भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : १६३ की उपलब्धि जब परिपूर्ण हो जाती है, अर्थात् जब स्वात्मस्वरूप बोधभैरव का साक्षात्कार स्पष्ट हो जाता है, तो इसी अत्यन्त परिपूर्ण स्थिति का नाम तृप्ति है ॥१४५॥ १महाशून्यलये वह्नौ भूताक्षविषयादिकम् । हूयते मनसा २सार्धं ३स होमैश्चेतनास्रुचा ॥१४६॥ महाशून्यस्य शून्यातिशून्यपदस्य आ समन्तात् लयो यत्र तस्मिन् परतत्त्वात्मनि शून्यातिशून्यरूपे परभैरवस्वरूपे वह्नौ भूताक्षविषयादिकं भूतेन्द्रियविषयभुवनतत्त्वादि- रूपं सकलं जगत् संकल्पविकल्पात्मकम्, तद्विभागकल्पनाहेतुना मनसा सह, चेतना विश्वानुसन्धात्री शक्तिरेव स्रुक् तया चेतनास्रुचा यद् हूयते सोऽत्र शास्त्रे वस्तुतो होमो हविरित्युच्यते ॥१४६॥ महाशून्य अर्थात् २शून्यातिशून्य पदवी (महामाया शक्ति) का चारों तरफ से जिस परतत्त्वात्मक परभैरव स्वरूप वह्नि में विलयन हो जाता है, अर्थात् जहां पहुँच कर शून्याति- शून्य पदवी की भी कोई पृथक् सत्ता नहीं रहने पाती, उस बोधभैरव रूप अग्नि में पंच महा- भूत, इन्द्रिय गण, अनेक विषय, भुवन-तत्त्व आदि संकल्प-विकल्पात्मक सकल जगत् की इन विभागों की कल्पना में प्रधान सहायक मन के साथ आहुति दे देना ही वास्तविक होम या हवि कहलाता है। यज्ञीय होम में घृत आदि की आहुति स्रुवा नाम के लकड़ी के बने पात्र से दी जाती है, उसी तरह से उक्त पदार्थों की यह अद्भुत हवि भी चिति नामक पात्र में रखकर दी जाती है। यह चिति ही सारे विश्व का अनुसन्धान करने वाली चेतना नाम की शक्ति है। इस चेतना में ही समस्त जागतिक पदार्थों को रखकर उनको बोधभैरव रूप अग्नि में लीन कर दिया जाता है, जिससे कि शुद्ध स्वात्मस्वरूप बच रहता है। अद्वय नय के अनुसार यही वास्त- विक होम है, जिससे कि शुद्ध अद्वय तत्त्व के अतिरिक्त सब कुछ भस्म हो जाता है। स्वच्छन्द- तन्त्र में इस होम का निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है— एवं हृदम्बुजावस्थो यष्टव्यो भैरवो विभुः । सबाह्याभ्यन्तरं कृत्वा पश्चाद्यजनमारभेत् ॥ (२।१५४) योगिनीहृदयदीपिका (पृ० २६४) में भी इसी अभिप्राय के दो श्लोक उद्धृत हैं— धर्माधर्महविर्दीप्ते आत्माग्नौ मनसा स्रुचा । सुषुम्णावर्त्मना नित्यमक्षवृत्तीर्जुहोम्यहम् ॥ नैदानैस्तर्पणैः सम्यग् विशुद्धैरमृतात्मभिः । मदहन्तां करोमीदं विश्वं हव्यपुरस्सरम् ॥ १. °दि°—ख० । २. साकं—शि० । ३. °मः स्रुक्च चेतना—ख० शि० ।

  1. महार्थ० परि० (पृ० १२७), स्वच्छन्द० (भा० १, प० २, पृ० ८७), शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३३), योगिनी० दीपिका (पृ० २६४) में यह मिलता है।
  2. शून्यातिशून्य प्रभृति शब्दों की व्याख्या पृ० ४३-४४ की टिप्पणी में की जा चुकी है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)