विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २० ) ही यहाँ प्रवृत्ति हो सकती है। स्वतन्त्र, आनन्दघन यह स्वात्मस्वरूप ही काल से लेकर प्रमाण पर्यन्त ऊपर बताये गये सभी तत्त्वों को स्वरूप प्रदान करने वाला है। मैं इस स्वात्मस्वरूप से भिन्न नहीं हूँ और इस अहमात्मक स्वात्मस्वरूप में ही यह सारा विश्व प्रतिबिम्बित हो रहा है। इस तरह की प्रत्यभिज्ञा के जाग्रत् होने पर साधक नित्योदित पारमेश्वर स्वरूप में समा-¹ विष्ट हो जाता है। इसके लिये मन्त्र, पूजा, ध्यान, चर्या आदि की कोई आवश्यकता नहीं रहती ! इस प्रकरण का उपसंहार अभिनवगुप्त ने इस श्लोक के साथ किया है— उपायजालं न शिवं प्रकाशयेद् घटेन किं भाति सहस्रदीधितिः । विवेचयन्नित्यमुदारदर्शनः स्वयंप्रकाशं शिवमाविशेत् क्षणात् ॥ इसकी व्याख्या हम पृ० १३५ पर कर चुके हैं। श्लो० १२०-१२१ की व्याख्या में मालिनीविजय प्रभृति ग्रन्थों के प्रमाण पर इस अनु- पाय प्रक्रिया का विशद विवेचन किया गया है। स्वच्छन्दतन्त्र, संकेतपद्धति, तन्त्रालोक, महार्थमंजरी प्रभृति अनेक ग्रन्थों में इसका प्रतिपादन किया गया है। आगे हम यह सिद्ध करने का प्रयास करेंगे कि उपक्रम, उपसंहार प्रभृति षड्विध लिंग की मीमांसक पद्धति से इस शास्त्र का विनियोग अनुपाय प्रक्रिया के प्रतिपादन में ही है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि यह अनुपाय प्रक्रिया सहज योग से भिन्न नहीं है। अभिनवगुप्त प्रभृति ने इन उपायों का जिस तरह का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है, उसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि उन्होंने आणव उपाय में क्रम और कुल दर्शन से भिन्न समस्त तान्त्रिक और यौगिक विधियों का समावेश किया है। शाक्त उपाय के रूप में क्रमदर्शन की, शाम्भव उपाय के रूप में उन्होंने कुलदर्शन की व्याख्या की है और प्रत्यभिज्ञा दर्शन को अनुपाय प्रक्रिया माना है। हमने ऊपर बताया था कि यहाँ प्रदर्शित सभी धारणाओं का उक्त उपाय-चतुष्टय में समावेश किया जा सकता है, किन्तु इस ग्रन्थ में अन्य अनेक योग-विधियों का भी समावेश है। उपर्युक्त प्रतिपादन से हमारी यह बात पुष्ट हो जाती है। अब हम विज्ञानभैरव में वर्णित धारणाओं के प्रमुख विषयों का यहाँ वर्णन करना चाहते हैं। सबसे पहले हम प्राणशक्ति को लेते हैं। प्राणशक्ति या प्राणकुण्डलिनी अनच्क पद की और आणव उपाय की व्याख्या के प्रसंग में प्राणशक्ति के सम्बन्ध में कहा जा चुका है। इसको कुण्डलिनी इसलिये कहते हैं कि मूलाधार स्थित कुण्डलिनी की तरह इसकी भी आकृति कुटिल होती है। जिस प्राण वायु का अपान अनुवर्तन करता है, उसकी गति १. धारणा संख्या ४१, ९७-९९, १०९ देखिये ।