भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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( ३० ) विज्ञान विज्ञानभैरव संमत विज्ञान की व्याख्या पहले की जा चुकी है, किन्तु ७४वीं धारणा बौद्ध संमत विज्ञान को अपना विषय बनाती है। विज्ञानवादी बौद्ध दार्शनिक मानते हैं कि घट आदि के ज्ञान का कोई आधार नहीं है, क्योंकि वस्तुतः किसी स्थिर आत्मा अथवा घट आदि वस्तुओं की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। चक्षु, आलोक (प्रकाश) आदि पदार्थों की भी वास्तविक सत्ता नहीं है। इसलिये यह सब कुछ भ्रमात्मक है, अत एव विकल्पस्वरूप है। ‘यह वही घट है’ इस तरह का ज्ञान ‘यह वही गंगा का प्रवाह है’ इस ज्ञान की तरह भ्रमा- त्मक ही माना जायगा। अर्थात् गंगा के प्रवाह में जैसे ‘यह वही प्रवाह है’ यह प्रत्यभिज्ञा भ्रान्ति-कल्पित है, उसी तरह से घट, पट, देवदत्त आदि की प्रत्यभिज्ञा को भी भ्रमात्मक ही मानना चाहिये। इस तरह से अन्ततः सब कुछ विज्ञानात्मक ही सिद्ध होता है। इस विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी की भी सत्ता वास्तविक नहीं है। शून्य शून्य और शून्यातिशून्य (महाशून्य) शब्दों का यहाँ अनेक अर्थों में प्रयोग हुआ है। आणव उपाय और मध्यनाडी सुषुम्णा के प्रसंग में आये इन शब्दों की व्याख्या पहले की जा चुकी है। स्वच्छन्दतन्त्र (७।५७) की टीका में क्षेमराज ने शून्य को माया का और शून्याति- शून्य को महामाया का बोधक माना है। समना पर्यन्त ¹अर्धमात्रा की स्थिति शून्य में और उन्मना की स्थिति शून्यातिशून्य पदवी में मानी गई है। मध्य धाम सुषुम्णा और शिव तत्त्व के अर्थ में भी क्रमशः शून्य और शून्यातिशून्य शब्दों का प्रयोग मिलता है। ३५वें श्लोक में मध्यनाडी के भीतर चिदाकाश रूप शून्य का निवास माना गया है। ३९वें श्लोक में शून्याति- शून्य के उच्चारण का तात्पर्य उन्मना पर्यन्त पिण्ड मन्त्र के उच्चारण के अभ्यास से है। ४२वें श्लोक में उन्मना की स्थिति शून्यावस्था में मानी गई है और उसको ‘शून्या’ कहा गया है। इसी स्थल पर शिव तत्त्व को शून्यातिशून्य बताया है। ४९वें श्लोक में द्वादशान्त पद का अर्थ शून्यातिशून्य मध्यधाम, अर्थात् सुषुम्णा नाडी किया है। कुण्डलिनी शक्ति अथवा प्राणकुण्डलिनी मध्यनाडी सुषुम्णा के सहारे द्वादशान्त नामक शून्यातिशून्य धाम में पहुँचती है। इसलिये औपचारिक रूप से यहाँ उसको भी शून्यातिशून्य कह दिया गया है। वस्तुतः इस शब्द का मुख्य प्रयोग द्वादशान्त धाम या उसमें अभिव्यक्त होने वाले शिवस्वरूप के लिये ही होता है। ६१वें श्लोक में मध्य धाम को शून्य स्वरूप बताया है और १४६वें श्लोक में महामाया शक्ति को महाशून्य, अर्थात् शून्यातिशून्य पदवी कहा है। विज्ञानभैरव संमत शून्य तत्त्व परमार्थतः अभावात्मक नहीं है, किन्तु ²सभी आलम्बन धर्मों से, सभी तत्त्वों से और सभी क्लेशाशयों से शून्य पदार्थ को ही ‘शून्य’ कहा गया है। १. दुर्गा सप्तशती की टीका में भास्करराय ने भी अर्धचन्द्र प्रभृति आठ ध्वनियों को अर्धमा- त्रात्मक और अनुच्चार्य माना है। २. “सर्वालम्बनधर्मैश्च सर्वतत्त्वैरशेषतः। सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥” शैवागम