विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६४ : विज्ञानभैरव इनमें से पहला श्लोक ज्ञानार्णवतन्त्र (२१।२९) और द्वितीय शुभगोदयावासना (श्लो० ३९) में उपलब्ध है। इसी लिए शिव सूत्र (२।८) में इस पांचभौतिक शरीर को हवि बताया गया है। भगवद्गीता में भी— सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ यहाँ ज्ञान से जलाई गई योगाग्नि में सभी बाह्य विषयों की आहुति देने की बात बताई गई है। महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १२७) में भी इस विषय का वर्णन मिलता है ॥१४६॥ यागोऽत्र परमेशानि तुष्टिरानन्दलक्षणा । क्षपणात् सर्वपापानां१ त्राणात् सर्वस्य पार्वति ॥१४७॥ रुद्रशक्तिसमावेशस्तत्क्षेत्रं भावना परा । अन्यथा तस्य तत्त्वस्य का पूजा कश्च तृप्यति ॥१४८॥ हे परमेशानि, उक्तसमाधानोत्था आनन्दलक्षणा तुष्टिरेवात्र यागो देवयजनम् । हे पार्वति, रुद्रप्रमातॄणां पतिरूपाणां या शक्तिरनाश्रिताख्या, तस्यां पशुप्रमातुस्तन्मयी- भवनमेव क्षेत्रम् । हेतुरूपेण क्षेत्रपदं निर्वक्ति—सर्वेषां सर्वविधानां पाशानां क्षपणात्, सर्वस्य प्राणिजातस्य च भवभयत्राणादिति । अर्थादस्मिन् शास्त्रे सर्वविधपाशक्षपणकरः सर्वविधभवभयमोचकश्च १रुद्रशक्तिसमावेशोऽनाश्रितशिवशक्त्यावेश एव क्षेत्रपदेनाभि- धीयते, न च पुनः कुरुक्षेत्रधर्मक्षेत्रादिगमनादि । एतत्सर्वं जप-ध्यान-पूजा-२तर्पण-होम- याग-क्षेत्रादिकं पराया देव्या भावनात्मकमेव विज्ञेयम् । यतो हि अद्वैतसतत्त्वस्य तस्य अन्यथा प्रकारान्तरेण का पूजा कश्च तृप्यति ? पूजनतर्पणादिकं कर्म ततो व्यतिरिक्तं न संभवतीति भावः ॥१४७-१४८॥ हे परमेश्वरि, इस शास्त्र में उक्त समाधि अवस्था में अनुभूयमान आनन्दजन्य सन्तुष्टि ही याग, अर्थात् देवयजन कहा जाता है। इसी प्रकार हे पार्वति, पशुरूपी प्रमाता को जब पूर्व उपदिष्ट किसी उत्कृष्ट भावना के माध्यम से पति रूपी रुद्र प्रमाता (अनाश्रित शिव) १. ॰शानां-ख० ।
- भट्ट आनन्द ने रुद्रशक्तिसमावेश का अर्थ 'रुद्र अर्थात् शिव की सर्वज्ञता प्रभृति छः शक्तियों का प्रादुर्भाव' किया है। शिव के सर्वज्ञता प्रभृतिः छः गुणों का विवेचन पृ० ८ की १ संख्या की टिप्पणी में देखना चाहिये ।
- 'तर्पण' शब्द की दो तरह की व्याख्या की जाती है । एक के अनुसार पूजा देवताओं की तथा तर्पण पितरों के निमित्त किया जाता है। दूसरी व्याख्या के अनुसार कुल, क्रम आदि शास्त्रों में प्रदर्शित तथा प्रस्तुत शास्त्र में भी 'जग्धिपान' (श्लो० ७१) प्रभृति श्लोकों में वर्णित विधि को तर्पण कहते हैं । इससे प्राप्त उल्लास दशा को तृप्ति कहा जाता है ।