भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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१६६ : विज्ञानभैरव १यैरेव पूज्यते द्रव्यैस्तर्प्यते वा परापरः१ । यश्चैव पूजकः सर्वः स एवैकः क्व पूजनम् ॥१५०॥ परापर इति परादेव्या सहितः परः परमेश्वरो भैरवः, यैरेव द्रव्यैः कुसुमादिभिः पूज्यते, क्षीरखण्डादिभिर्वा तर्प्यते, यश्चैव पूजकः सर्वः एकः स एव पूज्यपूजोपकरण- पूजकादिकः सर्व एष भेदस्तस्यैकस्य स्वरूपमित्येतेन तत्त्वज्ञानेन क्व पूजनं स्थूलमार्गेण कस्य पूजनं क्रियेत ? यदा हि सर्वस्य पूज्यपूजादेस्तदेकस्वरूपतया क्वापि भिन्नता नास्ति, तदा उक्तपारमार्थिकपूजाव्यतिरेकेण न किञ्चिदन्यत् पूजनादिकं संभवतीति भावः ॥१५०॥ परापर शब्द का अर्थ है परा देवी के साथ विद्यमान पर, परमेश्वर भैरव भट्टारक । परा देवी के साथ विद्यमान परभैरव की जिन पुष्प, गन्ध, धूप आदि से पूजा की जाती है, अथवा खीर, मिश्री-मावा आदि से भोग लगाया जाता है और जो पूजा करने वाला अथवा भोग लगाने वाला है, यह सब तो एक ही तत्त्व है। पूज्य, पूजन सामग्री और पूजक इस तरह के सभी भेद एक ही तत्त्व के विभिन्न स्वरूप हैं, इस तरह का पारमार्थिक बोध जग जाने पर किससे किसकी पूजा की जायगी ? जब कि इन सभी की एकरूपता के कारण परस्पर कोई भिन्नता नहीं है, तब इस अद्वय नय में प्रदर्शित पूजा के अतिरिक्त स्थूल दृष्टि से सम्पन्न होने वाली पूज्य, पूजन साधन, पूजा, पूजक आदि की परमार्थ दृष्टि से कोई सत्ता नहीं मानी जा सकती। इसी लिये महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १०७) में उद्धृत प्रभाकौल नामक ग्रन्थ में बताया गया है— यावत् तत् परमं शान्तं न विजानन्ति सुन्दरि । तावत् पूजाजपध्यानहोमलिङ्गार्चनादिकम् ॥ विदिते तु परे तत्त्वे सर्वाकारे निरामये । क्व पूजा क्व जपो होमः क्व च लिङ्गपरिग्रहः ॥ अर्थात् हे सुन्दरि, जब तक उस परम शान्त परमार्थ पद को नहीं जान पाते, तभी तक पूजा, जप, ध्यान, होम, लिगपूजा आदि कर्मकाण्ड किये जा सकते हैं। किन्तु जब उस सर्वाकार, निर्विकार, परम तत्त्व का बोध हो जाता है, तब पूजा, जप, होम, वेष-परिवर्तन आदि की कोई उपयोगिता नहीं रह जाती। इस स्थिति में तो पूजा, जप आदि की इस अद्वय भैरवनय में ऊपर बताई परिभाषाएं ही लागू हो सकती हैं ॥१५०॥ व्रजेत् प्राणो विशेज्जीव इच्छया कुटिलाकृतिः । दीर्घात्मा सा महादेवी परं२क्षेत्रं परापरा३ ॥१५१॥ १. ॰वरः-म० । २. परं-ख० । ३. ॰त्परा-ख० ।

  1. योगिनी० दीपिका (पृ० २४४), महार्थ० परि० (पृ० १०७) में प्राप्त है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)