विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : १०५ विशेषेण भेदप्रथात्मकेन स्वरूपेण पुरुषं मोहयतीति मायाया एव मोहनत्वं धर्मो न मम, कलायाः कलातत्त्वस्य, कलनं किञ्चित्करणं धर्मः, विद्यातत्त्वस्य किञ्चिद् वेदनं धर्म इत्यादि सर्वेषां तत्त्वानां धर्मं कलयन् विमृशन् पुरुषः पृथग् न भवेत्, किन्तु विवेकज्ञानात्मकाभेदख्यातिमान् भवेत् । 'ना पृथग् भवेत्' इति पाठे इत्येवं कलयन् ना पुरुषः पृथग् भवेत् सर्वोत्तीर्णः कूटस्थः स्यादित्यर्थः ॥९३॥ माया तत्त्व से मोहित होकर जीव परस्पर एक दूसरे को भिन्न समझने लगते हैं । अतः भेद-दृष्टि का विस्तार करना माया का धर्म है, शुद्ध चैतन्य का नहीं । इसी प्रकार कला तत्त्व का धर्म कुछ करना है, विद्या तत्त्व का धर्म कुछ जानना है । इसी तरह से सभी तत्त्वों के धर्मों के विषय में विचार करने वाले योगी की स्थिति अलग से नहीं रह जाती, किन्तु इस विवेक ज्ञान के सहारे वह अभेद ¹ख्याति से युक्त हो जाता है । प्रकृति और पुरुष के विवेक ज्ञान से कैवल्य का आविर्भाव सांख्य दर्शन को अभिप्रेत है । इस भावना के अभ्यास से माया प्रभृति के विभेदक स्वरूपों से अलग होकर योगी अपने कैवल्यात्मक स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । 'ना पृथग् भवेत्' ऐसा पाठ मानने पर इसका अर्थ यह होगा कि इस प्रकार की धारणा में चित्त को स्थिर करने वाला मनुष्य पृथक् हो जाता है, अर्थात् इन विभेदक दृष्टियों से ऊपर उठकर शुद्ध, कूटस्थ, सर्वोत्तीर्ण स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । प्रथम कारिका की व्याख्या करते समय अभिनवगुप्त ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० १, पृ० ८०) में माया शक्ति का अर्थ स्पष्ट करते हुए इस श्लोक का प्रमाण दिया है ॥९३॥ [ धारणा-७१ ] झगितीच्छां समुत्पन्नामवलोक्य शमं नयेत् । यत एव समुद्भूता ततस्तत्रैव लीयते ॥९४॥ इच्छां पुत्राद्येषणाम् इदं मे स्यादित्येवंप्रकारामेषणां समुत्पन्नाम् अमूर्तादपि चिन्मात्राद् मायाकृतक्षोभवशादुद्भूताम् अवलोक्य दृष्ट्वा तामन्तर्मुखत्वेन विमृश्य झगिति शीघ्रं शमं नयेत् शान्तिं प्रापयेत् । अमूर्तो हि चिन्मात्रात्मा मध्येज्ञानेनैव प्रकटितेच्छः । चिन्मात्रस्य निराकारत्वान्नास्ति इच्छा, परन्तु इष्यमाणमेषणादिकं वाऽविद्यैवैतत् दृष्ट्वा शान्तेच्छो भवेदिति तात्पर्यम् । यतो यस्माद् अविद्यात एव समुद्- भूता इच्छा, अविद्या हि आकाशात्मिका, ततस्तत्रैव लीयते लीना भवति, तेन हि
- दर्शन शास्त्र में ख्याति शब्द प्रतीति या ज्ञान के अर्थ में प्रयुक्त होता है । अभेद ख्याति का अर्थ है अद्वय बोध । सब कुछ शिवमय ही है, उसके भिन्न कुछ भी नहीं है, इस तरह की एकाकार प्रतीति ही यहां अभेद ख्याति कही गयी है । भ्रान्त ज्ञान के अर्थ में भी ख्याति शब्द प्रयुक्त होता है । अपूर्णता ख्याति का अर्थ है भ्रमवश अपने पूर्ण स्वरूप का ज्ञान न होना । भारतीय दर्शन में छः प्रकार की ख्याति मानी गई है । इनका स्वरूप बहुत ही संक्षेप में हमने महार्थमंजरी के उपोद्घात (पृ० ठ-ड) में बताया है ।