विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११८ : विज्ञानभैरव ठीक ही है कि अपने शरीर की अपेक्षा को त्याग कर और सभी शरीरों को अपना ही मान कर योगी कुछ ही दिनों में सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, अर्थात् वह सांसारिक दोष-जालों से सर्वथा स्वतन्त्र हो जाता है । इस श्लोक का वास्तविक अभिप्राय यह है कि अपने शरीर की भाँति अन्य शरीरों में भी-“स्वाङ्गकल्पेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च सा” (४।१।४) इस प्रत्यभिज्ञाकारिका के अनुसार भगवान् की ज्ञान और क्रिया शक्ति का विकास मानकर सर्वत्र चैतन्य की समान स्थिति की ही भावना करे कि अपने शरीर की उपेक्षा कर देने पर अथवा सभी शरीरों को अपना मान लेने पर चिन्मात्रस्वरूप सर्वत्र समान रूप से अनुस्यूत (अनुगत) है । अर्थात् यह सारा जगत् मेरा ही शरीर है, इस तरह की भावना का योगी को अभ्यास करना चाहिये । इस एक शरीर के नष्ट हो जाने पर भी मेरे ये सब दूसरे शरीर तो विद्यमान हैं ही, इस भावना के आधार पर अपने शरीर की ममता योगी को छोड़ देनी चाहिये । इस बेचारे अपने एक शरीर को उस अंग की तरह नहीं मान लेना चाहिये, जहाँ से कि प्राण के निकल कर गले में अटक जाने पर व्यक्ति को मरा समझ लिया जाता है। ऐसी नासमझी कर बैठने पर तो यह साधक भी मृतप्राय, मुर्दे के बराबर हो जायगा। जैसा कि विरूपाक्षपंचाशिका के इस श्लोक में बताया गया है— 1 उत्क्रम्य विश्वतोऽङ्गात् तद्भागैकतनुनिष्ठिताहन्तः । कण्ठलुठत्प्राण इव व्यक्तं जीवन्मृतो लोकः ।। (श्लो० ५) ऐसी भूल न हो, इसके लिये साधक को चाहिये कि अपने शरीर की तरह अन्य शरीरों में भी स्वसंवित्ति की समान रूप से अनुवृत्ति की भावना करे । ऐसा करने पर वह कुछ ही दिनों में सर्वव्यापक हो जाता है । ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० २, पृ० ३११, ४२७) में दो स्थलों पर यह श्लोक उद्धृत है ।।१०५।। [ धारणा-८३ ] निराधारं मनः कृत्वा विकल्पान्न विकल्पयेत् । तदात्मपरमात्मत्वे भैरवो मृगलोचने ॥१०६॥ हे मृगलोचने, निराधारं त्यक्तबाह्यालम्बनं मनः कृत्वा यदा विकल्पान् न विकल्पयेत् संकल्पकला यदा न विकल्पयेत्, तदा आत्मपरमात्मत्वे जीवात्मपरमात्म- भावे, उभयोरप्यवस्थयोरिति यावत्, भैरव एव भैरवरूपः परमात्मैव भवति । संकल्प- कलया जीवत्वम्, निर्विकल्पदशया ब्रह्मत्वमित्यतो विकल्पान् न विदध्यादिति भावः ॥१०६॥
- श्लोक का अर्थ इस प्रकार होगा—अपने विश्वमय शरीर को अज्ञानवश भूलकर प्राणी मनुष्य, देव आदि के कल्पित स्थूल शरीर को अपना मानने लगता है । इस जरा-रोग ग्रस्त शरीर में उसके प्राण कंठ में अटके रहते हैं और वह जीवित रहता हुआ भी मुर्दे के समान लगता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)