विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६२ : विज्ञानभैरव पूजा नाम विभिन्नस्य भावौघस्यापि संगतिः । स्वतन्त्रविमलानन्तभैरवीयचिदात्मना ॥ (४।१२१) अर्थात् रूप, रस आदि विभिन्न भाव पदार्थों की देश, काल आदि से अपरिच्छिन्न, निरुपाधिक, स्वतन्त्र, स्वच्छ, भैरवाकार परसंवित् से, अर्थात् बोधभैरव से अभेद रूप में प्रतिष्ठा ही पूजा कही जाती है। भट्ट उत्पल ने अपनी शिवस्तोत्रावली में पूजाविधि का वर्णन इस प्रकार किया है— ध्यानायासतिरस्कारसिद्धस्त्वत्स्पर्शोत्सवः । पूजाविधिरिति ख्यातो भक्तानां स सदाऽस्तु मे ॥ (१७।४) अर्थात् उच्चार, करण, ध्यान प्रभृति प्रयत्नसाध्य आणव प्रभृति उपायों के सहारे से संपन्न होने वाली विविध बाह्य विधियों को छोड़कर अनुपाय प्रक्रिया से सहज विधि से सम्पन्न होने वाला स्वात्मस्वरूप बोधभैरव का साक्षात्कार ही भक्त जनों की वास्तविक पूजा-विधि है। इसीलिये भट्ट नारायण ने— मलतैलाक्तसंसारवासनावर्तिदाहिना । ज्ञानदीपेन देव त्वां कदा नु स्यामुपस्थितः ॥ (श्लो० ११३) स्तवचिन्तामणि के इस श्लोक में भगवान् से प्रार्थना की है कि हे भगवन्, मैं पुष्प आदि से तो नित्य ही आपकी पूजा करता हूँ, किन्तु आप मेरे लिये वह स्थिति उपस्थित कीजिये कि जिससे मैं आपके सामने उस ज्ञानरूपी दीपक को लेकर उपस्थित हो सकूं, जो कि मल से, अज्ञानरूपी तैल से सिंचित वासना रूपी बत्ती को, धर्म-अधर्म प्रभृति जागतिक परम्परा को आगे बढ़ाने वाले समस्त संस्कारों को जला देने वाला है। इन सब वचनों का संक्षिप्त अभिप्राय यही है कि भेद बुद्धि को छोड़कर अद्वय स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होना ही वास्तविक पूजा है, पुष्प आदि से की गई पूजा तो एक प्रकार का विकल्प व्यापार ही है ॥१४४॥ ¹अत्रैकतमयुक्तिस्थे योत्पद्येत दिनाद्दिनम् । ²भरिताकारता सात्र तृप्तिरत्यन्तपूर्णता ॥१४५॥ अत्र प्रोक्तधारणासु एकतमयुक्तिस्थे सिद्धसमाधानदार्ढ्ये योगिनि, एकस्यां कस्याञ्चिद् युक्तौ धारणायामवस्थिते योगिनि इति यावत्, दिनाद्दिनम् उत्तरोत्तरम् भरिताकारता निर्विकल्पसमाधिरसस्वादाद् या पूर्णस्वात्मस्वरूपोपलब्धिरूपाऽत्यन्तपूर्णता उत्पद्येत, सा अत्र शास्त्रे तृप्तिरिति कथ्यते ॥१४५॥ ऊपर बताई गई ११२ धारणाओं में से किसी एक युक्ति (धारणा) में दृढ़ता पूर्वक एकाग्र समाधि का अभ्यास करने वाले योगी के चित्त में दिन-प्रतिदिन उत्तरोत्तर निर्विकल्प समाधि के रस के आस्वाद के बढ़ते रहने से सर्वज्ञ व्याप्त भैरव स्वरूप की, पूर्ण स्वात्मस्वरूप १. °रि°-शि० ।
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३४) में यह श्लोक उद्धृत है। २. भरिताकारता = भरितावस्था की विवेचना श्लोक ७१ की व्याख्या में देखनी चाहिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)