विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १८ ) सर्वात्म्य भावना के सहारे साधक के चित्त में शुद्ध¹ विकल्पों की सृष्टि होने लगती है, अर्थात् वह सभी जागतिक पदार्थों को अपने शुद्ध स्वरूप से पृथक् नहीं देखता, उन सब में अपने शुद्ध स्वरूप की ही भावना करता है । शाम्भव उपाय यह सारा जगत् शिवमय है, विज्ञानभैरव स्वरूप है । यह जगत् बोधगगन में उसी प्रकार प्रकाशित हो रहा है, जैसे कि दर्पण में मुँह का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है । जिसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है और जो किसी दूसरे पदार्थ में संक्रान्त होकर ही प्रकाशित होता है, उसको प्रतिबिम्ब² कहते हैं । जैसे कि दर्पण आदि में दिखाई पड़ने वाली प्रतिकृति की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है और दर्पण आदि में संक्रान्त होने पर वह दिखाई पड़ती है । बिम्ब की स्वतन्त्र सत्ता होती है । यह बिना किसी की सहायता के प्रकाशित होता है । जैसे कि मुख स्वयं भासित होता है । इसको प्रकाशित करने के लिये दर्पण जैसे पदार्थ की आवश्यकता नहीं पड़ती । यह विश्व भी दर्पण में प्रतिबिम्बित नगरी के समान शिवमय दर्पण में भासित हो रहा है । यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि दर्पण में भासित हो रहा प्रतिबिम्ब (मुख की प्रतिकृति) बिना बिम्ब (मुख) के प्रकाशित नहीं होता । इसी तरह से दर्पणस्थानीय शिव में प्रकाशित हो रहे प्रतिबिम्बस्थानीय इस जगत् के बिम्ब की भी सत्ता होनी चाहिये । आप यह बताइये कि यह बिम्बस्थानीय पदार्थ क्या है ? शास्त्रकारों ने इसका उत्तर यह दिया है कि वस्तु के स्वभाव के संबन्ध में प्रश्न करना व्यर्थ है । आग गरम होती है । पानी ठंडा होता है । यह इनका स्वभाव है । इस तरह से शिव का यह स्वभाव है कि वह अपने में ही अपने विज्ञानमय स्वरूप को जगत् के रूप में भासित होने देता है । ईश्वर की स्वातन्त्र्य शक्ति का ही यह सारा खेल है कि शिवमय दर्पण में बिना किसी बिम्ब की सत्ता के भी यह जगत् रूपी प्रतिबिम्ब भासित होता है । इस दृष्टि से विचार करने पर शिव के निर्विकल्प स्वरूप के अतिरिक्त इस जगत् की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है । इस निर्विकल्प शून्य³ स्थिति में अपने चित्त को समाहित करने का प्रयास ही शाम्भव उपाय है । त्रिविध समावेश इन तीनों उपायों के उदाहरण के रूप में २४ वें श्लोक की छः प्रकार की व्याख्या की गई है । उनको और यथास्थान दी गई टिप्पणियों को देखने से इन उपायों के स्वरूप को १. धारणा संख्या ३९, ७०-७६, ९७ द्रष्टव्य । २. तन्त्रसार में अभिनवगुप्त ने प्रतिबिम्ब का लक्षण यह किया है—‘‘यद भेदेन भासितु- मशक्तमन्यव्यामिश्रत्वेनैव भाति तत् प्रतिबिम्बम्, मुखरूपमिव दर्पणे’’ (पृ० १०) । तन्त्रा- लोक में बिम्ब का लक्षण इस प्रकार है—‘‘अन्यामिश्रं स्वतन्त्रं सद्भासमानं मुखं यथा’’ (३।५३) । ३. धारणा संख्या ३६, ८४-८५, ८७, १०१-१०८, ११०-११२ देखिये ।