विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२२ : विज्ञानभैरव हे देवि, इमं सम्प्रदायं शृणु, अहं ते सम्यग् वदामि—नेत्रयोः स्तब्धमात्रयोः सर्वस्यास्य भेदाभेदमयस्य जगतो विस्मरणादन्तरात्मनि च दत्तदृष्टेर्योगिनः सद्यः कैवल्यं जायते, यत्र तत्र ज्ञानप्रकाशः स्यादेवेत्यर्थः । सर्वेषूक्तवक्ष्यमाणानुशासनेष्वेतेषु चिन्मात्रा- वधारणचित्तैकाग्र्याभ्यसनमभिप्रेतमस्तीत्यवधेयम् ।।१११।। हे देवि, सुनो । मैं तुम्हें उस परम्परा का उपदेश करता हूँ, जिसका कि सही पद्धति से अभ्यास करने पर, अर्थात् भैरवी मुद्रा में प्रदर्शित विधि से अपने नेत्रों को विषयों की ओर से समेट कर स्थिर कर लेने पर, इस सारे भेदात्मक और अभेदात्मक जगत् को भूलकर अपनी अन्तरात्मा की ओर दृष्टि फेर लेने पर योगी तत्काल कैवल्य को प्राप्त कर लेता है, जिस किसी भी परिस्थिति में हो शुद्ध स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । इस ग्रन्थ में पहले बताई गई अथवा आगे बताई जाने वाली सभी धारणाओं का मुख्य उद्देश्य चित्त की एकाग्रता के संपादन के द्वारा चिन्मात्र स्वरूप की अभिव्यक्ति है ।।१११।। [ धारणा-८९ ] ¹कूपादिके महागर्ते स्थित्वोपरि निरीक्षणात् । अविकल्पमतेः सम्यक् सद्यश्चित्तलयः स्फुटम् ।।११२।। कूप उदपानम्, आदिना गिरिशृङ्गादेर्ग्रहणम् । महागर्ते बृहत्सुषिरे कूपादौ स्थित्वा । सामीप्यं सप्तम्यर्थः । महाश्वभ्रादिसमीपे स्थित्वेति यावत् । उपरि निरीक्ष- णात् ऊर्ध्वमेव कूपाद्याकाशनिश्चलदृष्ट्यवलोकनाद्धेतोः, अविकल्पमतेः अविद्यमानो विकल्पो यस्याः सा तथाविधा मतिर्यस्य तस्य निर्विकल्पबुद्धेर्भावकस्य सद्यस्तत्क्षणमेव चित्तलयश्चित्तप्रशान्तिरिति स्फुटं निश्चितम् ।।११२।। बहुत गहरे कूप, खड्ड आदि के पास खड़ा होकर नीचे देखने पर अथवा पर्वत के ऊँचे शिखर के पास खड़ा होकर ऊपर ताकने पर एक अज्ञात भय की कल्पना से एक क्षण के लिये शरीर रोमांचित हो उठता है, चित्त निर्विकल्प दशा में प्रविष्ट हो जाता है । साधक जब इस क्षणिक निर्विकल्प दशा में अपने चित्त को तल्लीन कर लेता है, तो तत्क्षण उसका चित्त शान्त हो जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है । किसी भी भयानक स्थिति में कुछ क्षण के लिये वेद्य अथवा अवेद्य कोटि में प्रविष्ट नील-पीत आदि पदार्थों की कोई सत्ता नहीं रह जाती । इस स्थिति में भैरव का परम घोरतर स्वरूप ही मात्र भासित होता है । इस भैरव स्वरूप में चित्त को स्थिर लेने पर साधक का चित्त तत्काल शान्त हो जाता है और तब उसके चित्त में परभैरव स्वरूप शिव का शान्त स्वरूप अभिव्यक्त हो उठता है ।।११२।। १. ॰ते परिनि॰-ख० ।
- नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २००) में यह श्लोक मिलता है ।