विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १७ ) है। कार्यकारण स्थल में क्रम से और कुहनप्रयोग (इन्द्रजाल से निर्मित पदार्थ) आदि में अक्रम से सभी पदार्थों की कलना करने वाला परमेश्वर का काल नामक स्वरूप सबसे पहले भासित होता है। भगवान् का स्वरूप भेदावस्था में काली शक्ति और भेदावस्था में प्राणशक्ति के नाम से जाना जाता है। संवित्स्वरूपा काली शक्ति में अपनी इच्छा से क्रम और अक्रम रूप से नाना रूपों में भासित होने के लिये क्रिया शक्ति का उन्मेष होता है। इस क्रिया शक्ति का प्रथम उन्मेष प्राण व्यापार है। 'प्राक् संवित् प्राणे परिणता' कल्लट के इस वचन में यही बात प्रतिपादित है। यह प्राणशक्ति अपने प्राण, अपान आदि पाँच रूपों में जीव को आप्यायित किये रहती है। इसी के रहने पर यह चेतन कहलाता है। इस क्रिया शक्ति के पूर्व भाग में कालाध्वा और उत्तर भाग में देशाध्वा की स्थिति है। कालाध्वा में पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप वर्ण, मन्त्र और पद की तथा देशाध्वा में कला, तत्त्व और भुवन की स्थिति है। शब्द और अर्थ स्वरूप शिव और शक्ति में व्याप्यव्यापक भाव से पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप से विद्यमान वर्ण, पद, मन्त्र और कला, तत्त्व, भुवन नामक षडध्व का विवेचन हम ५५-५६ संख्या के श्लोकों की व्याख्या में कर चुके हैं। इस तरह से प्रक्रिया भेद से यहाँ देशाध्वा और कालाध्वा के रूप में षडध्व का प्रतिपादन किया गया है। यह सारा षडध्वात्मक जगत् इस क्रिया शक्ति का ही उन्मेष है। सारे षडध्वात्मक जगत् में बाहर-भीतर सब जगह प्राणशक्ति का स्पन्द सतत प्रवृत्त है, तो भी हृदय प्रभृति स्थानों में ही इसके स्फुरण की अनुभूति होती है। १प्राणशक्ति के स्फुरण में ईश्वर की शक्ति, जीव की शक्ति और उसका प्रयत्न इन तीनों की उपयोगिता है। हृदय प्रभृति स्थानों में स्पन्दमान इस प्राणशक्ति में चित्त को विलीन कर देना भी स्थान-कल्पना नामक आणव उपाय का अंग है। इसी तरह से शरीर के भीतर विद्यमान नाडी, चक्र प्रभृति स्थानों में और लिंग, चत्वर, प्रतिमा आदि में चित्त को नियोजित करना भी स्थान-कल्पना के अन्तर्गत है। वस्तुतः बुद्धि, प्राण देह प्रभृति की कोई पारमार्थिक सत्ता नहीं है। ये सब विक- ल्पात्मक हैं। तो भी इनके सहारे २परमार्थ स्वरूप तक पहुँचा जा सकता है। इन विकल्पात्मक स्थूल उपायों को ही यहाँ आणव उपाय कहा गया है। शाक्त उपाय सत्तर्क, सदागम और सद्गुरु की सहायता से जब साधक उक्त उच्चार, करण प्रभृति विकल्प व्यापारों का शोधन कर लेता है, अर्थात् इन सब में स्वात्मस्वरूप का ही दर्शन करने लगता है, तो उसके चित्त में विश्वाहन्ता का विकास होता है। वह जान जाता है कि यह सारा विश्व मेरा ही स्वरूप है, मेरा शुद्ध स्वात्मस्वरूप तो इससे भी परे है। इस तरह १. धारणा संख्या ११२ द्रष्टव्य । २. अपारमार्थिकेऽप्यस्मिन् परमार्थः प्रकाशते । (तन्त्रा० ५।७) बुद्धौ प्राणे तथा देहे देशे वा जडता स्थिता । तां तिरोधाय मेधावी संविद्रश्मिमयो भवेत् ॥ (तन्त्रा० ५।१० विवेक में उद्धृत)