भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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( १९ ) समझने में सहायता मिलेगी । इन उपायों का सहारा लेकर साधक आणव, शाक्त और शाम्भव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है । भगवद्गीता (९।२३ तथा १२।३-५) में बताया गया है कि अन्य देवताओं की उपासना करने से और अक्षर ब्रह्म की उपासना करने से भी भगवत्पद की ही प्राप्ति होती है, किन्तु इनमें अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है । इसी तरह से आणव प्रभृति विभिन्न उपायों का सहारा लेने पर भी साधक को एक ही परम पद की प्राप्ति होती है । फल की प्राप्ति में कोई भेद नहीं रहता । उपायों के अनुष्ठान में ही तरतमभाव रहता है । उपायों की भिन्नता में शक्तिपात के तीव्र, मध्य, मन्द आदि भेदों को ही कारण माना जाता है । ऐसा कहा जा सकता है कि मन्द शक्तिपात होने पर आणव उपाय का, मध्य शक्तिपात में शाक्त उपाय का और तीव्र शक्तिपात में शाम्भव उपाय का सहारा लेने में साधक समर्थ हो जाता है । इन सबका प्रयोजन स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होना है । अनुपाय प्रक्रिया से भी वही स्वात्मस्वरूप प्रकाशित होता है और आणव उपाय से भी । इस प्रकार आलम्बन का भेद होने पर भी समावेश दशा में कोई भेद नहीं रहता । आणव समावेश, शाक्त समावेश और शाम्भव समावेश दशा एक ही है । उपायों के भेद के कारण समावेश दशा में भेद आरोपित कर लिया जाता है । इसी अभिप्राय को व्यक्त करते हुए अभिनवगुप्त ने तन्त्रसार (पृ० ४३) में कहा है— नैषां परफलविधौ कापि हि भिदा । अनुपाय प्रक्रिया अनुपाय पद की निरुक्ति हम व्याख्या (पृ० ३) में कर चुके हैं । वहाँ यह भी बता चुके हैं कि सिद्ध साहित्य में प्रचलित 'सहज' शब्द को हम अनुपम शब्द का पर्याय मान सकते हैं । किन्तु इस कथन को सिद्ध करने के लिये प्रमाण अपेक्षित हैं । तन्त्रसार (पृ० ८-९) में अनुपाय प्रक्रिया का विवेचन इस तरह से किया गया है—तीव्र शक्तिपाद के होने पर साधक गुरु के एक बार के उपदेश से ही नित्योदित समावेश दशा में लीन हो जाता है । उपाय के रूप में वह षडंग १ योग में प्रतिपादित तर्क नामक अंग का सहारा लेता है । वह सोचता है कि स्वयंप्रकाश स्वात्मस्वरूप ही तो परमेश्वर है । इसके लिए किसी उपाय की क्या आवश्यकता है ? यह स्वात्मस्वरूप नित्य, स्वयं-प्रकाश, निरावरण तत्त्व है । इसलिये किसी उपाय से इसके स्वरूप की प्राप्ति (लाभ) या प्रतीति (ज्ञप्ति) होगी, अथवा किसी आवरण को हटाया जायगा, इन सब बातों का कोई प्रसंग नहीं है । इस स्वात्म- स्वरूप में लीन (अनुप्रवेश) होने का भी कोई प्रसंग नहीं है, क्योंकि शुद्ध स्वात्मस्वरूप के अतिरिक्त उसमें प्रविष्ट होने वाले की अलग से कोई सत्ता नहीं है । फिर उपाय भी तो उससे अलग नहीं हैं । इसलिए यह सारा जगत् चिन्मात्र सार है। काल इसकी कलना नहीं कर सकता । देश इसको परिच्छिन्न नहीं कर सकता । उपाधि इसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती । इसकी कोई आकृति नहीं है । शब्दों की सहायता से इसको समझा नहीं जा सकता और न किसी प्रमाण की १. षडंग योग और तर्क का परिचय आगे दिया जा रहा है ।