग-पूजा आदि का विधान या निषेध, निष्परिग्रह रहने या सपरिग्रह होने का विधान, जटा-भस्म आदि का स्वीकार या परित्याग, व्रत आदि का आचरण करना या न करना, क्षेत्र-संन्यास आदि लेकर नियमों का पालन करना न करना, तिलक आदि चिह्न, नाम, गोत्र, आदि को रखना न रखना—जैसी बातों के बारे में पक्ष या विपक्ष में कुछ भी नहीं कहा जाता है। ये सभी वस्तुएँ विहित भी मानी जा सकती हैं और निषिद्ध भी। इसमें साधक की इच्छा ही प्रमाण है कि वह इनका आचरण करे या न करे। वस्तुतः तत्त्वज्ञान में इनकी कोई उपयोगिता नहीं है। नियम के नाम पर शास्त्र में केवल इतना ही विधान है कि योगी को प्रयत्नपूर्वक परम तत्त्व में अपने चित्त को स्थिर करना चाहिये। चित्त की यह स्थिरता जैसे भी हो, योगी को तदनुसार ही अपनी चर्या बना लेनी चाहिये। जिस योगी का चित्त परम तत्त्व में स्थिर हो गया है, वह विषयों का उपभोग करते हुए भी उनके दोषों से उसी प्रकार लिप्त नहीं होता, जैसे कि जल में रहते हुए भी कमलपत्र उससे निर्लिप्त रहता है। विष को दूर करने वाला गारुडिक अपने शरीर को मन्त्रों से जब सुरक्षित कर लेता है, तो उस पर जहर का असर नहीं होता, उसी तरह से यह महान् मतिशाली योगी विषय रूपी विष को खाकर भी मोहित नहीं होता । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)