भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : १२३ [ धारणा-९० ] १यत्र यत्र' मनो याति बाह्ये वाऽऽभ्यन्तरे२ प्रिये । तत्र तत्र ३शिवावस्था व्यापकत्वात् क्व४ यास्यति ।।११३।। यत्र यत्र यस्मिन् यस्मिन्, बाह्ये नीलपीतादौ, अपि वा अथवा, आभ्यन्तरे सुखदुःखादौ, मनो याति मनोविकल्पः संवेदनं प्रसरति, तत्र तत्र स्फुरत्संवित्सतत्त्वे, शिवावस्था शिवस्य चित्प्रकाशस्य अवस्था अवस्थानं क्व यास्यति ? न क्वचिद् गमिष्यतीति भावः । अत्र हेतुः—व्यापकत्वादिति । दिक्कालाकारैः प्रकाशसारत्वात् प्रकाशमानैः प्रकाशात्मनः स्वात्मभैरवस्यानवच्छेदादित्यर्थः ।।११३।। हे प्रिये, जहाँ-जहाँ नील-पीत आदि बाह्य पदार्थों में अथवा सुख-दुःख आदि आभ्यन्तर विषयों में मन का, अर्थात् उसके संकल्प-विकल्पात्मक संवेदनों का प्रसार होता है, वहाँ-वहाँ संवित् स्वरूप शिव ही चित्प्रकाश अवस्था में विद्यमान है । ऐसी स्थिति में यह मन उसको छोड़ कर जायगा कहाँ ? इसका अभिप्राय यह है कि इस जगत् में ऐसी कोई स्थिति नहीं है, जहाँ कि शिव न प्रकाशित हो रहे हों । अतः जहाँ भी मन जायगा वहाँ शिव का प्रकाशात्मक स्वरूप अवश्य रहेगा । इसके विपरीत यह प्रकाशात्मक स्वात्मस्वरूप भैरव दिशा, काल, आकार आदि को तो प्रकाशित करता है, क्योंकि उसी भैरव के प्रकाश से ये प्रकाशित हैं, किन्तु ऐसा होते हुए भी वे उस प्रकाशात्मक भैरव को परिच्छिन्न नहीं कर सकते । इसी लिये यह प्रकाशात्मक भैरव मन से भी परिच्छिन्न नहीं हो सकता । इसके साक्षात्कार के लिये तो इस भावना के अभ्यास को ही तीव्र करना पड़ता है कि मेरा मन जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ- वहाँ सर्वत्र प्रकाशात्मक शिव विद्यमान है ! इस धारणा का दृढ़ अभ्यास करने पर वह स्वात्म- स्वरूप स्वयं प्रकाशित हो जाता है । यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ।। (६।२६) भगवद्गीता के इस वचन में चंचल मन को नियमित कर उसको आत्मप्रवण बनाने की बात कही गई है । इसके विपरीत प्रस्तुत श्लोक में यह बताया गया है कि मन जहाँ भी जायगा, वही प्रकाशात्मक स्वात्मस्वरूप विद्यमान रहेगा । अतः मन को उस विषय से हटा कर अन्तरात्मा की ओर खींच लाने की आवश्यकता नहीं है । किन्तु जहाँ भी मन लग जाय, उसको वहीं उसी स्थिति में स्थिर कर देना चाहिये । ऐसा करने से वहीं शिवावस्था विकसित हो जायगी, जिसकी कि चर्चा स्पन्दकारिका के (२८-३० श्लोकों) को उद्धृत कर पहले (श्लो० ३३ की व्याख्या में) की जा चुकी है । १. तत्र-यो० । २. °पि वा-क० । ३. परा°-यो० । ४. प्रकाश्यते-यो० ।

  1. परमार्थसार (पृ० १४८), स्वच्छन्द० (भा० ३, प० ७, पृ० ३१२) और योगिनी० दीपिका (पृ० १९२, २९९, ३४३) में यह श्लोक प्राप्त होता है ।