विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ११७ परकायप्रवेश आदि के द्वारा नाना प्रकार के शरीरों में उन-उन कर्मों का भोग पूरा करने के अभिप्राय से विहार करने का और नाना सुखों को भोगने का सामर्थ्य आ जाता है । अपने देह का सहारा लिये बिना दूसरे के शरीर में संवित् स्वरूप की भावना कैसे करें ? इसका उत्तर श्लोक में ही 'स्ववत्' पद से दिया गया है । जैसे अपनी आत्मा में अपने शरीर का सहारा छोड़ कर योगी अपने संवित्स्वरूप का चिन्तन करता है, वैसे ही दूसरे के जीवित अथवा मृत शरीर में भी अपने संवित्स्वरूप के विमर्श को अनुगत करे । इसमें योगी की इच्छा ही नियामिका है कि वह अपने विमर्श को जीवित शरीर से अनुगत करेगा या मृत शरीर से । जीवित शरीर में विमर्श को अनुगत करने पर १वशिता, यत्रकामावसायिता आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । अपने संवित्स्वरूप के परामर्श के बल से किसी मरे हुए राजा आदि के शरीर में प्रविष्ट होकर योगी नाना प्रकार के भोगों को भोगता है, अथवा अपना अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध करता है । इससे यह सिद्ध होता है कि संवित्स्वरूप को कभी भी शरीर की अपेक्षा नहीं रहती, क्योंकि यह संवित्स्वरूप सर्वत्र अनुगत है । एक शरीर तो दूसरी जगह नहीं रह सकता । जैसे कि स्वप्नावस्था में चिदात्मा की तो अनुवृत्ति रहती है, क्योंकि स्वप्न के साक्षी के रूप में उस समय भी उसका स्फुरण विद्यमान है; किन्तु स्थूल शरीर उस समय नहीं रहता, क्योंकि उसकी वहाँ प्रतीति नहीं होती । सुषुप्ति अवस्था में तो केवल चिति की ही अनुवृत्ति रहती है, क्योंकि साक्षी के रूप में उस समय भी उसका स्फुरण विद्यमान हैं। अन्यथा यह कौन सोया है ? इस प्रश्न का उत्तर आप क्या देंगे ? इसके लिये स्वात्मस्वरूप संवित्ति की अनुवृत्ति माननी पड़ेगी । स्वप्नावस्था में जैसे स्थूल शरीर की निवृत्ति हो जाती है, उसी तरह सुषुप्ति दशा में सूक्ष्म शरीर की भी निवृत्ति माननी पड़ती है, क्योंकि उस अवस्था में गाढ निद्रा के कारण पदार्थों के दर्शन-स्पर्शन का आभास भी नहीं बच रहता । इसी तरह से चित्त के समाधिस्थ हो जाने पर तुरीय दशा में शुद्ध चिदानन्द का स्फुरण होने से आत्मा की वृत्ति रहती है, क्योंकि उस समय वह समाहित अवस्था में रहता है । सुषुप्ति दशा में प्रतीत होने वाले कारण देह रूप अज्ञान की भी तुरीय दशा में निवृत्ति हो जाती है । इस तरह से उक्त चार अवस्थाओं में उक्त तीनों शरीरों की नियमतः अनुवृत्ति नहीं होती, किन्तु आत्मा की संवित्स्वरूपता तो सर्वत्र अनुवृत्त रहती है । अतः इसके लिए उस-उस शरीर की अपेक्षा के न रहने से यह कहना से जाना जाता है । “बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः” (३।४३) इस योगसूत्र के व्यासभाष्य में विदेह और महाविदेह कैवल्य की व्याख्या की गई है और परकायप्रवेश की चर्चा आई है । . वशिता का अर्थ है सर्ववशीकार, सबको अपने वश में कर लेने का सामर्थ्य । यत्रकामाव- सायिता का तात्पर्य है जिस वस्तु को प्राप्त करने की चाह (इच्छा) योगी के मन में उत्पन्न होती है, वह अवसित हो जाती है, पूरी हो जाती है, उसकी इच्छा का कभी विघात नहीं होता ।