भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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१०४ : विज्ञानभैरव निर्मला गतिः, स्यादिति शेषः । तीक्ष्णसूच्यादिना अग्निना वा शरीरं प्रमथ्य तत्सहना- दिना या सहनशक्तिः सैवात्र चेतनेत्यभिधीयते । सूच्यादिव्यथानुभवितृचेतनाशक्ति- समाहितस्य भैरवविषयं निर्मलं ज्ञानं भवत्येवेति भावः ॥९१॥ अपने अंगुली, अंगूठे आदि किसी अंग को तीखी सुई अथवा कांटे१ आदि से पहले बींध दे । उसके बाद उसी स्थान में अपनी चेतना, अर्थात् संवित् को जोड़ देने पर, उस सूची आदि के बींधने से उत्पन्न पीड़ा का अनुभव करने वाली चेतना शक्ति में समाहित योगी के चित्त में भैरवविषयक निर्मल ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । तीखी सुई आदि से बींधने पर अथवा आग से जला देने पर शरीर के उस अंग में तीव्र पीड़ा होने लगती है । इस पीड़ा को सहन करने की शक्ति यहां 'चेतना' कही गई है । इस चेतना शक्ति में, अर्थात् किसी भी पीड़ा को सहन करने की शक्ति में अपने चित्त को समाहित करने वाला योगी अपने निर्मल बोधभैरव स्वरूप को पहचान लेता है ॥९१॥ [ धारणा-६९ ] चित्ताद्यन्तःकृतिर्नास्ति ममान्तर्भावयेदिति१ । विकल्पानामभावेन२ विकल्पैरुज्झितो भवेत् ॥९२॥ ममान्तः मद्देहान्तः, चत्तादिकमन्तःकरणं नास्तीति भावयेत्, अस्त्यपि नास्त्ये- वेत्येवं बाह्यविषयोपरमाद् दृढभावनः स्यात्, ततो विकल्पानामभावेन विकल्पैरुज्झित- स्त्यक्तो निर्विकल्पतया शुद्धचैतन्यो भवेत् ॥९२॥ मेरे शरीर के भीतर चित्त आदि अन्तःकरणों की कोई सत्ता नहीं है, ऐसी भावना करे । शरीर के भीत त आदि के रहते हुए भी जब यह भावना की जायगी कि उनकी कोई सत्ता नहीं है, तो अन्तःकरण की वृत्तियों के अभाव में बाह्य विकल्पों की भी कोई सत्ता नहीं रह जायगी । इस भावना का दृढ़ता से अभ्यास करने पर विकल्पों की सत्ता के न रह जाने से साधक इन बाह्य विकल्पों से मुक्त होकर निर्विकल्प दशा में प्रविष्ट हो जायगा, उसका शुद्ध स्वात्मचैतन्य अभिव्यक्त हो जायगा ॥९२॥ [ धारणा-७० ] २माया विमोहिनी नाम कलायाः कलनं स्थितम् । इत्यादिधर्मं तत्त्वानां कलयन्न३ पृथग् भवेत् ॥९३॥ १. ०द्यदि-ख० । २. ०वेऽपि-ख० । ३. ०यन् ना-ख० ।

  1. क्रान्तिकारी भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद प्रभृति के विषय में यह प्रसिद्ध है कि वे अपनी सहन शक्ति की परीक्षा के लिये जलती मोमबत्ती की लौ पर अपने हाथ के मांसल भाग को उस समय तक टिकाये रखते थे, जब कि वह जल कर टप-टप नीचे गिरने लगता था । प्रस्तुत श्लोक में भी लगभग इसी प्रकार की स्थिति में धारणा को स्थिर करने का विधान है । २. ई० प्र० वि० वि० ( भा० १, पृ० ८० ) में इसका पहला चरण और वहीं ( भा० ३, पृ० २८५ ) इस श्लोक का पूर्वार्ध रुद्रयामलसार के नाम से उद्धृत है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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