भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 178

विज्ञानभैरव : १२१ [ धारणा-८६ ] भ्रान्त्वा भ्रान्त्वा शरीरेण१ त्वरितं भुवि पातनात् । क्षोभशक्तिविरामेण परा संजायते दशा ॥१०९॥ शरीरेण स्वदेहेन पुनः पुनरतिशयेन परिभ्रम्य अन्ते तस्य शरीरस्य त्वरितं शीघ्रं भुवि पातनात् क्षोभशक्तिविरामेण भुवि स्थितस्य शरीरस्य वेगशक्तेर्विरामे सति प रा निर्विकल्पदशा संजायते प्रादुर्भवति ॥१०९॥ अपने शरीर को साधक उसी तरह से चारों तरफ तेजी से घुमावे, जैसा कि बच्चे चक्करघानी खाते समय तेजी से घूमते हैं। घूमते-घूमते वह अपने शरीर को पृथिवी पर गिरा दे । भूमि पर लुढ़क जाने पर उसको सब कुछ घूमता हुआ सा नजर आवेगा और थोड़ी देर के बाद एक विचित्र शान्ति का अनुभव होगा। यह एक प्रकार की निर्विकल्प अवस्था है। इस स्थिति में अपनी धारणा को स्थिर करने पर परम निर्विकल्प स्वात्मस्वरूप की अभि- व्यक्ति हो जाती है। टीकाकारों ने यहाँ पूजा के अंग के रूप में प्रदक्षिण परिभ्रमण का और जीव के नाना योनियों में जन्म-मरण की परम्परा का उल्लेख कर इनमें धारणा जमाने की बात कही है, जिनका कि प्रस्तुत ग्रन्थ की धारणा-पद्धति से कोई साम्य नहीं है ॥१०९॥ [ धारणा-८७ ] आधारेष्वथवा२ऽशक्त्या३ऽज्ञानाच्चित्तलयेन वा । जातशक्तिसमावेशक्षोभान्ते भैरवं वपुः ॥११०॥ आधारेषु ज्ञानविषयेषु पदार्थेषु अशक्त्या असामर्थ्येन, अथवा अज्ञानात् ज्ञानादे- रभावतः, वा अथवा, चित्तलयेन यो जातः शक्तौ अनाश्रिताख्यायां समावेशस्तेन क्षोभान्ते चञ्चलताविरामे सति भैरवं वपुः पूर्वोक्तस्वानुभवानन्दावस्थारूपम्, व्यज्यत इति शेषः ॥११०॥ आधार अर्थात् ज्ञान के विषयीभूत पदार्थों में असामर्थ्य के कारण जो चित्त का लय होता है, अथवा अज्ञान के कारण जो चित्त का लय होता है और इसके कारण जो अनाश्रित शक्ति में समावेश होता है, उससे क्षोभ अर्थात् चंचलता का विराम हो जाने पर साधक भैरव- शरीर हो जाता है, अर्थात् उसमें अपने अनुभव से ही जानी जा सकने वाली आनन्दात्मक अवस्था का आविर्भाव हो जाता है ॥११०॥ [ धारणा-८८ ] १सम्प्रदायमिमं देवि४ शृणु सम्यग् वदाम्यहम् । कैवल्यं जायते सद्यो नेत्रयोः स्तब्धमात्रयोः५ ॥१११॥ १. ॰राणि-ख० । २. ॰वा श०-ख० । ३. ध्या०-ख० । ४. भद्रे-ख० ई० । ५. इतः परम्-‘संकोचं कर्णयोः’ इत्यादिकः श्लोकोऽधिको वर्तते-क० ।

  1. ई० प्र० वि० वि० (भा० १, पृ० ७७; भा० ३, पृ० १६९, ३८६) में यह पूरा श्लोक अथवा उत्तरार्ध मात्र उद्धृत है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 178, कुल 256 में से · BharatKosha