भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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( १५ ) शक्ति की परीक्षा, १अद्भुत, २भयानक, ३आनन्द दायक स्थितियां, ४तिमिर भावना, ५चला- सन प्रभृति में भी धारणा को स्थिर करने की बात यहाँ कहो गई है और बताया गया है कि इनमें से किसी एक भी धारणा में मन को स्थिर करने पर व्यक्ति जीवन्मुक्त हो जाता है । जीवन्मुक्ति से अभिप्राय यहाँ विश्वाहन्ता के विकास से है । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि विज्ञानभैरव भारतीय मनीषा के द्वारा बटोरी गई सभी उत्कृष्ट मणियों का एक उज्ज्वल संग्रह है । यहाँ हम सबसे पहले उपाय-चतुष्टय का परिचय प्रस्तुत करते हैं । त्रिविध उपाय और समावेश उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः । यो भवेत् स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥ उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयन् । यं समावेशमाप्नोति शाक्तः सोऽत्राभिधीयते ॥ अकिञ्चिच्चिन्तकस्यैव गुरुणा प्रतिबोधतः । जायते यः समावेशः शाम्भवोऽसावुदाहृतः ॥ मालिनीविजय तन्त्र (२।२१-२३) के इन तीन श्लोकों में संक्षेप में आणव, शाक्त और शाम्भव उपाय तथा उनकी सहायता से प्राप्त होने वाली त्रिविध समावेश (समाधि) दशाओं का वर्णन किया गया है। अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक में तृतीय से लेकर द्वादश आह्निक तक अत्यन्त विस्तार से और तन्त्रसार (पृ० १०-११४) में अपेक्षाकृत कम विस्तार से, महे- श्वरानन्द ने महार्थमंजरी की चार कारिकाओं (५६-५९) तथा उनकी परिमल व्याख्या (पृ० १३८-१५३) में संक्षेप में इस विषय को समझाया है। इन्हीं ग्रन्थों के आधार पर ऊपर के श्लोकों की व्याख्या करते हुए हम यहाँ इनका अत्यन्त संक्षिप्त परिचय देते हैं । आणव उपाय उच्चार, करण, ध्यान, वर्ण और स्थान-कल्पना का अभ्यास आणव उपाय है । इनमें से किसी एक के अभ्यास से प्राप्त होने वाली एकाग्रता को आणव समावेश दशा कहते हैं । अणु अर्थात् परिमित प्रमाता परिमित स्वरूप वाले बुद्धि, प्राण, देह, देश, प्रभृति को उपाय के रूप में स्वीकार करता है, इसलिये इसको आणव उपाय कहा जाता है। इनमें से ध्यान बुद्धि का व्यापार है । प्राण स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार का होता है । स्थूल प्राण का व्यापार उच्चार है। यह प्राण आदि की वृत्तियों के रूप में प्रकट होता है । सूक्ष्म प्राण को वर्ण शब्द से कहा जाता है । शरीर के अंगों को किसी विशेष प्रकार की स्थिति में १. धारणा संख्या ४२,८९,९२ देखिये । २. धारणा संख्या १०५ देखिये । ३, धारणा संख्या ४०,४५-५० देखिये ४. धारणा संख्या ६०-६३ द्रष्टव्य । ५. धारणा संख्या ५९ द्रष्टव्य । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)